मेरे नजरिए से रामलखन जी: सेवा का शिखर और 'भिखारी ठाकुर' सम्मान (भाग 3)

सेन समाज के हितैषी नेता श्री रामलखन शर्मा जी का नेतृत्व और सामाजिक योगदान
सांकेतिक संपादन

प्रस्तावना:

45 वर्षों का संघर्ष, एक ऐतिहासिक सम्मान और समाज की अटूट एकजुटता!

​सुनील ठाकुर जी की कलम से निकली यह दास्तान आपको लखीसराय की मिट्टी से लेकर मुंबई के भव्य मंचों तक ले जाएगी। आखिर क्या था वह पल, जब एक महान व्यक्तित्व के सम्मान में पूरा सभागार 'बाग' बन गया और लोगों की आँखों में गर्व के आँसू छलक आए?

​इतिहास के उन पन्नों को पलटिए जहाँ त्याग और समर्पण ने 'पद्म श्री भिखारी ठाकुर सम्मान' का रूप लिया।

पढ़िए वह कहानी, जिसने समाज को एक नई पहचान और नई दिशा दी...


बीते अंकों की एक झलक: अब तक आपने पढ़ा...

​पिछले भागों में हमने देखा कि कैसे 1971 में एक युवा ने समाज सेवा की मशाल जलाई। 1984 में वे 'स्वजातीय सरदार' बने, बंगाल की धरती तक अपनी पहचान बनाई और बेगूसराय के मंच से समाज के 'पथ-प्रदर्शक' कहलाए। हमने उनके उस दर्द को भी महसूस किया जब बाबा धर्मदास मंदिर का सपना अधूरा रहा और उन्होंने स्वयं को एक 'थका मुसाफिर' कहा। लेकिन 2014-15 तक आते-आते, उन्होंने त्याग और अटूट आस्था की नई मिसालें पेश कीं।

अब पढ़िए, इस गौरवमयी यात्रा का वह अध्याय जब लखीसराय का यह सेवा-पथ मुंबई के समंदर तक जा पहुँचा...


समाज सेवा का अटूट सफर: गौरव और सम्मान की एक झलक

यह कहानी केवल कुछ तारीखों, प्रस्तावों या मंचों पर दी गई औपचारिक कड़ियों का संकलन नहीं है। यह इतिहास के पन्नों पर बिखरा वह अमूल्य दस्तावेज़ है, जो एक पूरे समाज के उत्थान, उसके दबे-कुचले स्वाभिमान को जगाने और निस्वार्थ सेवा की अखंड साधना को बयां करता है। जब कोई समाज अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ता है, तो उसके पीछे सालों का मौन त्याग, पसीने की बूंदें और एक निश्छल संकल्प छिपा होता है। यह गाथा उसी संकल्प की है, जिसमें समाज के हर वर्ग की धड़कनें शामिल हैं और जिसने लखीसराय से लेकर मुंबई की गलियों तक सामाजिक चेतना का एक नया सूरज उगाया है।

​यादगार शुरुआत: मुंबई की वह ऐतिहासिक शाम

वक्त के पहिये को घुमाकर अगर हम 5 जनवरी 2016 की उस शाम को याद करें, तो जेहन में एक अजीब सा रोमांच और गौरव का अहसास जाग उठता है। सपनों की नगरी मुंबई, जो अपनी तेज रफ्तार जिंदगी के लिए जानी जाती है, उस दिन एक ऐतिहासिक बदलाव की गवाह बन रही थी। मौका था 'राष्ट्रीय नाई महासभा' के राज्य स्तरीय सम्मेलन का। देश के कोने-कोने से आए स्वजातीय बंधुओं के चेहरों पर अपनी पहचान और हक को पाने की एक अलग ही चमक थी।

​उस गरिमामयी और खचाखच भरे मंच पर जैसे ही राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रद्धेय श्री आजाद गांधी जी का आगमन हुआ, पूरा परिसर एक नई ऊर्जा और जयघोष से गुंजायमान हो उठा। उनकी उपस्थिति मात्र ने वहां उपस्थित हजारों युवाओं और बुजुर्गों के भीतर एक नई चेतना का संचार कर दिया था। उस विशाल जनसमूह के सामने जब मुझे अपनी बात रखने और संबोधित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, तो वह मेरे लिए केवल एक भाषण देने का पल नहीं था। वह मेरे जीवन का एक ऐसा भावुक क्षण था, जहां मैं अपने सामने पूरे समाज की एकजुटता, उनकी सामूहिक शक्ति और आंखों में छिपे भविष्य के सपनों को साक्षात देख पा रहा था। उस शाम ने यह साबित कर दिया कि जब हौसले बुलंद हों और नेतृत्व सच्चा हो, तो समाज को एक सूत्र में बंधने से कोई ताकत नहीं रोक सकती।

​लखीसराय का संकल्प: जब नेतृत्व ने ली सामूहिक जिम्मेदारी की शपथ

​मुंबई की उस ऐतिहासिक शाम से कुछ समय पीछे की ओर चलें, तो 17 जुलाई 2014 का वह पावन दिन लखीसराय के सामाजिक इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। लखीसराय की मिट्टी गवाह है कि कैसे वहां के जिला सम्मेलन के दौरान समाज ने अपने भविष्य को एक नया मोड़ दिया था। पूरे सदन में एक अजीब सा उत्साह था, हर दिल में समाज के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। इसी पावन माहौल में, बिना किसी मतभेद के, पूर्ण सर्वसम्मति से श्री राजेश कुमार जी को लखीसराय का जिलाध्यक्ष चुना गया।

​वह पल बेहद भावुक और गरिमा से भरा था जब सूर्यगढ़ा के माननीय विधायक श्री प्रहलाद यादव जी, लखीसराय के वरिष्ठ मार्गदर्शक श्री फूलैना सिंह जी और स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष आजाद गांधी जी इस ऐतिहासिक पल के सीधे साक्षी बने। जब श्री राजेश कुमार जी मंच पर आए और उन्होंने पद एवं गोपनीयता की शपथ ली, तो पूरा सदन देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजता रहा। उपस्थित माताओं-बहनों की आँखों में एक भरोसा था और युवाओं की बाजुओं में एक नया जोश। वह सम्मान केवल राजेश कुमार जी नाम के एक व्यक्ति का नहीं था, बल्कि वह लखीसराय के कोने-कोने से आए हर उस गरीब, शोषित और कर्मठ व्यक्ति के सामूहिक विश्वास का था, जिसने समाज के कल्याण का सपना देखा था।

​20 जुलाई 2017: एक उत्सव, एक आत्मीय सम्मान

​तारीख 20 जुलाई 2017—इस दिन लखीसराय का राजबिहारी डांस एकेडमी का सभागार किसी आम आयोजन स्थल जैसा नहीं दिख रहा था। उसकी हवाओं में एक अलग ही सुवास थी, दीवारों पर सम्मान की अनकही कहानियां तैर रही थीं। अवसर बेहद खास था, समाज के स्तंभ श्री राम लखन शर्मा जी अपने जीवन के पड़ाव की 65वीं वर्षगांठ पूरी कर रहे थे। इस महत्वपूर्ण दिन को सिर्फ एक पारिवारिक उत्सव न रखकर, जिला अध्यक्ष प्रोफेसर श्री कान्त ठाकुर और जिला महासचिव सुनील ठाकुर के अथक परिश्रम, रातों की मेहनत और अटूट सूझबूझ ने एक महा-उत्सव में बदल दिया। उन्होंने इस दिन को 'पद्म श्री भिखारी ठाकुर सम्मान' समारोह का रूप देकर समाज के गौरव को आसमान पर पहुंचा दिया।

​उस दिन एकेडमी का सभागार किसी सजे-धजे उपवन की तरह प्रतीत हो रहा था, जहाँ बिखरे हुए फूल मिलकर एक खूबसूरत गुलदस्ता बन गए थे। चानन की पहाड़ियों से लेकर बड़हिया के मैदानों तक, सूर्यगढ़ा, हलसी, रामगढ़ और पिपरिया के हर गाँव, हर तोले से स्वजातीय बंधु सब कुछ छोड़कर वहां उमड़ पड़े थे। इस अद्भुत एकजुटता की सबसे खूबसूरत बात यह थी कि यह किसी एक जाति या दायरे में सिमटी हुई नहीं थी। इस महफिल में साम्प्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की एक ऐसी मिसाल देखने को मिली, जिसने सबकी आँखें नम कर दीं। मुस्लिम समुदाय के प्रबुद्ध नायक भाई मुस्तफा जी, क्षेत्र के कई जनप्रिय मुखिया, सामाजिक प्रधान और 'सविता रत्न' से सम्मानित भाई सुरेन्द्र प्रसाद शंभु जी की आत्मीय मौजूदगी ने यह संदेश दे दिया कि समाज सेवा का कोई धर्म नहीं होता, उसका केवल एक ही मजहब है—मानवता और आपसी प्रेम।

​फूलों की वर्षा और आंसुओं में झलकता भावनाओं का सैलाब

​समारोह का वह सबसे भावुक क्षण था जब मंच पर बैठे आदरणीय राम लखन शर्मा जी के ऊपर चारों तरफ से फूलों की वर्षा होने लगी। पंखुड़ियों की उस बौछार के बीच शर्मा जी की झुकी हुई आँखें और हाथ जोड़े खड़े रहने की मुद्रा ने सबका दिल जीत लिया। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति और समाज मिलकर उनकी दशकों की निष्काम कर्मठता, उनके संघर्षों और उनकी सादगी को साष्टांग नमन कर रहे हों। सभागार में माताओं, बहनों और नौजवानों की भारी तादाद इस बात की गवाह थी कि शर्मा जी ने केवल पद हासिल नहीं किया था, बल्कि उन्होंने लोगों के दिलों में अपनी एक अमिट जगह बनाई थी।

​मंच से जब एक-एक कर वक्ताओं ने उनके जीवन पर प्रकाश डालना शुरू किया, तो लगा कि उनके द्वारा कही गई बातें तो शर्मा जी के विशाल व्यक्तित्व की महज एक छोटी सी बानगी थीं। 45 वर्षों का एक लंबा, उतार-चढ़ाव से भरा सफर... यह कोई छोटा समय नहीं होता। साढ़े चार दशकों तक समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसुओं को पोंछना, नाई समाज के स्वाभिमान को जगाने के लिए अपने सुख-चैन, अपनी गृहस्थी और अपना सब कुछ दांव पर लगा देना—यह किसी आम इंसान के बस की बात नहीं है। उनके इस त्याग और निस्वार्थ सेवा को शब्दों की सीमाओं में बांधना ठीक वैसा ही है, जैसे कोई नादान बच्चा 'सूर्य को दीपक दिखाने' की कोशिश कर रहा हो।

​उपसंहार

​उस ऐतिहासिक सभा में उनकी प्रशंसा में जो भी कसीदे पढ़े गए, जो भी आदर-सूचक शब्द कहे गए, वे सब उनकी महानता, उनके सीधेपन और उनके अथाह सामाजिक योगदान के सामने बेहद छोटे और कमतर जान पड़ते हैं। राम लखन शर्मा जी जैसे कर्मयोगी रोज-रोज पैदा नहीं होते। उनका जीवन हम सभी के लिए एक जलती हुई मशाल की तरह है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करने और अपने समाज के गौरव को अक्षुण्ण रखने की प्रेरणा देती रहेगी। यह सफर थमा नहीं है, यह तो बस एक नई शुरुआत है।

​संस्मरणकर्ता:

सुनील ठाकुर, लखीसराय


इस शृंखलाबद्ध लेख का 

पिछला भाग यहाँ पढ़ें।

अगला भाग यहाँ पढ़ें।


लेखक की कलम से:

"समाज सेवा का यह कारवां रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि जब तक हम एक हैं, हम अजेय हैं।"


(Note:

Affiliate Disclosure: इस लेख में समाज सेवा में सहायक कुछ उपयोगी उत्पादों के लिंक दिए गए हैं। अमेज़न के इन लिंक्स से खरीदारी करने पर मुझे एक छोटा कमीशन मिलता है, जिससे आपकी लागत नहीं बढ़ती। इस राशि का उपयोग 'सेन सारथी' के सामाजिक कार्यों में ही किया जाता है। आपके सहयोग के लिए धन्यवाद।)

समाज सेवा के पथ पर आपके सहयोगी

​इस लेख में हमने श्री राम लखन शर्मा जी और सुनील ठाकुर जी के जिस संघर्षपूर्ण सफर के बारे में पढ़ा, वह हमें सिखाता है कि समाज के लिए समर्पण और ज्ञान का संचय कितना आवश्यक है। यदि आप भी इस विचारधारा से जुड़ना चाहते हैं, तो ये कुछ साधन आपके इस सफर में सहायक हो सकते हैं:

1. विरासत को समझने के लिए:

महान लोक कलाकार भिखारी ठाकुर जी के विचारों को समझे बिना समाज सेवा की यह चर्चा अधूरी है। उनकी रचनाओं का संग्रह आज की पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शिका है।



हमें आपकी राय का इंतज़ार है!

श्री राम लखन शर्मा जी के इस प्रेरणादायक सफर और समाज की इस एकजुटता ने क्या आपको भी प्रभावित किया? 


हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और इस प्रेरक कहानी को अपने मित्रों के साथ साझा करें! 💬👇



© सेन सारथी (Sen Saarthi) | सर्वाधिकार सुरक्षित

​इस लेख/दस्तावेज़ की समस्त सामग्री, विचार और साहित्यिक संरचना पूर्णतः मौलिक हैं तथा इसके सर्वाधिकार Sen Saarthi के पास सुरक्षित हैं। Admin की लिखित पूर्व अनुमति के बिना इस सामग्री के किसी भी हिस्से को किसी भी रूप में (जैसे- डिजिटल, प्रिंट, री-प्रोडक्शन, ब्लॉग, सोशल मीडिया या अन्य वेबसाइटों पर) कॉपी-पेस्ट करना, पुनरुत्पादित (reproduce) करना, या व्यावसायिक उपयोग करना कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। अनधिकृत उपयोग की स्थिति में कॉपीराइट अधिनियम (Copyright Act) के तहत उचित कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

​अस्वीकरण (Disclaimer)

​अस्वीकरण: यह लेख विशुद्ध रूप से एक सामाजिक संस्मरण और ऐतिहासिक घटनाओं के व्यक्तिगत अनुभवों व विवरणों पर आधारित है। लेख में उल्लिखित सभी तिथियां, स्थान, कार्यक्रम और नाम वास्तविक सामाजिक आयोजनों से संबंधित हैं। इस आलेख का मुख्य उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय, जाति, धर्म या संगठन की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि समाज के उत्थान, इतिहास के संरक्षण और आपसी भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना है। लेख में व्यक्त किए गए विचार संस्मरणकर्ता के निजी अनुभवों और निष्पक्ष दृष्टिकोण पर आधारित हैं।

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

सेन समाज के उत्थान के लिए यह कहानियाँ प्रेरणा का स्रोत हैं। आपके कमेंट्स हमें और प्रेरित करते हैं।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरे नजरिए से रामलखन जी: जिला महासचिव सुनील ठाकुर की कलम से एक गौरवगाथा (भाग 1)

सामाजिक चेतना: भाग-2 | एकता की पुकार और बिखराव का दर्द

सेन सारथी: परिचय, इतिहास और शिक्षा