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तनाव के युग में विवेक: विज्ञान और धर्म का समन्वय

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​यह आज की ही किसी सुबह की बात है। मेज पर एक चमचमाता हुआ नया लैपटॉप खुला था, हाथ में दुनिया के सबसे आधुनिक फीचर्स वाला स्मार्टफोन था, और कमरे का तापमान रिमोट के एक बटन से नियंत्रित हो रहा था। यह दृश्य है आज के आधुनिक समाज के एक आम इंसान का, जिसके पास विज्ञान की दी हुई हर सुख-सुविधा मौजूद है। सुबह की इस आपाधापी में वह तेजी से स्क्रीन पर उंगलियां चला रहा था, ईमेल के जवाब दे रहा था और दुनिया भर की खबरों पर नजर रख रहा था। बाहर से देखने पर उसका जीवन बेहद सफल, तेज और शक्तिशाली नजर आता था। ​लेकिन जैसे ही वह कुछ पल के लिए रुकता, स्क्रीन बंद होती और कमरे में सन्नाटा छाता, तो एक अजीब सी बेचैनी उसे घेर लेती। हाथ में मौजूद तकनीक और सुख-सुविधाओं के इस विशाल अंबार के बीच भी, उसके भीतर एक गहरा खालीपन था। वह खुद से पूछता—"अगर मेरे पास जीवन को आसान बनाने वाले सारे साधन मौजूद हैं, तो यह मानसिक तनाव, यह अशांति और यह अकेलापन क्यों है?" ​वास्तव में, यह केवल किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि आज के पूरे मानव समाज का सच है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ विज्ञान ने हमें असीमित 'शक्ति...

ऊर्जा के आलोक में: शिव ही श्रेष्ठ गुरु हैं

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​ इस संसार की चमचमाती आभा और अंतहीन अंधी दौड़ में हम सब अनवरत भाग रहे हैं। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को आंख मूंदने तक, बस एक ही जद्दोजहद चलती रहती है—खुद को साबित करने की, दूसरों से आगे निकलने की और भौतिक सुखों को समेटने की। लेकिन भागते-भागते जब कभी जिंदगी किसी मोड़ पर ठहरती है और हम अकेले में खुद से पूछते हैं कि इस जीवन का असली गंतव्य क्या है, तो चारों ओर एक गहरा, बेचैन करने वाला सन्नाटा छा जाता है। आज समाज में हर तरफ फैला पाखंड, आडंबर, अंधभक्ति और स्वार्थ का माहौल इस मानसिक व्याकुलता को और बढ़ा देता है। जब धर्म और आस्था के नाम पर सिर्फ व्यापार होने लगे, तो अंतरात्मा तड़प उठती है। ​ऐसी ही एक गहरी वैचारिक और आध्यात्मिक व्याकुलता के दौर में, जब मेरा मन सत्य और शांति की खोज में भटक रहा था, तब मेरे भीतर से एक स्पष्ट पुकार आई। उस पुकार ने मुझे अहसास कराया कि इस संसार रूपी दुस्तर भवसागर को बिना किसी सच्चे मार्गदर्शक, यानी बिना किसी सच्चे गुरु के पार कर पाना पूरी तरह असंभव है। ​जन्म और जीवन का अंतर: गुरु की अथाह महिमा ​हम इस धरा पर कैसे आते हैं? माता-पिता हमें यह अत्यंत दुर्लभ मानव जीवन देते है...

खुद से खुदा तक: जब किताबें ही गुरु बन गईं

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  गाँव की उस ढलती हुई शाम में, जब मिट्टी के तेल से जलने वाली छोटी सी ढिबरी की मद्धम पीली रोशनी कांपती थी, तो कमरे की दीवार पर अक्षरों से बड़े लाचारी के साये नाचते थे। उस मद्धम उजाले में फटी हुई गणित की किताब के पन्ने पलटता राकेश, दरअसल अपनी किस्मत के पन्ने पलट रहा होता था। गरीबी एक ऐसी बेड़ी है जो पैर में न भी दिखे, तो इंसान की सोच और सपनों को जकड़ लेती है। राकेश अपने पूरे स्कूल में सबसे कुशाग्र और होनहार छात्र था, लेकिन उसकी इस काबिलियत पर हर महीने एक ही साया भारी पड़ता था—ट्यूशन की फीस न दे पाने का डर। मैट्रिक और इंटर की पढ़ाई का दौर किसी भी विद्यार्थी के लिए जीवन का वो पहला बड़ा मोड़ होता है, जहाँ से भविष्य की राहें तय होती हैं। जहाँ राकेश के साथ पढ़ने वाले बाकी बच्चे साल-दो साल के लंबे कोचिंग और नामी ट्यूशनों का सहारा लेकर अपनी नींव मजबूत कर रहे थे, वहीं राकेश के लिए हर नया महीना एक मानसिक जंग लेकर आता था। वह पूरे साल कभी लगातार ट्यूशन नहीं जा पाया। कभी एक महीना गया, कभी दो तो कभी बहुत खींच-तान कर तीन-चार महीने। वजह बहुत कड़वी थी—घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि हर महीने समय पर म...

अंधविश्वास से विज्ञान और सच्ची शांति तक

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बचपन की यादें अक्सर धुंधली धूप और किसी पुरानी छाँव की तरह मन के कोने में बैठी रहती हैं। मेरे लिए वह छाँव लठोरा (लसोड़ा)  के उस पेड़ की थी, जो सड़क के किनारे मूक गवाह बनकर खड़ा रहता था। शाम का वक्त था, सूरज अभी पूरी तरह ढला नहीं था; उसकी गुनगुनी और मद्धम रोशनी पत्तियों से छनकर नीचे आ रही थी। मैं अपने दो दोस्तों के साथ वहाँ खड़ा था। बातचीत बच्चों वाली ही थी, लेकिन अचानक एक दोस्त ने मेरी उस आस्था पर चोट की जो मेरे जीवन का आधार थी। उसने कहा, "तुम जो यह हर वक्त शिव-शिव करते रहते हो, ठीक नहीं है। तुम्हें क्या लगता है, शिव ही सबसे बड़े हैं? ऐसा नहीं है। उनसे बड़े तो हनुमान जी हैं। जब उन्होंने पहाड़ उठाया था, तो शिव जी डर के मारे गुफा में छुप गए थे।" वह मुझे चिढ़ाना चाहता था, मेरे शिव को नीचा दिखाकर मेरे बाल-मन को भड़काना चाहता था। उसकी कहानी में कितनी सच्चाई थी, शास्त्रों का क्या तर्क था—उस उम्र में मुझे इससे कोई मतलब नहीं था। मैंने कोई बहस नहीं की, कोई गुस्सा नहीं दिखाया। मैंने बस अपनी आँखें मूंद लीं और अपने भीतर बैठे महादेव से चुपचाप कहा— "नहीं, मेरे शिव ही मेरे लिए सबसे अच्छ...

स्मृतियों के झरोखे से: भाई रामलखन और वो आत्मीय संबंध

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  प्रस्तावना: यादों की एक पुरानी डायरी समय बीतता है, लेकिन कुछ यादें किसी पुरानी डायरी के पन्नों में सूख चुके फूल की तरह अपनी खुशबू बनाए रखती हैं। साल 1987 की वो धुंधली सुबहें आज भी आँखों के सामने किसी जीवंत चलचित्र की तरह तैरने लगती हैं। मैं, कपिल देव शर्मा, उस वक्त अली नगर, सूर्यगढ़ा के मध्य विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद पर अपनी सेवाएँ दे रहा था। वो दौर सादगी का था, जहाँ पद से ज्यादा व्यक्ति के कर्म और उसके व्यवहार की महत्ता थी। इसी दौर में मेरी मुलाकात एक ऐसे व्यक्तित्व से हुई, जिसने समाज सेवा को अपना धर्म मान लिया था—वे थे भाई रामलखन जी। रामलखन जी उस समय सूर्यगढ़ा प्रखंड नाई सभा के अध्यक्ष थे। शुरुआत तो औपचारिक थी, एक शिक्षक और एक सामाजिक संगठन के मुखिया के बीच की भेंट, लेकिन धीरे-धीरे हमारे बीच के संवाद ने आत्मीयता की ऐसी चादर ओढ़ी कि हम 'स्वजातीय' से बढ़कर एक-दूसरे के अभिन्न अंग बन गए। चननियाँ गाँव: जब घर, मंदिर बन गया शिक्षक का जीवन अनुशासन की सीमाओं में बंधा होता है, लेकिन रामलखन जी का प्रेम उन सीमाओं को तोड़ने की ताकत रखता था। अली नगर स्कूल के ही पास उनका गाँव था—चननि...

आँसुओं में समाया साधुत्व: मोकामा की वो ऐतिहासिक और भावुक यात्रा

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​प्रस्तावना: यात्रा केवल भूगोल की नहीं, भावनाओं की भी ​पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे 1987 के उस दौर में, अली नगर सूर्यगढ़ा के मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक, कपिल देव शर्मा और सूर्यगढ़ प्रखंड नाई सभा के कर्मठ अध्यक्ष, भाई रामलखन जी के बीच एक निस्वार्थ और पारिवारिक संबंध बन गया था। चननियाँ गाँव का वो कच्चा घर और मुगशौड़ा जमालपुर में बाबा धर्मदास मंदिर के निर्माण में रामलखन जी का प्रेरक योगदान, उनके विराट व्यक्तित्व की महक फैला रहा था। ​लेकिन, जीवन की सबसे गहरी सीख अक्सर सबसे कठिन यात्राओं में मिलती है। यह भाग उस यात्रा का साक्षी है, जहाँ भूगोल की दूरियाँ कम पड़ गईं और दो दिलों के बीच का आध्यात्मिक संबंध हमेशा के लिए अमर हो गया। यह मोकामा के उस सम्मेलन की कहानी है, जहाँ रामलखन जी के भीतर छिपा एक 'साधु' दुनिया के सामने प्रकट हुआ। ​आमंत्रण और विवशता: स्नेह का मीठा दवाब ​साल 1987 का ही समय था। मोकामा प्रखण्ड नाई सभा का एक विशाल सम्मेलन औंटा ग्राम में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन की पूरी देख-रेख आदरणीय लक्ष्मी ठाकुर जी के कुशल हाथों में थी। सम्मेलन बड़ा था, और उद्देश्य था स्वजातीय भ...

मौन का महाकाव्य: 17 पन्नों में सिमटा एक बचपन

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​ बचपन की वे गलियाँ अक्सर बेफिक्र खेलों और शोर-शराबे से भरी होती हैं, लेकिन दीपक का संसार कुछ अलग ही खामोशी से बुना गया था। वह चौथी कक्षा का एक छोटा सा बालक था, जिसका हृदय किसी कोरे कागज़ की तरह पारदर्शी और निर्मल था। वह स्वभाव से बहुत कम बोलता था, लेकिन उसकी आँखें वह सब कुछ देख लेती थीं जिसे बड़े अक्सर अनदेखा कर देते थे। वह अपने टोले की महिलाओं के बीच होने वाली उन तीखी लड़ाइयों, उन डरावनी गालियों और आपसी मनमुटाव को देखकर भीतर तक दहल जाता था। ​ दीपक का सादा हृदय केवल औरतों की आपसी लड़ाई से ही नहीं, बल्कि धर्म और जाति के नाम पर होने वाले दंगों और मारपीट की खबरों को सुनकर भी बुरी तरह विचलित हो जाता था। वह उन नफरत भरी आवाजों के बीच खुद को बहुत अकेला महसूस करता और अक्सर मायूस होकर किसी कोने में बैठ जाता। उसके मन में एक ही सवाल उठता था कि लोग एक-दूसरे से इतनी नफरत क्यों करते हैं? इसी 'घुटन' और 'दुख' ने दीपक के भीतर एक अदम्य संकल्प को जन्म दिया। चूँकि वह बड़ों की चर्चाओं या उनके खेलों में शामिल नहीं हो सकता था, उसने अपनी कलम को ही अपना माध्यम बनाने का फैसला किया। ​ दीपक ने लिखना ...

सामाजिक न्याय के अग्रदूत और बलराम पद

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हमारा रिश्ता सिर्फ एक घर की चौखट या सुख-दुख की सांझ तक सीमित नहीं रहा। जब दो इंसान एक-दूसरे पर अगाध भरोसा करते हैं, तो वे एक-दूसरे के विचारों को भी मांजते हैं। रामलखन अंकल के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह केवल मेरे पारिवारिक मार्गदर्शक नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना की जीती-जागती पाठशाला थे। एक बार का वाकया है, मैंने समाज की दशा और दिशा को देखकर उनसे बहुत सहज भाव से कहा था, "रामलखन बाबू, आप अब सिर्फ अपनी जात की राजनीति छोड़कर पूरे 'जमात' (सर्वसमाज) की राजनीति करें, तो समाज के लिए कहीं ज्यादा अच्छा होगा।" मेरी इस बात पर उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के, दो टूक लफ्जों में जो जवाब दिया, उसने मुझे हिलाकर रख दिया। उन्होंने कहा, "जवाहर, पहले अपना घर सुधारे, फिर जमात की बात हो।" उनका यह जवाब कोई नाराजगी नहीं था, बल्कि एक कड़वी सच्चाई थी। उस समय मुझे महसूस हुआ कि उन्होंने मुझे जबरन एक गहरी सामाजिक सोच के दायरे में धकेल दिया है। उनकी उस एक बात ने मेरी आँखें खोल दीं। तब से मैं भी अपने गाँव की आंतरिक स्थिति और अतीत का गहराई से मूल्यांकन करने लगा कि कैसे हम जमीनी स्तर पर बदलाव ला सक...

प्रेम की अनूठी गंगा: रामलखन अंकल और मैं

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हमारा चननियाँ गाँव... जहाँ सुबह की धूप खेतों की हरियाली को चूमती है और शाम ढलते ही चौपालों पर अपनों के सुख-दुख की बातें शुरू हो जाती हैं। मैं जवाहर प्र० यादव, इसी मिट्टी का बेटा हूँ। स्वर्गीय गोपाल यादव जी का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते कंधों पर हमेशा एक जिम्मेदारी की भावना रही, लेकिन जीवन के सफर में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जो आपकी उंगली थामकर आपको सामाजिक और मानसिक रूप से बड़ा बना देते हैं। मेरे जीवन में यह स्थान आदरणीय रामलखन शर्मा जी का है, जिन्हें मैं और मेरा पूरा परिवार आदर से 'अंकल जी' कहता है। बात १९७५ के उस दौर की है, जब देश का राजनीतिक माहौल बहुत गर्म था। दिल्ली से लेकर गाँव की गलियों तक 'आपातकाल' (इमरजेंसी) की गूँज थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी के आदेश पर देश के बड़े-बड़े विरोधी नेताओं को जेलों में ठूँसा जा रहा था। हवाओं में एक अजीब सा डर और उत्सुकता का मिला-जुला माहौल था। इसी ऐतिहासिक और उथल-पुथल भरे दौर में मेरी मुलाकात रामलखन शर्मा जी से हुई। पहली ही मुलाकात में उनके भीतर की सच्चाई और उनके चेहरे का निश्छल भाव मेरे दिल को छू गया। शुरुआत में तो वह एक सा...