मेरे नजरिए से रामलखन जी: समाज-शिल्पी का संकल्प और अधूरा सपना (भाग 2)

सामाजिक कार्यकर्ता रामलखन शर्मा: सेन समाज के उत्थान और अधिकारों के प्रति समर्पित एक व्यक्तित्व

लेखक परिचय: 

यह विशेष लेख सुनील ठाकुर जी (जिला महासचिव, राष्ट्रीय नाई महासभा, लखीसराय) द्वारा लिखा गया है, जिन्होंने श्री रामलखन शर्मा जी के जीवन के प्रेरक संघर्षों को शब्दों में पिरोया है।

बीते अंक की एक झलक:

पिछले भाग में हमने पढ़ा कि कैसे 19 जुलाई 1952 को किशनपुर (बड़हिया) में जन्मे श्री रामलखन शर्मा जी ने मात्र 19 वर्ष की उम्र में समाज सेवा की मशाल थामी। 1971 से 1983 तक, 12 वर्षों तक बड़हिया प्रखंड सचिव के रूप में उन्होंने समाज को संगठित किया और 1983 के ऐतिहासिक सम्मेलन के जरिए अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया।
अब पढ़िए, उनके संघर्ष और सफलता का अगला अध्याय...


निर्विरोध नेतृत्व, सामाजिक समरसता और जीवन का अनवरत सफर

निर्विरोध नेतृत्व और क्षेत्रीय पहचान (1984)

​सार्वजनिक जीवन का मार्ग कभी सीधा और समतल नहीं होता। यह कांटों भरा और जन-आकांक्षाओं की कसौटियों से घिरा होता है। वर्ष 1984 श्री राम लखन शर्मा जी के इसी सार्वजनिक जीवन का एक ऐसा स्वर्णिम और महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर आया, जिसने उनके व्यक्तित्व को एक नई पहचान दी। इस वर्ष उनकी निश्छल सेवा भावना और सर्वस्वीकार्य छवि को देखते हुए पूरे समाज ने एक मत से उन्हें सूर्यगढ़ा प्रखण्ड का निर्विरोध अध्यक्ष चुना। निर्विरोध चुना जाना इस बात का सजीव प्रमाण था कि उनकी जनसेवा में कोई राजनीतिक द्वेष नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में पिरोने का पवित्र संकल्प था।

​उनकी इसी विलक्षण नेतृत्व क्षमता और सांगठनिक कौशल का लोहा हर किसी ने माना। इसी कड़ी में, 30 नवम्बर 1984 का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया, जब उन्हें विशाल दियारा क्षेत्र (जो वर्तमान में पिपरिया प्रखण्ड के रूप में जाना जाता है) के 'स्वजातीय सरदार' के सम्मानित और गौरवमयी पद से नवाजा गया। साम्हो की पावन धरती से लेकर बड़हिया तक फैला यह दुर्गम और विशाल दियारा क्षेत्र उनका मुख्य कार्यक्षेत्र बना। इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ जितनी कठिन थीं, वहाँ के लोगों की उम्मीदें उतनी ही बड़ी थीं। शर्मा जी ने अपनी सहज कर्मठता से उन उम्मीदों को पूरा किया और जीवन के ढलते पड़ाव में भी, वे आज भी पूरी निष्ठा के साथ इस क्षेत्र में अपनी नि:स्वार्थ सेवाएं दे रहे हैं।

​बंगाल की धरती पर सम्मान (1988)

​सच्चे नेतृत्व की गूँज कभी सीमाओं की मोहताज नहीं होती। राम लखन शर्मा जी की ख्याति और उनके विचारों की सुगंध केवल बिहार की भौगोलिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि वे पड़ोसी राज्य की माटी तक अपनी धमक छोड़ने में सफल रहे। वर्ष 1988 में पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में स्थित ऐतिहासिक 'निघा कोलवरी क्लब' में एक अभूतपूर्व दृश्य देखा गया। वहाँ आयोजित एक विशाल नाई सभा को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करने का गौरव शर्मा जी को प्राप्त हुआ।

​जब उन्होंने मंच संभाला और अपनी ओजस्वी व आत्मीय वाणी में समाज के उत्थान, एकजुटता और अधिकारों की बात की, तो पूरा प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। सुदूर बंगाल की धरती पर बसे प्रवासी समाज ने उनके विचारों की गहराई और दूरदर्शिता को न केवल आत्मसात किया, बल्कि उनके प्रति अगाध आदर व्यक्त करते हुए उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि बिहार की उस वैचारिक थाती का था जिसे शर्मा जी सहेजे हुए थे।

​पथ-प्रदर्शक की भूमिका (1991-1994)

​समय बीतता गया और शर्मा जी का सामाजिक कद और अधिक सुदृढ़ होता गया। वर्ष 1991 में बेगूसराय जिले के पावन प्रांगण में 'अखिल भारतीय नाई ब्राह्मण महासभा' का एक भव्य और ऐतिहासिक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस विशाल मंच पर उन्होंने अपनी मातृभूमि सूर्यगढ़ा का प्रतिनिधित्व अत्यंत गर्व के साथ किया। देश के कोने-कोने से आए प्रबुद्ध जन उस सभा में उपस्थित थे। जब शर्मा जी ने मंच से अपनी बुलंद आवाज़ में समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया और शिक्षा व स्वावलंबन का मार्ग दिखाया, तो पूरी सभा 'वाह-वाह' के गूँजते जयकारों से सराबोर हो उठी।

​वहाँ उपस्थित संपूर्ण समाज ने एक स्वर में, बिना किसी संकोच के उन्हें अपना निर्देशक, मार्गदर्शक और पथ-प्रदर्शक स्वीकार कर लिया। उनके इसी निरंतर बढ़ते प्रभाव और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए, वर्ष 1994 में लखीसराय जिला सभा ने सर्वसम्मति से उन्हें 'जिला संयोजक' की अत्यंत महत्वपूर्ण व गुरुतर जिम्मेदारी सौंपी। यह कोई साधारण पद नहीं था, बल्कि समाज को संगठित रखने की एक परीक्षा थी, जिसे वे आज तीन दशकों के बाद भी पूरी कुशलता, पारदर्शिता और ऊर्जा के साथ निभा रहे हैं।

​एक अधूरा सपना और 'थका मुसाफिर' (2000)

हर कर्मयोगी के जीवन में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ भावनाएं और संकल्प परीक्षा की घड़ी से गुजरते हैं। नए सहस्राब्दी की शुरुआत में, यानी सन् 2000 में शर्मा जी ने अपनी गहरी धार्मिक आस्था और सामाजिक समरसता के प्रतीक के रूप में सूर्यगढ़ा की धरती पर पूज्य 'बाबा धर्मदास मंदिर' के भव्य निर्माण का बीड़ा उठाया। उनकी देख-रेख और व्यक्तिगत प्रयासों से मंदिर निर्माण का कार्य अत्यंत उत्साह के साथ प्रारंभ भी हुआ। ईंटें जुड़ने लगीं और उम्मीदें आकार लेने लगीं। परंतु, नियति को कुछ और ही मंजूर था। समय के साथ समाज से जिस व्यापक और अपेक्षित सहयोग की आशा थी, वह संकुचित हो गई। धन और जन-सहयोग के अभाव के कारण मंदिर का वह पवित्र कार्य आज भी अधूरा खड़ा है।

​यह अधूरापन, कंक्रीट के उन पिलरों का नहीं, बल्कि शर्मा जी के अंतर्मन का है, जो उनके हृदय को हर दिन एक गहरी, मूक पीड़ा देता है। अपनी पूरी जिंदगी समाज के नाम कर देने वाला यह मनीषी आज स्वयं को समाज की सेवा में समर्पित एक ऐसे 'थके मुसाफिर' की पंक्ति में खड़ा पाता है, जो अपनी अंतिम मंजिल यानी मंदिर के पूर्ण होने की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए असहाय बैठा है। ढलती उम्र और अधूरी आस का यह दर्द केवल उनका व्यक्तिगत दर्द नहीं है, बल्कि यह हम सभी के सामूहिक सामाजिक उत्तरदायित्व पर एक गंभीर सवाल है, यह दर्द हम सभी का साझा दर्द है।

​त्याग और उत्तराधिकार (2006)

इतिहास में पद पाना बड़ी बात मानी जाती है, लेकिन पद को हंसते-हंसते छोड़ देना महानता की श्रेणी में आता है। वर्ष 2006 में राम लखन शर्मा जी ने सत्ता और पद का मोह छोड़कर आधुनिक युग में त्याग की एक नई और अनूठी मिसाल पेश की। उन्होंने सूर्यगढ़ा प्रखण्ड अध्यक्ष के गरिमामयी पद को स्वेच्छा से छोड़ने का निर्णय लिया और अपनी आँखों के सामने नई पीढ़ी को आगे बढ़ते देखने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने जगदीशपुर के कर्मठ युवा अजय ठाकुर को सहर्ष और सस्नेह यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। उनके इस अचानक लिए गए निर्णय से समाज के कई वरिष्ठ लोग दुखी और भावुक भी हुए, क्योंकि लोगों को उनके छांव में काम करने की आदत हो चुकी थी। परंतु, शर्मा जी का मानना था कि नेतृत्व का हस्तांतरण समय पर होना जरूरी है। पद छोड़ने के बाद भी शर्मा जी का मार्गदर्शन आज भी समाज को अनवरत मिल रहा है।

​श्री राम लखन शर्मा जी के शब्दों में: "अजय ठाकुर केवल एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि एक ऐसे समर्पित और संस्कारी अध्यक्ष हैं, जो समाज के छोटे से छोटे या बड़े से बड़े किसी भी कार्य में मेरी सलाह और आशीर्वाद के बिना आगे नहीं बढ़ते। वे मुझे सदैव एक पिता तुल्य भरपूर सम्मान देते हैं, जो मेरे लिए परम संतोष की बात है।"


​आस्था और अटूट संकल्प (2014-2015)

थकावट केवल शरीर को होती है, संकल्प को नहीं। मंदिर के अधूरेपन के दर्द को सीने में दबाए, शर्मा जी ने हार नहीं मानी। वर्ष 2014 में उन्होंने सूर्यगढ़ा के प्रसिद्ध और पावन गौरी शंकर धाम के समीप बाबा धर्मदास मंदिर के प्रांगण में बाबा की एक अत्यंत भव्य, सजीव और नयनाभिराम प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया। अपने बूते और सहयोगियों के दम पर, पूरे पारंपरिक उत्साह, श्रद्धा और 'शान-बान' के साथ उन्होंने इस अलौकिक पूजा-अर्चना और प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम को संपन्न किया और इस पावन स्थल को समाज के चरणों में समर्पित कर दिया।

​उनकी आंतरिक ऊर्जा और सक्रियता का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। उम्र के इस पड़ाव पर भी समाज के प्रति उनकी धड़कनें तेज थीं। 4 जुलाई 2015 को जमुई जिला सम्मेलन में अपने ओजस्वी विचारों से गहरी छाप छोड़ने के तुरंत बाद, वे पुनः एक बार बंगाल की धरती पर आमंत्रण पर पहुंचे। वर्धमान के अंडाल में आयोजित जिला नाई सभा सम्मेलन में उन्होंने पूरे बिहार राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए मुख्य वक्ता के रूप में मंच को संबोधित किया। उनका यह सफर दिखाता है कि जब तक शरीर में सांस है, वे समाज को जगाने और जोड़ने के अपने पवित्र मिशन से पीछे हटने वाले नहीं हैं। वे आज भी हमारे बीच एक जीवित प्रेरणापुंज बनकर खड़े हैं।

लेखक/संकलनकर्ता: 

सुनील ठाकुर, लखीसराय


"संघर्ष की यह गाथा अभी थमी नहीं है... अगले भाग में पढ़िए, कैसे बाधाओं के बीच भी श्री रामलखन शर्मा जी ने समाज की मशाल को जलाए रखा। 


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लेखक का संदेश:

श्री राम लखन शर्मा जी का जीवन हमें सिखाता है कि पद से बड़ा 'सम्मान' होता है और व्यक्ति की असली पूंजी उसकी 'सेवा' है। भले ही कुछ कार्य अधूरे हों, लेकिन उनके संकल्प की लौ आज भी उतनी ही प्रज्वलित है।
क्या आपको भी लगता है कि समाज निर्माण में ऐसे समर्पित नायकों की कहानियाँ सामने आनी चाहिए? मंदिर निर्माण के उनके अधूरे सपने पर आपके क्या विचार हैं? कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें और इस कहानी को साझा करें।


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​अस्वीकरण:
यह लेख एक सार्वजनिक और सामाजिक व्यक्तित्व के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों और उनके योगदान पर आधारित एक जीवन-वृत्त (Biography) है। लेख में शामिल सभी ऐतिहासिक तिथियां, नाम, स्थान और घटनाएं मूल लेखक द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रामाणिक विवरणों पर आधारित हैं।
  
​इस सामग्री का मुख्य उद्देश्य समाज के एक आदरणीय मार्गदर्शक के नि:स्वार्थ जीवन संघर्ष और उनकी सेवा भावना को डिजिटल माध्यम से जनता तक पहुँचाना है। यह लेख किसी भी प्रकार की राजनीतिक, व्यक्तिगत या सामाजिक विद्वेष की भावना से प्रेरित नहीं है। किसी भी विसंगति या सुधार के लिए मूल प्रकाशक/लेखक से संपर्क किया जा सकता है।

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