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महादेव शिव: सृष्टि के आदि गुरु और मोक्ष के एकमात्र दाता

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सांकेतिक संपादन गुरु की विलक्षण महिमा: जहाँ शब्द भी मौन हो जाते हैं अक्सर जीवन के किसी शांत कोने में बैठकर जब मन अंतर्मुखी होता है, तो एक गहरा सवाल भीतर कुलबुलाने लगता है। हम इस संसार में आते हैं, रिश्ते बनाते हैं, जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, और एक दिन चुपचाप विदा हो जाते हैं। इस आने-जाने के चक्र के बीच मन पूछता है—वह गुरु कैसा, जो हमें जन्म और मरण के इस भयानक भंवर से मुक्ति ही न दिला सके? यदि गुरु की शरण में आकर भी आत्मा सांसारिक बंधनों में ही छटपटाती रही, तो फिर उस शरणागति का अर्थ ही क्या रहा? इसी के समानांतर एक और जिज्ञासा अक्सर भक्तों के आंसुओं और प्रार्थनाओं के बीच से उठती है कि यदि शिव साक्षात् आदि-अनादि भगवान हैं, तो वे हमारे गुरु कैसे हो सकते हैं? सत्य की परतें जब धीरे-धीरे खुलती हैं, तो समझ आता है कि देवाधिदेव महादेव जितने महान 'देव' हैं, उतने ही करुणामयी और वात्सल्य से भरे 'गुरु' भी हैं। गुरु की महिमा का विस्तार इतना अनंत है कि उसकी थाह पाना इंसानी बुद्धि के परे है। इस महिमा को शब्दों में पिरोने की कोशिश करते हुए संतों ने कहा है कि यदि इस धरती के समस्त सात समुद्...

राम लखन शर्मा (भाग-1): एक महान समाज सेवक का जीवन परिचय

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परिचय: आपदा से अवसर तक का सफर (विस्थापन के दर्द से हौसले की उड़ान) इतिहास के पन्नों को जब-जब हम पलटते हैं, तो एक बात साफ दिखाई देती है—महान व्यक्तित्व कभी महलों के रेशमी पर्दों या सुख-सुविधाओं के बीच आकार नहीं लेते। वे तो चुनौतियों की धधकती भट्टी में तपकर, कोयले से हीरा बनकर निकलते हैं। यह कहानी भी एक ऐसे ही तपे हुए व्यक्तित्व की है, जिनका जन्म 19 जुलाई 1952 को मुंगेर जिले के किशनपुर गाँव की सौंधी माटी में हुआ था। नाम रखा गया—श्री रामलखन शर्मा। शर्मा जी ने जब इस दुनिया में अपनी आँखें खोलीं, तो शायद नियति ने उनके हिस्से में संघर्ष की एक लंबी इबारत लिख रखी थी। अभी वे जीवन का ककहरा सीख ही रहे थे कि प्रकृति ने अपना सबसे क्रूर रूप दिखाया। उफनती हुई गंगा की प्रचंड लहरों ने उनके पूरे हँसते-खेलते गाँव किशनपुर को अपने आगोश में ले लिया। पूरा गाँव नदी में विलीन हो गया। जिस मिट्टी पर पहला कदम रखा था, वह ज़मीन पानी के नीचे समा चुकी थी। चारों तरफ चीख-पुकार और तबाही का मंजर था। बचपन में ही विस्थापन का यह गहरा जख्म किसी भी आम इंसान को तोड़ सकता था, लेकिन रामलखन जी के भीतर हौसलों का एक ऐसा समंदर हिलोरे...

शिव गुरु का सहारा: रामलखन शर्मा की आध्यात्मिक यात्रा

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सांकेतिक संपादन श्री राम लखन शर्मा जी के आध्यात्मिक अनुभवों की जीवंत यात्रा "सत्यम् शिवम् सुंदरम्" — ये केवल तीन शब्द नहीं हैं, बल्कि इस अनंत ब्रह्मांड, चर-अचर सृष्टि और मानव अस्तित्व का संपूर्ण निचोड़ हैं। सदियों से हम इन शब्दों को सुनते आ रहे हैं, मंत्रों की तरह जपते आ रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी अपनी अंतरात्मा में उतरकर यह सोचने का प्रयास किया है कि हमारे इस उलझे हुए, आपाधापी से भरे जीवन में 'अध्यात्म' का वास्तविक और व्यावहारिक अर्थ क्या है? क्या अध्यात्म का अर्थ संसार को छोड़ देना है, या फिर संसार में रहते हुए खुद को खोज लेना है? इन गहरे और गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए जब हम बिहार के लखीसराय जिले के अंतर्गत आने वाले पावन क्षेत्र सूर्यगढ़ा की ओर रुख करते हैं, तो वहाँ के प्रखर शिव शिष्य श्री राम लखन शर्मा जी के विचारों में आध्यात्मिकता की एक अत्यंत सरल, सहज और सीधे दिल को छू लेने वाली व्याख्या मिलती है। आइए, उनके जीवन-अनुभवों और अमृत वचनों के माध्यम से स्वयं के अस्तित्व को टटोलने और अपने परम गुरु देवाधिदेव शिव को गहराई से जानने का एक आत्मीय प्रयास करते है...

समाज के सारथी: रामलखन शर्मा

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प्रस्तावना: समय की दहलीज पर एक ऐतिहासिक क्षण समय का चक्र अपनी गति से चलता रहता है। दिन बदलते हैं, महीने बीतते हैं और वर्ष कैलेंडर के पन्नों में कहीं खो जाते हैं। लेकिन इतिहास के सीने पर कुछ दिन ऐसे दर्ज हो जाते हैं, जिनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। ऐसा ही एक स्वर्णिम और ऐतिहासिक दिन था—19 जुलाई 2017। उस दिन बिहार की ऐतिहासिक धरती लखीसराय का माहौल आम दिनों जैसा नहीं था। वहाँ की हवाओं में एक अजीब सा उत्साह, आँखों में सम्मान के आँसू और दिलों में कृतज्ञता का भाव था। लखीसराय जिला नाई समाज अपने चहेते मार्गदर्शक, संरक्षक और समाज के सच्चे सारथी श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन के 65वें गौरवशाली वर्ष पूरे होने पर एक भव्य अभिनंदन समारोह के लिए एकत्रित हुआ था। 65 वर्ष की यह लंबी यात्रा केवल एक उम्र का पड़ाव नहीं है। यह उन अनगिनत रातों का गवाह है जो समाज की चिंता में जागकर बिताई गईं; यह उन संघर्षों का लेखा-जोखा है जिसने एक साधारण परिवार में जन्मे बालक को एक विराट 'शख्सियत' में तब्दील कर दिया। यह लेख उसी ऐतिहासिक "अभिनंदन पत्र" का एक संवेदात्मक और विस्तृत ब्लॉग स्वरूप है, जिसे नाई समाज...

रामलखन शर्मा: जननायक के संघर्ष की गूँज

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इतिहास केवल तारीखों और आंकड़ों का पुलिंदा नहीं होता, यह उन सांसों का हिसाब भी होता है जो किसी के चले जाने के बाद भी समाज की धड़कनों में चलती रहती हैं। कुछ नाम ऐसे होते हैं जो वक्त की धूल में खोते नहीं, बल्कि हर बीतते दिन के साथ और चमकदार हो जाते हैं। बिहार की मिट्टी से उपजा एक ऐसा ही नाम, जिसने सत्ता के गलियारों की चकाचौंध को झोपड़ियों के चूल्हे की आग से चुनौती दी— वे थे जननायक कर्पूरी ठाकुर। ​यह कहानी केवल एक राजनेता की नहीं है, यह कहानी है उस अदम्य साहस की जिसने महलों की नींद उड़ा दी और सदियों से अपमान का घूंट पी रहे इंसानों की आँखों में स्वाभिमान का काजल लगा दिया। उनके 33वें स्मृति दिवस के उस भावुक क्षण को याद कीजिए, जब मेदनीचौकी (लखीसराय) स्थित अमरपुर कॉलेज का पूरा प्रांगण एक अजीब सी खामोशी और फिर एक जबरदस्त गूंज से भर उठा था। लखीसराय जिला नाई समाज संघ के जिला संयोजक श्री रामलखन शर्मा जी जब मंच पर खड़े हुए, तो उनकी आँखें नम थीं, लेकिन आवाज में वही पुराना ओज था। उन्होंने जब बोलना शुरू किया, तो लगा जैसे वक्ता और श्रोता के बीच का फासला मिट गया है और साक्षात जननायक कर्पूरी ठाकुर अपने फ...

श्री रामलखन शर्मा: नाई समाज के गौरव की गाथा

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इतिहास की जीवंत मशाल: श्री रामलखन शर्मा जी के सात दशकों के त्याग और 'कर्पूरी ठाकुर सम्मान' की भावपूर्ण गाथा "इतिहास सिर्फ तारीखों और घटनाओं का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि यह उन साहसी फैसलों और अडिग कदमों से बनता है जो किसी समाज की दशा और दिशा को हमेशा के लिए बदल देते हैं।" साथियों, 16 अगस्त 2024 की वह ढलती हुई शाम मुंगेर की ऐतिहासिक धरती पर सिर्फ एक साधारण सम्मान समारोह भर नहीं थी। वह गवाह थी सात दशकों के अनवरत संघर्ष, मौन त्याग और निस्वार्थ लोक-सेवा की उस 'पावती' की, जिसका इंतजार इतिहास को बरसों से था। जब मुंगेर की पावन माटी पर श्रद्धेय श्री रामलखन शर्मा जी को जननायक कर्पूरी ठाकुर सम्मान से नवाजा गया, तो पंडाल में बैठी हर आँख नम थी और तालियों की गड़गड़ाहट में एक संतोष था। वह सम्मान केवल एक व्यक्ति के कंधों पर शॉल डालना या हाथ में स्मृति-चिह्न सौंपना नहीं था, बल्कि वह उस हर शोषित, वंचित और हाशिए पर खड़े इंसान की दबी हुई आवाज़ का सम्मान था जिसके हक की लड़ाई के लिए शर्मा जी ने अपनी पूरी जवानी और जीवन की सुख-सुविधाएँ हंसते-हंसते न्योछावर कर दीं। आज के इस विशे...

नाई समाज: दशा, दिशा और संकल्प

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प्रतीकात्मक चित्र आजादी के 72वें साल में उठी वह एक आवाज़, जो आज भी नाई समाज के लिए आईना है! - रामलखन शर्मा (जिला संयोजक, लखीसराय, बिहार) वक्त की नदी बहती रहती है, साल दर साल कैलेंडर के पन्ने बदलते रहते हैं, लेकिन कुछ सवाल कभी बूढ़े नहीं होते। वे इतिहास की छाती पर ऐसे घाव की तरह अंकित हो जाते हैं, जिन्हें वक्त की मरहम भी नहीं सुखा पाती। आज से कुछ साल पहले, साल 2018 में जब पूरा देश अपनी आज़ादी के जश्न में डूबा था, तब मुंगेर की पावन धरती पर बाबा धर्मदास पुजनोत्सव के पावन अवसर पर एक ऐसी हुंकार उठी थी, जिसने समाज की सोई हुई चेतना को हिलाकर रख दिया था। लखीसराय के जिला संयोजक श्रद्धेय रामलखन शर्मा जी ने उस स्वजातीय सभा में जो वक्तव्य दिया था, वह महज़ एक भाषण नहीं था। वह सदियों से उपेक्षित, स्वाभिमानी लेकिन हाशिए पर धकेल दिए गए नाई समाज की कड़वी सच्चाई का एक जीवंत और दर्दनाक दस्तावेज़ था। आज जब हम उस भाषण के अंशों को दोबारा पलटते हैं, तो शब्दों के पीछे छिपी पीड़ा, आक्रोश और समाज को बदलने की तड़प साफ महसूस होती है। आइए, उस ऐतिहासिक हुंकार के उन मर्मस्पर्शी पहलुओं में उतरते हैं, जो आज भी उतने ही...