शिव ही गुरु हैं: गुरु-शिष्य संबंध की आध्यात्मिक यात्रा
प्रतीकात्मक चित्र स्वार्थ से परे: गुरु और शिष्य का वास्तविक अंतर अध्यात्म की दुनिया में प्रवेश करने के लिए सबसे पहली शर्त है—निःस्वार्थ भाव। गुरु और शिष्य का संबंध सांसारिक अनुबंधों जैसा नहीं है। एक सच्चा गुरु वही है जो अपने शिष्य के माध्यम से कोई भी महान कार्य सिद्ध करवाए, लेकिन उस कार्य से गुरु को स्वयं के लिए लेशमात्र भी लाभ की आकांक्षा न हो। वहीं, एक समर्पित शिष्य वह है जो गुरु की सेवा और आज्ञा का पालन इस तरह करे कि उसके मन में अपने व्यक्तिगत लाभ का कोई विचार तक न आए। जहाँ स्वार्थ की दीवार गिर जाती है, वहीं गुरु और शिष्य एकाकार (एक) हो जाते हैं। गुरु की अगाध महिमा: जहाँ सरस्वती भी मौन हैं गुरु तत्व को शब्दों में बांधना असंभव है। आपकी लेखनी ने सत्य ही कहा है कि यदि इस संपूर्ण सृष्टि के वन-उपवन के समस्त वृक्षों को कलम बना दिया जाए और इस संसार के अथाह सागरों व महासागरों को स्याही (दवात) बना दिया जाए, तब भी महादेव शिव की महिमा का पूर्ण बखान नहीं किया जा सकता। जब स्वयं ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती उनकी स्तुति और बखान करते-करते विस्मित और थकित हो जाती हैं, तो हम साधारण मनुष्यों ...