त्याग, अधूरा ज्ञान और टूटते सपने: एक परिवार की कड़वी सच
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस लेख के पात्र, स्थान और घटनाएँ समाज में घटने वाले विभिन्न वास्तविक अनुभवों और परिस्थितियों से प्रेरित एक पूर्ण काल्पनिक प्रस्तुति हैं। किसी भी जीवित या मृत् व्यक्ति अथवा घटना से समानता महज़ एक संयोग है। इस कहानी का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि सही दिशा और व्यावहारिक सोच का संदेश देना है।
हमारे समाज में अक्सर यह कहावत दोहराई जाती है कि "माता-पिता के फैसले कभी गलत नहीं होते।" लेकिन जब इसी अटूट विश्वास के पीछे अज्ञानता, झूठी शान की हवस और बिना सोचे-समझे उठाए गए कदमों का पर्दा पड़ जाए, तो एक हँसता-खेलता परिवार किस तरह तबाही के गहरे दलदल में धंसता चला जाता है—यह कहानी उसी कड़वी सच्चाई का एक जीता-जागता दस्तावेज़ है।
अभावों की आग और नन्हे कंधों पर पहाड़ों का बोझ
गाँव के एक सुदूर कोने में मिट्टी और ईंटों से खड़ा वह दो कमरों का छोटा सा मकान केवल एक ढाँचा नहीं था, बल्कि अभावों और लाचारियों का एक जीता-जागता पिंजरा था। घर की ज़मीन बस उतनी ही थी, जितने में वह मकान अपनी आखिरी साँसें गिन रहा था। भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के नाते रोशन ने कभी खिलौनों से खेलना नहीं सीखा; उसने तो बचपन की दहलीज़ पर कदम रखते ही पेट पर पट्टी बाँधकर जीना सीख लिया था।
घर में चूल्हा जलना भी किसी त्यौहार से कम नहीं था। राशन-पानी की भारी तंगी के बीच चार-चार छोटी बहनों के विवाह का विचार रोशन के सिर पर तलवार की तरह लटकता रहता था।
उधर पिता का आलम यह था कि परदेश में रहकर जो थोड़ा-बहुत कमाते, उसका अधिकांश हिस्सा अपनी गंदी आदतों और नशे की भेंट चढ़ा देते। तीन-चार साल में कभी गाँव का रुख करते भी, तो उनकी जेब खाली और ज़बान पर बेतुकी बातें होतीं। समाज और रिश्तेदारी में उनके नाम पर केवल बदनामी ही हाथ आती थी। इस बदहाली ने घर के हर चिराग की लौ को मद्धम कर दिया था और पूरे परिवार के आत्मविश्वास की रीढ़ तोड़ दी थी।
ऐसे घुटन भरे माहौल में घर की सबसे बड़ी और सर्वेसर्वा रोशन की माँ थीं। रोशन के सीने में अपनी माँ के प्रति श्रद्धा का एक ऐसा समंदर बहता था, जहाँ केवल अदब, रूहानी जुड़ाव और बेपनाह हमदर्दी थी। उसकी नज़र में माँ का दर्जा भगवान से भी ऊँचा था। लेकिन नियति का क्रूर मज़ाक देखिए—माँ का स्वभाव अज्ञानता, अत्यधिक घमंड और 'अधजल गगरी छलकत जाए' वाली कहावत का सटीक उदाहरण था। घर में किसी अन्य सदस्य की इतनी हैसियत नहीं थी कि माँ के बनाए गलत रास्तों पर सवाल उठा सके।
किताबों से दूरी और परदेश का अंगार-पथ
12वीं की दहलीज लांघने और BA प्रथम वर्ष की परीक्षा निपटाने के बाद, 18-19 साल के मासूम रोशन ने घर के बिगड़ते हालातों को बड़ी बारीकी से टटोला। उसने देखा कि कर्ज़ का अजगर उसके परिवार को धीरे-धीरे निगल रहा है और बहनों की उम्र रेत की तरह हाथों से फिसल रही है।
यद्यपि माता-पिता किताबों से उसका नाता बनाए रखना चाहते थे, लेकिन रोशन जानता था कि खाली पेट पढ़ी गई विद्या कभी पेट की आग नहीं बुझा सकती। उसने अपनी इच्छाओं का गला घोंटा और कमाने के लिए परदेश की अनजानी राह पकड़ ली।
दक्षिण भारत (साउथ इंडिया) की तपती धरती पर पहुँचकर रोशन की ज़िंदगी आसमान से गिरकर खजूर पर अटकी वाली हो गई। जिस उंगलियों ने कल तक केवल कलम और कॉपियाँ संभाली थीं, वे अब कंक्रीट, गारे और ईंटों के बोझ से लहूलुहान होने लगीं।
राजमिस्त्री और निर्दयी लेबरों के बीच, कड़ी धूप में शरीर की चमड़ी झुलसती रहती। गाली-गलौज, बेतुकी बोलियों और अमानवीय माहौल के बीच रोशन दिन-रात एक करके पसीना बहाता रहा। जब मेहनत के बाद उसकी पहली कमाई हाथ में आई, तो पिता ने तुरंत कर्ज़ का बहाना बनाकर हाथ फैला दिया। रोशन को पिता की नीयत पर रत्ती भर शक नहीं था, लेकिन घर के चूल्हे की सही प्राथमिकता जानते हुए उसने अपनी गाढ़ी कमाई के पूरे रुपये सीधे अपनी माँ के चरणों में समर्पित कर दिए।
ममता का सच्चा अहसास, पर मार्गदर्शन की अज्ञानता
परदेश की उस जानलेवा धूप और रोशन की टूटती साँसों की खबर जब गाँव पहुँची, तो माँ का कलेजा कांप उठा। एक माँ की ममता जाग उठी और उसने तुरंत रोशन को घर वापस लौटने का संदेश भेज दिया।
निस्संदेह, यहाँ माँ के इस कदम में ममता का सच्चा रस घुला हुआ था, लेकिन एक दूरदर्शी अभिभावक के रूप में माँ से यहाँ सबसे भारी भूल हो गई। अगर माँ चाहती तो रोशन के सामने दूध का दूध और पानी का पानी करते हुए साफ़-साफ़ कह सकती थी— "बेटा, तेरी इस लाचारी को देखकर मेरी आत्मा रोती है, तू तुरंत लौट आ। घर पर कर्ज़ का बोझ भले ही पहाड़ जैसा है, लेकिन हम कोई दूसरा काम ढूंढ लेंगे जहाँ तेरा शरीर न गले और धीरे-धीरे घर का कर्ज़ भी उतर जाए।"
यदि माँ ने इस तरह सच्चाई को स्वीकार कर सही दिशा दिखाई होती, तो रोशन के गिरे हुए मनोबल को पर लग जाते। लेकिन माँ ने इसके उलट अपनी झूठी शान बचाने के लिए रोशन से सफेद झूठ बोल दिया— "तू चिंता मत कर बेटा, सारा कर्ज़ चुकता हो गया है, अब सिर पर एक पाई का उधार नहीं है!" और रोशन के खून-पसीने की कमाई को बेफिजूल की चीज़ों और दिखावे में पानी की तरह बहा दिया।
पढ़ाई की बेतुकी रट और गाँव में समय की बर्बादी
5 महीने की अंतहीन प्रताड़ना झेलकर जब रोशन गाँव लौटा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर आते ही माँ ने उस पर अव्यवहारिक रूप से पढ़ाई दोबारा शुरू करने की रट लगा दी।
रोशन का व्यावहारिक दिमाग चीख-चीख कर कह रहा था कि घर में न तो कोई ऐसी ज़मीन बची है जिसे बेचकर कॉलेज की फीस भरी जाए और न ही कल के राशन का कोई अता-पता है। उसकी सोच बिल्कुल सीधी थी—पहले 2-3 साल मेहनत करके कर्ज़ की ज़ंजीरों को तोड़ा जाए, बहनों के हाथ पीले करने का इंतज़ाम किया जाए, फिर बची हुई ज़िंदगी में पढ़ाई भी पूरी हो जाएगी।
लेकिन माँ के सिर पर तो अज्ञानता का भूत सवार था। वह दिन-रात रोशन के दिमाग का दही बनाती रहती और टोले-मोहल्ले के लोगों के सामने मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए कहती— "देखो जी! हम तो अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं, पर यही कुपूत नहीं पढ़ना चाहता!"
समाज की नज़र में माँ महानता की देवी बन जाती और बेकसूर रोशन को भरी सभा में ज़हर का घूँट पीकर सिर झुकाना पड़ता। माँ के प्रति अपार अदब के कारण वह अपने होंठ सी लेता, लेकिन अंदर ही अंदर घुटता रहता। माँ की इसी बेतुकी ज़िद और मानसिक प्रताड़ना के कारण रोशन गाँव में 5, 6, यहाँ तक कि 7-7 महीने तक बेकार बैठा रह जाता। जो कीमती समय वह परदेश में काम करके घर की तकदीर बदलने में लगा सकता था, वह गाँव की चौखट पर बैठकर मुफ़्त में स्वाहा हो जाता।
मुंबई पलायन और अपनों की नज़रों में 'गुनहगार' बनना
गाँव के इस दक़ियानूसी माहौल में अपना भविष्य डूबता देख, रोशन ने मुंबई में रहने वाले एक दूर के संबंधी से संपर्क किया और अपने बदन पर एकमात्र कमीज़ पहनकर अकेले ही सपनों के शहर मुंबई की ओर भाग निकला।
लेकिन माँ की अज्ञानता का साया वहाँ भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह दिन में दस बार फोन करके उसका दिमाग चाटती और पढ़ाई की बेतुकी रट लगाकर उसका मनोबल तोड़ती।
बात तब हद से बाहर निकल गई जब माँ ने रोशन के सबसे प्यारे और घनिष्ठ मित्र के कान भरने शुरू कर दिए— "देख भाई, रोशन मेरी बात नहीं सुनता, तू ही इसे समझाकर गाँव वापस बुला ले।"
माँ की बातों में आकर उसका दोस्त रोशन पर वापस आने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। रोशन अपने उस दोस्त को अपनी जान से ज़्यादा चाहता था, लेकिन मजबूरी के आगे घुटने टेकते हुए उसे भारी मन से दोस्त की बात काटनी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि दोस्त का दिल टूट गया और रोशन अपने सबसे करीबी इंसान की नज़र में भी एक "स्वार्थी, ज़िद्दी और बेकार इंसान" बनकर रह गया।
इसके बाद माँ ने जो किया, उसने रोशन की कमर ही तोड़ दी। रोशन को BA द्वितीय वर्ष की परीक्षा दिलाने की सनक में माँ ने पड़ोसियों के सामने आंचल फैलाकर नया कर्ज़ ले लिया। रोशन जिस कर्ज़ के दलदल को सुखाने मुंबई में दिन-रात एक कर रहा था, उसकी माँ ने अपने अज्ञान में उसी दलदल में नया पानी भर दिया। जब रोशन मेहनत करके गाँव लौटता, तो दरवाज़े पर लेनदार खड़े मिलते। रोशन का आत्मसम्मान पल भर में धूल-धूसरित हो जाता।
बिना बजट की शादी और तबाही का खौफनाक मोड़
गाँव में बेवजह उलझाए रखने और सही मार्गदर्शन न मिलने के कारण साल दर साल बीतते चले गए और आखिरकार बड़ी बहन की शादी की उम्र निकल जाने का डर सामने आ खड़ा हुआ। घर में ढेला भर पूँजी जमा नहीं हो सकी थी। अब माँ ने रिश्तेदारों और पड़ोसियों के आगे पिता के नशेड़ी होने की दुहाई देकर भीख मांगना शुरू किया।
बिना किसी ठोस बजट और बिना लड़के की सही जाँच-परख किए, केवल रिश्तेदारों के खोखले वादों के भरोसे जल्दबाज़ी में शादी तय कर दी गई। यह ठीक वैसा ही था जैसे कोई बिना पैसों के बाज़ार जाए और मजबूरी में सड़ी-गली मुफ़्त की सब्ज़ी उठाकर घर ले आए।
परिणाम इतना खौफनाक निकला कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ। बहन का पति एक नंबर का नशेड़ी, आवारा, लफुआ और हिंसक इंसान निकला। शादी के चंद हफ्तों बाद ही बहन पर लोहे की छड़ों और लातों से अत्याचार शुरू हो गया। बहन का सुहाग बसने से पहले ही उजड़ गया और वह लहूलुहान होकर वापस मायके की चौखट पर आ गिरी।
उधर, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से लिया गया कर्ज़ अब ब्याज (Interest) का ऐसा विकराल नाग बन चुका था जो पूरे परिवार को डस रहा था। जितने पैसों में दो-तीन बहनों की धूमधाम से इज़्ज़तदार विदाई हो सकती थी, उतना रुपया केवल उस कर्ज़ का ब्याज चुकाने में पानी की तरह बह गया।
खून के आँसू और एक कभी न खत्म होने वाला अंतहीन संघर्ष
आज की कड़वी हकीकत यह है कि रोशन, उसकी लाचार माँ और वह अभागी पीड़ित बहन—पूरा परिवार अपना गाँव-घर, इज़्ज़त और ज़मीन छोड़कर परदेश की तंग गलियों में मजदूरी करने पर मजबूर है।
रोशन आज भी दिन-रात अपने शरीर की आखिरी बूँद निचोड़कर उस कर्ज़ और ब्याज के दानव का पेट भर रहा है, जो किसी और की नहीं बल्कि उसकी माँ के अधूरे ज्ञान, अव्यवहारिक हठ और झूठी शान की देन था।
यह कहानी समाज के हर उस इंसान के लिए आँखें खोल देने वाली सीख है कि केवल ममता और भावनाओं के बहाव में आकर लिए गए फैसले हमेशा तबाही लाते हैं। जब तक जीवन के फैसलों में व्यावहारिकता, ईमानदारी और सही दूरदर्शिता का दीया न जले, तब तक अपनों का ही अधूरा ज्ञान पूरे परिवार को जीते जी जहन्नुम की आग में झोंक देता है।
प्रस्तुतीकरण:
सेन सारथी टीम (The Sen Saarthi Team)
कमेंट करके ज़रूर बताएं:
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि केवल भावनाएं नहीं, बल्कि सही दिशा और व्यावहारिक सोच ही परिवार को संभाल सकती है। इस विषय पर आपके क्या विचार हैं? नीचे कमेंट (Comment) करके हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
इसे भी पढ़ें:
कायाकल्प भाग 2: चिरायता और पैरों के दर्द से राहत
1983 बड़हिया सम्मेलन: देवाशीष ठाकुर की यादें और समाज का उदय
शिव चर्चा और ज्ञान का मर्म: साहब श्री हरिन्द्रानन्द जी के आध्यात्मिक सूत्र
बाबा धर्मदास का जीवन परिचय और दिव्य इतिहास

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
सेन समाज के उत्थान के लिए यह कहानियाँ प्रेरणा का स्रोत हैं। आपके कमेंट्स हमें और प्रेरित करते हैं।