गुरु पूर्णिमा: महत्व, पौराणिक इतिहास और महर्षि वेदव्यास की महिमा | Sen Saarthi
सांकेतिक संपादन गुरु पूर्णिमा: अज्ञान के अंधकार से बोध के प्रकाश तक समय की अनंत लहरों के बीच, जब मानव मन संशयों, भ्रमों और सांसारिक विषमताओं के घने कुहासे में भटकने लगता है, तब उसे किसी ऐसे संबल की तलाश होती है जो बिना किसी स्वार्थ के उसका हाथ थाम सके। भारतीय मनीषा ने सदियों के गहन आत्म-मंथन के बाद उस संबल को एक नाम दिया—'गुरु'। हमारी सनातन संस्कृति में गुरु का स्थान केवल सर्वोच्च ही नहीं है, बल्कि उसे माता-पिता के स्नेहिल और जीवनदायी संरक्षण से भी ऊपर का दर्जा दिया गया है। माता-पिता हमें यह भौतिक शरीर देते हैं, वे हमें इस संसार में आने का माध्यम बनते हैं; परंतु गुरु हमारे भीतर उस 'चैतन्य' को जगाते हैं, जो हमें इस संसार के पार देखने की दृष्टि प्रदान करता है। सदियों से चली आ रही हमारी ऋषियों की पावन परंपरा में गुरु को 'देवतुल्य' या केवल देवताओं का दूत नहीं, बल्कि स्वयं साक्षात त्रिगुणमयी सत्ता माना गया है। वे सृजन के प्रतीक ब्रह्मा हैं जो शिष्य के भीतर ज्ञान के नए अंकुर बोते हैं; वे पालनकर्ता विष्णु हैं जो उस ज्ञान की रक्षा और पोषण करते हैं; और वे संहारक मह...