सत्यं शिवं सुन्दरम्: भीतर छिपी चेतना की खोज
प्रस्तावना: आदिम भय से सत्य की खोज तक यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक गहरी खामोशी में लिपटा हुआ था, जहाँ मनुष्य ने जब पहली बार अपनी आँखें खोलीं, तो उसके भीतर एक विस्मय था, एक असीम कौतूहल था। प्रकृति का वैभव उसके सामने बिखरा पड़ा था। विशाल नदियाँ, गरजते हुए बादल, धधकती अग्नि और नीले आकाश के उस पार चमकता हुआ सूर्य—इन सबने मानव मन को विस्मित भी किया और भयभीत भी। वैदिक काल के उस उषाकाल में, जब मनुष्य ने सभ्यता की दहलीज पर पहला कदम रखा था, तब आज के आधुनिक मंदिर अस्तित्व में नहीं आए थे। उस समय 'भगवान' जैसा कोई निश्चित शब्द भी मानव की जुबान पर नहीं चढ़ा था। हमारे पूर्वज सरल थे, उनका बोध सीधा और स्पष्ट था। वे किसी अदृश्य, काल्पनिक सत्ता के पीछे नहीं भागे, बल्कि उन्होंने केवल उन प्राकृतिक और भौतिक शक्तियों की उपासना शुरू की, जिनसे उनका खुद का अस्तित्व बना था। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश—ये पांच तत्व ही उनके रक्षक थे और इन्हीं में उनकी आस्था थी। विशेषकर, अंधकार को चीरने वाले प्रकाश के महापुंज, अग्नि के साक्षात प्रतीक 'सूर्य' की पूजा मुख्य तौर पर की जाती थी। परंतु, जैसे-जैसे समय का चक...