अंधविश्वास से विज्ञान और सच्ची शांति तक
बचपन की यादें अक्सर धुंधली धूप और किसी पुरानी छाँव की तरह मन के कोने में बैठी रहती हैं। मेरे लिए वह छाँव लठोरा (लसोड़ा) के उस पेड़ की थी, जो सड़क के किनारे मूक गवाह बनकर खड़ा रहता था। शाम का वक्त था, सूरज अभी पूरी तरह ढला नहीं था; उसकी गुनगुनी और मद्धम रोशनी पत्तियों से छनकर नीचे आ रही थी। मैं अपने दो दोस्तों के साथ वहाँ खड़ा था। बातचीत बच्चों वाली ही थी, लेकिन अचानक एक दोस्त ने मेरी उस आस्था पर चोट की जो मेरे जीवन का आधार थी। उसने कहा, "तुम जो यह हर वक्त शिव-शिव करते रहते हो, ठीक नहीं है। तुम्हें क्या लगता है, शिव ही सबसे बड़े हैं? ऐसा नहीं है। उनसे बड़े तो हनुमान जी हैं। जब उन्होंने पहाड़ उठाया था, तो शिव जी डर के मारे गुफा में छुप गए थे।"
वह मुझे चिढ़ाना चाहता था, मेरे शिव को नीचा दिखाकर मेरे बाल-मन को भड़काना चाहता था। उसकी कहानी में कितनी सच्चाई थी, शास्त्रों का क्या तर्क था—उस उम्र में मुझे इससे कोई मतलब नहीं था। मैंने कोई बहस नहीं की, कोई गुस्सा नहीं दिखाया। मैंने बस अपनी आँखें मूंद लीं और अपने भीतर बैठे महादेव से चुपचाप कहा—"नहीं, मेरे शिव ही मेरे लिए सबसे अच्छे हैं।" उस लठोरा के पेड़ की सरसराहट के बीच जैसे मेरे और मेरे शिव के बीच एक गुप्त समझौता हो गया। उस भड़काने की कोशिश ने मेरे प्रेम को कम नहीं किया, बल्कि उसे और गहरा और अटूट बना दिया।
मिश्री, बादाम और गीतों का वो मखमली सुकून
वह दौर ऐसा था जब शिव मेरे लिए कोई दूर रहने वाले देवता नहीं, बल्कि घर के सबसे प्यारे सदस्य जैसे थे। हर रोज़ रात को सोने से पहले का मेरा एक पवित्र नियम था। कमरे में अगरबत्ती जलाना, उसकी भीनी-भीनी सुगंध का चारों तरफ फैल जाना और फिर अपने हाथों से महादेव को मिश्री और बादाम का भोग चढ़ाना। यह किसी मंदिर का आडंबर नहीं, एक बच्चे का अपने सबसे करीबी दोस्त के लिए रोज़ का लाड़-प्यार था।
इसके बाद बिस्तर पर लेटकर मैं तब तक शिव के गीत गुनगुनाता रहता, जब तक कि मेरी आँखें भारी न हो जाएँ। वह मिश्री जैसी मिठास और अगरबत्ती की खुशबू मेरे अचेतन मन में इस कदर बस चुकी थी कि सोते समय भी मेरी चेतना शिव की गोद में सोती थी। इस गहरे आंतरिक सुकून का असर मेरी पढ़ाई पर भी दिखता था। मैं जो भी पढ़ता, वह दिमाग में सीधे छप जाता था। धार्मिक कहानियों और शिव के नाम के सहारे मेरी पढ़ाई का शुरुआती सफ़र बहुत ही सुख और शांति से चल रहा था। लेकिन यह सुख का सागर हमेशा एक जैसा नहीं रहने वाला था।
अधूरा वादा और डर का वो मानसिक चक्रव्यूह
जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, ज़िंदगी के कड़वे सच—घर की भारी आर्थिक तंगी, माँ की लगातार खराब रहने वाली तबीयत और बाहरी दुनिया का कोलाहल—सामने आकर खड़े हो गए। जब हर तरफ परेशानियाँ बढ़ने लगीं, तो मेरा वह निश्छल प्रेम धीरे-धीरे 'लोभ और माँग' में बदलने लगा। मैं सुकून के लिए नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं की एक लंबी लिस्ट लेकर भगवान के सामने बैठने लगा।
इसी दौरान एक घटना घटी जिसने मेरे मन की नींव हिला दी। एक दिन मेरी दादी बाहर लकड़ी का बोझ हटा रही थीं, जहाँ पुरानी ईंटें बिखरी पड़ी थीं। अचानक वहाँ एक सांप दिखा और दादी को लगा कि सांप ने उन्हें छू लिया है या काट लिया है। यह सुनते ही मेरा बाल-मन बुरी तरह खौफ से भर गया। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि हम बड़े इलाज का खर्च उठा सकें। लाचारी में मैंने शिव से एक सौदा कर लिया—"हे शिव! मेरी दादी को बचा लो, मैं एक हफ्ते के भीतर आपके लिए शिव चर्चा करवाऊँगा।"
दादी बिल्कुल ठीक रहीं, उन्हें कुछ नहीं हुआ। विज्ञान कहता है कि शायद सांप ने काटा ही नहीं था, लेकिन मेरे मन ने माना कि यह शिव का चमत्कार है। पर असली त्रासदी इसके बाद शुरू हुई। घर की तंगी के कारण मैं वह शिव चर्चा नहीं करवा पाया। एक हफ्ता बीता, फिर कई हफ्ते बीत गए। मैंने खुद को सुरक्षित रखने के लिए मन ही मन चार बार, आठ बार और न जाने कितनी बार आगे के हफ़्तों में इसे पूरा करने का वादा किया, लेकिन गरीबी के कारण मैं मजबूर था।
यहाँ से मेरे भीतर एक गहरे अपराधबोध (Guilt) और डर ने जनम ले लिया। मुझे लगने लगा कि मैंने भगवान से किया वादा तोड़ा है, इसलिए घर की हर मुसीबत, माँ की बीमारी, हर लड़ाई-झगड़ा उसी टूटे वादे की सज़ा है। जो पूजा कभी मुझे असीम शांति देती थी, अब वह खौफ का कारण बन गई थी। यह डर मेरे मानसिक स्तर पर इस कदर हावी हो गया कि मैं रास्ते में साइकिल चलाते या पैदल चलते हुए लगातार डर के मारे शिव का नाम रटने लगा। मन में खौफ बैठ गया कि अगर मैंने 'मुझ पर दया करो' बोला, तो कहीं कुछ और बुरा न हो जाए। इस मानसिक लूप को काटने के लिए मैं एक ही शब्द को बार-बार दोहराने लगा, यहाँ तक कि किसी वस्तु को बार-बार छूने की अजीब आदत का शिकार हो गया कि अगर दोबारा नहीं छुआ तो कुछ अमंगल हो जाएगा। मैं इस अदृश्य तूफ़ान को अकेले झेल रहा था, अंदर ही अंदर घुट रहा था और मानसिक रूप से कमज़ोर होता जा रहा था।
विज्ञान का सहारा और तार्किक विद्रोह
जब यह घुटन अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई, तो मेरे मस्तिष्क ने आत्मरक्षा में एक बड़ा विद्रोह किया। मैट्रिक की परीक्षा के बाद मैंने विज्ञान (Science) को चुना। यह सिर्फ एक विषय का चुनाव नहीं था, बल्कि उस मानसिक चक्रव्यूह से बाहर निकलने का मेरा रास्ता था। अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन और खुद के अनुभवों से मैंने हर चीज़ को तर्क (Logic) की कसौटी पर कसना शुरू किया।
लेकिन इस मानसिक जाल को पूरी तरह तोड़ने की एक भारी कीमत मुझे चुकानी पड़ी। जब भी मैं पढ़ाई करने बैठता, पुरानी आदत के कारण वे धार्मिक शब्द और "ॐ नमः शिवाय" का लूप अपने आप मेरी जुबान पर चलने लगता और मुझे विचलित कर देता। उस समय, उस ज़बरदस्ती हावी होने वाले विचार को दिमाग से खदेड़ने के लिए मेरे पास एक ही हथियार था—विद्रोह करना। मैं खुद को सचेत करता और मन ही मन भगवान शिव को बहुत सारे अपशब्द कहता था। यह विरोधाभास बहुत तीखा था—एक समय था जब शिव का नाम लेकर मैं पढ़ पाता था, और अब एक ऐसा समय था जब शिव के विचारों को भगाने और पढ़ाई पर ध्यान लगाने के लिए मुझे उन्हें अपशब्द कहने पड़ते थे।
वह कोई नफ़रत नहीं थी, वह उस थके हुए किशोर की अपने अस्तित्व और अपनी पढ़ाई को बचाने की जंग थी। उस तीखे विद्रोह के बाद ही मेरा दिमाग उस लूप से आज़ाद हो पाता था और मुझे वह शांति मिलती थी जिससे मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूँ। विज्ञान ने मुझे 'मानने' की जगह 'जानने' की ओर मोड़ा। वक्त और तजुर्बे ने मुझे सिखाया कि व्यावहारिकता असल में क्या होती है। बचपन में मेरी आदत थी कि मैं बिना सोचे-समझे हर किसी के आगे सिर झुका देता था। तब मुझे लगता था कि यह मेरा संस्कार है, लेकिन विज्ञान और तर्क ने मेरी आँखें खोलीं। मैंने जाना कि हर झुकने वाला सिर आदर का हकदार नहीं होता और हर हाथ आशीर्वाद देने वाला नहीं होता। जब आप किसी गलत या बुरे इंसान के सामने झुकते हैं, तो आप उसका मनोबल और बढ़ा देते हैं। वह आपकी शालीनता को आपकी कमजोरी समझ लेता है, जिसका खामियाजा मानसिक रूप से आपको ही भुगतना पड़ता है। आज मैंने समाज, परिवार और रिश्तेदारों के बीच सही और गलत का अंतर समझ लिया है। अब मैं जानता हूँ कि अपनी बात को अधिकार से कैसे रखना है, किसे जवाब देना है और कहाँ झुकना है और कहाँ सीना तानकर खड़े रहना है।
खोए हुए रास्ते की नई तलाश
आज जब मैं मुड़कर अतीत के उस कोलाहल को देखता हूँ, तो विज्ञान और व्यावहारिकता सीख लेने के बाद भी, मन का एक कोना मुझे बचपन के उस खोए हुए सुकून की याद दिलाता है। लाख कोशिशों के बाद भी आज शिव के प्रति वह ध्यान नहीं लग पाता जो बचपन में सहज ही लग जाता था।
पर आज मेरे पास वह नासमझी नहीं है। आज मैं यह अंतर पूरी तरह समझ चुका हूँ कि मेरा लोभ क्या था, मेरा डर क्या था और असली अध्यात्म क्या है। मुझे आज इस बात का अहसास है:
"भगवान को इस सबसे कोई मतलब नहीं होता कि किसने क्या वादा किया। ब्रह्मांड की उस परम ऊर्जा को हमारे किसी आयोजन या दिखावे का लालच नहीं है। उसे तो बस इससे मतलब होता है कि कोई उसे सच्चे प्रेम से पुकार ले।"
बचपन का वह अधूरा वादा आर्थिक तंगी की लाचारी थी, कोई पाप नहीं। आज मैं किसी और के बताए शब्दों के जाल में नहीं फँसना चाहता। मुझे बाहरी दुनिया में सीना तानकर जीने के लिए विज्ञान और तर्क तो चाहिए ही, लेकिन अपने भीतर के कोलाहल को शांत करने के लिए उस आंतरिक मौन और ध्यान की भी तलाश है। मैं आज उसी भूले हुए रास्ते को एक नए और परिपक्व दृष्टिकोण से ढूँढ रहा हूँ—जहाँ विज्ञान की समझ भी हो, और भीतर महादेव की वह ठंडी, निश्छल छाँव भी हो।
लेखक और अनुभवकर्ता:
विजय रत्न
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महत्वपूर्ण सूचना / अस्वीकरण:
- व्यक्तिगत अनुभव: यह लेख पूरी तरह से लेखक के बाल-मन के व्यक्तिगत अनुभवों, मानसिक संघर्षों और उनके जीवन के क्रमिक विकास (Evolution) पर आधारित एक सत्य संस्मरण है।
- किसी की भावना को ठेस पहुँचाना उद्देश्य नहीं: इस लेख का उद्देश्य किसी भी धर्म, संप्रदाय, ईश्वर के प्रति आस्था, या किसी व्यक्ति विशेष की धार्मिक मान्यताओं और भावनाओं को ठेस पहुँचाना, ठेस पहुँचाने की कोशिश करना या उनका अनादर करना कतई नहीं है।
- तार्किक दृष्टिकोण: लेख में वर्णित विचार एक किशोर मन के उस दौर के असमंजस और बाद में विज्ञान व तर्क के माध्यम से उस स्थिति से बाहर निकलने की व्यावहारिक यात्रा को दर्शाते हैं। इसे केवल एक मानवीय संघर्ष और वैचारिक आत्म-मंथन के रूप में देखा जाना चाहिए।
- कोई चिकित्सा सलाह नहीं: लेख में साझा किए गए मानसिक तनाव के अनुभव लेखक के अपने जीवन के हैं। इसे किसी भी प्रकार की चिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक सलाह (Psychological Advice) न समझा जाए।

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