शिव: वह आदि गुरु जिनसे महान कोई नहीं
सांकेतिक संपादन जगतगुरु शिव करुणा और त्याग का महासागर महान सत्तासीन 'शिव' ही वास्तविक जगतगुरु हैं। देव, दानव और मानव—तीनों लोकों ने उन्हें ही अपना मार्गदर्शक स्वीकार किया है। प्रकृति के कण-कण में केवल शिव ही सबसे दयावान हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तब मिला जब प्राणियों की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं 'हलाहल' विष का पान किया। क्रोध और क्षमा का अद्भुत संतुलन सृष्टि के नायक कामदेव को भस्म कर उन्होंने अपनी शक्ति दिखाई, लेकिन जब रति ने प्रार्थना की, तो उसे पुनर्जन्म का वरदान देकर अपनी असीम दयालुता का परिचय भी दिया। शिव का प्रांगण वह दिव्य स्थान है जहाँ परस्पर विरोधी स्वभाव वाले जीव भी (जैसे साँप और मोर) भयमुक्त होकर एक साथ विचरण करते हैं। धन्य है वह आंगन, जहाँ पूर्ण समानता है। आज के 'देहधारी गुरु' और दिव्यता का अभाव आज के मानवीय गुरुओं में उस शिव-शक्ति का पूर्णतः अभाव दिखता है। जो गुरु स्वयं मोह, माया और अहंकार के जाल में उलझे हैं, वे हमें इस भवसागर से पार कैसे उतार सकते हैं? शिव ही एकमात्र ऐसे गुरु हैं जो दिव्य प्रकाशपुंज हैं। उन्हें लोभ, मोह, यश या अपयश कभी छू भी नही...