मेरे नजरिए से रामलखन जी: जिला महासचिव सुनील ठाकुर की कलम से एक गौरवगाथा (भाग 1)
लेखक परिचय:
यह विशेष लेख सुनील ठाकुर जी (जिला महासचिव, राष्ट्रीय नाई महासभा, लखीसराय) द्वारा लिखा गया है। वर्षों तक कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के बाद, सुनील जी ने अपने मार्गदर्शक और वरिष्ठ साथी श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन के उन अनछुए पहलुओं को साझा किया है, जो आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा हैं।
समाज-शिल्पी: श्री रामलखन शर्मा की गौरवगाथा
समय की धूल भले ही इतिहास के पन्नों को धुंधला कर दे, लेकिन समाज की भलाई के लिए अपना जीवन होम कर देने वाले महापुरुषों की कीर्ति कभी फीकी नहीं पड़ती। वे समाज के शिल्पी होते हैं, जो अपने पसीने और अटूट संकल्प से आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को एक सुंदर आकार देते हैं। लखीसराय की पावन धरती पर एक ऐसा ही देदीप्यमान नाम है—श्री रामलखन शर्मा।
लखीसराय जिला 'राष्ट्रीय नाई महासभा' के जिला सचिव सुनील ठाकुर जी के अंतर्मन से निकले आदरयुक्त शब्द जब हवाओं में गूंजते हैं, तो श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन का पूरा संघर्ष, उनकी निस्वार्थ सेवा और उनकी गौरवगाथा एक जीवंत चलचित्र की तरह आँखों के सामने तैरने लगती है। यह महज़ एक व्यक्ति का परिचय नहीं है, बल्कि एक पूरे समाज के जागृत होने और स्वाभिमान से जीने की अमर कहानी है।
सम्मान की वह ऐतिहासिक और भावुक शाम
स्मृतियों के झरोखे से अगर हम थोड़ा पीछे मुड़कर देखें, तो 20 जुलाई 2017 का वह दिन आज भी नाई समाज के हर व्यक्ति के सीने में गर्व की एक नई उमंग भर देता है। वह सिर्फ एक तारीख नहीं थी, बल्कि नाई महासभा द्वारा आयोजित एक ऐसे भव्य और ऐतिहासिक समागम की गवाह थी, जिसने पूरे जिले को एक सूत्र में पिरो दिया था।
उस दिन चारों तरफ अपार जनसैलाब उमड़ा हुआ था। जिले के कोने-कोने से आए नाई समाज के लोगों की आँखों में अपने इस प्रिय नेता के प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम साफ देखा जा सकता था। मंच पर जब सूर्यगढ़ा बाबा धर्मदास जन सेवा ट्रस्ट के ऊर्जावान संयोजक और 'राज विहारी डांस एकेडमी' के कुशल संचालक, श्री रामलखन शर्मा जी खड़े हुए, तो पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट और जयकारों से गूंज उठा।
जब उन्हें सम्मानित किया जा रहा था, तो कई बुजुर्गों की आँखें नम थीं। यह सम्मान किसी पद या सत्ता का नहीं था, बल्कि उनके द्वारा वर्षों से किए जा रहे निस्वार्थ त्याग, आधी रात को भी समाज के गरीब से गरीब व्यक्ति के लिए खड़े रहने की उनकी तत्परता और उनके अद्वितीय योगदान का एक छोटा सा नजराना था। उनकी यही जीवन-झांकी, उनके संघर्षों की यही सुगंध आज हम पूरे समाज के सम्मुख बड़े ही आदर के साथ समर्पित कर रहे हैं।
जन्म, मिट्टी की महक और गंगा की धाराओं का दर्द
इस गौरवगाथा की शुरुआत होती है आज से कई दशक पहले, 19 जुलाई 1952 की उस मंगलमय और पावन घड़ी से। सावन के उस सुहावने मौसम में, बड़हिया थाना के अंतर्गत आने वाले किशनपुर गाँव के एक बेहद प्रतिष्ठित और संस्कारी परिवार में किलकारी गूंजी। आदरणीय स्वर्गीय लालजीत ठाकुर के घर उनके सबसे छोटे पुत्र के रूप में रामलखन जी का जन्म हुआ। माँ-बाप की आँखों के तारे और भाइयों के लाडले रामलखन के भीतर बचपन से ही कुछ अलग करने की तड़प थी।
किशनपुर गाँव की वह मिट्टी, जहाँ रामलखन जी ने चलना सीखा, जहाँ की गलियों में उनका बचपन बीता, वह आज भौगोलिक रूप से अस्तित्व में नहीं है। समय की क्रूर चाल और मां गंगा की उफनती, बेलगाम धाराओं ने उस हंसते-खेलते गाँव को अपने आगोश में ले लिया और वह हमेशा-कमेशा के लिए नदी के सीने में विलीन हो गया।
गाँव भले ही पानी में समा गया, लेकिन उस मिट्टी के संस्कार, अपनों को बिखरते हुए देखने का दर्द और समाज को एकजुट रखने की जो सीख रामलखन जी को वहां से मिली, उसे गंगा की तेज धाराएं भी बहाकर नहीं ले जा सकीं। एक विस्थापित समाज के दर्द को उन्होंने बहुत करीब से महसूस किया था, और शायद इसी दर्द ने उनके भीतर के सामाजिक कार्यकर्ता को समय से पहले ही बड़ा कर दिया था।
युवावस्था की दहलीज़ और नेतृत्व का दिव्य उदय
अक्सर 19 वर्ष की उम्र ऐसी होती है जब युवा अपने करियर, अपनी पढ़ाई और अपनी खुद की दुनिया में खोए रहते हैं। वे अपने भविष्य के ताने-बाने बुनने में मसरूफ होते हैं। लेकिन रामलखन जी के भीतर तो समाज के उत्थान की एक ऐसी आग सुलग रही थी, जो उन्हें चैन से बैठने नहीं देती थी।
साल 1971 का वह दौर था। रामलखन जी उस समय इंटर (I.A.) के एक होनहार छात्र थे। एक तरफ किताबों का संसार था, तो दूसरी तरफ अपने नाई समाज की बदहाली, उनका पिछड़ापन और उनकी दबी हुई आवाजें थीं। उसी दौरान बड़हिया प्रखंड नाई सभा का एक कार्यक्रम चल रहा था। वहां उठती मांगों और समाज की बेबसी को देखकर इस 19 साल के युवा का दिल पसीज गया। उनकी स्वजातीय भावनाओं को एक ऐसा गहरा धक्का लगा कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को दरकिनार कर सेवा के इस कठिन मार्ग पर चलने का फैसला कर लिया।
पढ़ाई के साथ-साथ समाज सेवा के इस जज्बे, उनकी अद्भुत वक्तृत्व शैली और अटूट समर्पण को देखकर समाज के वयोवृद्ध नेताओं ने भांप लिया कि यह कोई साधारण लड़का नहीं है। सर्वसम्मति से उन्हें प्रखंड सचिव मनोनीत कर दिया गया। यहीं से लखीसराय के इतिहास में नेतृत्व के एक नए सूर्य का उदय हुआ।
संघर्ष की भट्टी में तपे निस्वार्थ सेवा के 12 वर्ष
उस ज़माने में यह संगठन 'अखिल भारतीय नाई ब्राह्मण सभा' के नाम से जाना जाता था। उस समय लखीसराय के वयोवृद्ध, आदरणीय और मार्गदर्शक नेता स्वर्गीय राम प्रसाद शर्मा जी के हाथों में इस सभा की कमान थी। रामलखन जी को स्वर्गीय राम प्रसाद जी के रूप में एक कुशल पारखी और गुरु मिला। उनके पदचिह्नों पर चलते हुए रामलखन जी ने साल 1971 से लेकर 1983 तक, यानी पूरे 12 वर्षों तक लगातार बड़हिया स्वजातीय सभा के सचिव के रूप में अपनी ऐतिहासिक सेवाएं दीं।
ये 12 साल कोई आसान नहीं थे। तब न तो आज की तरह सोशल मीडिया था और न ही संवाद के इतने साधन। गाँव-गाँव जाकर लोगों को जगाना, उनके सुख-दुख में शरीक होना, समाज की कुरीतियों के खिलाफ लड़ना और शिक्षा की अलख जगाना ही उनका रोज का नियम बन गया था। इन 12 वर्षों में उन्होंने निस्वार्थ सेवा की जो बेमिसाल इबारत लिखी, उसकी गूंज आज भी लखीसराय की फिजाओं में महसूस की जा सकती है। लोग आज भी उनके द्वारा किए गए कार्यों को बड़ी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करते हैं। रामलखन जी ने जो रास्ता तैयार किया था, जो मशाल जलाई थी, आज समाज की युवा पीढ़ी उसी के उजाले में आगे बढ़ रही है।
1983 का वह ऐतिहासिक महासम्मेलन: जब थम गया था लखीसराय
श्री रामलखन शर्मा जी के इस स्वर्णिम कार्यकाल का सबसे बड़ा और अमिट मील का पत्थर था—26 और 27 दिसंबर 1983 का वह प्रखंड स्तरीय सम्मेलन। यह सिर्फ एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि रामलखन जी के संगठनात्मक कौशल, उनकी साख और उनकी दिन-रात की मेहनत की एक अग्निपरीक्षा थी, जिसमें वे कुंदन बनकर उभरे।
एक छोटे से प्रखंड स्तर के आयोजन में उन्होंने अपनी साख के बल पर वो कर दिखाया जिसकी कल्पना बड़े-बड़े राजनेता भी नहीं कर सकते थे। उनके एक आह्वान पर उस छोटे से इलाके में जिला स्तर, राज्य स्तर और यहाँ तक कि देश की राजधानी दिल्ली से केंद्र स्तर के बड़े-बड़े स्वजातीय दिग्गज नेताओं का जमावड़ा लग गया। दो दिनों तक पूरा इलाका एक उत्सव के माहौल में डूबा रहा।
थाने के स्तर पर इतनी विशाल और अनुशासित सभा को आयोजित करना, सभी को एक जाजम पर बिठाना और पूरे समाज को "एकता ही शक्ति है" के सूत्र में पिरो देना, रामलखन जी के असाधारण और कुशल नेतृत्व का सबसे बड़ा प्रमाण था। उस सम्मेलन ने नाई समाज को उसकी राजनीतिक और सामाजिक ताकत का अहसास कराया।
उपसंहार: कृतज्ञ समाज का सादर नमन
सचमुच, श्री रामलखन शर्मा जी ने अपना पूरा जीवन समाज के उस आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोंछने में लगा दिया, जिसे मुख्यधारा ने भुला दिया था। उन्होंने कभी अपने फायदे के लिए राजनीति नहीं की, बल्कि हमेशा समाज के आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखा।
उनके इस अद्वितीय, पावन और महान योगदान के लिए लखीसराय का नाई समाज और यह पूरी मानवता उन्हें जितना भी धन्यवाद दे, जितना भी साधुवाद प्रकट करे, वह समुद्र में एक बूंद के समान बेहद कम ही होगा। वे समाज के लिए केवल एक पारंपरिक नेता भर नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे जीवित वटवृक्ष हैं, जिसकी ठंडी छांव में आज पूरा समाज सुरक्षित महसूस करता है। वे एक सच्चे मार्गदर्शक, एक पथ-प्रदर्शक और समाज-शिल्पी हैं, जिनका जीवन युगों-युगों तक आने वाली पीढ़ियों को निस्वार्थ राष्ट्र और समाज सेवा की प्रेरणा देता रहेगा।
कलम से:
सुनील ठाकुर (जिला महासचिव, राष्ट्रीय नाई महासभा, लखीसराय)
"यह इस श्रृंखला का पहला भाग है। रामलखन जी के जीवन के अन्य अनछुए पहलुओं और उनके आगे के संघर्षों को पढ़ने के लिए 'सेन सारथी' से जुड़े रहें।
अभी आपने सुनिल जी के लेख शृंखला का पहला भाग पढ़ा है।
पाठकों से एक विनती
रामलखन शर्मा जी का जीवन हमें सिखाता है कि समाज के लिए जीने का आनंद ही कुछ और है।
सुनील ठाकुर जी द्वारा लिखे गए इस संस्मरण पर आपकी क्या राय है? क्या आपके पास भी रामलखन जी से जुड़ी कोई याद या कोई संदेश है? कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी बात जरूर रखें और इस लेख को ज्यादा से ज्यादा साझा करें ताकि समाज के अन्य युवाओं को भी प्रेरणा मिल सके।
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अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार और जानकारियां सामाजिक विमर्श तथा उपलब्ध व्यक्तिगत संस्मरणों (श्री सुनील ठाकुर जी के वक्तव्य) पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, जाति या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि सामाजिक इतिहास और योगदान को संकलित करना है।

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