नाई समाज: दशा, दिशा और संकल्प
![]() |
| प्रतीकात्मक चित्र |
आजादी के 72वें साल में उठी वह एक आवाज़, जो आज भी नाई समाज के लिए आईना है!
- रामलखन शर्मा (जिला संयोजक, लखीसराय, बिहार)वक्त की नदी बहती रहती है, साल दर साल कैलेंडर के पन्ने बदलते रहते हैं, लेकिन कुछ सवाल कभी बूढ़े नहीं होते। वे इतिहास की छाती पर ऐसे घाव की तरह अंकित हो जाते हैं, जिन्हें वक्त की मरहम भी नहीं सुखा पाती। आज से कुछ साल पहले, साल 2018 में जब पूरा देश अपनी आज़ादी के जश्न में डूबा था, तब मुंगेर की पावन धरती पर बाबा धर्मदास पुजनोत्सव के पावन अवसर पर एक ऐसी हुंकार उठी थी, जिसने समाज की सोई हुई चेतना को हिलाकर रख दिया था। लखीसराय के जिला संयोजक श्रद्धेय रामलखन शर्मा जी ने उस स्वजातीय सभा में जो वक्तव्य दिया था, वह महज़ एक भाषण नहीं था। वह सदियों से उपेक्षित, स्वाभिमानी लेकिन हाशिए पर धकेल दिए गए नाई समाज की कड़वी सच्चाई का एक जीवंत और दर्दनाक दस्तावेज़ था।
आज जब हम उस भाषण के अंशों को दोबारा पलटते हैं, तो शब्दों के पीछे छिपी पीड़ा, आक्रोश और समाज को बदलने की तड़प साफ महसूस होती है। आइए, उस ऐतिहासिक हुंकार के उन मर्मस्पर्शी पहलुओं में उतरते हैं, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
इतिहास का वह कड़ा फैसला: जब एकता पर भारी पड़ी स्वतंत्रता
भाषण की शुरुआत भारत के उस ऐतिहासिक मोड़ से होती है, जिसे याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शर्मा जी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा था—"श्रद्धेय स्वजातीय नाई भाइयों, माताओं एवं मेरे प्रिय बच्चों! 15 अगस्त 2018 को पूरे देश ने आज़ादी का 72वां जश्न मनाया। तिरंगा हवा में लहरा रहा था, पर क्या उस तिरंगे की छांव में हमारे समाज को सच्ची आज़ादी मिली?"उन्होंने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए एक बेहद गंभीर तथ्य की ओर ध्यान खींचा। जब देश का विभाजन हो रहा था, जिन्ना अपनी हठ पर अड़े थे, तब महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के सामने एक यक्ष प्रश्न खड़ा था। प्रश्न था कि क्या देश की 'एकता' को बचाया जाए या देश की 'स्वतंत्रता' को चुना जाए? उस नाज़ुक मोड़ पर बाबा साहेब अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि यदि हम जबरन सिर्फ एकता के पीछे भागेंगे, तो स्वतंत्रता हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी। राष्ट्र के निर्माताओं ने एक कड़ा, साहसिक और दूरदर्शी फैसला लिया—उन्होंने स्वतंत्रता को चुना। आज शर्मा जी का यही सवाल नाई समाज के सामने है। जब समाज को बिखराव से बचाकर अपने अस्तित्व की रक्षा करनी हो, तो हमें भी इतिहास की तरह अपनी अस्मिता और स्वतंत्रता के लिए कड़े और दूरदर्शी फैसले लेने होंगे।
सामाजिक विडंबना: 'पोथी बनाम अस्तुरा' और हमारी मूक स्वीकार्यता
इस वैचारिक यात्रा का सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह है, जहाँ समाज की सांस्कृतिक गुलामी और कूटनीति का ज़िक्र आता है। 'पोथी' और 'अस्तुरा'—ये दो शब्द महज़ प्रतीक नहीं हैं, बल्कि दो अलग-अलग सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच का एक लंबा, मूक संघर्ष हैं। एक तरफ ज्ञान, सत्ता और कूटनीति की 'पोथी' थी, तो दूसरी तरफ श्रम, सेवा और ईमानदारी का 'अस्तुरा' था। विडंबना देखिए, ब्राह्मणों की चतुराई और नाई समाज की अत्यधिक सादगी, अल्पसंख्या व अशिक्षा का परिणाम यह हुआ कि हमने अपने कर्म (अस्तुरा) को तो पूरी निष्ठा से गले लगा लिया, लेकिन समाज में अपनी उस रीढ़ जैसी महत्ता को खुद ही भूल गए।यह कितनी बड़ी और दर्दनाक विडंबना है! मानव जीवन के जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफर में, जो सोलह संस्कार तय किए गए हैं, उनमें 'मुंडन' जैसा पवित्र और अनिवार्य संस्कार एक नाई के बिना अधूरा है। समाज में किसी के घर खुशियां आएं या दुखों का पहाड़ टूटे (श्राद्ध कर्म), नाई की उपस्थिति और उसकी केंद्रीय भूमिका के बिना समाज का कोई भी अनुष्ठान पूरा नहीं हो सकता। हमें प्रमुखता तो दी गई, लेकिन पर्दे के पीछे रखकर। हमने कभी अपनी इस महत्ता का श्रेय स्वयं नहीं लिया, कभी अपनी उंगली उठाकर समाज से अपना हक नहीं मांगा। हमारी इसी नकारात्मक और संकोची सोच का नतीजा है कि आज हम अपने ही समाज में एक मूक दर्शक बनकर, हाशिए पर खड़े अपनी नियति को कोस रहे हैं।
आज़ादी के किनारे सिसकता समाज: जेठ की दुपहरी और माघ की वो ठिठुरन
शर्मा जी के शब्दों में जब पद्मश्री भिखारी ठाकुर की पंक्तियों का ज़िक्र आता है, तो सभा में मौजूद हर आँख नम हो जाती है। देश के महान सपूतों ने हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को चूम लिया ताकि आने वाली पीढ़ियाँ एक आज़ाद हवा में सांस ले सकें। लेकिन क्या वाकई नाई समाज इस आज़ादी का हिस्सा बन पाया? सच तो यह है कि आज़ादी के इतने दशकों बाद भी हमारा आम नाई भाई मानसिक और आर्थिक दासता के उसी पुराने चंगुल में फंसा हुआ है।हम आज भी बंधुआ मजदूर की तरह समाज के हर तबके की सेवा के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। मौसम बदलता है, पर नाई की किस्मत नहीं बदलती। जेठ की वह तपती दुपहरी, जब लू के थपेड़े जिस्म को झुलसा देते हैं; माघ की वह ठिठुरती, कँपकँपाती सुबह, जब खून जमने लगता है; या सावन-भादो की वह मूसलाधार, अंधेरी रात—हमारा नाई भाई यजमान की एक आवाज़ पर, उनकी सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता है। लेकिन इस अथक परिश्रम और समर्पण के बदले में उसे क्या मिलता है? समाज से सम्मान? नहीं। उसे मिलती है सिर्फ झिझक, फटकार, तिरस्कार और अपमानजनक उपेक्षा। भिखारी ठाकुर ने अपनी अमर कृति 'नाई बहार' में इसी दर्द को पिरोया था कि यजमान के हित के लिए हम शीत, धूप और बरसात सब सहते हैं, फिर भी हमारी झोली खाली की खाली और स्थिति अत्यंत दयनीय बनी रहती है। यह समाज की सेवा में सिसकते हुए एक पूरे वर्ग की वो चीख है, जिसे दुनिया ने कभी सुनने की कोशिश नहीं की।
आत्म-चिंतन की वेधशाला: विखंडित नेतृत्व और निजी स्वार्थों की दीवाल
लेख का सबसे कड़वा और आत्म-मंथन करने वाला पहलू हमारा आंतरिक बिखराव है। शर्मा जी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बेहद खेद और भरे मन से कहा था कि आज हमारी दुर्दशा के लिए जितने ज़िम्मेदार बाहर के लोग हैं, उससे कहीं अधिक ज़िम्मेदार हमारे अपने लोग हैं। हमारे तथाकथित स्वजातीय नेता मंचों पर खड़े होकर 'एकता' का ढोंग तो रचते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते हैं।मुट्ठी भर की आबादी वाला हमारा यह सीधा-साधा समाज आज 8 से 10 अलग-अलग गुटों और खेमों में बंटा हुआ है। हर किसी की अपनी ढपली और अपना राग है। जब हमारे अपने ही पराए हो जाएं, जब समाज के अगुवा ही समाज के हितों को भूलकर अपने निजी स्वार्थों को साधने में लग जाएं, तो फिर भला इस समाज की दशा और दिशा कैसे सुधरेगी? हमारे पूर्वजों की अत्यधिक सहिष्णुता और आज के स्वार्थी, विखंडित नेताओं की अकर्मण्यता के कारण ही हमारा समाज आज भी एक जीवित शव की तरह सो रहा है। हमें इस गहरे सन्नाटे को तोड़ना होगा।
संकल्प की नई भोर: विकास का फौलादी मार्ग
यदि हमें अपनी खोई हुई अस्मिता को वापस पाना है, अपनी आने वाली पीढ़ियों की इज़्ज़त बचानी है, और वास्तव में इस आज़ाद देश का आज़ाद नागरिक बनना है, तो हमें अपनी इस गहरी नींद से जागना ही होगा। शर्मा जी ने समाज के उत्थान के लिए एक ठोस और फौलादी कार्ययोजना की रूपरेखा तैयार की थी:एक बैनर, एक आवाज़: हमें जाति के भीतर की उप-जातियों और गुटों को भुलाकर एक बैनर तले संगठित होना होगा और केवल और केवल अपने हक और विकास की बात करनी होगी।
फौलादी संगठन: प्रखंड स्तर से लेकर, जिला और राज्य स्तर तक संगठन के ढांचे को इतना मजबूत और फौलादी बनाना होगा कि कोई भी राजनीतिक दल हमें नज़रअंदाज़ करने की जुर्रत न कर सके।
आर्थिक आत्मनिर्भरता (मजबूत कोष): किसी भी लड़ाई को लड़ने के लिए शिक्षा और धन दो सबसे बड़े हथियार हैं। समाज के गरीब और मेधावी बच्चों की शिक्षा, और किसी भी विपत्ति में अपने भाइयों की मदद के लिए एक मजबूत केंद्रीय कोष (Fund) का निर्माण करना बेहद अनिवार्य है।
शर्मा जी ने अंत में एक बेहद पवित्र और गहरी बात कही कि— बाबा धर्मदास का यह मंदिर हमारे लिए सिर्फ एक पारंपरिक या धार्मिक पूजा स्थल नहीं है। यह मंदिर हमारे अस्तित्व की लड़ाई का 'विकास मंच' है। यह वह पवित्र स्थान है जहाँ हम अपने कुल देवता की छत्रछाया में, उनकी पावन उपस्थिति में बैठकर अपने ऊपर सदियों से हो रहे जुल्मों, शोषण और उपेक्षा के खिलाफ सामूहिक आवाज़ उठाएंगे और मिलकर उसका समाधान ढूंढेंगे। अपनी जातीय शान, अपनी गौरवशाली धरोहर और अपने स्वाभिमान को बचाए रखना ही अब मेरा और आपका सबसे पहला और परम कर्तव्य है।
"साल 2018 में मुंगेर की धरती से शर्मा जी ने जो सवाल उठाए थे, आज भी हमें आईने के सामने खड़े होकर खुद से पूछना चाहिए— क्या हमने उन 8-10 गुटों की दीवारों को गिराकर सच्ची एकता हासिल की है? या हम आज भी वहीं खड़े हैं?"
जय हिंद! जय नाई समाज!
मूल लेखक और वक्ता:
रामलखन शर्मा (जिला संयोजक, लखीसराय, बिहार)
आपकी बेहद कीमती राय?
प्रिय पाठकों, क्या आप भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि हमने सदियों से अपने कर्म (अस्तुरा) को तो पूरी ईमानदारी से निभाया, लेकिन अपनी शिक्षा, अपने अधिकारों और अपनी सामाजिक महत्ता को खुद ही भूल गए? इस बिखरे हुए समाज को एकजुट करने और इसकी दशा को सुधारने के लिए आपके पास क्या रचनात्मक सुझाव हैं? कमेंट बॉक्स में लिखकर हमें ज़रूर बताएं। याद रखिए, आपकी एक छोटी सी सोच और एक सही विचार ही हमारे पूरे समाज की दिशा और दशा को बदलने का सामर्थ्य रखता है।© 2026 सेन सारथी (Sen Saarthi). सर्वाधिकार सुरक्षित।
इस लेख का वर्तमान रूपांतरण, संपादन और भाषाई प्रस्तुतीकरण 'सेन सारथी' की बौद्धिक संपदा है। इस लेख में व्यक्त विचार और मूल वक्तव्य इसके मूल वक्ता श्री रामलखन शर्मा (जिला संयोजक, लखीसराय, बिहार) के हैं, जो उन्होंने साल 2018 में मुंगेर की एक सार्वजनिक स्वजातीय सभा में दिए थे। मूल वक्ता के विचारों का पूर्ण सम्मान करते हुए, उनकी अनुमति/संदर्भ के तहत इसे जनहित और सामाजिक जागरूकता के उद्देश्य से यहाँ संकलित किया गया है। Admin के बिना लिखित अनुमति के इस रूपांतरित पाठ का व्यावसायिक उपयोग या तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुतीकरण वर्जित है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
उद्देश्य: यह लेख पूर्णतः एक ऐतिहासिक सामाजिक भाषण (वर्ष 2018) के अंशों पर आधारित है। इसका एकमात्र उद्देश्य नाई समाज के इतिहास, संघर्ष, और सामाजिक चेतना को रेखांकित करना तथा रचनात्मक चर्चा को बढ़ावा देना है।
गैर-विवादित मंशा: इस लेख का उद्देश्य किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग, संगठन या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को आहत करना, उन्हें नीचा दिखाना या समाज में किसी प्रकार का विद्वेष फैलाना बिल्कुल नहीं है।
ऐतिहासिक संदर्भ: लेख में प्रयुक्त प्रतीक (जैसे 'पोथी बनाम अस्तुरा' या ऐतिहासिक संदर्भ) मूल वक्ता द्वारा तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक विसंगतियों को समझाने के लिए एक रूपक (Metaphor) के तौर पर इस्तेमाल किए गए थे। इसे किसी भी प्रकार की जातिगत वैमनस्यता या विद्वेषपूर्ण टिप्पणी के रूप में न देखा जाए।
पाठकों से अपील: 'सेन सारथी' पूरी तरह से एक सकारात्मक मार्गदर्शन और सामाजिक विकास का मंच है। हम अपने पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वे इस लेख को केवल सामाजिक सुधार, एकता और रचनात्मक आत्म-चिंतन के दृष्टिकोण से ही पढ़ें।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
सेन समाज के उत्थान के लिए यह कहानियाँ प्रेरणा का स्रोत हैं। आपके कमेंट्स हमें और प्रेरित करते हैं।