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खुद से खुदा तक: जब किताबें ही गुरु बन गईं

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  गाँव की उस ढलती हुई शाम में, जब मिट्टी के तेल से जलने वाली छोटी सी ढिबरी की मद्धम पीली रोशनी कांपती थी, तो कमरे की दीवार पर अक्षरों से बड़े लाचारी के साये नाचते थे। उस मद्धम उजाले में फटी हुई गणित की किताब के पन्ने पलटता राकेश, दरअसल अपनी किस्मत के पन्ने पलट रहा होता था। गरीबी एक ऐसी बेड़ी है जो पैर में न भी दिखे, तो इंसान की सोच और सपनों को जकड़ लेती है। राकेश अपने पूरे स्कूल में सबसे कुशाग्र और होनहार छात्र था, लेकिन उसकी इस काबिलियत पर हर महीने एक ही साया भारी पड़ता था—ट्यूशन की फीस न दे पाने का डर। मैट्रिक और इंटर की पढ़ाई का दौर किसी भी विद्यार्थी के लिए जीवन का वो पहला बड़ा मोड़ होता है, जहाँ से भविष्य की राहें तय होती हैं। जहाँ राकेश के साथ पढ़ने वाले बाकी बच्चे साल-दो साल के लंबे कोचिंग और नामी ट्यूशनों का सहारा लेकर अपनी नींव मजबूत कर रहे थे, वहीं राकेश के लिए हर नया महीना एक मानसिक जंग लेकर आता था। वह पूरे साल कभी लगातार ट्यूशन नहीं जा पाया। कभी एक महीना गया, कभी दो तो कभी बहुत खींच-तान कर तीन-चार महीने। वजह बहुत कड़वी थी—घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि हर महीने समय पर म...

अंधविश्वास से विज्ञान और सच्ची शांति तक

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बचपन की यादें अक्सर धुंधली धूप और किसी पुरानी छाँव की तरह मन के कोने में बैठी रहती हैं। मेरे लिए वह छाँव लठोरा (लसोड़ा)  के उस पेड़ की थी, जो सड़क के किनारे मूक गवाह बनकर खड़ा रहता था। शाम का वक्त था, सूरज अभी पूरी तरह ढला नहीं था; उसकी गुनगुनी और मद्धम रोशनी पत्तियों से छनकर नीचे आ रही थी। मैं अपने दो दोस्तों के साथ वहाँ खड़ा था। बातचीत बच्चों वाली ही थी, लेकिन अचानक एक दोस्त ने मेरी उस आस्था पर चोट की जो मेरे जीवन का आधार थी। उसने कहा, "तुम जो यह हर वक्त शिव-शिव करते रहते हो, ठीक नहीं है। तुम्हें क्या लगता है, शिव ही सबसे बड़े हैं? ऐसा नहीं है। उनसे बड़े तो हनुमान जी हैं। जब उन्होंने पहाड़ उठाया था, तो शिव जी डर के मारे गुफा में छुप गए थे।" वह मुझे चिढ़ाना चाहता था, मेरे शिव को नीचा दिखाकर मेरे बाल-मन को भड़काना चाहता था। उसकी कहानी में कितनी सच्चाई थी, शास्त्रों का क्या तर्क था—उस उम्र में मुझे इससे कोई मतलब नहीं था। मैंने कोई बहस नहीं की, कोई गुस्सा नहीं दिखाया। मैंने बस अपनी आँखें मूंद लीं और अपने भीतर बैठे महादेव से चुपचाप कहा— "नहीं, मेरे शिव ही मेरे लिए सबसे अच्छ...

मौन का महाकाव्य: 17 पन्नों में सिमटा एक बचपन

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​ बचपन की वे गलियाँ अक्सर बेफिक्र खेलों और शोर-शराबे से भरी होती हैं, लेकिन दीपक का संसार कुछ अलग ही खामोशी से बुना गया था। वह चौथी कक्षा का एक छोटा सा बालक था, जिसका हृदय किसी कोरे कागज़ की तरह पारदर्शी और निर्मल था। वह स्वभाव से बहुत कम बोलता था, लेकिन उसकी आँखें वह सब कुछ देख लेती थीं जिसे बड़े अक्सर अनदेखा कर देते थे। वह अपने टोले की महिलाओं के बीच होने वाली उन तीखी लड़ाइयों, उन डरावनी गालियों और आपसी मनमुटाव को देखकर भीतर तक दहल जाता था। ​ दीपक का सादा हृदय केवल औरतों की आपसी लड़ाई से ही नहीं, बल्कि धर्म और जाति के नाम पर होने वाले दंगों और मारपीट की खबरों को सुनकर भी बुरी तरह विचलित हो जाता था। वह उन नफरत भरी आवाजों के बीच खुद को बहुत अकेला महसूस करता और अक्सर मायूस होकर किसी कोने में बैठ जाता। उसके मन में एक ही सवाल उठता था कि लोग एक-दूसरे से इतनी नफरत क्यों करते हैं? इसी 'घुटन' और 'दुख' ने दीपक के भीतर एक अदम्य संकल्प को जन्म दिया। चूँकि वह बड़ों की चर्चाओं या उनके खेलों में शामिल नहीं हो सकता था, उसने अपनी कलम को ही अपना माध्यम बनाने का फैसला किया। ​ दीपक ने लिखना ...

बिहार दिवस पर अनमोल भाषण: एक छात्र की प्रेरक कहानी

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प्रतीकात्मक चित्र बचपन की यादें भी कमाल की होती हैं। धूल-मिट्टी से सने वो दिन और छोटी-छोटी चीजों में छुपी खुशियां, आज भी जब ज़हन में तैरती हैं, तो चेहरे पर एक अनजानी सी मुस्कान छोड़ जाती हैं। अनमोल के बचपन का वो दौर भी कुछ ऐसा ही था, जहाँ हर शाम एक नया खेल होता था और हर खेल का अपना एक अलग ही संसार था। गाँव की उस मिट्टी में एक अजीब सा सुकून था। बरसात के दिनों में जब चारों तरफ हरियाली छा जाती, तो खेतों के किनारे एक पौधा उगता था, जिसे सब स्थानीय भाषा में 'पेक्चा' कहते थे। पेक्चा का पत्ता आकार में काफी बड़ा और बिल्कुल गोल होता था। बच्चों के लिए वह पत्ता किसी जादुई थाली से कम नहीं था। शाम ढलते ही बच्चों की टोली जुट जाती और शुरू होता था 'झूठा-मूठा' का काल्पनिक खाना बनाने का खेल। कोई छोटी-छोटी सूखी लकड़ियां तोड़कर लाता और कहता, "लो, मैं जलावन लेकर आ गया।" कोई मिट्टी और पत्थरों को जोड़कर छोटा सा चूल्हा बनाता। फिर उस पेक्चा के बड़े और गोल पत्ते पर काल्पनिक पकवान परोसे जाते और सब मिलकर बड़ी मासूमियत से उसे एक-दूसरे में बांटते थे। उस पत्ते की एक और खासियत थी जो बच्चों को...

दीपक: शून्य के भंवर से ज्ञान के उजाले तक

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प्रतीकात्मक चित्र ​क्या आपने कभी उस खामोश चीख को महसूस किया है, जो बंद आँखों के पीछे एक बच्चा तब चिल्लाता है जब आसमान उसे निगलने लगता है? यह कहानी किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि उस 'लट्टू' की है जिसने एक मासूम बचपन को शून्य में नचाया और फिर एक माँ की ममता ने उसे ज्ञान के उजाले तक पहुँचाया। ​रातों का वह तिलिस्म और लट्टू का खौफ ​दीपक का बचपन दो समानांतर दुनियाओं के बीच झूलता था। सूरज ढलते ही जब गाँव के आंगन सन्नाटे की चादर ओढ़ लेते, दीपक की एक अलग ही जंग शुरू होती। वह चारपाई पर लेटा आसमान के उन बेतरतीब तारों को अपनी एकाग्रता की डोर से बांध लेता। देखते ही देखते, वे तारे उसके इशारे पर ज्यामितीय आकृतियाँ (Shapes) बनाने लगते। ​लेकिन यह जादुई खेल पलक झपकते ही एक डरावने भंवर में बदल जाता। दीपक को महसूस होता कि वह ज़मीन पर नहीं, बल्कि किसी शून्य में एक 'लट्टू' की तरह बेतहाशा नाच रहा है। गति इतनी तीव्र कि रूह कांप जाए। वह खुद को उस भंवर से निकालने के लिए चीखता नहीं था, क्योंकि उसे पता था कि यह युद्ध मानसिक है। वह सपने के भीतर ही खुद को याद दिलाता— "जागो दीपक, वापस आओ!" वह कर...