रामलखन शर्मा: समाज सेवा और संघर्ष की एक अनकही कहानी

प्रस्तावना:

इतिहास की किताबों में कई नायक दर्ज होते हैं, लेकिन समाज की जड़ों को सींचने वाले असली नायक अक्सर हमारी गलियों और समुदायों के बीच से निकलकर आते हैं। एक ऐसा ही व्यक्तित्व, जिसने अपनी मेहनत और संकल्प से समाज की सोई हुई चेतना को जगाया—वे हैं श्री रामलखन शर्मा जी। आज के इस विशेष लेख में हम उनके जीवन के उन पन्नों को पलटेंगे, जिन्हें समाज के विभिन्न विद्वानों और कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों से संजोया है।



समाज सेवी श्री रामलखन शर्मा के जीवन संघर्ष और समाज के प्रति योगदान
सांकेतिक संपादन

वह ऐतिहासिक दिन: जब एक युवा ने बुजुर्गों के बीच अपनी पहचान बनाई

वक्त की धूल भले ही इतिहास के पन्नों को धुंधला कर दे, लेकिन कुछ तारीखें, कुछ चेहरे और कुछ संघर्ष दिल के पन्नों पर हमेशा के लिए अमिट स्याही से लिख दिए जाते हैं। लखीसराय जिला राष्ट्रीय नाई महासभा के अध्यक्ष, प्रोफेसर श्रीकान्त ठाकुर जब अतीत के उन सुनहरे और गौरवशाली गलियारों में लौटते हैं, तो उनकी आँखें श्रद्धा और गर्व से चमक उठती हैं। वह दौर सिर्फ एक बीते हुए समय की कहानी नहीं है, बल्कि एक पूरे समाज के जागने, उठ खड़े होने और अपने हक के लिए हुंकार भरने की जीवंत दास्तान है।

जगदानी धर्मशाला का वह अविस्मरणीय सैलाब

बात साल 1983 की है। सर्द हवाओं के बीच गाँव-जवार में एक अलग ही गर्माहट महसूस हो रही थी। प्रोफेसर श्रीकान्त ठाकुर उस समय एक युवा विद्यार्थी थे, जिनके भीतर समाज को समझने और कुछ नया देखने की ललक थी। उन दिनों उनके पैतृक गाँव बड़हिया की चौपालों, खेतों और गलियों में सिर्फ एक ही चर्चा चारों ओर गूँज रही थी—'नाई सभा'।

तारीख थी 27 और 28 दिसंबर। स्थान था बड़हिया का ऐतिहासिक जगदानी धर्मशाला। दो दिनों के इस विशाल नाई सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए जब युवा श्रीकान्त वहाँ पहुँचे, तो नजारा देखकर उनके कदम ठिठक गए। धर्मशाला का प्रांगण इंसानी समंदर में तब्दील हो चुका था। दूर-दूर से आए स्वजातीय बंधुओं की आँखों में एक उम्मीद थी, एक छटपटाहट थी।

लेकिन उस अपार भीड़ के बीच, जिसने युवा श्रीकान्त का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा, वह दृश्य सबसे अनोखा और अचंभित करने वाला था। मंच पर और लोगों के बीच, सफेद बालों और तजुर्बे की झुर्रियों से भरे बुजुर्गों के बीच एक तेजस्वी युवा खड़ा था। वह युवा फूलों की भारी-भरकम मालाओं से लदा हुआ था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और चेहरे पर सादगी के साथ-साथ एक दृढ़ संकल्प झलकता था।

इतने बड़े-बड़े बुजुर्गों, मार्गदर्शकों और अनुभवी लोगों के बीच उस युवा को मिल रहा वह अगाध सम्मान यह बताने के लिए काफी था कि वह कोई साधारण युवक नहीं है। वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनने आया हो, बल्कि वह तो एक 'कर्मयोगी' था, जो भीड़ की अगुवाई करने का हौसला रखता था।
वहाँ मौजूद बुजुर्गों ने गर्व से गद्गद होकर श्रीकान्त जी को बताया, "यही रामलखन जी हैं!" यह वह नाम था जिसने उस दौर के क्रूर सामाजिक ताने-बाने को चुनौती दी थी। जब दबंगों के डर से लोग सहम जाते थे, तब इसी युवा ने छाती तानकर, उनकी आँखों में आँखें डालकर समाज के हक, सम्मान और जायज मजदूरी के लिए आवाज उठाई थी। उन्होंने सदियों से समाज की आँखों पर बंधी बेबसी और हीनभावना की पट्टी को अपने तर्कों और साहस से खोल दिया था। रामलखन जी ने एक ऐसी अटूट सामाजिक एकता की नींव रखी, जिसकी छांव में आज की नई पीढ़ी भी खुद को सुरक्षित महसूस करती है और गर्व से अपना सिर उठाती है। ऐसे साधु स्वभाव के निर्भीक कर्मयोगी के चरणों में प्रोफेसर श्रीकान्त ठाकुर आज भी अपना कोटि-कोटि प्रणाम निवेदित करते हैं।

70 वर्षों की सुनहरी विरासत और माटी का कर्ज

उमाशंकर ठाकुर (कोषाध्यक्ष, सूर्यगढ़ा) ने राम लखन के 70 वें जन्म दिन के अवसर पर उनकी सेवा यात्रा को कुछ पंक्तियों में पिरोया है।
सांकेतिक संपादन


रामलखन जी का जन्म 19 जुलाई 1952 को हुआ था। यह सिर्फ एक साधारण बालक का जन्म नहीं था, बल्कि समाज के कल्याण के लिए एक संकल्प का जन्म था। जब वह अपने जीवन के 70वें पड़ाव पर पहुँचे, तो सूर्यगढ़ा के कोषाध्यक्ष उमाशंकर ठाकुर ने उनकी इस दीर्घकालिक और निस्वार्थ सेवा यात्रा को शब्दों के मोतियों में पिरोया। उमाशंकर जी की पंक्तियाँ रामलखन जी के पूरे जीवन का आईना हैं:

प्रेरणा पुंज: श्री राम लखन शर्मा

70 साल की यह सुनहरी विरासत, है आज भी जिसकी अटूट डोर,

उसी संकल्प को कायम रखकर, है हमने बढ़ाया कदम चारों ओर।

परिवर्तन के सांचे में ढलकर भी, भरोसा जीतने का लिया जिन्होंने प्रण,

उस पथ-प्रदर्शक को आज हमारा, बारंबार कोटि-कोटि प्रणाम।

पुरखों की गौरव गाथा को, कागज़ पर उतारा है,

खोए हुए इतिहास को, शब्दों से संवारा है।

समाज के हर वर्ग को, हक का पाठ पढ़ाते हैं,

कठिन डगर पर भी वो, निर्भय कदम बढ़ाते हैं।

सूर्यगढ़ा की माटी का, जो कर्ज चुका रहे हैं,

सेवा की नई परिभाषा, दुनिया को दिखा रहे हैं।

वंशावली के ज्ञान से, रिश्तों को जोड़ा है,

रूढ़ियों की जंजीरों को, कर्मों से तोड़ा है।

देख आपके पद-चिह्नों को, 'उमाशंकर' भी अब जाग उठा,

सेवा के पावन पथ पर, लेकर संकल्प वह भाग उठा।

आपकी प्रेरणा से ही अब, मैंने सेवा का धर्म चुना,

समाज हित के सपनों का, मैंने भी अब ताना-बाना बुना।

कलम आपकी ताकत है, और सेवा ही आपका धर्म,

दिखता है हर लेख में, आपके संघर्षों का मर्म।

ऐसे कर्मठ व्यक्तित्व पर, हमें है पूरा नाज़,

आप ही हैं हमारे, कल और आज की आवाज़।

रामलखन जी ने केवल नारे नहीं लगाए, बल्कि उन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाया। उन्होंने पुरखों के खोए हुए गौरवशाली इतिहास को खोजा, वंशावली के गहरे ज्ञान से बिखरते हुए रिश्तों को एक सूत्र में पिरोया और समाज में व्याप्त पुरानी कुरीतियों की जंजीरों को अपने प्रगतिशील कर्मों से तोड़ डाला। सूर्यगढ़ा की पावन मिट्टी ने उन्हें जो संस्कार दिए, उन्होंने एक सच्चे सपूत की तरह अपनी पूरी जिंदगी लगाकर उस माटी का कर्ज चुकाया है।


सेन सारथी वेबसाइट बैनर - राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष संदेश

विरासत को आगे बढ़ाती नई पीढ़ी: छत्रछाया का अहसास

कोई भी आंदोलन या सामाजिक सुधार तब तक जीवित नहीं रहता, जब तक कि अगली पीढ़ी उसे अपने कंधों पर उठाने के लिए तैयार न हो। रामलखन शर्मा जी ने अपने जीवन से जो मशाल जलाई थी, उसकी रोशनी उनके अपने परिवार और अगली पीढ़ी में साफ दिखाई देती है।
उनके भतीजे और राष्ट्रीय नाई महासभा (लखीसराय) के वर्तमान जिला अध्यक्ष, राजेश कुमार अपने चाचा के बारे में बात करते हुए भावुक हो जाते हैं। वह अतीत को याद करते हुए कहते हैं:
"मेरे दादाजी स्व. लालजी ठाकुर और मेरे पूज्य चाचा रामलखन शर्मा जी का आशीर्वाद ही था, जिसने मेरे भीतर समाज सेवा का बीज बोया। साल 2014 मेरे जीवन का एक ऐसा मोड़ था, जब मुझे जिला अध्यक्ष जैसी भारी जिम्मेदारी सौंपी गई। सच कहूँ तो, उस समय यह पद मुझे एक बहुत बड़े और भारी बोझ जैसा लग रहा था। मन में घबराहट थी कि क्या मैं इस पद के साथ न्याय कर पाऊँगा?"
राजेश जी आगे बताते हैं कि उस मुश्किल दौर में चाचा रामलखन जी की अनुभवी और वात्सल्य से भरी छत्रछाया ने उनका हाथ थाम लिया। उन्होंने राजेश को सिखाया कि समाज की निस्वार्थ सेवा ही संसार में सबसे बड़ा और पवित्र धर्म है। पद तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो काम समाज के दिलों में जगह बना ले, वही स्थायी है। आज भी जब कभी सामाजिक जीवन में कोई मुश्किल मोड़ आता है, तो रामलखन जी के दिखाए रास्ते और उनके पद-चिह्न ही नई पीढ़ी का सबसे बड़ा सहारा बनते हैं।

सिद्धांतों की रक्षा: स्वाभिमान और सांगठनिक संघर्ष

एक सच्चे नायक की पहचान तब नहीं होती जब सब कुछ उसकी मर्जी के मुताबिक चल रहा हो, बल्कि तब होती है जब उसके सिद्धांतों की परीक्षा ली जा रही हो। रामलखन जी का जीवन भी इस बात का गवाह है कि उन्होंने कभी भी अपने आत्मसम्मान और सामाजिक मूल्यों का सौदा नहीं किया। संगठन को मजबूत करते-करते एक ऐसा समय भी आया जब कार्यशैली और वैचारिक मतभेदों की दीवारें खड़ी हो गईं।

ऐतिहासिक दस्तावेजों और गवाहियों के अनुसार, जब संगठन के भीतर कुछ लोगों द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, पारदर्शिता और नियमों की अनदेखी की जाने लगी, तो रामलखन जी मूकदर्शक बनकर नहीं बैठे। जहाँ आम तौर पर लोग पदों के लालच में चुप रहना पसंद करते हैं, वहाँ इस कर्मयोगी ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया।

उनका यह दृढ़ और अटूट विश्वास था कि कोई भी सामाजिक कार्य या पदों का चुनाव बंद कमरों की साजिशों से नहीं, बल्कि पूरे समाज की खुली देख-रेख और स्थानीय कमिटी की प्रत्यक्ष गरिमामयी उपस्थिति में होना चाहिए। उन्होंने उस समय के मठाधीशों को एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया था: "रिमोट कंट्रोल से चलने वाला अध्यक्ष पद रामलखन शर्मा को कभी स्वीकार नहीं हो सकता।"
उन्होंने साबित कर दिया कि उनके लिए समाज की गरिमा, न्याय और सिद्धांत किसी भी लालसा या ऊंचे पद से कहीं बढ़कर हैं। पद के मोह से कोसों दूर रहकर उन्होंने सिद्धांतों को प्राथमिकता दी और इस तरह उन्होंने न केवल अपनी बल्कि पूरे समाज की अस्मिता की रक्षा की। उनका यह संघर्ष आज भी आने वाली पीढ़ियों को यह सीख देता है कि झुक जाना आसान हो सकता है, लेकिन समाज के स्वाभिमान के लिए अडिग खड़े रहना ही असली इंसानियत है।

​उपसंहार

​श्री रामलखन शर्मा जी का जीवन हमें सिखाता है कि पद अस्थायी होते हैं, लेकिन आपके द्वारा किए गए समाज सुधार और लोगों के दिलों में बनाई गई जगह स्थायी होती है। वे आज भी समाज के लिए एक प्रेरणापुंज हैं।


प्रस्तुत संस्मरण: प्रो. श्रीकांत ठाकुर, श्री उमाशंकर ठाकुर एवं श्री राजेश कुमार जी के व्यक्तिगत अनुभवों और हस्तलिखित दस्तावेजों पर आधारित।


शर्मा जी का जीवन परिचय यहाँ पढ़ें।


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• ​सूचना का स्रोत: यह लेख विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों (प्रो. श्रीकांत ठाकुर, उमाशंकर ठाकुर एवं राजेश कुमार) द्वारा लिखित हस्तलिखित दस्तावेजों, व्यक्तिगत संस्मरणों और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है।

• ​उद्देश्य: इस लेख का मुख्य उद्देश्य समाज के प्रेरणादायी व्यक्तित्वों के संघर्ष और उनके सिद्धांतों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।

• ​अस्वीकरण (Disclaimer): लेख में व्यक्त किए गए विचार संबंधित लेखकों के व्यक्तिगत संस्मरणों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी जाति, व्यक्ति, संगठन या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या किसी की छवि को धूमिल करना नहीं है। प्रकाशक किसी भी प्रकार के सांगठनिक विवाद की पुष्टि नहीं करता है और न ही इसके लिए उत्तरदायी है।

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