मनीषी रामलखन शर्मा: मन में विद्रोह, हाथों में क्रांति

राष्ट्रीय प्रांत उपाध्यक्ष, बिहार प्रांत श्री रामबिलास पासवान के विचार और जीवनी पर आधारित सेन सारथी (Sen Saarthi) वेबसाइट का मुख्य पोस्टर, जिसमें वे पृष्ठभूमि में भारतीय तिरंगे के साथ चश्मा पहने हुए एक दृढ़ और क्रांतिकारी मुद्रा में नजर आ रहे हैं।


हाशिये पर खड़े समाज का सच्चा रहनुमा: रामलखन जी से एक आत्मीय मुलाकात

हमारा समाज अक्सर उन चेहरों को याद रखता है जो अखबारों के मुख्य पृष्ठों पर चमकते हैं या जो बड़बोलेपन के साथ मंचों पर ऊँचे नारे लगाते हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत का तजुर्बा रखने वाला हर व्यक्ति यह भली-भांति जानता है कि समाज की असली बुनियाद उन गुमनाम संतों, कर्मठ कार्यकर्ताओं और निश्छल समाजसेवियों के कंधों पर टिकी होती है, जो बिना किसी राजकीय सम्मान या प्रचार की लालसा के अपना पूरा जीवन लोगों के आंसू पोंछने में खपा देते हैं।

मैं रामविलास पासवान, ग्राम-सैदपुरा, सूर्यगढ़ा, जिला-लखीसराय का मूल निवासी हूँ। वर्तमान में सूर्यगढ़ा थाना में दफादार के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहा हूँ, और इसके साथ ही साथियों के विश्वास की बदौलत दफादार चौकीदार जिला संघ लखीसराय के अध्यक्ष पद का दायित्व तथा बिहार प्रांत के प्रांतीय उपाध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी भी संभाल रहा हूँ। समाज सेवा के इस कटीले मार्ग पर चलते हुए रोज़ नए अनुभव होते हैं, और सच कहूँ तो अपनी ही सेवा-भावना या संघर्षों का स्वयं अपने मुख से ज़िक्र करना मैं कतई उचित नहीं समझता। यह संस्कारों के खिलाफ है। लेकिन जब जीवन के सफर में समाज के किसी सच्चे, तपस्वी नायक से आमना-सामना होता है, तो उसकी जीवटता और संघर्ष पर प्रकाश डालना मेरा नैतिक कर्तव्य बन जाता है। यही मेरा संक्षिप्त परिचय है और यही मेरी अंतरात्मा की आवाज़ है।

एक कर्मठ व्यक्तित्व से मुलाकात और यात्रा के विचार

बात अभी कुछ समय पहले की है। एक महत्वपूर्ण विभागीय और सामाजिक सिलसिले में मुझे अपने गृह ज़िले लखीसराय से राजधानी पटना जाने का अवसर मिला। वहाँ बिहार राज्य चौकीदार दफादार संघ की एक विशाल राज्यस्तरीय सभा का आयोजन होना था, जिसे मुझे भी संबोधित करना था। सूर्यगढ़ा से पटना तक का रास्ता लंबा था। गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए जैसे-जैसे पहिए आगे बढ़ रहे थे, मेरे भीतर समाज सुधार की तमाम परिकल्पनाएँ, चिंताएँ और योजनाएँ उमड़-घुमड़ रही थीं। एक जनप्रतिनिधि और संगठन का हिस्सा होने के नाते जब आप रोज़ ज़मीनी स्तर पर गरीब, असहाय और शोषित वर्ग की तकलीफ़ों को देखते हैं, तो वे तकलीफ़ें आपके भीतर एक गहरी बेचैनी पैदा कर देती हैं। रास्ते भर मैं यही सोच रहा था कि आखिर हमारे समाज का वह हिस्सा जो आज भी विकास की अंतिम कतार में खड़ा है, उसका कल्याण कैसे होगा? क्या कोई ऐसा मसीहा है जो इनके हक की लड़ाई को बिना किसी निजी स्वार्थ के लड़ सके?

इसी वैचारिक उथल-पुथल के बीच, पटना पहुँचने पर मेरी मुलाकात नाई समाज के एक अत्यंत योग्य, कर्मठ, निष्ठावान और वयोवृद्ध समाजसेवी श्रद्धेय रामलखन शर्मा जी से हुई। ७० वर्ष की इस ढलती उम्र में भी उनके चेहरे पर जो गज़ब का तेज, आँखों में जो चमक और भीतर समाज के लिए जो छटपटाहट थी, उसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। उन्हें देखकर मुझे हिंदी की वह प्रसिद्ध कहावत बरबस याद आ गई—"होनहार बीरवान के होत चीकने पात"। भले ही वे अवस्था में बुजुर्ग थे, लेकिन उनका हौसला किसी ऊर्जावान युवा से भी कहीं बढ़कर था। जब मैंने उनके जीवन की संघर्ष-गाथा और अनुभवों को करीब से सुना, तो मुझे अहसास हुआ कि उनका पूरा जीवन ही ईमानदारी और समाज सेवा का एक सजीव दस्तावेज़ है।

रामलखन भाई आज उस समाज का नेतृत्व कर रहे हैं, जो सही मायने में सदियों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से हाशिये पर खड़ा रहने को विवश किया गया है। एक ऐसा मूकदर्शक समाज, जो किसी योग्य, अनुभवी नीति-निर्देशक और सच्चे पथ-प्रदर्शक की राह जोह रहा है। जब समाज की मुख्यधारा और सरकारें किसी वर्ग से अपनी आँखें फेर लेती हैं, तो उसकी स्थिति मझधार में फंसी उस नाव जैसी हो जाती है जिसका न तो कोई कुशल नाविक हो और न ही कोई मज़बूत पतवार। वह नाव लहरों के थपेड़े खाकर अज्ञात और विनाशकारी दिशा की ओर बहती चली जाती है। ऐसे ही दिशाहीन और उपेक्षित समाज के लिए भाई रामलखन जी एक मज़बूत खेवनहार और अटूट पतवार बनकर सामने आए हैं।

पहचान का रिश्ता और स्मृतियों का अनमोल झरोखा

दुनिया का यह दस्तूर है कि किसी भी इंसान, विचार या वस्तु की असली अहमियत तब तक समझ में नहीं आती, जब तक हम उससे आत्मीयता से परिचित नहीं होते। इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि हमारे घर की किसी पुरानी दीवार पर कोई प्राचीन मूर्ति स्थापित हो और हमें उसके इतिहास, उसकी कला या उसके महत्व के बारे में कुछ भी ज्ञात न हो, तो वह स्थान हमारे लिए महज एक उपेक्षित, उजाड़ खंडहर जैसा प्रतीत होता है। लेकिन जैसे ही किसी जानकार के माध्यम से उस मूर्ति की असली पहचान और उसकी ऐतिहासिकता उजागर होती है, वही खंडहर अचानक एक महान, पूजनीय और गौरवशाली धरोहर में तब्दील हो जाता है।

ठीक ऐसी ही दशा वयोवृद्ध समाजसेवी भाई रामलखन जी के संदर्भ में भी लागू होती है। जो लोग उन्हें ऊपर-ऊपर से देखते हैं, वे शायद उनकी आंतरिक दृढ़ता और वैचारिक गहराई को कभी नहीं नाप पाते। लेकिन जो व्यक्ति उनके करीब जाता है, उनके विचारों को सुनता है, वह समझ जाता है कि वे इस शोषित समाज के लिए कितनी बड़ी और अनमोल धरोहर हैं।

उनकी बातें सुनते-सुनते मेरा मन अचानक अतीत के झरोखे में झांकने लगा और मुझे साल 1994 की एक पुरानी घटना याद आ गई। वह घटना आज बत्तीस साल बाद भी मेरे ज़हन में उतनी ही ताज़ा और सजीव है, मानो कल की ही बात हो। उस समय सूर्यगढ़ा थाना के ही एक गाँव की किसी गंभीर सामाजिक समस्या और जातीय तनाव से सम्बंधित मामले को लेकर ज़िलाधिकारी (DM) के चेंबर में एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी। उस कमरे में जिले के बड़े-बड़े अधिकारी और संभ्रांत लोग मौजूद थे। वहाँ सामाजिक विषमता और जातीय अपवादों की एक लंबी, पेचीदा और तीखी बहस चल रही थी। माहौल में खासा तनाव था और प्रशासनिक दबाव साफ महसूस किया जा सकता था।

एक आम आदमी अमूमन बड़े अधिकारियों के सामने अपने हक की बात रखने में भी हिचकिचाता है, लेकिन उस गर्मागर्म माहौल के बीच मैंने अपनी आँखों से देखा कि कैसे रामलखन जी ने न्याय और सत्य की खातिर ज़िलाधिकारी की आँखों में आँखें डालकर सीधे नोक-झोंक शुरू कर दी थी। वह कोई व्यक्तिगत अहंकार या नाम कमाने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि उनके भीतर अपने पीड़ित समाज के स्वाभिमान को कुचले जाने का दर्द था, जो विद्रोह बनकर फूट पड़ा था। प्रशासनिक हनक के सामने उनकी वह बेबाकी, वह अकाट्य तर्कशक्ति और अपने लोगों के प्रति उनका वह अगाध प्रेम देखकर मैं दंग रह गया था। उसी दिन मेरे अंतर्मन ने गवाही दी थी कि सचमुच—"बिना पतवार के इस समाज रूपी नाव को सही दिशा में ले जाने के लिए भाई रामलखन जी ही सबसे योग्य और साहसी नाविक हैं।"

मन में विद्रोह, वाणी में ओज और हाथों में क्रांति

आज जब भी कभी बिहार की धरती पर या हमारे सामाजिक दायरों में सच्चे, निस्वार्थ समाजसेवियों की चर्चा होती है, तो 70 वर्षीय इस वयोवृद्ध मनीषी का चेहरा मेरी आँखों के सामने सम्मान से तैर जाता है। उनके पूरे जीवन की तपस्या, उनके त्याग और उनके जुझारू व्यक्तित्व को अगर मैं कुछ चंद शब्दों में समेटकर अंजलि देना चाहूँ, तो मेरे दिल की गहराइयों से बस यही पंक्ति निकलती है:

"मन में समाज के प्रति विद्रोह, वाणी में सत्य का ओज और हाथों में वैचारिक क्रांति की कठोर कलम रखने वाले इस मनीषी को मैं भला कैसे भूल जाऊँ!"

रामलखन जी की पैठ और लोकप्रियता केवल उनके अपने नाई समाज तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हर उस शोषित, पीड़ित और वंचित वर्ग के बीच है जो न्याय की आस खो चुका है। स्वार्थ, चाटुकारिता और दिखावे से भरे आज के इस आधुनिक दौर में, जहाँ लोग छोटे-छोटे पदों और राजनीतिक लाभ के लिए अपने सिद्धांतों का सौदा कर लेते हैं, रामलखन जी जैसा निश्छल, रीढ़ की हड्डी सीधा रखने वाला और समर्पित व्यक्तित्व विरले ही देखने को मिलता है। हमारी इस पटना की संक्षिप्त मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने जीवन के कई उतार-चढ़ावों, आंदोलनों और कड़वे-मीठे अनुभवों को मुझसे साझा किया, जो किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता के लिए एक महान प्रेरणापुंज से कम नहीं हैं।

ऐसे निस्पृह और निष्काम कर्मयोगी को अपने बीच पाकर न केवल उनका अपना समाज, बल्कि हम सभी सामाजिक कार्यकर्ता और दफादार-चौकीदार संघ के साथी खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि वे इस वयोवृद्ध मनीषी को दीर्घायु प्रदान करें और उनका स्वास्थ्य सदैव उत्तम बनाए रखें, ताकि वे आने वाली नई पीढ़ियों का मार्ग अपनी वैचारिक रोशनी से ऐसे ही आलोकित करते रहें और समाज की इस टूटती हुई नाव के खेवनहार बने रहें।

संस्मरणकर्ता:

रामबिलास पासवान

दफादार चौकीदार जिला संघ, लखीसराय (अध्यक्ष)

सह प्रांतीय उपाध्यक्ष, बिहार प्रांत

ग्राम - सैदपुरा, थाना - सूर्यगढ़ा, जिला - लखीसराय



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​— रामबिलास पासवान




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यह लेख पूरी तरह से लेखक के निजी अनुभवों, स्मृतियों और व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य किसी भी जाति, समाज, समुदाय, राजनीतिक दल या प्रशासनिक अधिकारी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना, उनका अपमान करना या किसी भी प्रकार का विवाद खड़ा करना कतई नहीं है।

​लेख में वर्ष 1994 की जिस प्रशासनिक घटना का उल्लेख किया गया है, वह लेखक की व्यक्तिगत स्मृति और सामाजिक संघर्ष के संदर्भ में एक संस्मरण मात्र है, इसे किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप न माना जाए। यह लेख पूरी तरह से सामाजिक सौहार्द, समाज सेवा की भावना और एक वरिष्ठ समाजसेवी के योगदान को रेखांकित करने के उद्देश्य से लिखा गया है।

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