कौन हैं रामलखन शर्मा, जिन्हें मिला 'कर्पूरी ठाकुर रत्न' सम्मान?

एक शांत प्राकृतिक दृश्य जिसमें एक व्यक्ति हरे रंग का स्वेटर पहने हुए झील के किनारे एक चट्टान पर बैठा है और विचारमग्न मुद्रा में पहाड़ों की ओर देख रहा है। झील के पानी में बर्फ से ढके पहाड़ों और देवदार के पेड़ों का साफ़ प्रतिबिंब दिखाई दे रहा है। पास ही एक भूरे रंग का बैग और पानी की बोतल रखी है। इमेज के ऊपरी हिस्से में हरे रंग के टेक्स्ट में हिंदी में लिखा है: 'कौन हैं रामलखन शर्मा, जिन्हें मिला कर्पूरी ठाकुर रत्न?' और नीचे बाईं ओर नीले रंग में 'Sen Saarthi' लिखा है।
प्रतीकात्मक चित्र

सेवा, समर्पण और सम्मान की एक अमर सांझ: जब कर्म को मिला 'रत्न' सम्मान

समाज में जब भी बदलाव की कोई मद्धम सी बयार चलती है, तो उसके पीछे किसी एक इंसान की बरसों की खामोश तपस्या होती है। कुछ लोग इतिहास के पन्नों पर सिर्फ नाम दर्ज कराने के लिए नहीं जीते, बल्कि वे दूसरों के जीवन में उजाला भरने के लिए खुद को मोमबत्ती की तरह जला देते हैं। बिहार की पावन धरती ने ऐसे कई मनीषियों को जनम दिया है, जिन्होंने महलों की सुख-सुविधाओं को छोड़कर झोपड़ियों में रहने वाले इंसानों के आंसुओं को पोंछना अपना धर्म समझा। ऐसे ही एक महामानव थे जननायक कर्पूरी ठाकुर जी, जिनके संघर्षों की गूंज आज भी बिहार के जर्रे-जर्रे में सुनाई देती है। और जब उन्हीं जननायक की याद में सजी कोई महफिल किसी जीवंत कर्मयोगी को सलाम करती है, तो वक्त ठहर जाता है और इतिहास खुद मुस्कुराने लगता है।

ऐसी ही एक ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाली घड़ी गवाह बनी 25 जनवरी 2019 की उस धुंधली मगर उजली शाम की। नालंदा जिले के दिल, बिहारशरीफ के आशीर्वाद सेवा सदन का सभागार केवल एक हॉल नहीं रह गया था, बल्कि वह कृतज्ञता और आदर की एक ऐसी पवित्र वेदी बन चुका था जहां समाज के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े लोगों की उम्मीदें सांस ले रही थीं। अवसर था—अतिपिछड़ा दलित संघर्ष मोर्चा, बिहारशरीफ के तत्वावधान में जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के 95वें जयंती समारोह का। हवा में एक अजीब सा अपनापन और उत्साह था। हर चेहरा इस बात से प्रफुल्लित था कि आज वे अपने मसीहा को याद कर रहे हैं, लेकिन महफिल की रूह तब मुकम्मल हुई जब वहां मुख्य अतिथि के रूप में एक ऐसी शख्सियत का आगमन हुआ, जिनका पूरा जीवन ही सेवा का दूसरा नाम है।

वे थे राष्ट्रीय नाई महासभा, जिला लखीसराय के गौरव और बाबा धर्मदास जन सेवा ट्रस्ट, सूर्यगढ़ा के मार्गदर्शक श्री राम लखन शर्मा जी। रामलखन बाबू केवल एक नाम नहीं, बल्कि चलते-फिरते समाज सेवा के एक जीवंत संस्थान हैं। लखीसराय के सूर्यगढ़ा प्रखंड के छोटे से गांव 'चननियाँ' की मिट्टी से उठकर आया यह व्यक्तित्व अपने भीतर सदियों के संचित संस्कार समेटे हुए है। पूज्य पिता स्वर्गीय लालजी ठाकुर, जो स्वजातीय समाज के एक बेहद सम्मानित और स्वाभिमानी सरदार थे, उनके छोटे पुत्र के रूप में रामलखन जी ने बचपन से ही अभावों को देखा था, लेकिन उन अभावों ने उनके भीतर कड़वाहट नहीं, बल्कि करुणा को जनम दिया। पिता के दिए हुए ईमानदारी और परोपकार के संस्कारों को उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा धन माना।

रामलखन बाबू का सेवा-सफ़र कोई कल या परसों की बात नहीं है। इसके पीछे आधी सदी की अटूट साधना है। साल 1971 का वह दौर, जब वे अपने विद्यार्थी जीवन की दहलीज पर खड़े थे, अमूमन उस उम्र में नौजवान अपनी नौकरियों और व्यक्तिगत तरक्की के सपने बुनते हैं। लेकिन रामलखन बाबू के सीने में एक अलग ही आग सुलग रही थी। उन्होंने देखा कि उनका अपना नाई समाज और समाज का वह तबका जिसे 'अतिपिछड़ा' या 'दलित' कहकर हाशिए पर धकेल दिया गया है, वह किस तरह बुनियादी हकों के लिए तरस रहा है। बस, उसी विद्यार्थी जीवन से उन्होंने नाई समाज के साथ-साथ हर उस इंसान के आंसू पोंछने का संकल्प ले लिया, जो समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ था। तब से लेकर आज तक, वक्त बदला, परिस्थितियां बदलीं, उम्र की लकीरें चेहरे पर आईं, लेकिन समाज सेवा का जो जज्बा 1971 में था, वह आज भी वैसा ही अडिग है। समाज सेवा उनके जीवन का कोई अंशकालिक काम नहीं है, बल्कि वह उनके शरीर में बहने वाले रक्त की तरह उनके जीवन का एक अनिवार्य अंग बन चुकी है।

उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे केवल कागजी या दफ्तरी समाजसेवक नहीं हैं। जब भी समाज के किसी गरीब के घर पर विपदा आती है, जब भी किसी कल्याणकारी कार्य के लिए समाज को एक अगुआ की जरूरत होती है, रामलखन बाबू वहां 'सशरीर' उपस्थित रहते हैं। वे धूप-छांव, सुख-दुख की परवाह किए बिना, सबसे आगे खड़े होकर लोगों के भीतर चेतना की अलख जगाते हैं। उनकी इसी निश्छल और अटूट भावना का एक साक्षात प्रमाण है सूर्यगढ़ा के कटैहर में निर्मित बाबा धर्मदास जी का वह विशाल और भव्य मंदिर। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं है, बल्कि यह रामलखन बाबू के उस संकल्प का प्रतीक है जो उन्होंने अपने पुरखों और अपनी संस्कृति को सहेजने के लिए लिया था। इस मंदिर का एक बड़ा हिस्सा बनकर तैयार हो चुका है और जो थोड़ा बहुत काम बाकी है, उसे भी वे दिन-रात एक करके पूरा करा रहे हैं ताकि बहुत जल्द इस पावन स्थल को समाज के चरणों में समर्पित किया जा सके। लेकिन रामलखन बाबू का दिल किसी एक जाति की सीमाओं में नहीं बंधा है। भले ही वे नाई समाज के गौरव हैं, लेकिन समाज के अन्य पिछड़े, वंचित और सवर्ण वर्गों में भी उनका योगदान उतना ही निस्वार्थ और गहरा रहा है। वे हर पीड़ित में ईश्वर का रूप देखते हैं।

इसीलिए, जब 25 जनवरी 2019 को वे बिहारशरीफ के उस सभागार में मंच पर आए, तो माहौल में एक आदरयुक्त सन्नाटा छा गया। लोग उत्सुक थे उस मनीषी को सुनने के लिए। और जब रामलखन बाबू ने माइक संभाला और बोलना शुरू किया, तो ऐसा लगा मानो वक्त की सुइयां पीछे घूम गई हों। उन्होंने जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के जीवन की उस लंबी, पथरीली और संघर्षों से भरी दास्तान को इस तरह अपने शब्दों में पिरोया कि सुनने वालों की आंखें नम हो गईं। उनके भाषण में कोई राजनीतिक छलावा या बनावटीपन नहीं था, बल्कि उसमें भावनाओं का एक ऐसा समंदर हिलोरें ले रहा था जिसने सीधे लोगों के दिलों को छुआ। वे कर्पूरी ठाकुर जी के संघर्षों, उनकी सादगी, उनके फक्कड़पन और गरीबों के लिए उनकी तड़प का जिक्र इस तरह कर रहे थे, मानो उन्होंने कर्पूरी जी के साथ रहकर उनकी हर परिस्थिति को बेहद नजदीक से देखा हो, उनकी एक-एक समस्या को खुद जीकर महसूस किया हो। सभागार में बैठे हर व्यक्ति को ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उनकी आंखों के सामने जननायक के जीवन की कोई सजीव झांकी चल रही हो।

रामलखन बाबू ने सिर्फ कर्पूरी जी के जीवन की कहानियां नहीं सुनाईं, बल्कि उन्होंने उस मंच से वर्तमान समाज को एक बहुत बड़ी सीख दी। उन्होंने याद दिलाया कि कर्पूरी ठाकुर केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं है, बल्कि वह एक रास्ता है—त्याग का रास्ता, ईमानदारी का रास्ता, और अंतिम व्यक्ति के उत्थान का रास्ता। उन्होंने बड़ी बेबाकी और सहजता से इस बात को सरजमीन पर रखा कि एक साधारण नाई समाज में जनम लेने वाला व्यक्ति अपने कर्मों से कैसे पूरे देश का 'जननायक' बन जाता है। उन्होंने समझाया कि नाई समाज और अतिपिछड़ा समाज को किसी के रहमों-करम की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें कर्पूरी जी के दिखाए रास्ते पर चलकर अपने अधिकारों को खुद हासिल करना होगा। रामलखन बाबू का वह वक्तव्य सचमुच बिहारशरीफ के उस हॉल में बैठे हताश और निराश लोगों के लिए एक नई रोशनी की तरह आया। उस रोशनी में न जाने कितने दिलों के अंधेरे दूर हो गए और लोग खुद को अंदर से आलोकित महसूस करने लगे।

सभागार में बैठा अतिपिछड़ा दलित संघर्ष मोर्चा का एक-एक सदस्य और पूरा नाई समुदाय उस वक्त भाव-विभोर था। वे खुद को धन्य मान रहे थे कि उनके बीच रामलखन बाबू जैसा एक मनीषी, एक सच्चा मार्गदर्शक उपस्थित है। उस पल हर दिल से एक ही दुआ निकल रही थी—धन्य है वह मां, जिसने अपनी कोख से ऐसे निष्काम कर्मयोगी को जनम दिया! एक ऐसी मां जिसने अपने लाल को इस समाज की सेवा में ऐसा झोंक दिया कि आज उनके कारण पूरे नाई समाज और अतिपिछड़ा समाज के आंगन में स्वाभिमान और उम्मीद की एक नई सुबह (विहान) आ गई है। ऐसे सपूत पर सिर्फ एक परिवार या एक गांव को नहीं, बल्कि पूरे सूबे को नाज होना स्वाभाविक है।

समारोह के उस भावुक और गरिमामयी चरमोत्कर्ष पर, बिहारशरीफ जिला नालंदा की ओर से अतिपिछड़ा दलित संघर्ष मोर्चा ने कृतज्ञता प्रकट करने का एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने रामलखन बाबू के त्याग, उनकी आधी सदी की समाज सेवा और उनके इस अद्भुत अवदान को सलाम करते हुए उन्हें "जननायक कर्पूरी ठाकुर रत्न" की मानद उपाधि और सम्मान पत्र से सम्मानित किया। जब वह सम्मान पत्र रामलखन बाबू के हाथों में सौंपा जा रहा था, तब पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और "जननायक कर्पूरी ठाकुर अमर रहें" के नारों से गूंज उठा। लेकिन असल में, उस सम्मान को पाकर केवल रामलखन बाबू सम्मानित नहीं हो रहे थे, बल्कि वह सम्मान पत्र खुद एक सच्चे कर्मयोगी के हाथों में जाकर गौरवान्वित महसूस कर रहा था। मोर्चा के पदाधिकारियों और नाई समाज के लोगों की आंखों में गर्व के आंसू थे कि उन्होंने आज एक सही पारखी की तरह समाज के असली 'रत्न' को पहचान कर उसे उसकी सही जगह दी है।

उस शाम ने विदा ली, तारीखें बदल गईं, साल बीत गए, लेकिन 25 जनवरी 2019 की वह सांझ आज भी बिहारशरीफ और लखीसराय के सामाजिक इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर दर्ज है। वह इस बात की गवाह है कि जब तक इस धरती पर रामलखन बाबू जैसे समर्पित, निस्वार्थ और संवेदनशील मनीषी मौजूद हैं, तब तक जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के विचार कभी मर नहीं सकते। वे विचार जीवित हैं, सांस ले रहे हैं और समाज के सबसे कमजोर तबके को आज भी आगे बढ़ने का हौसला दे रहे हैं।

निवेदक व आयोजक परिवार:

यह ऐतिहासिक सम्मान और भावनाओं का यह समंदर जिन आदरणीय साथियों की लगन और निष्ठा का परिणाम था, वे सदैव समाज के ऋणी रहेंगे:

अतिपिछड़ा दलित संघर्ष मोर्चा, बिहारशरीफ, नालंदा

 प्रदेश अध्यक्ष: श्री बलराम दास जी

 प्रदेश अध्यक्ष: श्री अनिल पासवान जी

 संयोजक: श्री दीपक ठाकुर जी


अगले भाग पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।



​"रामलखन बाबू जैसे सच्चे कर्मयोगी और जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के विचारों के बारे में आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार हमारे साथ ज़रूर साझा करें।"




© 2026 सेन सारथी (Sen Saarthi). सर्वाधिकार सुरक्षित।

इस लेख की समस्त सामग्री (Text) 'सेन सारथी' ब्लॉग की बौद्धिक संपदा है। इस लेख को बिना लिखित अनुमति के किसी अन्य वेबसाइट, ब्लॉग या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हूबहू कॉपी-पेस्ट करना या व्यावसायिक रूप से उपयोग करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है। उल्लंघन पाए जाने पर उचित कानूनी या डिजिटल (DMCA) कार्रवाई की जा सकती है। आप लेख के लिंक को सोशल मीडिया पर साझा (Share) कर सकते हैं।

​⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer):

​यह लेख दिनांक 25/01/2019 को अतिपिछड़ा दलित संघर्ष मोर्चा, बिहारशरीफ द्वारा आयोजित समारोह और उनके द्वारा प्रदान किए गए आधिकारिक सम्मान पत्र (हस्तलिखित दस्तावेजों) और उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य केवल सामाजिक सेवा, प्रेरणा और ऐतिहासिक घटनाक्रम को पाठकों तक पहुंचाना है। इसका उद्देश्य किसी भी जाति, समुदाय, संस्था या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाना या कोई राजनीतिक एजेंडा फैलाना बिल्कुल नहीं है। यदि किसी तथ्य या नाम को लेकर कोई विसंगति पाई जाती है, तो आयोजक परिवार/संस्था के आधिकारिक दस्तावेज ही अंतिम रूप से मान्य होंगे।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरे नजरिए से रामलखन जी: जिला महासचिव सुनील ठाकुर की कलम से एक गौरवगाथा (भाग 1)

सामाजिक चेतना: भाग-2 | एकता की पुकार और बिखराव का दर्द

सेन सारथी: परिचय, इतिहास और शिक्षा