रामलखन शर्मा: समाज सेवा और संघर्ष की एक अनकही कहानी

प्रस्तावना:

इतिहास की किताबों में कई नायक दर्ज होते हैं, लेकिन समाज की जड़ों को सींचने वाले असली नायक अक्सर हमारी गलियों और समुदायों के बीच से निकलकर आते हैं। एक ऐसा ही व्यक्तित्व, जिसने अपनी मेहनत और संकल्प से समाज की सोई हुई चेतना को जगाया—वे हैं श्री रामलखन शर्मा जी। आज के इस विशेष लेख में हम उनके जीवन के उन पन्नों को पलटेंगे, जिन्हें समाज के विभिन्न विद्वानों और कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभवों से संजोया है।



समाज सेवी श्री रामलखन शर्मा के जीवन संघर्ष और समाज के प्रति योगदान
सांकेतिक संपादन

वह ऐतिहासिक दिन: जब एक युवा ने बुजुर्गों के बीच अपनी पहचान बनाई

प्रोफेसर श्रीकान्त ठाकुर (अध्यक्ष, लखीसराय जिला राष्ट्रीय नाई महासभा) उस सुनहरे दौर को याद करते हुए लिखते हैं:

​बात साल 1983 की है। मैं उस समय विद्यार्थी था और हमारे गाँव बड़हिया में 'नाई सभा' की बड़ी चर्चा हुआ करती थी। 27 और 28 दिसंबर को जगदानी धर्मशाला में एक विशाल नाई सम्मेलन का आयोजन हुआ। जब मैं वहाँ पहुँचा, तो भीड़ देखकर दंग रह गया। लेकिन सबसे ज्यादा अचंभित करने वाला दृश्य वह था, जब मैंने फूलों की मालाओं से लदे एक तेजस्वी युवा को देखा।

​इतने बड़े-बड़े बुजुर्गों और अनुभवी लोगों के बीच उस युवा को मिला सम्मान यह बताने के लिए काफी था कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि एक 'कर्मयोगी' है। लोगों ने बताया कि यही रामलखन जी हैं, जिन्होंने दबंगों के बीच खड़े होकर समाज के हक और मजदूरी के लिए आवाज उठाई है। उन्होंने समाज की आँखों पर बंधी पट्टी को खोला और एक ऐसी अटूट एकता कायम की, जिसे आज की नई पीढ़ी भी गर्व से स्वीकार करती है। ऐसे साधु स्वभाव के कर्मयोगी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

​70 वर्षों की सुनहरी विरासत

उमाशंकर ठाकुर (कोषाध्यक्ष, सूर्यगढ़ा) ने राम लखन के 70 वें जन्म दिन के अवसर पर उनकी सेवा यात्रा को कुछ पंक्तियों में पिरोया है।
सांकेतिक संपादन

रामलखन जी का जन्म 19 जुलाई 1952 को हुआ। उनके 70वें जन्मदिन के अवसर पर उमाशंकर ठाकुर (कोषाध्यक्ष, सूर्यगढ़ा) ने उनकी सेवा यात्रा को कुछ इन पंक्तियों में पिरोया है:

​​

प्रेरणा पुंज: श्री राम लखन शर्मा

​70 साल की यह सुनहरी विरासत, है आज भी जिसकी अटूट डोर,

उसी संकल्प को कायम रखकर, है हमने बढ़ाया कदम चारों ओर।

परिवर्तन के सांचे में ढलकर भी, भरोसा जीतने का लिया जिन्होंने प्रण,

उस पथ-प्रदर्शक को आज हमारा, बारंबार कोटि-कोटि प्रणाम।

​पुरखों की गौरव गाथा को, कागज़ पर उतारा है,

खोए हुए इतिहास को, शब्दों से संवारा है।

समाज के हर वर्ग को, हक का पाठ पढ़ाते हैं,

कठिन डगर पर भी वो, निर्भय कदम बढ़ाते हैं।

​सूर्यगढ़ा की माटी का, जो कर्ज चुका रहे हैं,

सेवा की नई परिभाषा, दुनिया को दिखा रहे हैं।

वंशावली के ज्ञान से, रिश्तों को जोड़ा है,

रूढ़ियों की जंजीरों को, कर्मों से तोड़ा है।

​देख आपके पद-चिह्नों को, 'उमाशंकर' भी अब जाग उठा,

सेवा के पावन पथ पर, लेकर संकल्प वह भाग उठा।

आपकी प्रेरणा से ही अब, मैंने सेवा का धर्म चुना,

समाज हित के सपनों का, मैंने भी अब ताना-बाना बुना।

​कलम आपकी ताकत है, और सेवा ही आपका धर्म,

दिखता है हर लेख में, आपके संघर्षों का मर्म।

ऐसे कर्मठ व्यक्तित्व पर, हमें है पूरा नाज़,

आप ही हैं हमारे, कल और आज की आवाज़।


विरासत को आगे बढ़ाती नई पीढ़ी

​उनके (राम लखन शर्मा जी के) भतीजे और राष्ट्रीय नाई महासभा (लखीसराय) के जिला अध्यक्ष, राजेश कुमार बताते हैं कि कैसे रामलखन जी उनके लिए एक मार्गदर्शक की तरह रहे हैं:

​"मेरे दादा स्व. लालजी ठाकुर और चाचा रामलखन ठाकुर जी के आशीर्वाद ने मुझे समाज सेवा की ओर प्रेरित किया। जब 2014 में मुझे जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली, तो वह मेरे लिए एक बड़ा बोझ जैसा था। लेकिन चाचा रामलखन जी की अनुभवी छत्रछाया में मैंने सीखा कि समाज की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। उनके पद-चिह्नों पर चलकर ही मुझे हर मुश्किल मोड़ पर सहारा मिलता रहा।"

​सिद्धांतों की रक्षा और सांगठनिक संघर्ष

​किसी भी बड़े व्यक्तित्व का सफर संघर्षों के बिना पूरा नहीं होता। रामलखन जी के जीवन में भी एक ऐसा मोड़ आया जब सांगठनिक कार्यशैली को लेकर वैचारिक मतभेद उभरे।

​दस्तावेजों के अनुसार, जब संगठन के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई, तो रामलखन जी ने अपनी आवाज बुलंद की। उनका मानना था कि सामाजिक कार्य और पदों का चुनाव हमेशा समाज की देख-रेख और स्थानीय कमिटी की उपस्थिति में होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि "रिमोट कंट्रोल से चलने वाला अध्यक्ष पद उन्हें स्वीकार नहीं"। उन्होंने पद के मोह से ऊपर उठकर सिद्धांतों को प्राथमिकता दी और समाज की गरिमा से समझौता नहीं किया।

​उपसंहार

​श्री रामलखन शर्मा जी का जीवन हमें सिखाता है कि पद अस्थायी होते हैं, लेकिन आपके द्वारा किए गए समाज सुधार और लोगों के दिलों में बनाई गई जगह स्थायी होती है। वे आज भी समाज के लिए एक प्रेरणापुंज हैं।


प्रस्तुत संस्मरण: प्रो. श्रीकांत ठाकुर, श्री उमाशंकर ठाकुर एवं श्री राजेश कुमार जी के व्यक्तिगत अनुभवों और हस्तलिखित दस्तावेजों पर आधारित।


शर्मा जी का जीवन परिचय यहाँ पढ़ें।


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• ​सूचना का स्रोत: यह लेख विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों (प्रो. श्रीकांत ठाकुर, उमाशंकर ठाकुर एवं राजेश कुमार) द्वारा लिखित हस्तलिखित दस्तावेजों, व्यक्तिगत संस्मरणों और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है।

• ​उद्देश्य: इस लेख का मुख्य उद्देश्य समाज के प्रेरणादायी व्यक्तित्वों के संघर्ष और उनके सिद्धांतों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।

• ​अस्वीकरण (Disclaimer): लेख में व्यक्त किए गए विचार संबंधित लेखकों के व्यक्तिगत संस्मरणों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संगठन या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या किसी की छवि को धूमिल करना नहीं है। प्रकाशक किसी भी प्रकार के सांगठनिक विवाद की पुष्टि नहीं करता है और न ही इसके लिए उत्तरदायी है।

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