समाज के सारथी: रामलखन शर्मा
प्रस्तावना: समय की दहलीज पर एक ऐतिहासिक क्षण
समय का चक्र अपनी गति से चलता रहता है। दिन बदलते हैं, महीने बीतते हैं और वर्ष कैलेंडर के पन्नों में कहीं खो जाते हैं। लेकिन इतिहास के सीने पर कुछ दिन ऐसे दर्ज हो जाते हैं, जिनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। ऐसा ही एक स्वर्णिम और ऐतिहासिक दिन था—19 जुलाई 2017। उस दिन बिहार की ऐतिहासिक धरती लखीसराय का माहौल आम दिनों जैसा नहीं था। वहाँ की हवाओं में एक अजीब सा उत्साह, आँखों में सम्मान के आँसू और दिलों में कृतज्ञता का भाव था। लखीसराय जिला नाई समाज अपने चहेते मार्गदर्शक, संरक्षक और समाज के सच्चे सारथी श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन के 65वें गौरवशाली वर्ष पूरे होने पर एक भव्य अभिनंदन समारोह के लिए एकत्रित हुआ था।
65 वर्ष की यह लंबी यात्रा केवल एक उम्र का पड़ाव नहीं है। यह उन अनगिनत रातों का गवाह है जो समाज की चिंता में जागकर बिताई गईं; यह उन संघर्षों का लेखा-जोखा है जिसने एक साधारण परिवार में जन्मे बालक को एक विराट 'शख्सियत' में तब्दील कर दिया। यह लेख उसी ऐतिहासिक "अभिनंदन पत्र" का एक संवेदात्मक और विस्तृत ब्लॉग स्वरूप है, जिसे नाई समाज ने अपने इस महानायक को उनकी 65वीं वर्षगांठ पर सादर समर्पित किया था। आइए, हम सब मिलकर इस महानायक के जीवन के उन पन्नों को पलटते हैं, जिसने समाज की दशा और दिशा बदलने के लिए अपना सर्वस्व सहर्ष न्योछावर कर दिया।
संघर्ष की कोख से जन्मा एक कुंदन व्यक्तित्व
कहते हैं कि कुछ लोग वक्त के बेरहम थपेड़ों के साथ बह जाते हैं और इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे विरले लोग भी होते हैं जो अपनी फौलादी दृढ़ इच्छाशक्ति से वक्त की जलधारा का रुख ही मोड़ देते हैं। श्री रामलखन शर्मा जी एक ऐसे ही अद्वितीय व्यक्तित्व का नाम है। उनके जीवन की शुरुआत ही प्रकृति की एक अत्यंत क्रूर परीक्षा के साथ हुई थी।
19 जुलाई 1952 को अविभाजित मुंगेर जिले के पावन किशनपुर ग्राम में आपका जन्म हुआ था। अभी जीवन की किलकारियां गूंज ही रही थीं कि प्रकृति ने एक भयानक विडंबना रची। जिस मिट्टी में नन्हे रामलखन ने घुटनों के बल चलना सीखा था, जिस आँगन में उनका बचपन मुस्कुराया था, वह पूरा का पूरा गाँव गंगा नदी की उफनती लहरों के आगोश में समा गया। सब कुछ बिखर गया, जमीन छूटी, आशियाना उजड़ा, लेकिन उस विकट और डरावनी घड़ी में भी इस परिवार ने घुटने नहीं टेके। इस कठिन समय में श्री बिरजू ठाकुर और श्रीमती तारा देवी के संबल, अटूट स्नेह और त्याग ने आपके जीवन में 'अध्ययन-अध्यापन' की वो मजबूत नींव रखी, जिसने आगे चलकर एक महान समाज सुधारक को जन्म दिया।
विरासत में मिली निडरता और संस्कारों की प्रखरता
रामलखन जी के व्यक्तित्व में जो निडरता, निर्भीकता और आँखों में जो तेज झलकता है, वह उन्हें विरासत में मिला था। उनके पूज्य पिता स्वर्गीय लालजीत शर्मा एवं माता स्वर्गीया सुन्दरी देवी के उच्च संस्कारों ने उनके चरित्र को गढ़ा था। माता-पिता ने उन्हें सिखाया था कि खुद के लिए जीना तो सिर्फ पेट भरना है, असली मनुष्य वो है जो दूसरों के आंसुओं को पोंछने का साहस रखे।
साल 1971 में जब उन्होंने आई.ए. (इंटरमीडिएट) की परीक्षा ससम्मान उत्तीर्ण की, तो वह एक ऐसा दौर था जब हर युवा अपने सुरक्षित करियर, नौकरी और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के सपने बुन रहा होता है। लेकिन रामलखन जी के भीतर समाज के पिछड़ेपन को देखकर एक तड़प थी। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की आहुति दे दी और अपना पूरा जीवन समाज की निस्वार्थ सेवा के महायज्ञ में होम करने का एक साहसिक फैसला ले लिया।
मात्र 20 वर्ष की कोमल उम्र और कंधों पर युग बदलने की जिम्मेदारी
जब किसी के भीतर समाज को बदलने का जज्बा अंगारे की तरह दहक रहा हो, तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती। मात्र 20 वर्ष की अल्पायु में, जब युवा जीवन के रास्तों को तलाश रहे होते हैं, तब समाज के प्रबुद्ध लोगों ने रामलखन जी के भीतर छिपी नेतृत्व क्षमता और अटूट योग्यता को पहचान लिया। वर्ष 1971 में ही उन्हें 'बड़हिया नाई सभा' के सचिव का अत्यंत महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण दायित्व सौंप दिया गया।
इस युवा सचिव के कंधों पर जिम्मेदारी आते ही समाज ने पहली बार वैचारिक और सामाजिक क्रांति का एक नया सवेरा देखा। रामलखन जी ने सदियों से चली आ रही रूढ़िवादिता और कुरीतियों की जड़ों पर सीधा प्रहार किया:
• कुरीतियों पर करारा प्रहार: उन्होंने समाज में व्याप्त 'करतारी कफन' (मृत्युभोज से जुड़ी एक कुप्रथा) का पुरजोर विरोध कर उसका पूर्ण बहिष्कार करवाया। इसके साथ ही गरीब परिवारों को कर्ज के दलदल में धकेलने वाली 'तिलक प्रथा' और फिजूलखर्ची पर कड़ाई से रोक लगाई।
• शिक्षा की अलख जगाना: उनका मानना था कि शिक्षा के बिना कोई भी समाज अंधकार से बाहर नहीं निकल सकता। इसलिए उन्होंने मेधावी लेकिन आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर वर्ग के छात्र-छात्राओं की शिक्षा के लिए विशेष मदद की व्यवस्था शुरू की।
• आर्थिक आत्मनिर्भरता: समाज के भीतर सुख-दुख में काम आने के लिए उन्होंने एक मजबूत सामूहिक आर्थिक कोष का निर्माण किया, ताकि किसी गरीब को विपत्ति के समय किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।
इस कठिन और काँटों भरे सफर में रामलखन जी अकेले नहीं थे। उनके इस सामाजिक महायज्ञ में उनकी सहधर्मिणी श्रीमती उर्मिला देवी ने परछाई बनकर, कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दिया। उन्होंने पारिवारिक मोर्चे को इस तरह संभाला कि रामलखन जी निश्चिंत होकर समाज सेवा कर सके। श्रीमती उर्मिला देवी का यह त्याग आज के आधुनिक समय में नारी शक्ति और समर्पण का एक अनुपम और पूजनीय उदाहरण है।
जहाँ कदम पड़े, वहाँ बहार आई: 'मूरझाए बाग के माली'
वक्त का कारवां आगे बढ़ता रहा। साल 1983 में रामलखन जी ने चननियां गाँव (पिपरिया) की पवित्र भूमि को अपना नया आशियाना बनाया। वे जहाँ भी गए, अपने सरल, सौम्य और आत्मीय स्वभाव से देखते ही देखते जन-जन के हृदय के सम्राट बन गए। उनकी निष्पक्षता और सेवा भाव का ही असर था कि वर्ष 1984 में सूर्यगढ़ा प्रखण्ड के संपूर्ण नाई समाज ने उन्हें सर्वसम्मति से, निर्विरोध अपना अध्यक्ष चुन लिया।
उनकी संगठनात्मक क्षमता और ख्याति की गूँज केवल बिहार की सीमाओं तक ही सीमित नहीं रही। वर्ष 1986 में जब वे कर्म के सिलसिले में पश्चिम बंगाल के 'निधा कोल्यरी' पहुंचे, तो वहाँ की स्थिति देखकर उनका संवेदनशील मन द्रवित हो उठा। वहाँ नाई समाज बिखरा हुआ, शोषित और दिशाहीन था। रामलखन जी ने अपनी अद्भुत कार्यक्षमता और आत्मीयता से उस बिखरे हुए समाज को एक सूत्र में पिरोकर संगठित कर दिया। 12 अगस्त 1986 को पश्चिम बंगाल के उस सुदूर अंचल में वहां के समाज ने रामलखन जी को जो ऐतिहासिक सम्मान और मान-पत्र दिया, वह उनकी निस्वार्थ अंतरप्रांतीय सेवा का एक जीवंत प्रमाण है।
शब्दों के जादूगर और सोए हुए समाज को जगाने वाले प्रखर वक्ता
श्री रामलखन शर्मा जी केवल एक कर्मठ कार्यकर्ता ही नहीं हैं, बल्कि वे शब्दों के जादूगर और एक अत्यंत प्रखर वक्ता भी हैं। साल 1991 का वह ऐतिहासिक 'बेगूसराय सम्मेलन' आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। जब रामलखन जी ने मंच संभाला और माइक पर अपनी बुलंद आवाज में बोलना शुरू किया, तो हजारों की भीड़ से खचाखच भरा पूरा पंडाल एकदम निस्तब्ध रह गया। हवाएं जैसे थम सी गईं। उनके शब्दों में वह धार थी, वह दर्द था और वह आग थी, जो सोए हुए समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर जगाने की क्षमता रखती थी। उनकी वे ओजस्वी पंक्तियां आज भी हमारी रगों में लहू बनकर दौड़ती हैं और हमारे कानों में गूंजती हैं:
"वो लूट रहे हैं गाँवों को, मैं कैसे खामोश हो जाऊँ?
वो लूट रहे हैं सपनों को, मैं चैन से कैसे सो जाऊँ?"
एक ऐतिहासिक और अमर धरोहर: बाबा धर्मदास मंदिर का निर्माण
जीवन के 50वें बसंत में, जहाँ लोग अमूमन अपनी जिम्मेदारियों से रिटायर होने की बात सोचते हैं, रामलखन जी ने एक ऐसा ऐतिहासिक संकल्प लिया जिसने आगे चलकर एक नया इतिहास रच दिया। वर्ष 2000 में उनके दूरदर्शी मार्गदर्शन और अटूट श्रद्धा के फलस्वरूप सूर्यगढ़ा के पावन 'गौरीशंकर धाम' में 'बाबा धर्मदास ट्रस्ट' की स्थापना हुई।
यह कोई साधारण काम नहीं था। इसके लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दिए, पैरों में छाले पड़े, अनेक बाधाएं आईं, लेकिन उनके संकल्प के आगे हर मुश्किल ने घुटने टेक दिए। उनके इसी भगीरथ प्रयास, कठोर परिश्रम और अडिग संकल्प की बदौलत आज गौरीशंकर धाम में बाबा धर्मदास का एक भव्य और गगनचुंबी मंदिर साकार रूप ले चुका है। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह नाई समाज की अस्मिता, गौरव और एकता का साक्षात प्रतीक है। जब तक सूर्य-चंद्रमा रहेंगे और जब तक यह पवित्र मंदिर खड़ा रहेगा, इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में श्री रामलखन शर्मा जी का नाम बड़े ही आदर और श्रद्धा के साथ अंकित रहेगा।
हमारी सामूहिक प्रार्थना: एक वटवृक्ष की छाँव
आज लखीसराय जिला नाई समुदाय ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव समाज श्री रामलखन शर्मा जी को अपने परिवार का एक ऐसा विशाल और बुजुर्ग वटवृक्ष मानता है, जिसकी ठंडी छाँव में हर कोई खुद को सुरक्षित महसूस करता है। उन्होंने अपने जीवन की खुशियों को समाज के नाम कर दिया।
हम सभी जिलावासी और संपूर्ण नाई समाज ईश्वर के चरणों में यह सामूहिक प्रार्थना करते हैं कि हमारे पूज्य मार्गदर्शक श्री रामलखन शर्मा जी दीर्घायु हों, पूर्णतः स्वस्थ रहें और शतायु (100 वर्ष से अधिक) हों, ताकि उनकी बुद्धिमत्ता, उनके अनुभवों का अमूल्य निचोड़ और उनका स्नेहिल मार्गदर्शन हमें और हमारी आने वाली पीढ़ियों को सदैव मिलता रहे।
आपके गरिमामयी शुभेच्छु और कृतज्ञ समाज:
• प्रो० श्रीकान्त ठाकुर (अध्यक्ष, लखीसराय जिला नाई समुदाय)
• सुनील ठाकुर (जिला महासचिव, लखीसराय)
• राजेश कुमार (अध्यक्ष, अतिपिछड़ा संघ)
• सुरेन्द्र प्रसाद शंभु (अध्यक्ष, जय बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट)
• राजबिहारी (मनीष कुमार) (संस्थापक, राजबिहारी डांस एकेडमी)
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| मूल अभिनंदन पत्र में अंकित श्री रामलखन शर्मा जी की तस्वीर और शुभेच्छु गण। |
"समाज की सेवा केवल एक पद नहीं, बल्कि एक साधना है। श्री रामलखन शर्मा जी का जीवन हमें सिखाता है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो बहती हुई गंगा की धारा भी आपका रास्ता नहीं रोक सकती। आइए, हम सब मिलकर समाज की उन्नति के इस दीये को बुझने न दें।"
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