शिव ही गुरु क्यों?
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| सांकेतिक संपादन |
"अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि आज के इस आधुनिक और भागदौड़ भरे परिवेश में आखिर 'शिव' को ही गुरु बनाने की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है? आज के इस लेख में मैं इसी प्रश्न का उत्तर और शिव-शिष्यता के मर्म को साझा कर रहा हूँ..."
शिव: आदि गुरु और जीवन का प्रकाश (एक आध्यात्मिक अनुभूति)
आज के इस भागते-दौड़ते समाज में जब हम चारों तरफ नजर दौड़ाते हैं, तो एक अजीब सा खालीपन और बेचैनी दिखाई देती है। ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ, चमकती गाड़ियाँ और तकनीक की इस चकाचौंध के बीच इंसान भीतर से कितना अकेला और खोया हुआ महसूस कर रहा है। मानव की गिरती हुई नैतिकता, बिखरते रिश्ते और स्वार्थ की अंधी दौड़ इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी आध्यात्मिक चेतना कहीं गहरी नींद में सो गई है। इस अज्ञान के गहन और दमघोंटू अंधकार से निकलकर ज्ञान के उस परम प्रकाश की ओर बढ़ने का जो मार्ग है, वही 'शिव गुरु' का वास्तविक कार्य है।
आज दुनिया के कोने-कोने में, हर गली-मोहल्ले में शिव को अपना गुरु बनाने की एक नई चेड़ (होड़) और तड़प दिखाई दे रही है। यह महज कोई अंधविश्वास या लहर नहीं है, बल्कि यह इंसानी आत्मा की वह चीख है जो सांसारिक भटकाव से थक चुकी है। इसका एक बहुत बड़ा और कड़वा कारण यह है कि आज के दौर के तथाकथित भौतिकवादी गुरु मनुष्य की वास्तविक पीड़ा, उसके आंसुओं और उसकी आंतरिक तड़प को समझने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
प्राचीन संतों ने सदियों पहले एक बहुत गहरी और डराने वाली चेतावनी दी थी:
"हरई शिष्य धन, शोक न हरई। सो गुरु घोर नरक महँ परई॥"
इस सीधे और मर्मस्पर्शी वाक्य का अर्थ है कि जो गुरु अपने शिष्य की गाढ़ी कमाई, उसका धन और उसकी संपत्ति तो सहर्ष स्वीकार कर लेता है, लेकिन उसके जीवन के संताप, उसके दुखों और उसके मानसिक क्लेश को दूर नहीं करता, वह गुरु घोर नर्क का भागी होता है। दुर्भाग्यवश, वर्तमान समय में अध्यात्म का परिदृश्य बदल चुका है। कई गुरु अब केवल धन के लोभी और व्यापारिक मानसिकता के होकर रह गए हैं। आश्रमों के नाम पर ऊँची-ऊँची भव्य इमारतें खड़ी करना, मंचों पर बैठकर स्वयं की पूजा करवाना और संसार में अपना नाम व रसूख कमाना ही उनका एकमात्र ध्येय बनकर रह गया है।
वे मंचों पर बैठकर शास्त्रों, पवित्र कुरान, रामायण और गीता के प्रकांड ज्ञाता होने का ढोंग तो रचते हैं, परंतु यदि उनके भीतर झाँका जाए, तो उनका खुद का मन दो वक्त की रोटी की चिंता, अकूत धन के संचय और आधुनिक भौतिकतावादी चकाचौंध के दलदल में धंसा रहता है। वे धर्म और मोक्ष के नाम पर आम, सीधे-साधे इंसानों के सामने 'सुंदर सपनों' का एक ऐसा मायाजाल बुनते हैं, जिसमें फंसाकर वे मंदिरों, मस्जिदों या गिरजाघरों की संकीर्ण सीमाओं में मोटी फीस वसूलने की परिपाटी चला रहे हैं। एक निरीह, गरीब और सीधे-साधे इंसान की मेहनत की खून-पसीने की कमाई इन गुरुओं के आडंबर और भावनाओं की तेज धारा में बह जाती है। ऐसे स्वार्थी गुरुओं की तुलना उस 'परम त्यागी शिव' से करना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। अतः, अब समय आ गया है कि हम इस बाहरी दुनिया के भटकाव को छोड़ें, इन नकली दुकानों को पहचानें और सीधे उस महादेव के शिष्य बनें जिन्होंने विष खुद पीकर संसार को अमृत दिया। आइए, हम सब उस शिव गुरु के असीम आश्रम की ओर चलें, जहाँ किसी धन की नहीं, बल्कि केवल और केवल सत्य की चर्चा होती है।
राम के चार रूप: एक आंतरिक आध्यात्मिक चिंतन
जब हम शिव को गुरु मानकर इस मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, तो हमारे भीतर ज्ञान के चक्षु खुलते हैं और ईश्वर के प्रति एक नया दृष्टिकोण पैदा होता है। अक्सर जिज्ञासुओं के मन में यह सवाल उठता है कि राम कौन हैं? क्या राम एक हैं या उनके अनेक रूप हैं? हमारे प्राचीन आध्यात्मिक चिंतन और संतों के अनुभवों के आधार पर राम के चार दिव्य स्वरूपों का बड़ा ही सुंदर और तार्किक वर्णन मिलता है, जिसे हर साधक को अपने हृदय में उतारना चाहिए:
एक राम घट-घट में बोले: यह राम का वह स्वरूप है जो किसी पत्थर या खास स्थान में नहीं, बल्कि इस चराचर जगत के हर जीव, हर पशु-पक्षी और हर मनुष्य की अंतरात्मा की चेतना में वास करता है। हमारी हर सांस में जो स्पंदन है, वही राम है।
एक राम अवध घर डोले: यह राम का ऐतिहासिक और सगुण रूप है, जिन्होंने त्रेतायुग में राजा दशरथ के पुत्र के रूप में अयोध्या की पावन धरती पर जन्म लिया, मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए और मानवीय लीलाओं से संसार को जीने की कला सिखाई।
एक राम का सकल पसारा: यह राम का वह विराट स्वरूप है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। नदी की धार में, हवा के झोंकों में, पेड़ों की सरसराहट में और आसमान के तारों में—सृष्टि के कण-कण में जो ऊर्जा प्रवाहित हो रही है, वह यही राम है।
एक राम जगत से न्यारा: यह वह निर्गुण, निराकार, सनातन और परम तत्व है जो इस संसार के जन्म-मरण, सुख-दुख और सभी बंधनों से पूरी तरह परे है। जिसे बुद्धि से नहीं, सिर्फ अनुभव से जाना जा सकता है।
आश्चर्य और आनंद की बात यह है कि यही 'जगत से न्यारे' जो चौथे राम हैं, उन्हें स्वयं देवाधिदेव शिव (शंकर) भी अपना आराध्य मानते हैं। वे कैलाश पर आंखें मूंदकर जिस परम सत्ता का अनवरत ध्यान धरते हैं, वह यही राम तत्व है। जब गुरु और ईश्वर एक-दूसरे में इस तरह समाहित हों, तो शिष्य का कल्याण निश्चित हो जाता है।
जीव का मूल स्वरूप और साधना की कठिन यात्रा
इस संसार में रहते हुए आखिर मनुष्य इतना दुखी क्यों है? इस रहस्य को उजागर करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण की अमर पंक्तियों में जीव के वास्तविक स्वरूप को एक बड़े ही जीवंत और व्यावहारिक रूपक के माध्यम से समझाया है:
"ईश्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
सो माया बस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥"
इन पंक्तियों की गहराई को महसूस कीजिए। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह जो जीव (मनुष्य) है, वह किसी साधारण मिट्टी का पुतला नहीं है, बल्कि वह स्वयं उस परमेश्वर का ही एक अविनाशी अंश है। अपने मूल रूप में वह पूरी तरह चेतन है, निर्मल (मैल रहित) है और असीम सुख का भंडार है। लेकिन विडंबना देखिए, इस संसार में आने के बाद वह 'माया' के वशीभूत हो गया है, वासनाओं और मोह के जाल में फंस गया है।
इसकी स्थिति बिल्कुल वैसी ही हो गई है जैसे एक तोता (कीर) और एक बंदर (मरकट) शिकारी के मामूली से लालच और तरकीब के बंधन में पड़कर अपनी स्वतंत्रता खो बैठते हैं। बंदर मुट्ठी भर चने के लालच में बर्तन में हाथ डालता है और मुट्ठी बंद होने के कारण फंस जाता है; वह चाहे तो मुट्ठी खोलकर भाग सकता है, पर लालच उसे भागने नहीं देता। ठीक इसी तरह, मनुष्य भी संसार के झूठे रिश्तों, धन और वासनाओं के जाल में खुद को बांधे बैठा है।
इस अज्ञान के बंधन को काटकर, अपने पिंजरे को तोड़कर पुनः अपने उसी 'सुख की राशि' वाले मूल स्वरूप में लौट आने के लिए एक लंबी और धैर्यपूर्ण आंतरिक यात्रा तय करनी पड़ती है। और आपको जानकर अचरज होगा कि इस महान यात्रा की शुरुआत किसी कठिन योग से नहीं, बल्कि 'श्रद्धा' के एक छोटे से बिंदु से शुरू होती है, जिसे हम और आप 'दया भाव' कहते हैं।
चित्त का दीपक और शिव-चर्चा की दिव्य रोशनी
ज्ञान के इस मार्ग पर चलना और साधना करना कोई एक दिन का चमत्कार नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत वैज्ञानिक और क्रमिक आंतरिक प्रक्रिया है। संतों ने इस पूरी साधना को ग्रामीण जीवन के एक बेहद खूबसूरत उदाहरण से समझाया है, जिसे पढ़ते ही मन आनंदित हो उठता है:
साधना के इस मार्ग में सबसे पहले 'श्रद्धा' रूपी गाय की आवश्यकता होती है। जब साधक के मन में सच्ची श्रद्धा जागती है, तब वह अपने सत्कर्मों और साधना के माध्यम से 'कर्म' रूपी दूध प्राप्त करता है। इस भक्ति और कर्म के दूध को जब मथा जाता है, तो उसमें से संसार के प्रति 'वैराग्य' (मोह का छूटना) और धर्म रूपी मक्खन बाहर निकलकर आता है। इसके बाद, साधना की तपन से इस मक्खन को तपाया जाता है, जिससे जो दिव्य और शुद्ध 'घृत' (घी) प्राप्त होता है, साधक उसे बड़ी जतन से अपने 'चित्त (मन) रूपी दीये' में डालता है।
जब साधक इस चित्त के दीये को शिव-चर्चा की माचिस से जलाता है, तो उसके जीवन के चारों ओर ज्ञान और दिव्यता का एक ऐसा प्रकाश फैलता है जो सारे संशयों को मिटा देता है। यह प्रकाश इतना शक्तिशाली होता है कि यह हमारे भीतर की जड़ और चेतन के बीच की सदियों से उलझी हुई ग्रंथियों (गांठों) और अहंकार को एक झटके में सुलझा देता है।
हालांकि, यह मार्ग जितना सुंदर दिखता है, उतना सरल नहीं है। जब आप अपने भीतर का दीया जलाएंगे, तो संसार की नकारात्मकता, ईर्ष्या और विपरीत परिस्थितियाँ हवा के झोंकों की तरह आपको बुझाने की कोशिश करेंगी। इस साधना के क्रम में कई विघ्न-बाधाएं आती हैं, जहाँ आपके धैर्य और संकल्प की परम आवश्यकता होती है। एक बहुत ही प्रसिद्ध और गहरी कहावत है:
पवन जगावत आग को, दीपक देत बुझाय॥
हवा का एक तेज झोंका जब आता है, तो वह कमजोर संकल्प वाले छोटे से दीपक को पल भर में बुझा देता है। लेकिन वही हवा जब जंगल की भीषण आग (दावानल) से टकराती है, तो उसे बुझाने के बजाय उसे और अधिक प्रज्वलित, और अधिक विराट बना देती है। हमें भी शिव की शरण में रहकर अपनी साधना को, अपने विश्वास को उस 'छोटे से दीपक' जैसा कमजोर नहीं रखना है जो परिस्थितियों की मामूली हवा से बुझ जाए, बल्कि हमें अपने भीतर की लौ को 'दावानल' (एक बड़ी आग) बनाना है, ताकि बाधाओं की आंधियां हमें बुझाने के बजाय हमारे संकल्प को और मजबूत कर दें।
शिव शिष्यता के तीन अचूक सूत्र और अंतिम सत्य
आधुनिक युग में आम जनमानस के लिए इस कठिन साधना को सरल और सुलभ बनाने का महान कार्य भैया हरिंद्रानंद जी ने किया। उन्होंने हमें शिव को अपना साक्षात गुरु स्वीकार करने की विधि के रूप में तीन बेहद सरल, व्यावहारिक और चमत्कारी सूत्र दिए हैं: दया, चर्चा और 'नमः शिवाय' का मानसिक जाप।
लेकिन यहाँ हमें बहुत सावधान रहने की जरूरत है। सिर्फ मुंह से यह कह देना कि "शिव मेरे गुरु हैं", पर्याप्त नहीं होगा। यह कोई औपचारिकता नहीं है। शिव से अपने दुखों के लिए दया मांगने से पहले, हमें अपने भीतर झांकना होगा और दूसरों पर दया करना, उनके दर्द को महसूस करना सीखना होगा। जब हमारे दिल में समाज के आखिरी व्यक्ति के प्रति, पशु-पक्षियों के प्रति सच्ची करुणा और दया जागेगी, तभी हमारे भीतर का सच्चा साधक जीवित होगा।
अक्सर जब हम जीवन की परीक्षाओं में असफल होते हैं या निराश होते हैं, तो हम इसे अपनी किस्मत मानकर मार्ग से भटक जाते हैं। यह असफलता वास्तव में हमारी आंतरिक कमजोरी का संकेत है। ऐसे समय में 'शिव-चर्चा' (गुरु की बातें करना और सुनना) वह असीम ऊर्जा बनती है, जो हमारे संकल्प के घी को लगातार जलाए रखती है, हमें टूटने नहीं देती और हर परिस्थिति में निर्भीक व निडर बनाती है।
इस ज्ञान की अगाध गहराई और ईश्वर के इस अनूठे अनुभव को महाकवि सूरदास जी ने अपने अमर शब्दों में कुछ इस तरह व्यक्त किया है:
"मन-बानी को अगम अगोचर, सो जानै जो पावै॥"
महाकवि कहते हैं कि वह परमात्मा, वह शिव तत्व हमारी इस संकीर्ण बुद्धि, मन और वाणी की पहुंच से बहुत परे (अगम और अगोचर) है। शब्दों में इतनी ताकत नहीं कि उस आनंद को बयां कर सके। उसे तो केवल वही जान सकता है, वही महसूस कर सकता है जो उसे पा लेता है, जो उसमें पूरी तरह डूब जाता है।
शिव-चर्चा का भी अंतिम और मूल उद्देश्य यही है कि मनुष्य बाहरी आडंबरों, पैसों के लोभी गुरुओं के चंगुल और संसार के झूठे बंधनों से मुक्त हो। वह शिव को अपना मार्गदर्शक बनाकर ज्ञान के उस आंतरिक बल पर स्वयं के अंतर्मन को प्रकाशित करे और इस बहुमूल्य मानव जीवन के अंतिम, परम और एकमात्र सत्य को प्राप्त कर सके। आइए, हम सब अपने हाथ उस आदि गुरु शिव की ओर बढ़ाएं।

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