समय का पाठ (भाग 3) : कर्म से बदला नसीब

समय का पाठ भाग 3 कहानी के लिए मिट्टी की झोपड़ी में दीये की रोशनी में अपने छोटे भाई दयाल को पुस्तक थमाता 12 साल का दीपक, पास में बैठकर भावुक आँखों से देखती माँ। सेन सारथी (Sen Saarthi) ब्रांडिंग।


लेखक की दो बातें...

​गरीबी इंसान से उसकी उम्र और मासूमियत छीन लेती है, लेकिन अगर नीयत में ईमानदारी और मन में स्वाभिमान हो, तो वही परिस्थिति इंसान को वक्त से पहले परिपक्व और महान बना देती है। यह कहानी किसी व्यक्ति या स्थान विशेष को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के उस यथार्थ को दर्शाने के लिए लिखी गई है जहाँ मेहनत, सही संस्कार और शिक्षा ही हर अभाव का अंतिम उत्तर बनते हैं।

​क्या 12 साल का दीपक अपनी भूख की तड़प से उठकर समाज के ताने सहते हुए अपने परिवार की तकदीर बदल पाएगा? फकीर बाबा का वह कौन सा एक विचार था जिसने इस नन्हे बच्चे को कारखाने और सेठ की हवेली तक पहुँचा दिया? स्वाभिमान, संघर्ष और पारिवारिक प्रेम की यह मर्मस्पर्शी यात्रा आपको जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने पर मजबूर कर देगी।



रात का सन्नाटा गहरा हो चुका था। मिट्टी की झोपड़ी के कोने में बिछी पुरानी चटाई पर 12 साल का दीपक करवटें बदल रहा था। उसकी आँखों से नींद गायब थी। रह-रहकर उसके दिमाग में आज दोपहर घटी घटनाएँ किसी चलचित्र की तरह घूम रही थीं।

दीपक को याद आ रहा था कि जब वह दोपहर की कड़कती धूप में कारखाने के लोहे के विशालकाय गेट के बाहर बेबस खड़ा था, तब धनसुख चाचा की डांट ने उसे अंदर तक हिला दिया था। लेकिन जब उसने अपने घर की तंगहाली और छोटे भाई के भूखे पेट की बात बताई, तो धनसुख चाचा का कठोर दिल मोम की तरह पिघल गया था।

चाचा उसे सामने वाले टी-स्टॉल पर ले गए थे, भरपेट खाना खिलाया था और फिर शाम को कारखाने की ड्यूटी खत्म होने के बाद प्यार से हाथ पकड़कर गाँव वापस लाए थे।

दीपक ने अंधेरे में अपनी हथेलियों को देखा। धनसुख चाचा ने रास्ते में उससे वादा किया था कि वे उसे एक बहुत ही सज्जन सेठ के घर काम पर लगवा देंगे। दीपक की आँखों के सामने फकीर बाबा का चेहरा कौंध गया। बाबा ने कहा था— "भगवान किसी की किस्मत खराब नहीं बनाते, इंसान अपने कर्म से अपना नसीब खुद लिखता है।" दीपक ने मन ही मन ईश्वर का शुक्रिया अदा किया और एक गहरी और सुकून भरी साँस लेकर सो गया।

अगली सुबह, पौ फटने से पहले ही दीपक उठ गया। उसने कुएँ के ठंडे पानी से मुँह-हाथ धोया और फटी हुई कमीज़ को करीने से सुखाकर पहन लिया।

दीपक चुपचाप झोपड़ी से बाहर निकला। धनसुख चाचा ने उसे सख्त हिदायत दी थी कि वे गाँव के अंदर एक साथ नहीं चलेंगे। गाँव के पंचायत भवन के पास, जो टोले से लगभग 100-150 मीटर दूर था, दीपक नीम के पेड़ के नीचे खड़ा होकर चाचा का इंतज़ार करने लगा।

कुछ ही देर में धनसुख चाचा वहाँ पहुँचे। उन्होंने आसपास देखा और धीमी आवाज़ में बोले, "चलो दीपक।"

दोनों सेठ के घर की तरफ पैदल चलने लगे। गाँव की पगडंडी पर धूल उड़ाते हुए चलते समय धनसुख चाचा ने दीपक के कंधे पर हाथ रखा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी गंभीरता थी।

"देख दीपक," धनसुख बोले, "मैं जानता हूँ कि तुम्हारी चाची थोड़ी कड़क मिज़ाज की हैं। अगर वे तुम्हें मेरे साथ देखतीं, तो घर में फालतू की खटपट शुरू हो जाती। इसलिए मैंने तुम्हें पंचायत भवन पर बुलाया। तुम मेरी इस बात का बुरा मत मानना।"

"नहीं चाचा, मैं सब समझता हूँ। आप मेरे लिए इतना कर रहे हैं, वही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है," दीपक ने निश्छल भाव से कहा।

धनसुख ने एक लंबी साँस खींची और आगे बोले, "बेटा, मेरा जी नहीं चाहता कि तुम्हें इस छोटी सी उम्र में काम पर झोंका जाए। लेकिन हम गरीबों का जीवन ही ऐसा होता है—रोज़ कुआँ खोदना और रोज़ पानी पीना। जिस दिन हाथ शांत बैठ गए, उस दिन चूल्हा ठंडा पड़ जाएगा।"

धनसुख ने दीपक की आँखों में झाँकते हुए कहा, "लेकिन एक बात हमेशा याद रखना दीपक... धन से बड़ा दुनिया में कोई जाल नहीं होता, और शिक्षा से बड़ा कोई हथियार नहीं होता। आज तुम्हारी परिस्थितियाँ तुम्हें काम करने पर मजबूर कर रही हैं, यह सही है। लेकिन जैसे ही तुम्हारे घर का बुरा समय ढले, तुम काम के साथ-साथ पढ़ाई का दामन थाम लेना। यह संसार तुम्हें भीख दे सकता है, लेकिन तुम्हारे जीवन का भार नहीं उठा सकता। इसलिए पैसे के जाल में मत फँसना, विद्या का रास्ता चुनना।"

दीपक ने चाचा की बातें अपने दिल की गहराई में उतार लीं और सिर हिलाकर बोला, "जी चाचा, मैं आपकी बात हमेशा याद रखूँगा।"

लगभग आधा घंटा पैदल चलने के बाद दोनों एक बड़े से मुख्य द्वार के सामने पहुँचे। सामने एक विशालकाय हवेलीनुमा घर खड़ा था। धनसुख ने दरवाज़े की कुंडी खटखटाई।

अंदर से एक रौबीली लेकिन सौम्य आवाज़ आई, "कौन है?"

दरवाज़ा खुला और सामने सफ़ेद कुर्ते-पायजामे में ढले सेठजी खड़े थे।

"नमस्ते सेठजी!" धनसुख ने सिर झुकाकर आदर से प्रणाम किया।

"नमस्ते, नमस्ते धनसुख! आओ बैठो," सेठजी ने बरामदे में रखी लकड़ी की कुर्सियों की तरफ इशारा करते हुए कहा। "बहुत दिनों बाद दिखाई दिए? सब ख़ैरियत?"

धनसुख कुर्सी के कोने पर संकोच से बैठते हुए बोला, "हाँ सेठजी, सब ऊपर वाले की दया है।"

सेठजी ने अंदर की तरफ मुड़कर आवाज़ लगाई, "अजी सुनती हो! चाय और थोड़ा नाश्ता लेकर आना।"

"अरे नहीं-नहीं सेठजी, चाय-नाश्ते की ज़हमत मत उठाइए," धनसुख ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा। "मुझे कारखाने की ड्यूटी पर भी पहुँचना है और शाम होने से पहले घर भी लौटना है। दरअसल, मैं एक खास काम से आया था। आपने पिछले हफ़्ते ज़िक्र किया था कि आपको घर की देखभाल और साफ़-सफ़ाई के लिए किसी ईमानदार लड़के की ज़रूरत है?"

सेठजी की उत्सुकता बढ़ी, "हाँ-हाँ, बिल्कुल! मुझे ज़रूरत तो है। क्या तुम्हें कोई मिला?"

धनसुख ने दीपक को आगे बढ़ाते हुए कहा, "सेठजी, यह हमारे टोले का ही बच्चा है—दीपक। बहुत ही होनहार, लगनशील और सच्चा लड़का है। इसे आप अपना ही भतीजा समझिए।"

सेठजी ने चश्मा ठीक करते हुए दीपक को ऊपर से नीचे तक देखा। उनके चेहरे पर असंतोष के भाव आ गए। "अरे धनसुख! यह तो अभी बहुत छोटा बच्चा है। मैं इससे काम कैसे ले सकता हूँ? बाल-मजदूरी पाप है। किसी बड़े आदमी को भेजो।"

दीपक का दिल बैठने लगा। उसे लगा कि उसके हाथ से उम्मीद की यह आखिरी किरण भी छूट रही है।

धनसुख ने मिन्नत करते हुए कहा, "सेठजी, यह कोई भारी-भरकम काम थोड़े ही करेगा। घर में झाड़ू लगाना, थोड़ा-बहुत सामान इधर-उधर रखना बस यही तो है। इसके सिर पर अपने भूखे परिवार को संभालने की बहुत बड़ी लाचारी है। मैं तो गरीब हूँ, इसे सहारा नहीं दे सकता, लेकिन आपके यहाँ इसे दो रोटी और थोड़े पैसे मिल जाएँगे तो इस गरीब का घर बच जाएगा।"

दीपक भी दोनों हाथ जोड़कर, रुँधे गले से गिड़गिड़ाया, "सेठजी! कृपया मुझे काम पर रख लीजिए। मैं बहुत मन लगाकर काम करूँगा। आपको कभी शिकायत का मौका नहीं दूँगा।"

दीपक की आँखों में छलकती मासूमियत, लाचारी और स्वाभिमान का अनोखा मिश्रण देखकर सेठजी का दिल पसीज गया।

सेठजी ने एक गहरी साँस ली और मुस्कुराकर बोले, "ठीक है धनसुख, सिर्फ तुम्हारे कहने पर और इस बच्चे की लगन देखकर मैं इसे रख रहा हूँ। लेकिन सुनो, मैं इसे अपने घर का नौकर नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य की तरह रखूँगा। कल सुबह से इसे भेज देना।"

धनसुख का चेहरा खुशी से खिल उठा। "बहुत-बहुत धन्यवाद सेठजी! मैं रोज़ सुबह कारखाने जाते समय इसे यहाँ छोड़ दिया करूँगा और शाम को 6 बजे छुट्टी के वक्त इसे अपने साथ वापस घर ले जाया करूँगा। मेरे आने से पहले इसे अकेले बाहर मत निकलने दीजिएगा।"

"हाँ-हाँ, बेफिक्र रहो," सेठजी ने मुस्कुराते हुए दीपक से पूछा, "बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?"

"दीपक... सेठजी," उसने धीमी आवाज़ में कहा।

"कुछ खाओगे बेटा?" सेठजी ने पूछा।

"नहीं अंकल, मैं घर से खाकर आया हूँ," दीपक ने बहुत ही शिष्टता से मना किया।

सेठजी ने पास के पेड़ से दो ताज़े, पके हुए अमरूद तोड़े। एक उन्होंने दीपक के नन्हे हाथों में थमाया और दूसरा धनसुख की तरफ बढ़ा दिया। "लो, रास्ते में खाते हुए जाना।"

"शुक्रिया सेठजी," धनसुख और दीपक अमरूद लेकर सेठजी के घर से बाहर निकल आए।

कुछ महीनों बाद...

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। दीपक हर रोज़ सुबह धनसुख चाचा के साथ सेठजी के घर जाता, दिन भर ईमानदारी और लगन से काम करता, और शाम को उन्हीं के साथ मुस्कुराता हुआ घर लौटता।

धीरे-धीरे दीपक की मेहनत रंग लाने लगी। हर महीने मिलने वाले पैसों से घर की दयनीय स्थिति पूरी तरह सुधर गई। झोपड़ी में अब दोनों वक्त चूल्हा जलने लगा था, छोटे भाई के लिए दूध और दवाइयों का इंतज़ाम हो गया था।

लेकिन सबसे बड़ा बदलाव आया था गाँव और पड़ोसियों के नज़रिए में।

जो पड़ोसी कल तक दीपक और उसकी माँ को देखकर मुँह फेर लेते थे, वही पड़ोसी अब उनके दरवाज़े पर आकर हाल-चाल पूछते थे। जिस चाची ने दो मुट्ठी चावल देने से मना करके दरवाज़ा पटक दिया था, आज वही चाची दीपक की माँ के पास घंटों बैठकर सुख-दुख की बातें करती थीं और अपने घर के हर मांगलिक कार्यक्रम में सबसे पहला न्योता दीपक के घर देने आती थीं।

एक शाम, जब दीपक काम से लौटकर आया, तो उसने देखा कि उसकी माँ कोने में बैठी अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछ रही थीं।

दीपक घबराकर माँ के पास गया और उनके घुटनों पर सिर रखते हुए बोला, "क्या हुआ माँ? तुम रो क्यों रही हो? क्या किसी ने तुमसे कुछ कहा?"

माँ ने दीपक का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया और उसके माथे को चूमते हुए गद्गद स्वर में बोलीं, "नहीं मेरे लाल... ये दुख के आँसू नहीं हैं। आज तूने यह साबित कर दिया कि अपनी मेहनत से कमाकर खाई गई सूखी रोटी में जो स्वाभिमान और इज़्ज़त है, वह दूसरों के आगे हाथ फैलाने में नहीं।"

माँ की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वे बोलीं, "बेटा, आज मैं तेरी ज़िद और तेरे विचारों के सामने हार गई। लेकिन मुझे अपनी इस हार पर इतना गर्व हो रहा है जितना दुनिया की किसी जीत पर नहीं होता। आज तेरी वजह से इस घर को समाज में सिर उठाकर जीने का हक़ मिला है।"

दीपक ने बहुत ही नम्रता से अपनी माँ के आँसू पोंछे और बोला, "नहीं माँ! ऐसा मत कहो। मैंने तो सिर्फ काम किया है, लेकिन मुझे सही संस्कार और परवरिश तो तुमने ही दी है। याद है माँ? जब मैं बिना बताए घर से भागा था, तब तुमने अपने आँसुओं को मेरे रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया था। तुमने मुझे काम करने की आज़ादी दी।"

दीपक की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। वह आगे बोला, "मुझे आज भी उस फकीर बाबा की बात याद आती है माँ... उन्होंने कहा था कि ईश्वर किसी का नसीब ख़राब नहीं करते, इंसान अपनी मेहनत से अपना नसीब खुद बनाता है। जैसे भगवान हमारे कर्मों में कोई बाधा नहीं डालते, वैसे ही तुमने भी मुझे काम करने से नहीं रोका। माँ, मैंने कभी ईश्वर को नहीं देखा, लेकिन मेरे लिए तो ईश्वर का रूप तुम ही हो।"

"मेरा प्यारा बच्चा!" माँ ने भावुक होकर दीपक को अपने सीने से लगा लिया। झोपड़ी का कोना-कोना उस वात्सल्य और प्रेम से महक उठा।

माँ ने खुद को सँभाला और मुस्कुराते हुए बोलीं, "चलो, अब बहुत बातें हो गईं। मैं तुम दोनों भाइयों के लिए खाना परोसती हूँ। आज दोनों साथ बैठकर खाओ।"

खाट पर बैठा छोटा भाई दयाल तुतलाते हुए बोला, "नहीं माँ! सिर्फ हम दोनों भाई नहीं, आज तू भी हमारे साथ एक ही थाली में खाएगी!"

माँ की आँखों में फिर खुशी की चमक आ गई, "अरे बेटा, कोई परोसने वाला भी तो होना चाहिए ना? तुम दोनों खा लो, फिर मैं खा लूँगी।"

भोजन करते समय दीपक ने अचानक अपनी माँ की तरफ देखा और गंभीर स्वर में कहा, "माँ, मैं सोच रहा हूँ कि अब दयाल का गाँव के स्कूल में दाखिला करवा दूँ। यह पढ़ेगा, तो हमारा घर सिर्फ धन-धान्य से ही नहीं, बल्कि विद्या और संस्कारों से भी समृद्ध होगा।"

माँ चौंककर बोली, "हाँ बेटा, मैं भी यही सोच रही थी। लेकिन पढ़ाई तो हर बच्चे के लिए ज़रूरी है... फिर तू खुद क्यों पीछे छूट रहा है? तू भी तो पढ़ाई कर सकता है?"

दीपक ने मुस्कुराते हुए माँ का हाथ अपने हाथ में लिया और बोला, "तुम चिंता मत करो माँ! धनसुख चाचा ने मुझे एक बात सिखाई थी—'जब बस या गाड़ी छूट रही हो, तो पहले छोटे बच्चे को खिड़की से अंदर बैठाया जाता है, क्योंकि बड़ा इंसान तो दौड़कर भी गाड़ी पकड़ सकता है।' अभी दयाल की उम्र पढ़ाई शुरू करने की है। भगवान की कृपा से हमारा घर सही रास्ते पर आ गया है, आगे सब अच्छा ही होगा। पहले दयाल का एडमिशन हो जाने दो, फिर मैं भी नाइट स्कूल या किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी कर लूँगा।"

माँ ने दीपक की दूरदर्शिता और अपने छोटे भाई के प्रति त्याग को देखा, तो उनका दिल गर्व से चौड़ा हो गया।

माँ ने दीपक के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा, "अच्छा मेरे बच्चे... जैसा तुम्हें उचित लगे वैसा ही करो। जिस घर में तेरे जैसा स्वाभिमानी और समझदार बेटा हो, उस घर पर भगवान की मेहरबानी हमेशा बनी रहेगी।"

बाहर रात का अंधेरा पूरी तरह ढल चुका था, और झोपड़ी के भीतर एक नन्हे दीये की रोशनी में तीन चेहरे एक साथ बैठकर खाना खा रहे थे। यह सिर्फ खाने की थाली नहीं थी, बल्कि मेहनत, स्वाभिमान, शिक्षा और अटूट पारिवारिक प्रेम का वह महा-प्रसाद था, जिसने गरीबी के हर अंधेरे को परास्त कर दिया था।


लेखन एवं प्रस्तुतीकरण:

सेन सारथी टीम (The Sen Saarthi)



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Disclaimer (अस्वीकरण):

   पूरी तरह से काल्पनिक रचना: यह कहानी ('समय का पाठ' सीरीज़) पूरी तरह से एक काल्पनिक और साहित्यिक रचना है। इसमें प्रयुक्त सभी नाम, पात्र, स्थान, घटनाएँ और संवाद लेखक की कल्पना की उपज हैं। इसका उद्देश्य केवल एक सकारात्मक, प्रेरणादायक और शिक्षाप्रद संदेश पाठकों तक पहुँचाना है।

   किसी भी संस्था, स्थान या समुदाय के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं: कहानी में दर्शाई गई परिस्थितियाँ, सामाजिक ताने-बाने या किरदारों का आचरण किसी भी विशेष जाति, वर्ग, समुदाय, धर्म, क्षेत्र या संस्था को नीचा दिखाने या उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। यदि किसी जीवित या मृत व्यक्ति, वास्तविक घटना या स्थान से इसकी कोई समानता पाई जाती है, तो उसे मात्र एक संयोग समझा जाए।

   बाल श्रम (Child Labour) पर रुख और वैधानिक स्पष्टीकरण: यह कहानी 12 साल के बालक 'दीपक' की अत्यंत कठिन परिस्थितियों और उसके स्वाभिमान के संघर्ष को दर्शाती है। यह कहानी किसी भी रूप में 'बाल-मजदूरी' (Child Labour) का समर्थन, बढ़ावा या महिमामंडन नहीं करती है। भारत के कानून (बाल श्रम निषेध एवं विनियमन अधिनियम) और मानवीय दृष्टिकोण से 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी करवाना कानूनी अपराध है। कहानी का मुख्य संदेश यही है कि बच्चे का असली स्थान स्कूल और शिक्षा में है, तथा बाल-मन की समझदारी और स्वाभिमान ही अंततः उसे शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाता है।


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