गुरु पूर्णिमा: महत्व, पौराणिक इतिहास और महर्षि वेदव्यास की महिमा | Sen Saarthi
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| सांकेतिक संपादन |
गुरु पूर्णिमा: अज्ञान के अंधकार से बोध के प्रकाश तक
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। यहाँ गुरु का सम्मान माता-पिता से भी ऊपर है। सदियों से चली आ रही हमारी परंपरा में गुरु को 'देवतुल्य' मानते हुए उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान आदर दिया जाता है। 'आचार्य देवो भवः' का उपदेश हमें यही सिखाता है कि गुरु का स्थान देवों के तुल्य है। यही कारण है कि हर वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में पूरे श्रद्धा भाव और भव्यता के साथ मनाया जाता है।
पूर्णता का प्रतीक: गुरु
गुरु अपने आप में पूर्ण होते हैं, और शायद इसीलिए 'पूर्णिमा' का दिन उनकी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त माना गया। इस दिन चारों ओर वेदों की ऋचाएं, पुराणों की कथाएं और धार्मिक अनुष्ठानों की गूँज सुनाई देती है।
प्राचीन काल में गुरु ही शिष्य को सांसारिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार के ज्ञान से सुसज्जित करते थे। आज समय बदला है, और ज्ञान के दो स्पष्ट पहलू उभर कर आए हैं—पहला व्यावहारिक (लौकिक) ज्ञान और दूसरा आध्यात्मिक (पारलौकिक) ज्ञान। आज के दौर में शिक्षक तो कई हो सकते हैं, जो हमें जीविकोपार्जन सिखाते हैं, लेकिन 'गुरु' वही एक होता है जो अपने आध्यात्मिक बल से हमें इस भवसागर को पार करने की राह दिखाता है।
गुरु की महिमा को इन पंक्तियों में बखूबी पिरोया गया है:
"हरि हरें शिष्य के दुख, जो गुरु न हरें शोक।
ऐसे गुरु नरक पड़ें, सहें घोर दुःख लोक॥"
अर्थात्, जो गुरु अपने शिष्य के संताप को नहीं हर पाता, वह गुरु पद के योग्य नहीं। वास्तव में, उस निराकार परम पुरुष तक पहुँचने का मार्ग हमें गुरु ही दिखाते हैं। इसलिए सबसे पहले गुरु की वंदना की जाती है, जिन्होंने इस संसार के सत्य से हमारा परिचय कराया। गुरु पूजन के समय उनके चित्र या उनकी पादुकाओं को धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, चंदन और नैवेद्य अर्पित कर पूरी श्रद्धा के साथ उनका स्मरण करना चाहिए।
वेद व्यास: मानवता के आदि गुरु
मशहूर कार्टूनिस्ट और विद्वान लेखक आर. के. लक्ष्मण (रमन मैग्सेसे और पद्मभूषण से सम्मानित) के विचारों की झलक यहाँ मिलती है। माना जाता है कि महर्षि वेदव्यास जी ने ही वेदों, उपनिषदों और पुराणों का संकलन (प्रणयन) किया था। इसी कारण उन्हें समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। चूँकि व्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हुआ था, इसलिए इस दिन को 'व्यास पूर्णिमा' भी कहते हैं। इस दिन व्यास जी के चित्र पर माल्यार्पण कर उनका पूजन बड़े ही धूमधाम से किया जाता है।
वेदव्यास जी की अमर रचनाओं में 'महाभारत' सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे 'पाँचवा वेद' भी कहा जाता है। महाभारत की विशेषता यह है कि इसमें मानव जीवन का ऐसा कोई प्रसंग नहीं है, जो अछूता रह गया हो। जप, तप और दान से लेकर सर्वस्व त्यागने वाले महान यज्ञों तक—इस लोक और परलोक से जुड़ी हर विद्या की चर्चा इसमें समाहित है। विश्वप्रसिद्ध 'श्रीमद्भगवद्गीता' भी इसी महान ग्रंथ का एक अटूट हिस्सा है।
इस प्रकार, गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कृतज्ञता व्यक्त करने का एक महापर्व है। उपर्युक्त व्याख्यान भारतवर्ष में गुरु के उस विराट महत्व की एक छोटी सी झांकी मात्र है।
चिंतक:
रामलखन शर्मा, लखीसराय
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