सत्यं शिवं सुन्दरम्: भीतर छिपी चेतना की खोज
प्रस्तावना: आदिम भय से सत्य की खोज तक
यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक गहरी खामोशी में लिपटा हुआ था, जहाँ मनुष्य ने जब पहली बार अपनी आँखें खोलीं, तो उसके भीतर एक विस्मय था, एक असीम कौतूहल था। प्रकृति का वैभव उसके सामने बिखरा पड़ा था। विशाल नदियाँ, गरजते हुए बादल, धधकती अग्नि और नीले आकाश के उस पार चमकता हुआ सूर्य—इन सबने मानव मन को विस्मित भी किया और भयभीत भी।
वैदिक काल के उस उषाकाल में, जब मनुष्य ने सभ्यता की दहलीज पर पहला कदम रखा था, तब आज के आधुनिक मंदिर अस्तित्व में नहीं आए थे। उस समय 'भगवान' जैसा कोई निश्चित शब्द भी मानव की जुबान पर नहीं चढ़ा था। हमारे पूर्वज सरल थे, उनका बोध सीधा और स्पष्ट था। वे किसी अदृश्य, काल्पनिक सत्ता के पीछे नहीं भागे, बल्कि उन्होंने केवल उन प्राकृतिक और भौतिक शक्तियों की उपासना शुरू की, जिनसे उनका खुद का अस्तित्व बना था। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश—ये पांच तत्व ही उनके रक्षक थे और इन्हीं में उनकी आस्था थी। विशेषकर, अंधकार को चीरने वाले प्रकाश के महापुंज, अग्नि के साक्षात प्रतीक 'सूर्य' की पूजा मुख्य तौर पर की जाती थी।
परंतु, जैसे-जैसे समय का चक्र घूमा, मानवीय बस्तियाँ बसने लगीं और एक सामाजिक ढांचा खड़ा हुआ। जब लोग कबीलों और समाजों में बंधने लगे, तो एक नया यक्षप्रश्न सामने खड़ा हो गया। सवाल यह था कि इतने बड़े जनसमूह को एक सूत्र में कैसे पिरोया जाए? कौन इस समाज का नेतृत्व करेगा? किस आधार पर लोगों को एक जगह एकत्रित (जमा) किया जाए, और किसकी बात को लोग बिना किसी शंका के सुनेंगे और समझेंगे?
मूर्तिकला और कल्पना शक्ति का प्राकट्य
मानव मन सदा से किसी ठोस आधार की तलाश में रहता है। उस दौर के प्रबुद्ध पूर्वजों के दिलो-दिमाग में यह बात गहराई से बैठ गई कि समाज को जोड़े रखने के लिए किसी ऐसी आलंबन, किसी ऐसी प्रेरणा की आवश्यकता है, जिसके प्रभाव से लोग स्वतः ही एक जगह खिंचे चले आएँ। एक ऐसा केंद्र, जहाँ बैठकर समाज से जुड़े विविध विषयों पर चर्चा हो सके, आपसी मतभेदों पर विचार-विमर्श किया जा सके।
इसी सामाजिक और आत्मिक आवश्यकता से मनुष्य की 'कल्पना शक्ति' का जन्म हुआ। इंसानी मन ने अदृश्य शक्तियों को आकार देना शुरू किया और कुछ देवी-देवताओं की सुंदर कल्पनाएँ की गईं। लेकिन, केवल विचारों में बहती अमूर्त और अदृश्य शक्तियाँ आम जनमानस को बहुत लंबे समय तक आकर्षित नहीं रख पाईं। सामान्य मनुष्य को छूने, देखने और महसूस करने के लिए एक माध्यम चाहिए था। बस, इसी मोड़ पर मानव ने पत्थरों को तराशना शुरू किया और 'मूर्ति' का निर्माण हुआ। मूर्ति कोई जड़ पत्थर नहीं थी, वह मनुष्य की सामूहिक आस्था और अनुशासन का साक्षात केंद्र बिंदु बन गई।
शव और शिव: चेतना का मूल सिद्धांत
परंतु, अध्यात्म का यह सफर केवल सामाजिक अनुशासन या मूर्तियों तक आकर नहीं रुक जाता। जब एक साधक अपने भीतर उतरता है, तो उसे समझ आता है कि ब्रह्मांड की असली मूर्ति तो स्वयं उसका यह शरीर है। शिव कोई दूर आकाश में रहने वाले देवता मात्र नहीं हैं; शिव हमारे 'अहम् सगासीन' हैं—वे हमारी आत्मा के मूल अधिष्ठान हैं।
इस सृष्टि के कण-कण में, हर जीव के श्वास-प्रश्वास में शिव का ही वास है। शिव के बिना यह सुंदर, गतिशील शरीर कुछ भी नहीं, बल्कि सिर्फ एक निष्प्राण 'शव' है। जब तक भीतर वह परम चेतना धड़क रही है, तब तक हम क्रियाशील हैं, जीवंत हैं। जैसे ही वह चेतना इस काया को छोड़ती है, यह शरीर जान-रहित, मुर्दा और पूरी तरह से निष्काम हो जाता है। अर्थात, हमारे भीतर निवास करने वाली वह 'आत्मा रूपी शिव' ही इस जीवन की एकमात्र वास्तविक शक्ति है। उनके बिना, इस हाड़-मांस के पुतले की कोई बिसात नहीं; हम केवल एक शव के समान हैं।
गुरु कृपा, शक्तिपात और आंतरिक संवाद
जब एक साधक इस परम सत्य को जानने के लिए व्याकुल होता है, तब उसके जीवन में 'गुरु' का प्रवेश होता है। अध्यात्म के मार्ग पर 'शक्तिपात' एक अत्यंत रहस्यमयी और पवित्र घटना है। आम दुनिया जिसे अलौकिक क्षमता या चमत्कार समझती है, वास्तव में वह केवल चमत्कार नहीं है। अलौकिक शक्तियों ने तो इसे हमेशा 'अनुग्रह' कहा है—और अनुग्रह का सीधा अर्थ है 'गुरु-कृपा'। यह एक ऐसा जीवंत और मौन अनुभव है, जिसे गुरु अपने भीतर से सीधे शिष्य के अंतःकरण में संप्रेषित (Transmit) करता है।
इस अनुभव की गहराई को समझाते हुए एक परम पावन प्रसंग स्मरणीय है। जब स्वामी सत्यानंद जी ने उस अलौकिक ईश्वरीय शक्ति के परम आनंद को महसूस किया, तो उन्होंने भावुक होकर उस शक्ति से कहा कि आप मुझे दीक्षा देकर मेरी गुरु हो जाइए।
तब उस दिव्य शक्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं, मैं तुम्हारी गुरु नहीं हो सकती। मैंने तो केवल अपनी शक्ति को तुममें संप्रेषित कर दिया है। लेकिन याद रखो, अभी जो दिव्य अनुभव तुम्हें हुआ है, वह पूरी तरह से तुम्हारा खुद का कमाया हुआ अनुभव नहीं है। वह तो मात्र एक क्षणिक झलक थी, जो तुम्हें राह दिखाने के लिए दी गई थी।"
उस परम शक्ति का यह संदेश हर साधक के लिए एक महान सीख है। हमारा कर्म ही हमारे जीवन का असली साथी बनता है। गुरु केवल कपाट खोल सकता है, लेकिन चलना शिष्य को खुद पड़ता है। अपने कर्मों को सुधारना, विकारों को छोड़ना और निरंतर आत्म-विकास के मार्ग पर बढ़ना ही वह वास्तविक अनुभव है, जो किसी बाहरी सहारे से नहीं, बल्कि स्वयं तुम्हारे अंदर से अंकुरित होकर बाहर आता है। जब यह बोध जगता है, तो हृदय में भक्ति और ज्ञान के शब्द स्वतः ही किसी सरिता की भांति तैरने लगते हैं।
सत्यगुरु की खोज और चेतना का अभ्युदय
एक सच्चा गुरु कभी अपने शिष्य को परावलंबी या अपाहिज नहीं बनाता। वह तो शिष्य से कहता है, "अभी जो मैं तुम्हारे भीतर अनुभव डाल रही हूँ, यह मेरी शक्ति का एक अंश है। परंतु, मेरी इस शुरुआती सहायता के बिना तुम इस मार्ग पर आगे नहीं बढ़ पाते। अब तुम्हारी परीक्षा है; मेरी इस मदद को एक बीज मानकर, इस दिव्य अनुभूति को स्वयं अपने अंदर विकसित करने की पूरी चेष्टा करो।"
जब साधक के मन में यह सवाल उठता है कि मैं इस परम अवस्था को स्थायी रूप से कैसे प्राप्त करूँ, तो भीतर से आवाज आती है—'एक सच्चे गुरु की तलाश करो'।
मानव मन सदियों से इसी खोज में भटक रहा है। वह सोचता है कि गुरु कौन है? क्या वह कोई किताबी ज्ञान पढ़ाने वाला शिक्षक है? क्या वह आदेश देने वाला कोई कठोर मालिक है? क्या वह सुख-दुख में हाथ थामने वाला कोई संसारी साथी है, या फिर अपनी करामात दिखाने वाला कोई जादूगर है? मनुष्य नाना प्रकार के भ्रमों और संशयों के भंवर में भटकता फिरता है। उसके मन में कई अपेक्षाएँ होती हैं कि कोई गुरु आए, मेरे मस्तक पर अपना वरदहस्त रखे और मैं पल भर में काकभुशुंडि की तरह त्रिकालदर्शी या सर्वज्ञानी हो जाऊँ, मुझे रातों-रात कोई अलौकिक अनुभव हो जाए।
परंतु, परम सत्य यह है कि सच्चा सद्गुरु ऐसा कुछ नहीं करता। वह आपको कोई जादुई छड़ी नहीं थमाता। गुरु का वास्तविक कार्य तो आपकी आँखें खोलना है। वह आपसे कहता है कि तुम्हें स्वयं मेहनत करके अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ और अपने हृदय को पूरी तरह से निर्मल, निष्कपट बनाना होगा। इस आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया में बहुत धैर्य और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है।
जब आपका अंतःकरण पूरी तरह पवित्र हो जाता है, तब आपके भीतर वह ब्रह्मांडीय अनुभव, वह अलौकिक चेतना स्वयं प्रकट होने लगती है। चेतना का यह सर्वोच्च विकास ही मनुष्य की असली यात्रा है। इस परम अवस्था को आप चाहे जो नाम दे दें—इसे ही योगियों ने 'इंद्रजीत' कहा है, जिसने अपनी समस्त इंद्रियों पर विजय पा ली हो।
यह अलौकिक अवस्था किसी चंचल मन, बाहरी इंद्रियों या दुनिया के किसी भौतिक साधन से कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। जब ध्यान की गहराइयों में जाकर मन पूरी तरह शांत और लुप्त हो जाता है, तब यह स्थूल शरीर और इसकी वासनाओं से भरी इंद्रियां भी विलग (अलग) हो जाती हैं। उस परम शून्यता में एक नई, दिव्य चेतना का जन्म होता है। ठीक उसी क्षण एक ऐसा अनूठा अनुभव घटित होता है, जो किसी व्यक्ति या गुरु द्वारा बाहर से नहीं दिया जाता; बल्कि साधक का अपना खुद का 'निजी अनुभव' ही उसका वास्तविक 'सत्यगुरु' बन जाता है। यह वह परम प्रकाश है, जो स्वयं के भीतर से, स्वयं के लिए प्रकट होता है।
सत्यं शिवं सुन्दरम्
जो हमारे जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का परम प्रकाश प्रदान करता है, वही परम सत्य है। और सत्य ही एकमात्र वह शाश्वत शक्ति है जो 'सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्' है। हम सब उस परमशिव के आलोक से ही आलोकित हैं, भले ही अज्ञानवश हम खुद को उनसे अलग या अन्यत्र मानते रहें।
वह शिव साक्षात प्रकाश-स्वरूप हैं, और उन्हीं की छाया के रूप में, उन्हीं की प्रेरणा से संज्ञान पाकर आज हम उनके 'शिष्य' बने हैं। सत्य एक ही है, परंतु इस संसार में उसके रूप अनेक हैं। मनुष्य चाहे जिस भाव से, जिस रूप में उस परम सत्ता की आराधना करे, उसे जिस भी नाम से देवता माने, और अपनी बुद्धि के अनुसार उसके स्वरूप की जैसी भी व्याख्या करे—वह हर रूप में, हर कण में वही का वही देव है।
मानव द्वारा अपनी आत्मीयता, श्रद्धा और साधना से जिस दिव्य शक्ति को अपने भीतर सृजित और जाग्रत किया जाता है, वही साक्षात देवत्व है। अंततः, सारे भेद, सारे मार्ग और सारी साधनाएँ एक ही परम सत्य में जाकर लीन हो जाती हैं। राहें अलग हो सकती हैं, पर मंजिल एक ही है—"किन्तु सत्यम शिवम सत्य सुन्दरम, एक ही है।"
मूल विचारक:
शिव शिष्य रामलखन शर्मा
(समाजसेवी, जिला संयोजक, नाई संघ, लखीसराय, बिहार)
आपकी आत्मा की आवाज क्या कहती है?
शिव शिष्य श्री राम लखन शर्मा जी के इन परम आत्मीय और गहरे विचारों को पढ़कर आज आपके अंतर्मन में क्या भाव जगा? क्या आपने भी कभी अपने भीतर उस मूक चेतना या 'सत्यगुरु' को महसूस किया है?
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