रामलखन शर्मा के लोकगीत और सामाजिक भलाई का संदेश
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| प्रतीकात्मक चित्र |
विरासत का अंकुरण और चेतना का शंखनाद: रामलखन शर्मा की सामाजिक पुकार
इस संसार में मनुष्य का जीवन केवल सांसें लेने और व्यक्तिगत तरक्की पा लेने का नाम नहीं है। कुछ आत्माएं ऐसी होती हैं, जिनके भीतर समाज की पीड़ा को हरने का जज्बा किसी आकस्मिक घटना से नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिले संस्कारों की समृद्ध मिट्टी से उपजता है। जब बचपन की कोमल आंखें अपने ही घर में निस्वार्थ सेवा का जीवंत उदाहरण देखती हैं, तो वह भावना व्यक्तित्व की गहराइयों में इस कदर समा जाती है कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही लोक-कल्याण बन जाता है। लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा अंतर्गत ग्राम-पोस्ट 'चननियाँ' के स्थाई निवासी रामलखन शर्मा एक ऐसी ही तपस्वी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी पारिवारिक विरासत को समाज के उत्थान का जरिया बना दिया।
पूज्य पिता की विरासत और सेवा का अंकुर
रामलखन बाबू का यह लेख केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि अपने पुरखों के प्रति कृतज्ञता की एक अनमोल अभिव्यक्ति है। वे अत्यंत आदर और गर्व से कहते हैं कि वे अपने पूज्य पिता स्वर्गीय लालजी ठाकुर जी के छोटे पुत्र हैं। स्वर्गीय लालजी ठाकुर जी अपने स्वजातीय समाज के एक ऐसे 'सरदार' (अगुआ) थे, जिन्होंने आजीवन समाज की पगड़ी की प्रतिष्ठा और एकता के लिए काम किया। उन्होंने समाज सेवा को कोई पेशा या दिखावा नहीं माना, बल्कि उसे जीवन जीने का ढंग बनाया।
बालक रामलखन ने बचपन से ही अपने घर के आंगन में समाज सेवा के जो कार्य देखे, जो त्याग और समर्पण महसूस किया, वह उनके भीतर एक छोटे से बीज के रूप में समाहित हो गया। जैसे मिट्टी के भीतर छुपा एक अदृश्य बीज धीरे-धीरे अंकुरित होता है, ठीक वैसे ही पिता के कर्मों को देखकर रामलखन बाबू के भीतर समाज के लिए कुछ कर गुजरने की भावना का अंकुरण हुआ। उन्होंने अपने उपगोश यानी अपने अंतर्मन की सबसे पवित्र गहराई में पिता के उसी आशीर्वाद और आदर्शों को सहेजकर रखा। इसी का प्रतिफल था कि उन्होंने स्वयं को केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने आप को संपूर्ण समाज का एक सच्चा सेवक मानकर आजीवन समाज सेवा का कठिन व्रत ले लिया।
वे अपने अंतर्मन के इसी दर्द, इसी छटपटाहट और चेतना को समाज के सामने रखना चाहते हैं। वे देखना चाहते हैं कि उनका अपना नाई समाज उनके इस दर्द को, उनकी इस भावना के इजहार को कहाँ तक परख पाता है और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का क्या मन बनाता है। इसी तड़प को उन्होंने एक बेहद मर्मस्पर्शी और क्रांतिकारी लोकगीत के माध्यम से पिरोया है।
जागो-जागो नाई भाई: सोए हुए स्वाभिमान को आवाज़
रामलखन बाबू का यह लोकगीत केवल सुरों और ताल का संगम नहीं है, बल्कि यह सदियों की मानसिक गुलामी और कुरीतियों के अंधेरे में सोए हुए समाज को झकझोर कर जगाने वाला एक सामाजिक शंखनाद है। इसकी एक-एक पंक्ति में समाज को बदलने की व्याकुलता छिपी है:
"जागो-जागो नाई-भाई, भैलो अब भोर हो।
कते दिना सुतल रहबा, बन के तू निभोर हो।"
गीत की शुरुआत ही एक आत्मीय और गहरी पुकार से होती है। रामलखन बाबू अपने भाइयों से कहते हैं कि ऐ मेरे नाई भाइयों! अब तो जाग जाओ, क्योंकि चेतना और अधिकारों की एक नई सुबह (भोर) हो चुकी है। तुम और कितने दिनों तक इस कदर बेफिक्र, असहाय और 'निभोर' (लाचार) बनकर सोते रहोगे? अगर अब भी नहीं जागे, तो वक्त तुम्हें बहुत पीछे छोड़ देगा।
"सब जाती वर्ग मिली, भेल सब एक हो।
फूटी-फूटी रोवत रहबा, होजा सब एक हो।"
इस अंतरे में वे एक कड़वी सामाजिक हकीकत से पर्दा उठाते हैं। वे समझाते हैं कि आज दुनिया की तमाम जातियां और वर्ग अपने हक के लिए एकजुट हो चुके हैं, वे 'एक' हो गए हैं। लेकिन हमारा समाज आज भी आपसी बिखराव का शिकार है। वे सचेत करते हैं कि अगर तुम यूँ ही टुकड़ों में बंटे रहे, तो भविष्य में अकेले-अकेले कोने में बैठकर 'फूटी-फूटी' रोने के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। अगर सम्मान से जीना है, तो आपसी मतभेद भुलाकर सबको 'एक' होना ही पड़ेगा।
चापलूसी का त्याग और श्रम की गरिमा
"धोबी, बढ़ई, ब्रह्मण, मोची, करे काम सोची हो।
हमें न जानिलिया भैया, तू करवा बिना सोची हो।"
रामलखन बाबू समाज के हर वर्ग के श्रम का आदर करते हुए एक बड़ा उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि चाहे धोबी हो, बढ़ई हो, ब्राह्मण हो या मोची—हर वर्ग अपना काम बहुत सोच-समझकर, अपनी शर्तों और सम्मान के साथ करता है। लेकिन अफ़सोस, हमारा भाई बिना दूरदर्शिता के, बिना सोचे-समझे दूसरों की जी-हुज़ूरी में लग जाता है। बिना सोचे-समझे किया गया श्रम कभी गौरव नहीं दिलाता।
"छोरी देहो नीच कामा, छोड़ी देहो करतारी कफ़नमा हो।
सब मिले उठाई देहो मजदूरी सलियनमा हो।"
यहाँ एक समाज सुधारक की हुंकार साफ सुनाई देती है। वे सीधे तौर पर आह्वान करते हैं कि उन तमाम 'नीच कामों' और 'करतारी कफ़नमा' यानी अछूते वस्त्र लेने की आदत को हमेशा के लिए त्याग दो, जो तुम्हारे स्वाभिमान को कुचलती हैं। किसी के सामने झुकने या तलवे चाटने से समाज का उत्थान नहीं होता। इसके बजाय, पूरा समाज एक साथ चौपाल पर बैठे और अपनी मेहनत, अपनी 'मजदूरी' का एक सही, सच्चा और सम्मानजनक मूल्य (सलियना मजदूरी) तय करे। अपनी मेहनत का वाजिब हक मांगना सीखो।
पुरखों का गौरव और शिक्षा का संदेश
"युग-युग पंडित, रेवती, शर्मा सरदार सुरेश महान हो,
पूर्णियाँ के आनन्दी बाबू साहित्य लिखल बखान हो।"
कोई भी समाज तब तक अपनी पहचान की रक्षा नहीं कर सकता, जब तक वह अपने इतिहास और पुरखों पर गर्व न करे। रामलखन बाबू अपने गीत के माध्यम से समाज के उन महान मनीषियों को नमन करते हैं जिन्होंने समाज को राह दिखाई। वे युगों-युगों से चले आ रहे मार्गदर्शकों, रेवती बाबू, शर्मा सरदारों और सुरेश जैसे महान नायकों का स्मरण करते हैं। साथ ही, वे पूर्णियाँ के 'आनन्दी बाबू' का विशेष आदर के साथ उल्लेख करते हैं, जिन्होंने अपनी कलम और 'साहित्य' के माध्यम से नाई समाज के गौरव का बखान किया और समाज को एक बौद्धिक पहचान दी।
"लिखी पढ़ि गाएल रामलखन नाई हो।
सब मिल विचार करो जेही में भलाई हो।"
गीत के अंतिम पड़ाव पर रामलखन शर्मा जी बहुत ही सरलता और विनम्रता से अपनी बात समाप्त करते हैं। वे कहते हैं कि यह गीत किसी अज्ञानी की कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि जीवन के अनुभवों को 'लिख-पढ़कर', अच्छी तरह समझकर इस 'रामलखन नाई' ने इसे गाया है। यह उनके दिल की वह सच्ची पुकार है जो कागज़ पर उतरी है। वे अंत में पूरे समाज के विवेक पर यह फैसला छोड़ जाते हैं कि—अब आप सब मिलकर इस पर 'विचार' कीजिए कि हमारे समाज की असली 'भलाई' और तरक्की किस रास्ते पर चलने में है।
उपसंहार
रामलखन शर्मा जी का यह लेख और यह कालजयी लोकगीत वास्तव में एक व्यक्ति का विचार नहीं, बल्कि पूरे समाज की आत्मा की आवाज़ है। अपने पूज्य पिता स्वर्गीय लालजी ठाकुर जी से जो सेवा का अंकुर उन्हें मिला था, उसे उन्होंने इस अद्भुत गीत के माध्यम से पूरे समाज में बिखेर दिया है ताकि एक वैचारिक क्रांति आ सके। यह आलेख हमें सिखाता है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही समाज को एक नई दिशा दी जा सकती है।
अनुभवकर्ता व समाजसेवी:
रामलखन शर्मा
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अस्वीकरण: यह लेख रामलखन शर्मा जी के व्यक्तिगत संस्मरणों, उनके पिता की विरासत और उनके द्वारा रचित लोकगीत के साहित्यिक व सामाजिक विश्लेषण पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल समाज में जागृति, एकता और सकारात्मक प्रेरणा फैलाना है। किसी भी ऐतिहासिक या व्यक्तिगत तथ्य के संदर्भ में मूल हस्तलिखित दस्तावेज ही अंतिम रूप से मान्य होंगे।

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