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सामाजिक चेतना: भाग-2 | एकता की पुकार और बिखराव का दर्द

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सांकेतिक संपादन प्रस्तावना ​"क्या संख्या में कम होना ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है, या अपनों के बीच का बिखराव?" ​जमुई की सभा में श्री राम लखन शर्मा जी के शब्द केवल भाषण नहीं, बल्कि समाज के गिरते हुए रसूख पर एक कड़ा प्रहार थे। लेखक ने इस लेख के माध्यम से उन कड़वे सत्यों को कुरेदने की कोशिश की है, जिन्हें अक्सर हम राजनीति की चकाचौंध में अनदेखा कर देते हैं। आइए, समाज की सिसकती उम्मीदों के इस सफर में शामिल हों। पिछले भाग का संक्षिप्त सार (Recap): पिछले भाग में हमने पढ़ा कि जमुई की सभा में श्री राम लखन शर्मा जी ने सामाजिक संगठन और राजनीति के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने स्वर्गीय सुनील बाबू को श्रद्धांजलि देते हुए यह संदेश दिया कि राजनीति 'स्वार्थ का घड़ा' है, जबकि समाज सेवा एक 'वटवृक्ष' है। अब पढ़िए, उससे आगे के विचार... हमारी असली पहचान: अल्पसंख्यक या बिखरा हुआ समाज? ​किसी भी समाज की जीवंतता और उसका अस्तित्व इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसकी जनसंख्या कितनी बड़ी है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि संकट के समय उसका आपसी जुड़ाव कितना गहरा है। जब सामाजिक मंचों से...

मेरे नजरिए से रामलखन जी: समाज-शिल्पी का संकल्प और अधूरा सपना (भाग 2)

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लेखक परिचय:   यह विशेष लेख सुनील ठाकुर जी (जिला महासचिव, राष्ट्रीय नाई महासभा, लखीसराय) द्वारा लिखा गया है, जिन्होंने श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन के प्रेरक संघर्षों को शब्दों में पिरोया है। बीते अंक की एक झलक: ​ पिछले भाग में हमने पढ़ा कि कैसे 19 जुलाई 1952 को किशनपुर (बड़हिया) में जन्मे श्री रामलखन शर्मा जी ने मात्र 19 वर्ष की उम्र में समाज सेवा की मशाल थामी। 1971 से 1983 तक, 12 वर्षों तक बड़हिया प्रखंड सचिव के रूप में उन्होंने समाज को संगठित किया और 1983 के ऐतिहासिक सम्मेलन के जरिए अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया। ​ अब पढ़िए, उनके संघर्ष और सफलता का अगला अध्याय... निर्विरोध नेतृत्व, सामाजिक समरसता और जीवन का अनवरत सफर ​ निर्विरोध नेतृत्व और क्षेत्रीय पहचान (1984) ​सार्वजनिक जीवन का मार्ग कभी सीधा और समतल नहीं होता। यह कांटों भरा और जन-आकांक्षाओं की कसौटियों से घिरा होता है। वर्ष 1984 श्री राम लखन शर्मा जी के इसी सार्वजनिक जीवन का एक ऐसा स्वर्णिम और महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर आया, जिसने उनके व्यक्तित्व को एक नई पहचान दी। इस वर्ष उनकी निश्छल सेवा भावना और सर्वस्वीकार्य छवि को देखते ...

सामाजिक चेतना: भाग-1 | राजनीति और संगठन के बीच का द्वंद्व

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एक विशेष प्रस्तावना: प्रिय पाठकों, आज का यह लेख उस ओजस्वी वाणी का दस्तावेज़ है, जिसने जमुई की धरती पर समाज के आत्म-सम्मान की अलख जगाई। हम आपके समक्ष श्री राम लखन शर्मा जी के ऐतिहासिक भाषण के कुछ चुनिंदा अंश प्रस्तुत कर रहे हैं, जिन्हें जमुई जिला अध्यक्ष श्री मदन ठाकुर जी ने न केवल संकलित किया, बल्कि अपनी कलम से उसे जीवंत रूप दिया है। ​यह वैचारिक यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती; यह इस श्रृंखला का पहला भाग है। इसके बाद दो और भाग आने शेष हैं, जिनमें समाज के उत्थान की गहरी समझ छिपी है। एक उत्सव की सुबह और हवाओं में घुली उदासी ​ 26 अक्टूबर, जमुई। शरद ऋतु की उस सुबह जमुई शहर के वातावरण में एक अजीब सी हलचल थी। सड़कों पर आम दिनों से ज़्यादा सरगर्मी थी और हवाओं में एक ऐसा उत्साह था, जो किसी बड़े उत्सव के आगमन की गवाही दे रहा था। अवसर ही कुछ ऐसा था। राष्ट्रीय नाई महासभा के स्थापना दिवस (05/01/2015) का यह भव्य उत्सव था, जिसे यादगार बनाने के लिए महीनों से तैयारियाँ चल रही थीं। इसके साथ ही, यह दिन समाज के मार्गदर्शक, महासभा के सचेतक और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष माननीय श्री आजाद गाँधी जी के जन्मोत्सव का भी ...

शिव ही गुरु क्यों?

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सांकेतिक संपादन "अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि आज के इस आधुनिक और भागदौड़ भरे परिवेश में आखिर 'शिव' को ही गुरु बनाने की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है? आज के इस लेख में मैं इसी प्रश्न का उत्तर और शिव-शिष्यता के मर्म को साझा कर रहा हूँ..." शिव: आदि गुरु और जीवन का प्रकाश (एक आध्यात्मिक अनुभूति) आज के इस भागते-दौड़ते समाज में जब हम चारों तरफ नजर दौड़ाते हैं, तो एक अजीब सा खालीपन और बेचैनी दिखाई देती है। ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ, चमकती गाड़ियाँ और तकनीक की इस चकाचौंध के बीच इंसान भीतर से कितना अकेला और खोया हुआ महसूस कर रहा है। मानव की गिरती हुई नैतिकता, बिखरते रिश्ते और स्वार्थ की अंधी दौड़ इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी आध्यात्मिक चेतना कहीं गहरी नींद में सो गई है। इस अज्ञान के गहन और दमघोंटू अंधकार से निकलकर ज्ञान के उस परम प्रकाश की ओर बढ़ने का जो मार्ग है, वही 'शिव गुरु' का वास्तविक कार्य है। आज दुनिया के कोने-कोने में, हर गली-मोहल्ले में शिव को अपना गुरु बनाने की एक नई चेड़ (होड़) और तड़प दिखाई दे रही है। यह महज कोई अंधविश्वास या लहर नहीं है, बल्कि यह इंसानी आत्मा की वह...

मेरे नजरिए से रामलखन जी: जिला महासचिव सुनील ठाकुर की कलम से एक गौरवगाथा (भाग 1)

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लेखक परिचय: यह विशेष लेख सुनील ठाकुर जी (जिला महासचिव, राष्ट्रीय नाई महासभा, लखीसराय) द्वारा लिखा गया है। वर्षों तक कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के बाद, सुनील जी ने अपने मार्गदर्शक और वरिष्ठ साथी श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन के उन अनछुए पहलुओं को साझा किया है, जो आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा हैं। समाज-शिल्पी: श्री रामलखन शर्मा की गौरवगाथा समय की धूल भले ही इतिहास के पन्नों को धुंधला कर दे, लेकिन समाज की भलाई के लिए अपना जीवन होम कर देने वाले महापुरुषों की कीर्ति कभी फीकी नहीं पड़ती। वे समाज के शिल्पी होते हैं, जो अपने पसीने और अटूट संकल्प से आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को एक सुंदर आकार देते हैं। लखीसराय की पावन धरती पर एक ऐसा ही देदीप्यमान नाम है— श्री रामलखन शर्मा । लखीसराय जिला 'राष्ट्रीय नाई महासभा' के जिला सचिव सुनील ठाकुर जी के अंतर्मन से निकले आदरयुक्त शब्द जब हवाओं में गूंजते हैं, तो श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन का पूरा संघर्ष, उनकी निस्वार्थ सेवा और उनकी गौरवगाथा एक जीवंत चलचित्र की तरह आँखों के सामने तैरने लगती है। यह महज़ एक व्यक्ति का परिचय नहीं है, बल्कि एक पूर...

स्मृति शेष: संकल्प (भाग 1) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू

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  प्रस्तुति पृष्ठभूमि:  "यह लेख मेरे (सुरेंद्र प्रसाद शम्भू) उन गहरे अनुभवों और भावनाओं का प्रतिबिंब है, जिन्हें मैंने श्रद्धेय रामलखन शर्मा जी के सानिध्य में महसूस किया था। उनके ओजस्वी व्यक्तित्व और मार्गदर्शन ने मुझे इन यादों को लेखनीबद्ध करने की प्रेरणा दी है। " मेरी पहचान: जड़ों से जुड़ा एक शिक्षक और समाज का सारथी मेरा नाम सुरेंद्र प्रसाद शम्भू है। समाज मुझे एक शिक्षक के रूप में देखता है, जो बच्चों के भविष्य को अक्षरों के उजाले से संवारता है। वर्तमान समय में, मुझे 'बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट' के अध्यक्ष के रूप में दीन-दुखियों और समाज की सेवा करने का सौभाग्य भी प्राप्त है। जब भी मैं किसी सार्वजनिक मंच पर होता हूँ या किसी सामाजिक कार्य की रूपरेखा तैयार कर रहा होता हूँ, तो अक्सर लोग कौतूहलवश मुझसे एक सवाल पूछ बैठते हैं—"शम्भू जी, आप तो पेशे से एक शिक्षक हैं, जिसका काम स्कूल की चारदीवारी और ब्लैकबोर्ड तक सीमित होता है; फिर आपका यह झुकाव सामाजिक सरोकारों, आंदोलनों और जनसेवा की तरफ इतना गहरा कैसे हो गया?" इस सवाल को सुनकर मैं अक्सर कुछ पलों के लिए मौन हो जाता ह...

जननायक कर्पूरी ठाकुर: सादगी और न्याय की मिसाल — लेखक रामलखन शर्मा

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मूर्धन्य जननेता कर्पूरी ठाकुर: सादगी, समरसता और मानवीय चेतना के जीवंत संवाहक मुख्य वक्ता: रामलखन शर्मा (जिला संयोजक, लखीसराय नाई समाज संघ) आयोजन स्थल: के.एस.एस. कॉलेज परिसर, लखीसराय बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भूमि लखीसराय के के.एस.एस. कॉलेज के प्रांगण में आयोजित एक भव्य एवं गरिमामयी समारोह में, सुप्रसिद्ध विचारक और लखीसराय नाई समाज संघ के जिला संयोजक रामलखन शर्मा जी ने भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर के विराट व्यक्तित्व और उनकी कालजयी कृतियों पर अपने अत्यंत मर्मस्पर्शी विचार साझा किए। शर्मा जी का यह उद्बोधन मात्र एक व्याख्यान नहीं था, बल्कि वह एक ऐसे युगपुरुष के जीवन दर्शन का सजीव दस्तावेज़ था जिसने अपनी अंतिम सांस तक समाज के हाशिए पर खड़े अंतिम व्यक्ति के आंसुओं को पोंछने का व्रत लिया था। आइए, उस ओजस्वी और मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत भाषण के उन मुख्य अंशों से रूबरू हों, जो आज के संक्रमण काल में भी हमें राष्ट्र-निर्माण का सच्चा मार्ग दिखाते हैं। एक ऐसा निर्मल दर्पण जिसमें समाज को अपनी सही पहचान मिली रामलखन शर्मा जी ने अपने भाषण की शुरुआत एक बेहद भावुक और दार्शनिक वि...