महादेव शिव: सृष्टि के आदि गुरु और मोक्ष के एकमात्र दाता
सांकेतिक संपादन गुरु की विलक्षण महिमा: जहाँ शब्द भी मौन हो जाते हैं अक्सर जीवन के किसी शांत कोने में बैठकर जब मन अंतर्मुखी होता है, तो एक गहरा सवाल भीतर कुलबुलाने लगता है। हम इस संसार में आते हैं, रिश्ते बनाते हैं, जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, और एक दिन चुपचाप विदा हो जाते हैं। इस आने-जाने के चक्र के बीच मन पूछता है—वह गुरु कैसा, जो हमें जन्म और मरण के इस भयानक भंवर से मुक्ति ही न दिला सके? यदि गुरु की शरण में आकर भी आत्मा सांसारिक बंधनों में ही छटपटाती रही, तो फिर उस शरणागति का अर्थ ही क्या रहा? इसी के समानांतर एक और जिज्ञासा अक्सर भक्तों के आंसुओं और प्रार्थनाओं के बीच से उठती है कि यदि शिव साक्षात् आदि-अनादि भगवान हैं, तो वे हमारे गुरु कैसे हो सकते हैं? सत्य की परतें जब धीरे-धीरे खुलती हैं, तो समझ आता है कि देवाधिदेव महादेव जितने महान 'देव' हैं, उतने ही करुणामयी और वात्सल्य से भरे 'गुरु' भी हैं। गुरु की महिमा का विस्तार इतना अनंत है कि उसकी थाह पाना इंसानी बुद्धि के परे है। इस महिमा को शब्दों में पिरोने की कोशिश करते हुए संतों ने कहा है कि यदि इस धरती के समस्त सात समुद्...