तनाव के युग में विवेक: विज्ञान और धर्म का समन्वय
यह आज की ही किसी सुबह की बात है। मेज पर एक चमचमाता हुआ नया लैपटॉप खुला था, हाथ में दुनिया के सबसे आधुनिक फीचर्स वाला स्मार्टफोन था, और कमरे का तापमान रिमोट के एक बटन से नियंत्रित हो रहा था। यह दृश्य है आज के आधुनिक समाज के एक आम इंसान का, जिसके पास विज्ञान की दी हुई हर सुख-सुविधा मौजूद है। सुबह की इस आपाधापी में वह तेजी से स्क्रीन पर उंगलियां चला रहा था, ईमेल के जवाब दे रहा था और दुनिया भर की खबरों पर नजर रख रहा था। बाहर से देखने पर उसका जीवन बेहद सफल, तेज और शक्तिशाली नजर आता था। लेकिन जैसे ही वह कुछ पल के लिए रुकता, स्क्रीन बंद होती और कमरे में सन्नाटा छाता, तो एक अजीब सी बेचैनी उसे घेर लेती। हाथ में मौजूद तकनीक और सुख-सुविधाओं के इस विशाल अंबार के बीच भी, उसके भीतर एक गहरा खालीपन था। वह खुद से पूछता—"अगर मेरे पास जीवन को आसान बनाने वाले सारे साधन मौजूद हैं, तो यह मानसिक तनाव, यह अशांति और यह अकेलापन क्यों है?" वास्तव में, यह केवल किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि आज के पूरे मानव समाज का सच है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ विज्ञान ने हमें असीमित 'शक्ति...