शिव ही गुरु हैं: गुरु-शिष्य संबंध की आध्यात्मिक यात्रा
प्रतीकात्मक चित्र स्वार्थ से परे: गुरु और शिष्य का वास्तविक अंतर अध्यात्म की अनंत यात्रा में जब कोई पिपासु जीव पहला कदम रखता है, तो कालचक्र की गूंज उसे एक ही सत्य समझाती है—निःस्वार्थ भाव। यह इस मार्ग की पहली और अनिवार्य शर्त है। संसार के तमाम रिश्ते किसी न किसी सामाजिक, आर्थिक या भावनात्मक अनुबंध की बैसाखियों पर टिके होते हैं। वहाँ 'लेन-देन' का एक अदृश्य बहीखाता हमेशा खुला रहता है। किंतु, गुरु और शिष्य का संबंध इस नश्वर जगत के नियमों से सर्वथा परे है। यह दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो चेतनाओं का मिलन है। एक सच्चा गुरु वह दिव्य पारस है, जो अपने शिष्य के भीतर छिपे सुप्त सामर्थ्य को जगाता है। वह शिष्य के माध्यम से संसार में महान से महानतम कार्यों को सिद्ध करवा लेता है, इतिहास रच देता है, लेकिन उस विराट सफलता के चरम क्षणों में भी गुरु के भीतर अपने लिए लेशमात्र भी श्रेय, यश या लाभ की आकांक्षा नहीं होती। वह आकाश की तरह निर्लिप्त रहता है। दूसरी ओर, एक समर्पित शिष्य के हृदय की धड़कनें सिर्फ समर्पण की भाषा समझती हैं। वह जब गुरु की सेवा में लीन होता है या उनकी आज्ञा का पालन करता है, तो उस...