समय का पाठ (भाग 3) : कर्म से बदला नसीब
लेखक की दो बातें... गरीबी इंसान से उसकी उम्र और मासूमियत छीन लेती है, लेकिन अगर नीयत में ईमानदारी और मन में स्वाभिमान हो, तो वही परिस्थिति इंसान को वक्त से पहले परिपक्व और महान बना देती है। यह कहानी किसी व्यक्ति या स्थान विशेष को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के उस यथार्थ को दर्शाने के लिए लिखी गई है जहाँ मेहनत, सही संस्कार और शिक्षा ही हर अभाव का अंतिम उत्तर बनते हैं। क्या 12 साल का दीपक अपनी भूख की तड़प से उठकर समाज के ताने सहते हुए अपने परिवार की तकदीर बदल पाएगा? फकीर बाबा का वह कौन सा एक विचार था जिसने इस नन्हे बच्चे को कारखाने और सेठ की हवेली तक पहुँचा दिया? स्वाभिमान, संघर्ष और पारिवारिक प्रेम की यह मर्मस्पर्शी यात्रा आपको जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने पर मजबूर कर देगी। रात का सन्नाटा गहरा हो चुका था। मिट्टी की झोपड़ी के कोने में बिछी पुरानी चटाई पर 12 साल का दीपक करवटें बदल रहा था। उसकी आँखों से नींद गायब थी। रह-रहकर उसके दिमाग में आज दोपहर घटी घटनाएँ किसी चलचित्र की तरह घूम रही थीं। दीपक को याद आ रहा था कि जब वह दोपहर की कड़कती धूप में कारखाने के लोहे के विशालकाय गे...