जगतगुरु शिव: करुणा, त्याग और सत्य का महासागर
सांकेतिक संपादन प्रस्तावना: आदि और अंत के मध्य बिखरा शिव-भाव इस अनंत ब्रह्मांड में जब-जब भटकाव का अंधेरा गहराया है, मानवता ने हमेशा एक ऐसे मार्गदर्शक की तलाश की है जो उसे बिना किसी स्वार्थ के सही राह दिखा सके। सनातन चेतना में आदि और अंत के अधिष्ठाता, देवाधिदेव महादेव ही वह परम सत्ता हैं, जिन्हें संपूर्ण सृष्टि ने अपना 'जगतगुरु' स्वीकार किया है। शिव केवल एक नाम नहीं, बल्कि चेतना की वह सर्वोच्च अवस्था हैं जहाँ पहुँचकर हर प्रकार का भेदभाव, संकीर्णता और अहंकार विलीन हो जाता है। देव, दानव और मानव—इन तीनों लोकों की प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। देव विलासिता और अमृत के खोजी हैं, दानव सत्ता और अधिकार के भूखे हैं, और मानव अपने अस्तित्व के संघर्ष में उलझा है। लेकिन अचरज देखिए कि इन तीनों के मार्गदर्शक, इन तीनों के आराध्य केवल शिव हैं। प्रकृति के कण-कण में, चाहे वह बर्फीला कैलाश हो या श्मशान की भस्म, हर जगह शिव की करुणा का वास है। वे जितने सहज हैं, उतने ही अगम्य भी हैं। उनकी करुणा का कोई ओर-छोर नहीं है, और यही कारण है कि वे इस जगत के सच्चे और शाश्वत गुरु हैं। करुणा का सर्वोच...