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शिव ही गुरु हैं: गुरु-शिष्य संबंध की आध्यात्मिक यात्रा

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प्रतीकात्मक चित्र स्वार्थ से परे: गुरु और शिष्य का वास्तविक अंतर अध्यात्म की दुनिया में प्रवेश करने के लिए सबसे पहली शर्त है—निःस्वार्थ भाव। गुरु और शिष्य का संबंध सांसारिक अनुबंधों जैसा नहीं है। एक सच्चा गुरु वही है जो अपने शिष्य के माध्यम से कोई भी महान कार्य सिद्ध करवाए, लेकिन उस कार्य से गुरु को स्वयं के लिए लेशमात्र भी लाभ की आकांक्षा न हो। वहीं, एक समर्पित शिष्य वह है जो गुरु की सेवा और आज्ञा का पालन इस तरह करे कि उसके मन में अपने व्यक्तिगत लाभ का कोई विचार तक न आए। जहाँ स्वार्थ की दीवार गिर जाती है, वहीं गुरु और शिष्य एकाकार (एक) हो जाते हैं। गुरु की अगाध महिमा: जहाँ सरस्वती भी मौन हैं गुरु तत्व को शब्दों में बांधना असंभव है। आपकी लेखनी ने सत्य ही कहा है कि यदि इस संपूर्ण सृष्टि के वन-उपवन के समस्त वृक्षों को कलम बना दिया जाए और इस संसार के अथाह सागरों व महासागरों को स्याही (दवात) बना दिया जाए, तब भी महादेव शिव की महिमा का पूर्ण बखान नहीं किया जा सकता। जब स्वयं ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती उनकी स्तुति और बखान करते-करते विस्मित और थकित हो जाती हैं, तो हम साधारण मनुष्यों ...

1983 बड़हिया सम्मेलन: देवाशीष ठाकुर की यादें और समाज का उदय

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प्रतीकात्मक चित्र प्रस्तावना: एक मुलाकात जो प्रेरणा बन गई इतिहास की किताबों में अक्सर बड़े युद्धों और राजाओं की कहानियाँ होती हैं, लेकिन असली इतिहास वह होता है जिसे आम आदमी अपने पसीने और जज्बात से लिखता है। यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है। देवाशीष ठाकुर जी के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उनके देखने का नजरिया ही बदल दिया। वे कहते हैं, "समाज सेवा की ललक तो मन में थी, लेकिन उस आग को मशाल बनाने का काम भाई राम लखन के स्नेह और निर्देशन ने किया।" 1980 का वह दौर था जब नाई समाज अपनी पहचान और वजूद की तलाश में था। देवाशीष जी अपने पिता तुल्य राम प्रसाद शर्मा जी के साथ लखीसराय में समाज सेवा की अलख जगा रहे थे, लेकिन उन्हें एक ऐसे 'रहनुमा' की तलाश थी जो समाज के बिखरे हुए दर्द को एक स्वर दे सके। वह रहनुमा उन्हें भाई राम लखन के रूप में मिला। बड़हिया सम्मेलन (1983): एक कीर्तिमान की शुरुआत तारीख थी 26 और 27 दिसंबर 1983, और स्थान था बड़हिया का जगदम्बी धर्मशाला। यह मात्र एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि एक सोए हुए समाज का शंखनाद था। देवाशीष जी याद करते हैं कि कैसे राम लखन जी ने अपनी सांगठनिक कुशलता...

राम लखन शर्मा: सूर्यगढ़ा का स्वर्णिम काल और त्याग की पराकाष्ठा (भाग 2)

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  सांकेतिक संपादन ​प्रस्तावना: नेतृत्व की असली कसौटी – जब समाज बना परिवार से बड़ा ​भाग 1 में हमने देखा कि कैसे राम लखन शर्मा जी ने विरासत में मिले जुझारूपन और विद्यार्थी जीवन के संघर्षों से अपने नेतृत्व की नींव रखी। लेकिन एक सच्चे नेता की पहचान केवल उसके उदय से नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए 'त्याग' और 'निर्णयों' से होती है। ​सूर्यगढ़ा प्रखण्ड अध्यक्ष अजय ठाकुर के शब्दों में, "राम लखन जी का जीवन उस ध्रुव तारे की तरह है, जो तूफानों में फंसी नाव को सही दिशा दिखाता है।" भाग 2 में हम उनके जीवन के उस स्वर्णिम काल की चर्चा करेंगे जब उन्होंने सूर्यगढ़ा नाई समाज की किस्मत बदली और एक ऐसा कड़ा निर्णय लिया जिसने उन्हें 'नेताओं की भीड़' से अलग कर एक 'मनीषी' और 'साधु' की श्रेणी में खड़ा कर दिया। यह कहानी है एक ऐसे चयन की, जहाँ एक तरफ सगा भाई था और दूसरी तरफ पूरे समाज की लाज। ​अंधकार से प्रकाश की ओर: सूर्यगढ़ा नाई सभा का पुनर्गठन (1984) ​वर्ष 1984 सूर्यगढ़ा के नाई समुदाय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। अजय ठाकुर जी उस दौर को याद करते हुए बताते ह...

राम लखन शर्मा: एक साधु व्यक्तित्व और नेतृत्व की विरासत (भाग 1)

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प्रतीकात्मक चित्र प्रस्तावना: जब राहें धुंधली हों, तब मिलता है एक रहनुमा समाज सेवा का मार्ग काँटों भरा होता है, और अक्सर इस सफर में व्यक्ति दिशाभ्रमित हो जाता है। ऐसे ही समय में समाज को एक ऐसी मशाल की जरूरत होती है जो न केवल रास्ता दिखाए, बल्कि खुद जलकर दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाए। सूर्यगढ़ा प्रखण्ड (लखीसराय) के नाई समाज के लिए श्री राम लखन शर्मा जी का व्यक्तित्व बिल्कुल वैसा ही है। प्रखण्ड अध्यक्ष अजय ठाकुर (ग्राम जगदीशपुर) के शब्दों में, राम लखन जी केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक 'योग्य गुरु' और 'सच्चे रहनुमा' हैं, जिनके सानिध्य में समाज ने एक नया सवेरा (बिहान) देखा है। एक साधु आवरण: लोभ-मोह से परे का व्यक्तित्व अजय ठाकुर जी अपने संस्मरणों में राम लखन शर्मा जी की तुलना एक 'साधु' से करते हैं। यहाँ 'साधु' का अर्थ गेरुए वस्त्रों से नहीं, बल्कि उस आचरण से है जो छल-कपट, माया-मोह और लोभ-लालच से कोसों दूर हो। राम लखन जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी जोशपूर्ण वाणी है। अजय ठाकुर जी बताते हैं कि उनकी पहली मुलाकात में ही उन्हें राम लखन जी की विचारधारा मे...

राम लखन शर्मा – संवैधानिक चेतना और समाज की गौरवगाथा (भाग-2)

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प्रतीकात्मक चित्र ​प्रस्तावना: वैचारिक क्रांति का शंखनाद ​पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे राम लखन शर्मा जी ने संघर्ष को अपना साथी बनाया। इस दूसरे भाग में हम उनके जीवन के उस सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर चर्चा करेंगे, जिसने न केवल बेगूसराय बल्कि पूरे मुंचेर प्रमंडल के समाज की 'आंखें खोलने' का काम किया। यह कहानी है—अधिकारों के प्रति जागरूकता और एक समाज को 'भीड़' से 'शक्ति' में बदलने की। ​मुंबई अधिवेशन और स्वाधीनता का सही अर्थ ​राम लखन जी के विचारों में वैश्विक गहराई थी। मुंबई में आयोजित एक महत्वपूर्ण अधिवेशन के दौरान उन्होंने 'स्वाधीनता' की एक नई परिभाषा दी थी। उनके अनुसार, स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि अपने समाज के भीतर की बुराइयों और अज्ञानता से मुक्ति है। ​उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति या समाज अपनी प्रतिभा को पहचानना नहीं जानता, वह कभी वास्तव में स्वतंत्र नहीं हो सकता। उन्होंने आह्वान किया कि समाज के हर व्यक्ति को अपनी कला और पूर्वजों की विरासत पर गर्व करना चाहिए। उनके लिए 'आत्म-सम्मान' ही उन्नति की पहली सीढ़ी थी। ​अनुच्छेद 1...

राम लखन शर्मा: समाज सेवा और संघर्ष की अमर गाथा (भाग-1)

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प्रतीकात्मक चित्र प्रस्तावना: एक युगदृष्टा का उदय ​बिहार की धरती हमेशा से महान विभूतियों और समाज सुधारकों की जन्मस्थली रही है। इसी गौरवशाली परंपरा में एक नाम उभरकर सामने आता है— श्री राम लखन शर्मा। मुंगेर प्रमंडल, विशेष रूप से लखीसराय और बेगूसराय के क्षेत्रों में नाई समाज के उत्थान के लिए उन्होंने जो अलख जगाई, वह आज के युवाओं के लिए एक मशाल के समान है। यह लेख केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं है, बल्कि एक पूरे समाज के जागने की कहानी है। ​प्रोफेसर रविन्द्र कुमार की दृष्टि में एक 'खुली किताब' ​बेगूसराय राष्ट्रीय नाई महा सभा के जिला अध्यक्ष, प्रोफेसर रविन्द्र कुमार (पप्पू जी), राम लखन जी के व्यक्तित्व को एक 'दर्पण' के समान मानते हैं। उनके अनुसार, राम लखन जी ने विद्यार्थी जीवन से ही समाज सेवा को अपना धर्म मान लिया था। ​"उनका जीवन एक खुली किताब है, जिसमें समाज की हर परिस्थिति का हल छिपा है। वे एक ऐसे साधु स्वरूप अभिभावक हैं, जिनकी कार्यशैली कल्पना से परे और अनूठी है।" ​प्रोफेसर साहब का यह कथन दर्शाता है कि राम लखन जी ने न केवल समाज को राह दिखाई, बल्कि खुद को एक मिसाल क...

शिव शिष्य कैसे बनें? महादेव को गुरु बनाने के 3 सूत्र

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सांकेतिक संपादन शिव शिष्य बनने के तीन सूत्र: एक आध्यात्मिक मंथन ​शिव को अपना गुरु मानने की राह पर चलने वाले शिष्यों के लिए 'तीन सूत्र' क्या हैं और वे इतने अनिवार्य क्यों हैं? शिव शिष्य राम लखन शर्मा जी के विचारों के मंथन से निकले कुछ अनमोल अंश यहाँ प्रस्तुत हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि शिष्य बनने के लिए ये तीन विधियाँ ही पूर्ण और पर्याप्त क्यों हैं। ​ शिष्यता की त्रिवेणी ​किसी भी शिष्य के लिए मार्ग सरल और स्पष्ट होना चाहिए। इसीलिए, आदिगुरु शिव की शिष्यता के लिए भी ये तीन सूत्र—दया मांगना, चर्चा करना और नाम जाप करना—पूर्णतः सफल और पर्याप्त हैं। ये सूत्र 'सत्यम, शिवम, सुंदरम' का स्वरूप हैं, जो हमें आत्म-समर्पण की ओर ले जाते हैं और धर्म के वास्तविक भाव को दर्शाते हैं। ​ प्रथम सूत्र: दया मांगना (अहंकार का विसर्जन) ​"हे शिव! आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ पर दया करें।" ​शिष्य भाव को अपने भीतर जागृत करना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। इस भाव के आते ही मनुष्य के भीतर से अहंकार, लोभ, मोह, क्रोध और अशांति का विनाश होने लगता है। 'दया' मांगने का वास्...

शिव चर्चा और ज्ञान का मर्म: साहब श्री हरिन्द्रानन्द जी के आध्यात्मिक सूत्र

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प्रतीकात्मक चित्र प्रस्तावना (Introduction) ​"नमस्ते साथियों, सेन सारथी पर आपका स्वागत है। ​अक्सर हम जीवन की आपाधापी में यह भूल जाते हैं कि वास्तविक शांति और सफलता का आधार केवल सूचनाएँ नहीं, बल्कि 'सच्चा ज्ञान' है। लेकिन वास्तव में ज्ञान किसे कहते हैं? क्या यह केवल पुस्तकों में सिमटा है, या इसका अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है? ​आज के विशेष लेख में, लेखक राम लखन शर्मा जी साहब श्री हरिन्द्रानन्द जी के दिव्य दर्शन और शिव चर्चा के माध्यम से हमें ज्ञान के उस वास्तविक स्वरूप से परिचित करा रहे हैं, जो हमें 'अज्ञान' के अँधेरे से निकालकर 'अद्वैत' के प्रकाश की ओर ले जाता है। आइए, इस आध्यात्मिक यात्रा में सहभागी बनें। शिव चर्चा और ज्ञान का मर्म: साहब श्री हरिन्द्रानन्द जी के दर्शन की एक यात्रा अक्सर हमारे मन में यह जिज्ञासा उठती है कि वास्तव में ज्ञान किसे कहते हैं? क्या यह केवल किताबों में है या इसके मायने कुछ और हैं? साहब श्री हरिन्द्रानन्द जी द्वारा दी गई 'शिव चर्चा' के माध्यम से जो बोध हमें प्राप्त होता है, वह इसी गहन प्रश्न का उत्तर खोजने का एक दिव्य प्रयास ...

गुरु पूर्णिमा: महत्व, पौराणिक इतिहास और महर्षि वेदव्यास की महिमा | Sen Saarthi

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  सांकेतिक संपादन गुरु पूर्णिमा: अज्ञान के अंधकार से बोध के प्रकाश तक ​भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। यहाँ गुरु का सम्मान माता-पिता से भी ऊपर है। सदियों से चली आ रही हमारी परंपरा में गुरु को 'देवतुल्य' मानते हुए उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान आदर दिया जाता है। 'आचार्य देवो भवः' का उपदेश हमें यही सिखाता है कि गुरु का स्थान देवों के तुल्य है। यही कारण है कि हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में पूरे श्रद्धा भाव और भव्यता के साथ मनाया जाता है। ​ पूर्णता का प्रतीक: गुरु गुरु अपने आप में पूर्ण होते हैं, और शायद इसीलिए 'पूर्णिमा' का दिन उनकी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त माना गया। इस दिन चारों ओर वेदों की ऋचाएं, पुराणों की कथाएं और धार्मिक अनुष्ठानों की गूँज सुनाई देती है। ​प्राचीन काल में गुरु ही शिष्य को सांसारिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार के ज्ञान से सुसज्जित करते थे। आज समय बदला है, और ज्ञान के दो स्पष्ट पहलू उभर कर आए हैं—पहला व्यावहारिक (लौकिक) ज्ञान और दूसरा आध्यात्मिक (पारलौकिक) ज्ञान। आज के दौर में शि...