स्मृति शेष: संकल्प (भाग 1) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू
प्रस्तुति पृष्ठभूमि:
"यह लेख मेरे (सुरेंद्र प्रसाद शम्भू) उन गहरे अनुभवों और भावनाओं का प्रतिबिंब है, जिन्हें मैंने श्रद्धेय रामलखन शर्मा जी के सानिध्य में महसूस किया था। उनके ओजस्वी व्यक्तित्व और मार्गदर्शन ने मुझे इन यादों को लेखनीबद्ध करने की प्रेरणा दी है।"
मेरी पहचान: जड़ों से जुड़ा एक शिक्षक और समाज का सारथी
मेरा नाम सुरेंद्र प्रसाद शम्भू है। समाज मुझे एक शिक्षक के रूप में देखता है, जो बच्चों के भविष्य को अक्षरों के उजाले से संवारता है। वर्तमान समय में, मुझे 'बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट' के अध्यक्ष के रूप में दीन-दुखियों और समाज की सेवा करने का सौभाग्य भी प्राप्त है। जब भी मैं किसी सार्वजनिक मंच पर होता हूँ या किसी सामाजिक कार्य की रूपरेखा तैयार कर रहा होता हूँ, तो अक्सर लोग कौतूहलवश मुझसे एक सवाल पूछ बैठते हैं—"शम्भू जी, आप तो पेशे से एक शिक्षक हैं, जिसका काम स्कूल की चारदीवारी और ब्लैकबोर्ड तक सीमित होता है; फिर आपका यह झुकाव सामाजिक सरोकारों, आंदोलनों और जनसेवा की तरफ इतना गहरा कैसे हो गया?"
इस सवाल को सुनकर मैं अक्सर कुछ पलों के लिए मौन हो जाता हूँ और अतीत के झरोखों में झांकने लगता हूँ। सच तो यह है कि भले ही समय के चक्र और आधुनिक शिक्षा ने मुझे मेरे पुश्तैनी काम से थोड़ा दूर कर दिया, लेकिन मेरे भीतर की जो मूल पहचान है, वह कभी धुंधली नहीं हुई। मुझे पूरी दुनिया के सामने, अपनी पूरी चेतना के साथ यह स्वीकार करने में अगाध गर्व महसूस होता है कि मैं नाई समाज का एक अटूट हिस्सा हूँ। यह केवल एक जातिगत पहचान नहीं है, बल्कि यह उन संघर्षों, आंसुओं और श्रम की कहानी है जिससे मेरी नस-नस वाकिफ है। मेरी इस सुप्त पड़ी सोच को, मेरे जीवन के उस उद्देश्य को दिशा मिली साल 1984 में। 1984 का वह साल, जिसने मेरे जीवन की दिशा और दशा को हमेशा-अमिट रूप से बदल कर रख दिया।
1984 की वह शाम: जब समाज की सिसकियों को शब्द मिले
वह साल 1984 का था। हवाओं में एक अजीब सी सुगबुगाहट थी और मैं उस उम्र में था जब एक युवा दुनिया के ताने-बाने को, ऊंच-नीच को और समाज की कड़वी हकीकतों को समझने की शुरुआत ही कर रहा होता है। दिल में कुछ करने की तमन्ना तो थी, पर कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। उसी दौर की एक धुंधली सी शाम मुझे आज भी कल की तरह याद है। सूर्यगढ़ा बाजार में हमारे नाई समाज की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक सभा का आयोजन हो रहा था। इस सभा की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि इसकी अध्यक्षता स्वयं श्रद्धेय श्री रामलखन शर्मा जी कर रहे थे, जिनका नाम सुनते ही समाज के लोगों की आंखों में एक उम्मीद जाग उठती थी।
मैं उस दिन घर पर ही था, तभी मेरा परम मित्र हनुमान ठाकुर मेरे पास आया। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी और उसने मुझसे कहा, "शम्भू, चलो आज तुम्हें समाज का असली चेहरा दिखाता हूँ।" मुझे नहीं पता था कि मैं जहाँ जा रहा हूँ, वह जगह मेरे भविष्य की नींव बनने वाली है। हनुमान मुझे लगभग खींचते हुए उस विशाल जनसभा के बीच ले गया।
भीड़ खचाखच भरी थी, चारों तरफ सुगबुगाहट थी। तभी मंच पर एक सन्नाटा छा गया और श्रद्धेय रामलखन जी ने माइक संभाला। जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, सूर्यगढ़ा बाजार की वह फिजां बदल गई। उनकी आवाज में कोई बनावटीपन नहीं था, बल्कि उसमें समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की सिसकियां थीं, वर्षों से दबाया गया दर्द था। वे हमारी बिखरी हुई व्यवस्था, हमारे अधिकारों के हनन और अपनों की पीड़ाओं का ऐसा सजीव, मार्मिक और जीवंत वर्णन कर रहे थे, मानो कोई मंझा हुआ संवेदनशील कलाकार मंच पर किसी रूह को झकझोर देने वाली कहानी का जीवंत मंचन कर रहा हो। उस शाम उनकी बातें कानों से होते हुए सीधे मेरे दिल के सबसे गहरे कोने में उतर गईं। मेरी आंखों के कोर गीले हो गए थे और भीतर एक तड़प जाग उठी थी कि मैं अब यूं ही हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकता।
जैसे हनुमान ने सुग्रीव को राम से मिलाया...
उस जादुई और भावुक कर देने वाली शाम को जब मैं वापस लौट रहा था, तो मेरे अंतर्मन में एक अद्भुत और अलौकिक संयोग बार-बार कौंध रहा था। हमारी सनातनी संस्कृति की वह पावन कथा मेरी आंखों के सामने तैर गई जब त्रेतायुग में, व्याकुल और असहाय सुग्रीव की मुलाक़ात मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम से करवाने का माध्यम स्वयं वीर हनुमान बने थे।
मैंने अपने मित्र की तरफ देखा और मुस्कुरा उठा। प्रकृति भी कैसे-कैसे ताने-बाने बुनती है! ठीक उसी पावन प्रसंग की तरह, आधुनिक युग के इस सामाजिक कुरुक्षेत्र में, मेरे मित्र 'हनुमान' ठाकुर ने मुझ जैसे एक साधारण और राह ढूंढते युवा को समाज के तारणहार 'रामलखन' जी से मिलवा दिया था। वह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि वह एक शिष्य का अपने गुरु से, एक भटके हुए राही का अपने पथ-प्रदर्शक से मिलन था।
उनके चुंबकीय, त्यागी और ओजस्वी व्यक्तित्व का मेरे ऊपर ऐसा गहरा और अमिट प्रभाव पड़ा कि मैंने उसी पावन क्षण, बिना एक पल गंवाए, मन ही मन यह प्रतिज्ञा कर ली कि अब से मेरा जीवन इनके ही मार्गदर्शन में समाज के कल्याण के लिए समर्पित होगा। मेरी इस निष्ठा और उत्साह को देखते हुए समाज ने मुझे सूर्यगढ़ा प्रखंड नाई सभा का सचिव चुनकर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी। और बस, वही वह ऐतिहासिक मोड़ था जहाँ से मेरी समाज सेवा, अधिकारों की लड़ाई और ज़मीनी संघर्ष की असली व अविस्मरणीय यात्रा का शंखनाद हुआ।
राम और लक्ष्मण का अनूठा संगम: गुरु की महत्ता
सचिव बनने के बाद मुझे रामलखन जी के सानिध्य में रहने, उन्हें करीब से देखने, सुनने और उनकी कार्यशैली को समझने के अनगिनत अवसर मिले। मैंने उन्हें जितना जाना, उतना ही उनके प्रति श्रद्धा और गहरी होती गई। उनके विराट व्यक्तित्व में मुझे एक अद्भुत और विरल संयोग दिखाई देता था—उनके भीतर एक तरफ जहाँ भगवान राम जैसी अगाध मर्यादा, धैर्य, करुणा और सबको साथ लेकर चलने की शालीनता थी; तो वहीं दूसरी तरफ समाज के दुश्मनों और अन्यायी ताकतों के खिलाफ लक्ष्मण (लखन) जैसा तीव्र आक्रोश, अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प भी कूट-कूट कर भरा था। वे सचमुच अपने नाम 'रामलखन' को चरितार्थ करते थे।
समय बीतता गया, पर उनके प्रति मेरा सम्मान और गहरा होता चला गया। मेरी स्मृतियों के गलियारे में 20 जुलाई 2017 का वह गौरवशाली दिन सोने के अक्षरों में अंकित है। लखीसराय के पावन मैदान पर पूरा जिला एकजुट होकर उनका 'अभिनन्दन जन्मोत्सव' मना रहा था। वह केवल एक व्यक्ति का जन्मदिन नहीं था, बल्कि वह कृतज्ञ समाज द्वारा अपने मसीहा को दिया जा रहा एक भावभीना सम्मान था। मैं भी उस ऐतिहासिक और अत्यंत भावुक कर देने वाले पल का साक्षी था, मंच के ठीक सामने बैठा था।
उस समारोह के दौरान, जब आसपास के लोग मुझे बार-बार टोकते थे और पूछते थे कि "शम्भू जी, आप इतनी देर से बिना पलक झपकाए, इतनी गहरी और खोई हुई नजरों से रामलखन जी को क्यों निहार रहे हैं? आपकी आँखों में ये आँसू कैसे हैं?" तब मेरे पास उन्हें देने के लिए कोई शब्द नहीं होते थे। मैं उन्हें क्या बताता कि मेरी आँखों के सामने तो यादों का एक पूरा समंदर हिलोरें ले रहा था। मैं तो 1984 की उस शाम से लेकर 2017 तक के उस लंबे संघर्षमयी सफर को अपनी बंद आँखों से देख रहा था, जिसे रामलखन जी ने अपने खून-पसीने से सींचा था।
जब अन्याय के खिलाफ उठी गर्जना (1994)
जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मेरी यादों के पन्नों में साल 1994 की वह भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना आज भी वैसी की वैसी ही दर्ज है। वह दौर हमारे समुदाय के लिए एक कठिन परीक्षा का समय था। कुछ सामंती और अत्याचारी ताकतों द्वारा हमारे सीधे-साधे और भोले-भाले समुदाय पर बेइंतहा जुल्म ढाए जा रहे थे, हमारा शोषण चरम पर था। चारों तरफ भय का माहौल था और लोग डर के मारे अपने घरों में दुबक रहे थे।
लेकिन, ऐसे विपरीत और डरावने समय में भी श्रद्धेय रामलखन जी विचलित नहीं हुए। उन्होंने कायरों की तरह चुप्पी साधने के बजाय, सिंह की तरह गर्जना करने का रास्ता चुना। उन्होंने न केवल इस अन्याय के खिलाफ अपनी बुलंद आवाज उठाई, बल्कि पूरे जिले के शोषितों को एकजुट कर दिया। उन्होंने अत्याचारियों के खिलाफ ऐसी जंग छेड़ी कि उनकी सत्ता की ईंट से ईंट बजा दी। वे तब तक चैन से नहीं बैठे, जब तक कि उन सभी अत्याचारियों और जुल्म ढाने वालों को कानून के शिकंजे में कसकर जेल की सलाखों के पीछे नहीं पहुँचा दिया। उनके उस रौद्र, त्यागी और जुझारू व्यक्तित्व को देखकर मेरे भीतर का शिक्षक और जाग उठा। उन्होंने मुझे किताबी ज्ञान से परे हटकर यह सिखाया कि वास्तव में समाज के लिए लड़ना किसे कहते हैं, और अपने हक के लिए कैसे सीना तानकर खड़ा हुआ जाता है। उनका यही पाठ आज भी मेरे जीवन का सबसे बड़ा संबल है।
संस्मरणकर्ता:
सुरेंद्र प्रसाद शम्भू
(शिक्षक एवं अध्यक्ष, बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट)
आपकी क्या राय है?
दोस्तों, हर किसी के जीवन में एक ऐसा 'मार्गदर्शक' जरूर होता है जो उसे सही रास्ता दिखाता है। मेरे लिए वह रामलखन जी थे।
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने आपकी सोच बदल दी? या हमारे समाज के संघर्षों पर आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर लिखें! ---

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