स्मृति शेष: एकता (अंतिम भाग 4) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू
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| सांकेतिक संपादन |
प्रस्तावना:
कड़वे सच की गूँज और शांति का मार्ग
क्या कभी सच बोलना समाज में भूचाल ला सकता है? क्या एक तीखा विचार लोगों के अहं (Ego) को चोट पहुँचाकर सभा का माहौल बदल सकता है?
श्रृंखला के इस चौथे अध्याय में, सुरेंद्र प्रसाद शम्भू हमें पटना की उस गहमागहमी भरी सभा में ले चलते हैं, जहाँ उनके एक बेबाक बयान ने 'दबंगों' को हिलाकर रख दिया था। यह कहानी है उस साहस की, जहाँ लेखक ने समाज का आइना सबके सामने रख दिया, और उस महान नेतृत्व की, जिसने बिखरती हुई सभा को अपनी सूझ-बूझ से एक सूत्र में पिरो लिया।
जानने के लिए पढ़िए यह रोमांचक संस्मरण—कैसे रामलखन शर्मा जी की एक जादुई मुस्कान ने विवाद की आग को एकता की ठंडी फुहार में बदल दिया।
एक ऐसी कड़ी, जो सिखाती है कि नेतृत्व केवल आदेश देना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है!
पिछले भागों का सार (Recap):
अब तक आपने पढ़ा कि कैसे सुरेंद्र प्रसाद शम्भू जी ने रामलखन जी के सानिध्य में समाज सेवा का ककहरा सीखा और ज्योतिराव फुले के विचारों को आत्मसात किया। पिछले अध्याय में हमने रामलखन जी की उस कालजयी कविता को सुना जिसने समाज को झकझोर कर रख दिया था।
अब आगे भाग-4 पढ़ें.....
एकता का सूत्र और अडिग मुस्कान: स्मृतियों के झरोखे से भाई रामलखन जी का विराट व्यक्तित्व
लेखक: सुरेंद्र प्र० शंभु (सविता रत्न से सम्मानित नाई समाज सेवक)
समाज की यात्रा कभी भी सरल रेखा में नहीं होती। समय-समय पर इसमें वैचारिक भटकाव, स्वार्थ की कड़वाहट और आंतरिक अंतर्विरोधों के ऐसे कठिन मोड़ आते हैं, जहाँ पूरा सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होने का खतरा मंडराने लगता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज को सही दिशा दिखाने वाले, नि:स्वार्थ भाव से समर्पित और अडिग संकल्प वाले किसी सच्चे सेवक की आवश्यकता महसूस हुई है, तब-तब नियति ने किसी न किसी महापुरुष को कसौटी पर उतारा है। हमारे सामाजिक जीवन में जब भी ऐसा संकट आया, आदरणीय भाई रामलखन जी हमेशा उस कसौटी पर न केवल सौ टका खरे उतरे, बल्कि उन्होंने नि:स्वार्थ नेतृत्व की एक नई और कालजयी परिभाषा भी लिखी। आज जब मैं जीवन के इस पड़ाव पर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मन में यह गहरे संकोच और विस्मय की भावना जागृत होती है कि आखिर मैं किस मुख से, किन सीमित शब्दों से उनके इतने विराट विचारों और उनके अगाध व्यक्तित्व का अवलोकन करूँ? सत्य तो यह है कि मेरा सीमित सामर्थ्य उनके कृतित्व और आदर्शों को शब्दों में पूरी तरह समेटने में बौना साबित होता है।
मेरी स्मृति के झरोखे में उनके साथ बिताया गया एक-एक पल, एक-एक संवाद और एक-एक सीख किसी महान पाठशाला के जीवंत अध्याय की तरह अंकित है। उनके सानिध्य में रहना किसी विश्वविद्यालय में जीवन दर्शन को व्यावहारिक रूप से सीखने जैसा था। इतने वर्षों के एक लंबे, घनिष्ठ और आत्मीय साथ में, मैंने देश, काल और सामाजिक परिस्थितियों को तेजी से बदलते देखा। इस लंबे दौर में न जाने कितने उतार-चढ़ाव आए, कितनी ही विकट और विषम परिस्थितियाँ सामने खड़ी हुईं, जहाँ आम इंसान अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है या फिर हताश होकर घुटने टेक देता है। परंतु, भाई रामलखन जी का व्यक्तित्व अद्भुत और अद्वितीय था; मैंने उन्हें हर कठिन से कठिन और तनावपूर्ण परिस्थिति में भी हमेशा मुस्कुराते हुए ही देखा। ऐसा लगता था मानो संकटों और चुनौतियों से उनका कोई पुराना और गहरा दोस्ताना हो। समय के क्रूर थपेड़े और विपरीत परिस्थितियां भी उनकी उस आंतरिक शांति और सौम्यता को कभी डिगा नहीं पाईं।
उनके चेहरे पर चिंता, हताशा या निराशा की लकीरें कभी अपना स्थायी घर नहीं बना पाईं। उनकी वह चिर-परिचित, शांत और अडिग मुस्कान केवल एक शारीरिक या कृत्रिम भाव नहीं थी, बल्कि वह उनके भीतर छिपी अगाध जिजीविषा, गहरी आस्तिकता और समाज के प्रति अटूट निष्ठा की एक जीवंत गवाही थी। उनकी मुस्कान सामने वाले के भीतर के तनाव को पल भर में सोख लेने की अद्भुत क्षमता रखती थी।
पटना की वह ऐतिहासिक सभा और सत्य की गूँज
समय के पन्नों को पलटते हुए मुझे बिहार की राजधानी पटना में आयोजित समाज की वह ऐतिहासिक और विशाल सभा आज भी ज्यों की त्यों याद है। उस दिन पटना का वह सभागार समाज के कोने-कोने से आए प्रतिनिधियों, प्रबुद्ध विचारकों और आम जनमानस से खचाखच भरा हुआ था। हवा में एक अजीब सी राजनैतिक और सामाजिक सरगर्मी तैर रही थी। मंच पर तमाम वरिष्ठ पदाधिकारी, दबंग चेहरे और समाज के अगुआ अपनी-अपनी प्रतिष्ठा के साथ आसीन थे। जब मुझे मंच से उपस्थित जनसमूह को संबोधित करने का अवसर मिला, तब समाज की वर्तमान दुर्दशा, आंतरिक कलह, स्वार्थपरता और दिशाहीनता को देखकर मेरे भीतर का संचित आक्रोश और पीड़ा, संकोच की तमाम पारंपरिक सीमाओं को लांघकर शब्दों के रूप में फूट पड़ी। मैं मंच पर खड़ा तो अवश्य था, लेकिन मेरी अंतरात्मा समाज के भीतर पनप रहे खोखलेपन पर रो रही थी।
मैंने बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी कूटनीतिक औपचारिकता के, अत्यंत स्पष्ट और बेबाक शब्दों में सभा के समक्ष एक ऐसा कड़वा सत्य रख दिया जिसे अमूमन लोग दबाने का प्रयास करते हैं। मैंने गरजती हुई आवाज़ में कहा— "आज हमारे समाज में जितनी भी स्वजातीय पार्टियां, उप-गुट या तथाकथित संगठन सक्रिय हैं, हमें आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि क्या वास्तव में उनके पास धरातल पर कोई ठोस ज़मीन है? कड़वा सच तो यही है कि इनमें से किसी के पास भी अपनी कोई ठोस मज़बूत ज़मीन या ऐसा कोई सशक्त प्लेटफार्म नहीं है, जो पूरे समाज को एक सूत्र में पिरोकर मुख्यधारा में सम्मान दिला सके। हम केवल कागजी दावों, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और खोखले नारों के सहारे जी रहे हैं।"
मेरे इस बेबाक, तीखे और अप्रत्याशित बयान ने मानो जलती हुई आग में घी का काम किया। क्षण भर के भीतर ही पूरी विशाल सभा में एक गहरा, भारी और डरावना सा सन्नाटा पसर गया। सभागार की हवा जैसे अचानक ठहर सी गई। मंच से लेकर आखिरी कतार में बैठे लोगों तक की सांसें अटक गईं। कुछ लोग, जो स्वयं को समाज का स्वयंभू ठेकेदार, मसीहा या अगुआ समझते थे, उन्हें यह खरी-खरी बात सीधे उनके अहंकार और कलेजे में जाकर चुभ गई। वे इस कड़वे सच को आत्मसात कर सुधार करने के बजाय, इसे अपनी झूठी प्रतिष्ठा, व्यक्तिगत हैसियत और गरिमा पर एक तीखा प्रहार समझने लगे।
माहौल देखते ही देखते गरमाने लगा और गरमाहट व्यक्तिगत आक्षेपों में बदलने लगी। सभा का अनुशासित वातावरण अचानक विक्षोभ और अराजकता में बदलने लगा। लोग अपने-अपने स्थानों पर खड़े होकर चिल्लाने लगे, उग्र तर्क-वितर्क करने लगे। हर कोई खुद को और अपने गुट को 'दबंग', 'प्रभावशाली', 'बाहुबली' और 'होनहार' साबित करने की एक अंधी होड़ में उतर आया। हर तरफ से असहमति और विरोध की आवाज़ें उठ रही थीं, मानो उस कड़वे सच को शोर के नीचे हमेशा-हमेशा के लिए दबा देने का कोई सामूहिक प्रयास चल रहा हो। लेकिन मेरे विचारों में किसी व्यक्तिगत द्वेष या ईर्ष्या की भावना नहीं थी; उनके पीछे समाज के प्रति गहरी तड़प, निश्छल प्रेम और सत्य का अडिग दम था। यही कारण था कि सामने से चाहे जितने भी कुतर्क और तीखे बाण आए, कोई भी व्यक्ति अपने खोखले तर्कों के सहारे मेरे द्वारा रेखांकित किए गए यथार्थ को बौना साबित नहीं कर सका। सत्य अपनी जगह अडिग खड़ा रहा, भले ही उसके चारों ओर अशांति और आक्रोश का समुद्र हिलोरे ले रहा था।
रामलखन जी: संकट के समय एक कुशल सूत्रधार
जब सभा में तनाव अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया और ऐसा लगने लगा कि अब बात पूरी तरह से संभलने के दायरे से बाहर हो चुकी है—समाज के विभिन्न धड़ों के बीच का यह वैचारिक टकराव किसी हिंसक रूप या स्थायी सामाजिक बिखराव में बदल जाएगा—ठीक उसी नाज़ुक, नाजुक और संवेदनशील क्षण में भाई रामलखन जी अपनी चिर-परिचित सूझ-बूझ, अदम्य धैर्य और अद्वितीय गरिमा के साथ अपने स्थान से उठ खड़े हुए। उनके खड़े होते ही जैसे अशांत लहरों को थामने वाला कोई कुशल मल्लाह नाव की पतवार संभाल लेता है, वैसा ही अहसास सबको हुआ। उन्होंने माइक अपने हाथों में लिया और अपनी गहरी, गंभीर, मधुर तथा ओजस्वी वाणी से विकल जनसमूह को संबोधित करना शुरू किया। उनकी आवाज़ में एक ऐसा चुंबकीय प्रभाव और सम्मोहन था कि चीखते-चिल्लाते और आक्रोश से लाल चेहरे धीरे-धीरे शांत होने लगे। उनकी वाणी में न तो कोई क्रोध था, न कोई शिकायत और न ही किसी के प्रति दुर्भावना; बल्कि उसमें एक पितातुल्य ममता, बड़प्पन और समाज के प्रति गहरी चिंता समाहित थी।
उन्होंने बड़ी ही आत्मीयता और कुशलता से उत्तेजित लोगों के आत्मसम्मान को सहलाते हुए उन्हें शांत किया। उन्होंने किसी एक पक्ष का अंधा समर्थन नहीं किया, बल्कि सत्य और व्यवस्था दोनों का मान रखा। रामलखन जी ने बेहद चतुरता, दूरदर्शिता और दार्शनिक अंदाज़ में उस कड़वे विवाद को तुरंत किसी तात्कालिक या जबरन फैसले पर ले जाने के बजाय, उसे भविष्य के सकारात्मक, रचनात्मक और दूरगामी फैसलों पर छोड़ने की व्यावहारिक सलाह दी। उन्होंने अपनी अद्भुत संगठन क्षमता और वाकपटुता से उस बिखरती हुई सभा को न केवल संभाला, बल्कि समाज के विभिन्न गुटों को एक मंच पर वापस लाकर समाज को एक बहुत बड़े ऐतिहासिक बिखराव से बचा लिया।
उस दिन उन्होंने केवल एक तात्कालिक विवाद को शांत नहीं किया था, बल्कि उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में यह बात गहरे तक उतार दी थी कि आपसी मतभेद और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं चाहे जितनी भी गहरी क्यों न हों, सामूहिक अस्तित्व, सामाजिक अस्मिता और 'एकता का सूत्र' हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए। उन्होंने सबको एक साथ मिलकर, कदम से कदम मिलाकर चलने का वह अनुपम पाठ पढ़ाया, जिसकी प्रासंगिकता आज के इस बिखराव वाले दौर में भी उतनी ही बनी हुई है।
आज जब मैं जीवन के इस मोड़ पर उस पूरी घटना का निष्पक्ष पुनरावलोकन करता हूँ, तो मेरा मस्तक उनके प्रति अगाध श्रद्धा और सम्मान से स्वतः ही झुक जाता है। धन्य हैं उनके वे लोक-कल्याणकारी विचार और धन्य है उनका वह युगांतकारी नेतृत्व, जिसने कभी भी संकीर्ण व्यक्तिगत लाभ, जातिवाद या व्यक्तिवाद को अपने आदर्शों पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हमेशा व्यक्तिवाद से ऊपर उठकर 'समाजवाद' और सर्वजन हिताय की भावना को सर्वोपरि रखा। भाई रामलखन जी का जीवन और उनके विचार हमारे समाज के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक मशाल की तरह रहेंगे, जो अंधकार के हर दौर में हमें एकजुट रहने, एक-दूसरे का संबल बनने और मुस्कुराते हुए संकटों से लड़ने की निरंतर प्रेरणा देते रहेंगे।
संस्मरणकार परिचय:
सुरेंद्र प्र० शंभु सविता रत्न से सम्मानित प्रतिष्ठित नाई समाज सेवक
ग्राम: खावा (मेदनीचौकी), सूर्यगढ़ा, जिला: लखीसराय, बिहार।
Note:-
"यह लेख श्रृंखला का चौथा/अंतिम भाग है।"
पिछले भाग-यहाँ पढ़ें।
पाठकों के लिए संदेश:
अक्सर कड़वा सच समाज में हलचल पैदा कर देता है, लेकिन एक कुशल नेतृत्व वही है जो उस हलचल को एकता में बदल दे। क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा मार्गदर्शक है जो विवादों के बीच शांति का रास्ता निकाल लेता है? अपने अनुभव और इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें! 👇
© सेन सारथी (Sen Saarthi) | सर्वाधिकार सुरक्षित
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यह लेख पूरी तरह से संस्मरणकार के व्यक्तिगत अनुभवों और पुरानी यादों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संगठन, गुट या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या किसी का अपमान करना कतई नहीं है। मानवीय स्मृति के आधार पर घटना या तिथि के संदर्भ में किसी भी अनजानी त्रुटि के लिए यह ब्लॉग उत्तरदायी नहीं होगा। इस लेख का एकमात्र उद्देश्य समाज में एकजुटता और भाई रामलखन जी के विचारों का सकारात्मक संदेश फैलाना है।

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