ऊर्जा के आलोक में: शिव ही श्रेष्ठ गुरु हैं

हिमालय की पृष्ठभूमि में ध्यान मग्न भगवान शिव का दिव्य पोस्टर, जिसमें 'ऊर्जा के आलोक में: शिव ही श्रेष्ठ गुरु हैं' हिंदी में लिखा है, साधक रामलखन शर्मा और 'Sen Saarthi' वेबसाइट के साथ।

इस संसार की चमचमाती आभा और अंतहीन अंधी दौड़ में हम सब अनवरत भाग रहे हैं। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को आंख मूंदने तक, बस एक ही जद्दोजहद चलती रहती है—खुद को साबित करने की, दूसरों से आगे निकलने की और भौतिक सुखों को समेटने की। लेकिन भागते-भागते जब कभी जिंदगी किसी मोड़ पर ठहरती है और हम अकेले में खुद से पूछते हैं कि इस जीवन का असली गंतव्य क्या है, तो चारों ओर एक गहरा, बेचैन करने वाला सन्नाटा छा जाता है। आज समाज में हर तरफ फैला पाखंड, आडंबर, अंधभक्ति और स्वार्थ का माहौल इस मानसिक व्याकुलता को और बढ़ा देता है। जब धर्म और आस्था के नाम पर सिर्फ व्यापार होने लगे, तो अंतरात्मा तड़प उठती है।

​ऐसी ही एक गहरी वैचारिक और आध्यात्मिक व्याकुलता के दौर में, जब मेरा मन सत्य और शांति की खोज में भटक रहा था, तब मेरे भीतर से एक स्पष्ट पुकार आई। उस पुकार ने मुझे अहसास कराया कि इस संसार रूपी दुस्तर भवसागर को बिना किसी सच्चे मार्गदर्शक, यानी बिना किसी सच्चे गुरु के पार कर पाना पूरी तरह असंभव है।

​जन्म और जीवन का अंतर: गुरु की अथाह महिमा

​हम इस धरा पर कैसे आते हैं? माता-पिता हमें यह अत्यंत दुर्लभ मानव जीवन देते हैं। वे हमें हाड़-मांस का यह शरीर देते हैं, पाल-पोसकर बड़ा करते हैं। लेकिन केवल इस भौतिक संसार में जन्म ले लेने भर से जीवन सार्थक नहीं हो जाता। एक नवजात शिशु को, जो कोरे कागज की तरह है, सही-गलत का बोध कराना, उसे समाज और अध्यात्म के सांचे में ढालकर 'संस्कारित' करना सिर्फ और सिर्फ एक गुरु के हाथों ही संभव है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु की महिमा वास्तव में अथाह और अनंत है।

​जीवन के हर कठिन मोड़ पर, हर उस चौराहे पर जहाँ रास्ते धुंधले पड़ने लगते हैं और बुद्धि काम करना बंद कर देती है, हमें एक गुरु की परम आवश्यकता महसूस होती है।

​जैसे जेठ की तपती दुपहरी और सूरज की किरणें धरती को झुलसा देती हैं, ठीक वैसे ही यह सांसारिक कठिनाइयाँ और चिंताएं मनुष्य के मन को भीतर तक थका देती हैं। ऐसे त्रस्त जीवन में गुरु की छत्रछाया उस शीतल, घने वटवृक्ष की भांति है, जिसके नीचे कदम रखते ही संसार के सारे ऐश्वर्य और आत्मिक सुख स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। गुरु कोई साधारण हाड़-मांस का मनुष्य नहीं होता; वे तो साक्षात ज्ञान के असीम भंडार हैं, अज्ञान के घने अंधकार में शीतलता बिखेरते चाँद हैं और प्यासी आत्मा को तृप्त करने वाली परम पवित्र गंगा हैं।

​सच्चे गुरु की कसौटी: भ्रम और पाखंड का खंडन

​आज के इस कलयुग में सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह उठता है कि हम सच्चे गुरु को पहचानें कैसे? आज जहाँ हर नुक्कड़ पर गुरु का मुखौटा पहने लोग बैठे हैं, वहाँ असली और नकली का भेद करना अत्यंत कठिन हो जाता है। लेकिन मेरी अंतरात्मा कहती है कि जो गुरु स्वयं लोभ के जाल में फंसा हो, जो अपने शिष्यों में पाखंड और अंधभक्ति की भावना को बढ़ावा देता हो, जिसके अपने मन में लोलुपता, वासना और स्वार्थ भरा हो, वह भला किसी डूबती हुई नैया का खेवनहार कैसे बन सकता है?

​सच्चे गुरु की सबसे बड़ी और अकाट्य पहचान यही है कि वे कभी अपनी भक्ति का व्यापार नहीं करते। वे ज्ञान को बेचते नहीं हैं। उनके दरबार में, उनके साए में कभी कोई भेदभाव, ऊँच-नीच या अमीर-गरीब का अंतर नहीं होता। सबसे बड़ी बात, उनकी कथनी और करनी में रत्ती भर भी फर्क नहीं होता—वे जो उपदेश देते हैं, स्वयं उसी पवित्रता को जीते हैं।

​वास्तव में, गुरु और ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। गुरु के चरणों के नख से निकलने वाली सादगी और ज्ञान की मंद-मंद ज्योति किसी अलौकिक 'मणि' के समान प्रकाशमान होती है। जब एक बार उस मणि का सच्चे मन से स्मरण कर लिया जाए, तो हृदय के भीतर सदियों से जमा अज्ञान का अंधकार तिनके की तरह उड़ जाता है और भीतर एक दिव्य दृष्टि का प्रकट्य होता है। यही वह आंतरिक दृष्टि है जो मनुष्य को संत और असंत, सार और असार के बीच का अंतर समझाती है।

​ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्य: गुरु वचनों की अमोघ शक्ति

​गुरु के मुख से निकले वचनों में कितनी असीम और अमोघ शक्ति होती है, इसका प्रमाण हमारे सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से मिलता है। ऋग्वेद की एक अत्यंत पावन और प्रेरक कथा इस सत्य को पूरी तरह प्रमाणित करती है। पौराणिक काल में, जब वारीशरण के साथ हुए भीषण युद्ध में पराजित होकर राजा अभ्यावर्ती अपना राज-पाट, ऐश्वर्य और सर्वस्व खो चुके थे, तब हताशा के घने बादलों के बीच उन्हें केवल एक ही किरण दिखाई दी। वे पूरी तरह टूट चुके थे, लेकिन अपनी अंतिम उम्मीद लेकर वे अपने गुरु, महर्षि गविष्ठ भरद्वाज की कुटिया में पहुँचे।

​राजा ने अत्यंत दीन भाव से गुरु के चरणों में अपना शीश नवाया, अपनी पूरी व्यथा सुनाई और पुनः अपना खोया हुआ राज्य, सम्मान और प्रजा का कल्याण वापस पाने का मार्ग पूछा। महर्षि गविष्ठ भरद्वाज ने अपने प्रिय शिष्य की आंखों में छिपी व्याकुलता और उनके भीतर के धर्म को देखा। महर्षि ने किसी भौतिक अस्त्र-शस्त्र का सहारा नहीं लिया, बल्कि उन्होंने ऋग्वेद की चार अत्यंत पवित्र ऋचाओं (रचनाओं) के माध्यम से पूरी एकाग्रता और श्रद्धा से स्तुति की।

​गुरु के उन दिव्य मंत्रों और वचनों का प्रभाव इतना तीव्र था कि राजा अभ्यावर्ती का न केवल खोया हुआ साम्राज्य वापस मिला, बल्कि उनका हर एक मनोरथ पूर्ण हुआ। यह प्राचीन गाथा हमें यह सिखाती है कि जब कोई सच्चा गुरु अपने शिष्य के आत्मिक या व्यावहारिक कल्याण के लिए कोई संकल्प लेता है, तो स्वयं नियति और यह पूरा ब्रह्मांड उस कार्य को सिद्ध करने में जुट जाता है। जब गुरु की इच्छा और उनकी रुचि में हमारा सच्चा अनुराग (प्रेम) बढ़ने लगता है, तभी हमारे लिए साक्षात परमात्मा से मिलने का मार्ग निष्कंटक और साफ होता है।

​चरम परिणति: नमक की पोटली और शिव तत्व का सार

​इस संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव क्या है? जब एक समर्पित शिष्य अपने गुरु के वचनों को, उनके ज्ञान को अपने जीवन में पूरी तरह उतार लेता है, तब एक ऐसी परम अवस्था आती है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। अस्तित्व, अस्तित्व से इस तरह मिल जाता है कि फिर शिष्य और गुरु दो अलग-अलग सत्ता नहीं रह जाते; वे दोनों एकरूप हो जाते हैं।

​परंतु, इस परम एकत्व और अद्वैत का अनुभव करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए मनुष्य को अपने भीतर कठिन साधना की भट्टी जलानी पड़ती है, गहरी समझ विकसित करनी होती है, अडिग विवेक का आश्रय लेना पड़ता है और सबसे बढ़कर—अपना सर्वस्व गुरु के चरणों में समर्पित कर अटूट श्रद्धा रखनी होती है।

​सच्चा गुरु वही हो सकता है जो स्वयं उस 'ब्रह्म' (परमेश्वर) से एकाकार हो चुका हो, जिसे इस सृष्टि के अंतिम सत्य का पूर्ण बोध हो। हम परमात्मा को किसी सांसारिक वस्तु या खिलौने की तरह छूकर या बाजार से खरीदकर नहीं जान सकते। परमात्मा का मिलना तो ठीक वैसा ही है, जैसे नमक की एक छोटी सी पोटली असीम सागर की गहराई को नापने के लिए पानी में उतरी हो। जैसे ही वह नमक की पोटली सागर की पहली लहर के संपर्क में आती है, वह अपना अलग नाम, रूप और अस्तित्व पूरी तरह खो देती है। वह स्वयं विलीन होकर उस विशाल सागर का ही एक अटूट हिस्सा बन जाती है।

​ठीक इसी प्रकार, जो गुरु स्वयं इस संसार की माया से सर्वथा रहित हैं, जिन्हें इस कलियुग की कोई भी कलुषित या मलीन छाया छू तक नहीं सकती, वे परम गुरु, आदि गुरु एकमात्र शिव हैं। यदि मनुष्य ब्रह्मा या स्वयं शिव के समान गुणी और शक्तिशाली भी हो जाए, तब भी बिना गुरु रूपी शिव की कृपा के वह इस संसार सागर को पार नहीं कर सकता। शिव गुरु ही जीवात्मा को उस परम परमात्मा से मिलाकर सदा के लिए एक कर देते हैं।

​अतः, इस दिव्य ऊर्जा के आलोक में यह पूर्णतः सत्य है कि शिव ही आदि हैं, शिव ही अंत हैं, और वही संपूर्ण ब्रह्मांड के एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ गुरु हैं।

​साधक:

राम लखन शर्मा



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