राम लखन शर्मा (भाग-1): एक महान समाज सेवक का जीवन परिचय
परिचय: आपदा से अवसर तक का सफर (विस्थापन के दर्द से हौसले की उड़ान)
इतिहास के पन्नों को जब-जब हम पलटते हैं, तो एक बात साफ दिखाई देती है—महान व्यक्तित्व कभी महलों के रेशमी पर्दों या सुख-सुविधाओं के बीच आकार नहीं लेते। वे तो चुनौतियों की धधकती भट्टी में तपकर, कोयले से हीरा बनकर निकलते हैं। यह कहानी भी एक ऐसे ही तपे हुए व्यक्तित्व की है, जिनका जन्म 19 जुलाई 1952 को मुंगेर जिले के किशनपुर गाँव की सौंधी माटी में हुआ था। नाम रखा गया—श्री रामलखन शर्मा।
शर्मा जी ने जब इस दुनिया में अपनी आँखें खोलीं, तो शायद नियति ने उनके हिस्से में संघर्ष की एक लंबी इबारत लिख रखी थी। अभी वे जीवन का ककहरा सीख ही रहे थे कि प्रकृति ने अपना सबसे क्रूर रूप दिखाया। उफनती हुई गंगा की प्रचंड लहरों ने उनके पूरे हँसते-खेलते गाँव किशनपुर को अपने आगोश में ले लिया। पूरा गाँव नदी में विलीन हो गया। जिस मिट्टी पर पहला कदम रखा था, वह ज़मीन पानी के नीचे समा चुकी थी। चारों तरफ चीख-पुकार और तबाही का मंजर था। बचपन में ही विस्थापन का यह गहरा जख्म किसी भी आम इंसान को तोड़ सकता था, लेकिन रामलखन जी के भीतर हौसलों का एक ऐसा समंदर हिलोरे ले रहा था, जिसे गंगा की बाढ़ भी नहीं डुबो सकती थी। पिता श्री बिरजू ठाकुर और माता श्रीमती तारा देवी के संस्कारों की छाँव में, इस आपदा के बीच ही उनके भीतर एक अदम्य जिजीविषा ने जन्म लिया। माता-पिता के दिए इसी नैतिक संरक्षण ने आगे चलकर उन्हें एक आम इंसान से पूरे समाज का मार्गदर्शक बना दिया।
20 साल की अल्हड़ उम्र और क्रांति का पहला आगाज़
जीवन के 20वें साल की उम्र बड़ी अजीब होती है। इस उम्र में अमूमन युवा अपने करियर, अपनी नौकरियों, या खूबसूरत भविष्य के रंगीन सपनों के ताने-बाने बुनने में मसरूफ रहते हैं। लेकिन रामलखन जी की आँखों में अपनी व्यक्तिगत तरक्की से कहीं बड़ा सपना पल रहा था। साल 1971 का था, देश में बदलाव की बयार थी, और इसी दौरान युवा रामलखन ने समाज के दबे-कुचले और उपेक्षित लोगों की तकलीफों को अपनी निजी ज़िम्मेदारी मान लिया।
जैसे ही उन्होंने आई.ए. (इंटरमीडिएट) की पढ़ाई पूरी की, समाज ने उनकी ईमानदारी और धारदार समझ को पहचान लिया। उन्हें 'बड़हिया नाई सभा' के सचिव पद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिया गया। महज़ बीस साल के एक युवा के कंधों पर पूरे समाज को संगठित करने का यह बोझ छोटा नहीं था। लेकिन शर्मा जी के लिए यह कोई पद नहीं, बल्कि समाज के भीतर पसरे अंधियारे को मिटाने वाले 'परिवर्तन के महायज्ञ' की पहली आहुति थी।
सामाजिक कुरीतियों पर वज्रपात: जब परंपराओं के नाम पर होते शोषण को रोका
सचिव का पद संभालते ही रामलखन शर्मा जी ने महसूस किया कि समाज को बाहरी ताकतों से बाद में, पहले अपने ही भीतर की सड़ी-गली कुरीतियों से लड़ना होगा। उन्होंने देखा कि किस तरह गरीब परिवारों को 'करतारी कफन' जैसी दकियानूसी और रीढ़ तोड़ने वाली पुरानी परंपराओं के नाम पर कर्ज के दलदल में धकेला जा रहा था। बेटी की शादी में 'तिलक प्रथा' (दहेज) का दानव पिताओं की पगड़ी और सम्मान दोनों को निगल रहा था।
रामलखन जी ने इसके खिलाफ एक मौन लेकिन बेहद आक्रामक विद्रोह की शुरुआत की। उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर लोगों को समझाया, बड़ों के हाथ जोड़े और युवाओं को जागरूक किया। नतीजा यह हुआ कि समाज के लोग खुद इस शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो गए और इन कुप्रथाओं को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।
आर्थिक और शैक्षिक नींव: कलम की ताकत से उजाले की ओर
रामलखन जी अच्छी तरह जानते थे कि कुरीतियों पर केवल सामाजिक भाषणों से रोक नहीं लगाई जा सकती; इसके लिए समाज के बच्चों के हाथों में किताबों का होना ज़रूरी है। उन्होंने देखा कि कई मेधावी और होनहार बच्चे महज़ चंद रुपयों की कमी के कारण स्कूल की चौखट छोड़ मजदूरी करने पर मजबूर हो जाते थे। इस दर्द ने उनके संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख दिया।
उन्होंने दूरदर्शिता दिखाते हुए एक विशेष 'शिक्षा कोष' (Education Fund) की स्थापना की। समाज के संपन्न लोगों से थोड़ा-थोड़ा सहयोग लेकर उन्होंने एक ऐसी गुल्लक तैयार की, जिसने गरीब बच्चों की पढ़ाई के बंद होते रास्तों को दोबारा खोल दिया। उनका संकल्प था—पैसे की तंगी के कारण किसी भी बच्चे की कलम नहीं रुकनी चाहिए। इस एक कदम ने अनगिनत घरों में शिक्षा का दीया जलाया।
पारिवारिक संबल: उर्मिला देवी के त्याग की मूक कहानी
इस बेहद पथरीली और कांटों भरी सामाजिक यात्रा में रामलखन जी कभी अकेले नहीं रहे। उनके पीछे एक ऐसी मूक शक्ति खड़ी थी, जिसने खुद को धूप में जलाकर शर्मा जी के संघर्षों को छाँव दी—उनकी धर्मपत्नी श्रीमती उर्मिला देवी। जब रामलखन जी समाज सुधार के लिए दिन-रात घर से बाहर रहते थे, तब घर की ज़िम्मेदारियों को संभालना, बच्चों की परवरिश करना और पति के हौसलों को हर टूटती घड़ी में संबल देना उर्मिला देवी ने ही किया। उन्होंने अपने मौन त्याग से यह साबित कर दिया कि किसी भी युगांतकारी पुरुष की सफलता के पीछे सिर्फ एक स्त्री का नाम नहीं, बल्कि उसकी आत्मिक शक्ति और निस्वार्थ समर्पण होता है।
संगठन की शक्ति: बिहार की माटी से बंगाल के कोयला अंचलों तक
रामलखन शर्मा जी की संगठनात्मक क्षमता का दायरा केवल एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक ही नहीं रुकने वाला था। उनकी कार्यशैली में एक ऐसी चुम्बकीय कशिश थी कि लोग खिंचे चले आते थे। साल 1983 में जब वे चननियां (पिपरिया) आए, तो कुछ ही समय में वे वहां के स्थानीय लोगों के सुख-दुख के साथी बन गए। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई उन्हें अपना रक्षक मानने लगा था।
लेकिन उनकी सांगठनिक क्षमता की असली और सबसे कठिन परीक्षा साल 1986 में हुई। उन्हें पश्चिम बंगाल की 'निधा कोल्यरी' (कोयला खदान क्षेत्र) में रहने वाले अपने समाज के लोगों के बीच जाने का मौका मिला। वहां मजदूर और समाज के लोग बिखरे हुए थे, उनका शोषण हो रहा था और उनके बीच कोई एकजुटता नहीं थी। रामलखन जी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए उस कठिन माहौल में दिन-रात एक कर दिया। बिखर चुके समाज के तिनकों को समेटकर उन्होंने एक ऐसा अटूट संगठन खड़ा किया कि विरोधी भी दंग रह गए। उनके इसी निस्वार्थ सेवाभाव और निष्पक्ष छवि का सम्मान करते हुए, वहां के लोगों ने उन्हें सर्वसम्मति से 'निर्विरोध अध्यक्ष' चुन लिया। यह उनके जीवन की एक बहुत बड़ी संगठनात्मक विजय थी।
जब मंच से गूँजी समाज की आवाज़: बेगूसराय का ऐतिहासिक सम्मेलन
साल 1991 का बेगूसराय सम्मेलन इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। यह वह दौर था जब समाज को एक ऐसे नेता की तलाश थी जो न सिर्फ उनकी समस्याओं को समझे, बल्कि उसे व्यवस्था के कानों तक पहुँचा सके। इस सम्मेलन में जब रामलखन शर्मा जी ने मंच संभाला, तो फिजा में एक अजीब सी खामोशी छा गई। लेकिन जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया, उनकी वक्तृत्व कला (Oratory Skills) का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा। उनके शब्दों में कोई बनावटीपन नहीं था, बल्कि उसमें समाज के सदियों पुराने दर्द की कसक और आंखों के आंसू शामिल थे।
उनके कंठ से निकले शब्दों ने सोए हुए समाज की रगों में ऐसा गर्म खून दौड़ा दिया कि लोग अपनी सुध-बुध भूल गए। उनके हृदय की गहराइयों से निकली वे पंक्तियाँ आज भी हवाओं में तैरती हैं और हर सामाजिक कार्यकर्ता का मार्गदर्शन करती हैं:
"जब गाँवों के सपने लूटे जा रहे हों, तो कोई सच्चा सारथी कैसे सो सकता है? जब समाज की आँखों में उम्मीद धुंधली पड़ रही हो, तो खामोश रहना अपराध है।"
इन पंक्तियों ने न सिर्फ उस समय लोगों को झकझोरा, बल्कि आज भी जब कोई व्यक्ति थका हुआ महसूस करता है, तो यह पंक्तियाँ उसमें नई ऊर्जा फूंक देती हैं।
आस्था और संस्कृति का भव्य प्रतीक: बाबा धर्मदास मंदिर का निर्माण
कहते हैं कि जीवन का उत्तरार्ध अक्सर लोग आराम और संन्यास में बिताना पसंद करते हैं। लेकिन रामलखन जी का जीवन विश्राम के लिए नहीं, बल्कि नए कीर्तिमान गढ़ने के लिए था। जब वे अपने जीवन के 50वें पड़ाव पर पहुँचे, यानी साल 2000 में, तब उन्होंने एक ऐसा ऐतिहासिक कार्य शुरू किया जो आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था और अस्मिता की अटूट 'धरोहर' बनने वाला था।
उनके भीतर अपने पूर्वजों और संस्कृति के प्रति अगाध श्रद्धा थी। इसी श्रद्धा और अटूट संकल्प के बल पर उन्होंने सूर्यगढ़ा के पवित्र 'गौरीशंकर धाम' में 'बाबा धर्मदास ट्रस्ट' की नींव रखी। शुरुआत में यह काम असंभव सा लगता था, लेकिन शर्मा जी के पीछे समाज का अटूट विश्वास था। आज गौरीशंकर धाम में गर्व से मस्तक ऊँचा किए खड़ा बाबा धर्मदास का वह भव्य और अलौकिक मंदिर महज़ ईंट-पत्थरों या सीमेंट की कोई निर्जीव इमारत नहीं है। वह मंदिर श्री रामलखन शर्मा जी के पसीने की हर एक बूंद, उनके वर्षों के अथक परिश्रम और पूरे समाज की अगाध आस्था का एक जीता-जागता, धड़कता हुआ स्मारक है। वहां आने वाले हर श्रद्धालु को शर्मा जी के संकल्प की खुशबू महसूस होती है।
एक वटवृक्ष का साया (आगामी पीढ़ियों का संबल)
आज जब हम लखीसराय जिला नाई समाज की ओर देखते हैं, तो हमें वहां बिखराव या असुरक्षा की भावना नहीं दिखती। इसका श्रेय केवल और केवल श्री रामलखन शर्मा जी को जाता है। वे आज समाज के बीच एक ऐसे विशाल, घने और प्राचीन वटवृक्ष की तरह खड़े हैं, जिसकी जड़ें ज़मीन में बहुत गहरी हैं और जिसकी फैली हुई मजबूत शाखाओं की शीतल छाँव में पूरा समाज खुद को सुरक्षित, गौरवान्वित और सम्मानित महसूस करता है। उनके अनुभव की छाँव ने न जाने कितने ही नौजवानों को भटकने से बचाया है।
हमारा यह डिजिटल मंच 'सेन सारथी', उनके इसी विराट और निस्वार्थ जीवन के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता प्रकट करता है। 'सेन सारथी' की पूरी टीम ईश्वर से उनके उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और दीर्घायु जीवन की मंगल कामना करती है। समाज को आज भी और आने वाले कई दशकों तक उनके इस स्नेहिल मार्गदर्शन और 'सारथी' रूपी नेतृत्व की अत्यंत आवश्यकता है। बाबा धर्मदास का आशीर्वाद उन पर सदैव बना रहे।
प्रस्तुतीकरण:
'सेन सारथी' टीम (Sen Saarthi Team)
आगे देखिए भाग-2 में...
रामलखन जी के व्यक्तित्व का प्रभाव केवल समाज तक सीमित नहीं रहा। आखिर कैसे एक साधारण व्यक्ति की आवाज़ सत्ता के गलियारों और बड़े प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुँची? भाग-2 में हम जानेंगे उन दिग्गजों और महा-पदों पर बैठे व्यक्तियों के विचार, जिन्होंने रामलखन जी के कार्यों की सराहना की और उनके मिशन में अपना सहयोग दिया।
आगामी अंक: "प्रशासनिक गलियारों में गूँजती एक नायक की पहचान"
सविता रत्न से सम्मानित: सुरेंद्र प्रसाद शम्भू (शिक्षक एवं अध्यक्ष, बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट) के विचार यहां पढ़ें।
"अध्यक्ष" राष्ट्रीय नाई महासभा, जिला शाखा — जमुई (बिहार): श्री मदन ठाकुर के सुन्दर विचार यहाँ पढ़ें।
जिला महासचिव, राष्ट्रीय नाई महासभा, लखीसराय: सुनील ठाकुर जी के प्रेरणादायक विचार यहाँ पढ़ें।
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