किताबों से मज़दूरी तक: जीवन की सीख देने वाली कहानी
अस्वीकरण (Disclaimer): यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसमें शामिल सभी पात्र, घटनाएँ और संवाद लेखक की कल्पना की उपज हैं। यदि किसी जीवित या मृत व्यक्ति, स्थान अथवा वास्तविक घटना से इसका कोई संबंध प्रतीत होता है, तो इसे मात्र एक संयोग माना जाए। इसका उद्देश्य केवल एक सकारात्मक सीख देना है, किसी की भी भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं। दो अलग दुनियाओं का सफ़र घर के पुराने लकड़ी के बक्से में रखी किताबों की गंध और शहर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन के लोहे के जलते डिब्बों की बदबू—इन दोनों के बीच का अंतर सिर्फ़ दूरी का नहीं था, दो अलग-अलग दुनियाओं का था। गाँव की वही धूल भरी पगडंडी, जहाँ तक मेरी पढ़ाई-लिखाई के सपने फैले हुए थे, अचानक घर की जर्जर परिस्थितियों के बोझ तले दब गई थी। पिता जी की ढलती उम्र और घर के बेकाबू होते हालातों ने मेरे हाथों से पेन छूटवाकर कंधे पर झोला टंगवा दिया था। गाँव से बस पकड़ी, फिर कई घंटों का थका देने वाला ट्रेन का सफर तय किया और आख़िरकार सुपरवाइजर के साथ उस अनजानी जगह, उस लेबर कॉलोनी में जा पहुँचा जहाँ ठेकेदार ने मजदूरों के रुकने का इंतज़ाम कर रखा था। सपनों और हक़ीक़त का ट...