1983 बड़हिया सम्मेलन: देवाशीष ठाकुर की यादें और समाज का उदय

रामलखन शर्मा जी की प्रेरणादायक जीवनी
प्रतीकात्मक चित्र

प्रस्तावना: एक मुलाकात जो प्रेरणा बन गई

इतिहास की किताबों में अक्सर बड़े युद्धों और राजाओं की कहानियाँ होती हैं, लेकिन असली इतिहास वह होता है जिसे आम आदमी अपने पसीने और जज्बात से लिखता है। यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है। देवाशीष ठाकुर जी के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उनके देखने का नजरिया ही बदल दिया। वे कहते हैं, "समाज सेवा की ललक तो मन में थी, लेकिन उस आग को मशाल बनाने का काम भाई राम लखन के स्नेह और निर्देशन ने किया।"

1980 का वह दौर था जब नाई समाज अपनी पहचान और वजूद की तलाश में था। देवाशीष जी अपने पिता तुल्य राम प्रसाद शर्मा जी के साथ लखीसराय में समाज सेवा की अलख जगा रहे थे, लेकिन उन्हें एक ऐसे 'रहनुमा' की तलाश थी जो समाज के बिखरे हुए दर्द को एक स्वर दे सके। वह रहनुमा उन्हें भाई राम लखन के रूप में मिला।

बड़हिया सम्मेलन (1983): एक कीर्तिमान की शुरुआत

तारीख थी 26 और 27 दिसंबर 1983, और स्थान था बड़हिया का जगदम्बी धर्मशाला। यह मात्र एक सम्मेलन नहीं था, बल्कि एक सोए हुए समाज का शंखनाद था। देवाशीष जी याद करते हैं कि कैसे राम लखन जी ने अपनी सांगठनिक कुशलता से थाना, जिला, राज्य और यहाँ तक कि केंद्र के नेताओं को एक मंच पर ला खड़ा किया।

बड़हिया जैसे स्थान पर इतना बड़ा खुला अधिवेशन करना उस समय किसी चमत्कार से कम नहीं था। देवाशीष जी जब एक सेवक के रूप में वहाँ पहुँचे, तो वहाँ की व्यवस्था और राम लखन जी के व्यक्तित्व ने उन्हें झकझोर दिया। वे कहते हैं, "भाई राम लखन के प्रस्ताव पत्र और उनके ओजस्वी भाषण ने देश के हर कोने को हिला दिया। वह आवेदन नहीं, बल्कि समाज और सरकार दोनों के ऊपर एक हथौड़े की चोट थी।" उस भाषण ने देवाशीष जी की आँखों पर बँधी वह पट्टी खोल दी, जो उन्हें यह सोचने पर मजबूर करती थी कि नाई समाज केवल सेवा के लिए बना है। उस दिन उन्हें अहसास हुआ कि सेवा के साथ-साथ सम्मान और अधिकार की लड़ाई भी उतनी ही ज़रूरी है।

वो 'अखिल भारतीय नाई-ब्राह्मण महासभा' का दौर

उस समय समाज का काम 'अखिल भारतीय नाई-ब्राह्मण महासभा' (रजिस्ट्रेशन नंबर 6, दिनांक 23.4.1942) के बैनर तले चल रहा था, जिसे पंडित रेवती शर्मा ने सींचा था। बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा और दिल्ली जैसे राज्यों में यह संगठन सक्रिय था। बड़हिया सम्मेलन में केंद्र के नेताओं ने बहुत सी बातें कहीं, जिन्हें देवाशीष जी 'प्रसाद' की तरह मानते हैं, लेकिन असली क्रांति तो राम लखन जी के उस क्रांतिकारी 'मांग पत्र' से आई जिसने समाज की संवेदनाओं को जगा दिया।

समाज का दर्द: दर्पण के समान कड़वी सच्चाई

देवाशीष जी उस दौर की पीड़ा को शब्दों में पिरोते हुए बताते हैं कि नाई समाज को 'नाई-ब्राह्मण' कहकर अलंकृत तो किया गया, लेकिन स्थान और सम्मान के मामले में हमेशा पीछे रखा गया। वे सवाल उठाते हैं—आजादी के दशकों बाद भी हमारी दशा बंधुआ मजदूरों से बदतर क्यों है?

आज भी गाँवों में वह तस्वीर नहीं बदली है। आए दिन समाज के लोगों पर अत्याचार, मार-पीट और जोर-जुल्म की खबरें आती हैं। विडंबना देखिए, जिस समाज की हर रस्म और रिवाज में नाई खड़ा रहता है, उसी नाई को सार्वजनिक कुओं से पानी पीने या रास्तों पर चलने के लिए प्रताड़ित किया जाता है। देवाशीष जी के शब्दों में एक टीस है— "यह कैसी भारतीय संविधान से परे व्यवस्था है कि सालों-साल काम करने के बाद भी हमें वाजिब मजदूरी नहीं मिलती? प्राकृतिक आपदा आए तो मार हम पर पड़े, और शादी-ब्याह हो तो हम जेठ की दोपहरी से लेकर माघ की ठिठुरती ठंड तक हाजिर रहें, पर बदले में हमें क्या मिलता है?"

अदृश्य कलाकार की उपेक्षा: एक मूक सवाल

एक नाई केवल बाल नहीं काटता, वह 'ईश्वरीय ढाँचे' को एक सुंदर शक्ल में बदलने वाला कलाकार है। लेकिन इस कलाकार की दुनिया कितनी बेरंग है, यह देवाशीष जी के वर्णन से पता चलता है। शहरों में नाई को उस स्थान पर बैठकर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है जहाँ कूड़ा फेंका जाता है या जहाँ खुली नालियाँ गंध मारती हैं। सरकार ने आज तक इन 'पेशेवर मजदूरों' के लिए किसी शेड या बैठने के समुचित स्थान की व्यवस्था नहीं की। बीमार पड़ने पर कोई सहारा नहीं, और काम के दौरान आकस्मिक मृत्यु हो जाए तो कोई आंसू पोंछने वाला नहीं।

केंद्र और राज्य सरकारों पर कटाक्ष करते हुए देवाशीष जी कहते हैं कि अल्पसंख्यकों की मदद के नाम पर ढोल पीटने वाली सरकारों के पास इस 'अति-अल्पसंख्यक' नाई समाज के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। जनगणना के आंकड़ों में हमारी संख्या कम हो सकती है, लेकिन हमारा श्रम और हमारा योगदान इस देश की नींव में है।

उपसंहार: एक संकल्प जो आज भी जारी है

1983 के उस बड़हिया सम्मेलन ने देवाशीष ठाकुर जी को एक ऐसा मकसद दिया जिससे वे आज तक जुदा नहीं हुए। राम लखन जी के आशीर्वाद और संरक्षण में उन्होंने सैकड़ों बेटियों के घर बसाए, समाज की अस्त-व्यस्त व्यवस्था को सुधारा और जहाँ भी समाज को उनकी आवश्यकता हुई, वे हमेशा चट्टान की तरह खड़े रहे।

वे अपनी इस सेवा भावना का पूरा श्रेय भाई रामलखन को देते हैं। देवाशीष जी का यह संस्मरण हमें याद दिलाता है कि जब तक समाज अपनी दशा और दिशा के लिए खुद आवाज़ नहीं उठाएगा, तब तक सत्ता की कुर्सियों पर बैठे लोग हमारी बात नहीं सुनेंगे। 1983 की वह चिंगारी आज भी 'Sen Saarthi' जैसे माध्यमों से समाज के युवाओं को प्रेरित कर रही है।


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अस्वीकरण: यह लेख श्री देवाशीष ठाकुर (सलाहकार व निर्देशक, लखीसराय स्वजातीय कमिटी) के लिखित संस्मरणों पर आधारित है। 'Sen Saarthi Team' ने इसे केवल साहित्यिक रूप प्रदान किया है ताकि यह समाज के युवाओं के लिए पठनीय और प्रेरक बन सके।

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