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शिव: वह आदि गुरु जिनसे महान कोई नहीं

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सांकेतिक संपादन जगतगुरु शिव करुणा और त्याग का महासागर महान सत्तासीन 'शिव' ही वास्तविक जगतगुरु हैं। देव, दानव और मानव—तीनों लोकों ने उन्हें ही अपना मार्गदर्शक स्वीकार किया है। प्रकृति के कण-कण में केवल शिव ही सबसे दयावान हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तब मिला जब प्राणियों की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं 'हलाहल' विष का पान किया। ​क्रोध और क्षमा का अद्भुत संतुलन सृष्टि के नायक कामदेव को भस्म कर उन्होंने अपनी शक्ति दिखाई, लेकिन जब रति ने प्रार्थना की, तो उसे पुनर्जन्म का वरदान देकर अपनी असीम दयालुता का परिचय भी दिया। शिव का प्रांगण वह दिव्य स्थान है जहाँ परस्पर विरोधी स्वभाव वाले जीव भी (जैसे साँप और मोर) भयमुक्त होकर एक साथ विचरण करते हैं। धन्य है वह आंगन, जहाँ पूर्ण समानता है। ​आज के 'देहधारी गुरु' और दिव्यता का अभाव आज के मानवीय गुरुओं में उस शिव-शक्ति का पूर्णतः अभाव दिखता है। जो गुरु स्वयं मोह, माया और अहंकार के जाल में उलझे हैं, वे हमें इस भवसागर से पार कैसे उतार सकते हैं? शिव ही एकमात्र ऐसे गुरु हैं जो दिव्य प्रकाशपुंज हैं। उन्हें लोभ, मोह, यश या अपयश कभी छू भी नही...

रामलखन शर्मा: समाज सेवा और संघर्ष की एक अनकही कहानी

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प्रस्तावना: इतिहास की किताबों में कई नायक दर्ज होते हैं, लेकिन समाज की जड़ों को सींचने वाले असली नायक अक्सर हमारी गलियों और समुदायों के बीच से निकलकर आते हैं। एक ऐसा ही व्यक्तित्व, जिसने अपनी मेहनत और संकल्प से समाज की सोई हुई चेतना को जगाया—वे हैं श्री रामलखन शर्मा जी। आज के इस विशेष लेख में हम उनके जीवन के उन पन्नों को पलटेंगे, जिन्हें समाज के विभिन्न विद्वानों और कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों से संजोया है। सांकेतिक संपादन वह ऐतिहासिक दिन: जब एक युवा ने बुजुर्गों के बीच अपनी पहचान बनाई ​ प्रोफेसर श्रीकान्त ठाकुर (अध्यक्ष, लखीसराय जिला राष्ट्रीय नाई महासभा) उस सुनहरे दौर को याद करते हुए लिखते हैं: ​बात साल 1983 की है। मैं उस समय विद्यार्थी था और हमारे गाँव बड़हिया में 'नाई सभा' की बड़ी चर्चा हुआ करती थी। 27 और 28 दिसंबर को जगदानी धर्मशाला में एक विशाल नाई सम्मेलन का आयोजन हुआ। जब मैं वहाँ पहुँचा, तो भीड़ देखकर दंग रह गया। लेकिन सबसे ज्यादा अचंभित करने वाला दृश्य वह था, जब मैंने फूलों की मालाओं से लदे एक तेजस्वी युवा को देखा। ​इतने बड़े-बड़े बुजुर्गों और अनुभवी लोगों के बीच उस युवा क...

शिव गुरु महिमा: गुरु ज्ञान की एक दिव्य झलक | Shiv Guru Mahima

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सांकेतिक संपादन गुरु ज्ञान की झलक जीवन की समस्त यात्राओं का अंतिम पड़ाव 'गुरु' है और जब वह गुरु स्वयं 'शिव' हों, तो गंतव्य और भी पावन हो जाता है। सत्य तो यह है कि गुरु ज्ञान की इस दिव्य झलक को पाने के लिए शिष्य को यहाँ-वहाँ भटकने की आवश्यकता नहीं पड़ती; बल्कि जब शिष्य अपनी कर्मठता और अटूट श्रद्धा से परिपूर्ण होता है, तो वह सामर्थ्य स्वयं गुरु को उसके द्वार तक खींच लाता है। सृष्टि की धुरी पर खड़ी यह प्रकृति भी जब अपनी छटा बिखेरती है, तो मनुष्य के भीतर उस परम ज्ञान की लालसा और तीव्र हो जाती है। जीवन के "क्यों, कहाँ और कैसे" जैसे अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए हमें एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है, जो हाथ पकड़कर हमें सत्य से परिचित कराए। हम अज्ञानी जीव अक्सर इस संसार के मायाजाल और दुखों के भंवर में फंसकर स्वयं को अत्यंत बेचैन और असहाय अनुभव करने लगते हैं। व्याकुलता बढ़ती है, शांति ओझल हो जाती है और थकान मिटने का नाम नहीं लेती। उस घनाटोक अंधकार में हम अपनी असली पहचान तक खो देते हैं। जीवन के उस कठिन मोड़ पर, जहाँ माता-पिता, भाई-बहन और सांसारिक संबंधी भी साथ ...

स्मृति शेष: एकता (अंतिम भाग 4) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू

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सांकेतिक संपादन प्रस्तावना: कड़वे सच की गूँज और शांति का मार्ग क्या कभी सच बोलना समाज में भूचाल ला सकता है? क्या एक तीखा विचार लोगों के अहं (Ego) को चोट पहुँचाकर सभा का माहौल बदल सकता है? श्रृंखला के इस चौथे अध्याय में, सुरेंद्र प्रसाद शम्भू हमें पटना की उस गहमागहमी भरी सभा में ले चलते हैं, जहाँ उनके एक बेबाक बयान ने 'दबंगों' को हिलाकर रख दिया था। यह कहानी है उस साहस की, जहाँ लेखक ने समाज का आइना सबके सामने रख दिया, और उस महान नेतृत्व की, जिसने बिखरती हुई सभा को अपनी सूझ-बूझ से एक सूत्र में पिरो लिया। जानने के लिए पढ़िए यह रोमांचक संस्मरण—कैसे रामलखन शर्मा जी की एक जादुई मुस्कान ने विवाद की आग को एकता की ठंडी फुहार में बदल दिया। एक ऐसी कड़ी, जो सिखाती है कि नेतृत्व केवल आदेश देना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है! पिछले भागों का सार (Recap): अब तक आपने पढ़ा कि कैसे सुरेंद्र प्रसाद शम्भू जी ने रामलखन जी के सानिध्य में समाज सेवा का ककहरा सीखा और ज्योतिराव फुले के विचारों को आत्मसात किया। पिछले अध्याय में हमने रामलखन जी की उस कालजयी कविता को सुना जिसने समाज को झकझोर कर रख दिया था। अब ...

मेरे नजरिए से रामलखन जी: समाज का नाविक और सेवा की अमर ज्योति (अंतिम भाग 4)

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सांकेतिक संपादन प्रस्तावना:  एक युग का समापन और विरासत की शुरुआत ​"सच्चा नेतृत्व वह नहीं जो शांत लहरों में नाव चलाए, बल्कि वह है जो समाज की दिशाहीन नौका को तूफानों के बीच से सुरक्षित किनारे तक ले आए।" ​"नाविक वही है जो तूफानों में भी पतवार न छोड़े, और सच्चा सेवक वही है जो घोर अंधेरे में भी समाज के लिए उम्मीद का दीपक बने।" ​क्या कोई इंसान माघ की ठिठुरती ठंड और जेठ की जलती दोपहरियों की परवाह किए बिना, 45 वर्षों तक एक समान लगन से समाज की सेवा कर सकता है? सुनील ठाकुर जी की इस विशेष श्रृंखला के अंतिम पड़ाव में, आज हम उस 'समाज के नाविक' के अंतिम अध्याय की चर्चा करेंगे। अभावों और आर्थिक तंगियों के बावजूद उन्होंने समाज को दिशा देने का जो संकल्प लिया, वह आज एक मिसाल बन चुका है। ​इस समापन भाग में जानिए, क्यों रामलखन शर्मा जी का जीवन हर समाजसेवी के लिए एक 'सच्ची खुली किताब' है और कैसे उनका संघर्ष आज भी हमें रास्ता दिखाता है। ​ आइए, इस गौरवमयी गाथा के अंतिम और सबसे भावुक अध्याय से जुड़ते हैं... बीते अंकों की एक झलक: अब तक आपने पढ़ा... पिछले भागों में हमने श्री रामल...

समाज की चेतना (अंतिम भाग-3) — संकल्प से सिद्धि तक: हमारी एकता, हमारा सम्मान

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सांकेतिक संपादन पिछली कड़ियों का संक्षिप्त सार (Recap): ​ अब तक हमने 'सामाजिक चेतना' की श्रृंखला में जाना कि: • ​राजनीति बनाम समाज सेवा: राजनीति अक्सर स्वार्थ का घड़ा होती है, जबकि नि:स्वार्थ समाज सेवा एक वटवृक्ष की भाँति सबको छाया देती है। • ​विभाजन का दर्द: हमारा समाज अल्पसंख्यक होने के बावजूद 8-10 अलग-अलग खेमों और संविधानों में बंटा हुआ है, जो हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। • ​खोखली राजनीति: आपसी खींचतान और निजी स्वार्थ की राजनीति संगठन की कमर तोड़ रही है, जिससे हमारी उम्मीदें आज भी हाशिये पर सिसक रही हैं। ​प्रस्तावना (लेखक की दृष्टि): ​"संख्या बल कम होना उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितना कि मन का बिखराव। पिछले दो भागों में हमने समाज की चुनौतियों को गहराई से समझा। आज इस समापन कड़ी में, हम समाधान की बात करेंगे। यह लेख एक पुकार है—अपनी जड़ों की ओर लौटने की और बिखरे हुए समाज को एक सूत्र में पिरोने की।" संकल्प से सिद्धि तक — हमारी एकता, हमारा सम्मान ​आज हवाओं में एक अलग सी गूंज है, जमुई की इस पावन मिट्टी में एक अनोखी तरंग है। आज हमारे संगठन का स्थापना दिवस है। यह केवल कैलेंडर की एक...

स्मृति शेष: क्रांति (भाग 3) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू

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सांकेतिक संपादन प्रस्तावना:  जब शब्दों में उतरी सामाजिक क्रांति! ​क्या एक कविता किसी समाज की सोई हुई चेतना को जगा सकती है? क्या 19वीं सदी के एक महापुरुष के विचार आज के दौर की गुत्थियों को सुलझा सकते हैं? ​श्रृंखला के इस तीसरे भाग में, सुरेंद्र प्रसाद शम्भू हमें ले चलते हैं 2016 की उस ऐतिहासिक गांधी जयंती की सभा में, जहाँ लखीसराय का कोना-कोना रामलखन शर्मा जी की ओजस्वी वाणी से गूँज उठा था। यह लेख केवल एक महापुरुष का स्मरण नहीं है, बल्कि 'माली' और 'नाई' के उस अटूट रिश्ते की दास्तां है जो समाज को एक सुंदर 'मानव बगीचा' बनाने का सपना देखती है। ​इस भाग की जान है वह दुर्लभ कविता, जो महात्मा ज्योतिराव फुले के संघर्षों को सीधे आपके हृदय तक उतार देगी। आइए, जानते हैं कि क्यों आज के इस आधुनिक युग में भी हमें एक नए 'फुले' की तलाश है और क्यों रामलखन जी की वह पुकार आज भी प्रासंगिक है। ​ इतिहास, संवेदना और क्रांति का एक अद्भुत संगम—पढ़िए इस श्रृंखला की सबसे भावुक कड़ी। • भाग 2 (Recap):   में हमने देखा कि कैसे शम्भू जी को 'बाबा धर्मदास जन सेवा ट्रस्ट' की कमान मिली। ...

मेरे नजरिए से रामलखन जी: सेवा का शिखर और 'भिखारी ठाकुर' सम्मान (भाग 3)

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सांकेतिक संपादन प्रस्तावना: 45 वर्षों का संघर्ष, एक ऐतिहासिक सम्मान और समाज की अटूट एकजुटता! ​सुनील ठाकुर जी की कलम से निकली यह दास्तान आपको लखीसराय की मिट्टी से लेकर मुंबई के भव्य मंचों तक ले जाएगी। आखिर क्या था वह पल, जब एक महान व्यक्तित्व के सम्मान में पूरा सभागार 'बाग' बन गया और लोगों की आँखों में गर्व के आँसू छलक आए? ​इतिहास के उन पन्नों को पलटिए जहाँ त्याग और समर्पण ने ' पद्म श्री भिखारी ठाकुर सम्मान ' का रूप लिया। ​ पढ़िए वह कहानी, जिसने समाज को एक नई पहचान और नई दिशा दी... बीते अंकों की एक झलक: अब तक आपने पढ़ा... ​पिछले भागों में हमने देखा कि कैसे 1971 में एक युवा ने समाज सेवा की मशाल जलाई। 1984 में वे 'स्वजातीय सरदार' बने, बंगाल की धरती तक अपनी पहचान बनाई और बेगूसराय के मंच से समाज के 'पथ-प्रदर्शक' कहलाए। हमने उनके उस दर्द को भी महसूस किया जब बाबा धर्मदास मंदिर का सपना अधूरा रहा और उन्होंने स्वयं को एक 'थका मुसाफिर' कहा। लेकिन 2014-15 तक आते-आते, उन्होंने त्याग और अटूट आस्था की नई मिसालें पेश कीं। ​ अब पढ़िए, इस गौरवमयी यात्रा का वह अध्याय ...

स्मृति शेष: विरासत (भाग 2) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू

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सांकेतिक संपादन प्रस्तावना:  समाज के 'सविता रत्न' की कलम से... किसी भी समाज का उत्थान केवल नारों से नहीं, बल्कि उन अनकहे संघर्षों और अटूट विश्वास से होता है, जो पर्दे के पीछे रहकर लड़े जाते हैं। प्रस्तुत संस्मरण 'सविता रत्न' सुरेन्द्र प्रसाद शंभू (शंभू ठाकुर) जी के उन अनुभवों की जीवंत झांकी है, जिन्होंने नाई समाज की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह मात्र एक कहानी नहीं है, बल्कि एक कर्मठ अध्यक्ष और एक दूरदर्शी मार्गदर्शक रामलखन शर्मा जी के बीच के उस आत्मीय संबंधों का दस्तावेज़ है, जहाँ शब्द शंभू जी के थे, लेकिन संकल्प रामलखन जी का। आखिर क्यों एक कड़क अनुशासनप्रिय नेता ने समाज के भीतर 'ज्योतिराव फुले' की खोज शुरू की? और कैसे सम्मान की एक चमक ने दो व्यक्तित्वों के सपनों को एक कर दिया? आइए, शंभू ठाकुर जी की इस भावुक और प्रेरक यात्रा का हिस्सा बनें, जहाँ समाज को संवारने का जज्बा किसी जुनून से कम नहीं है। पिछले भाग में आपने पढ़ा: पेशे से शिक्षक और वर्तमान में 'बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट' के अध्यक्ष, सुरेंद्र प्रसाद शम्भू (शंभू ठाकुर) जी ने अपनी जड़ों स...