1983 बड़हिया सम्मेलन: देवाशीष ठाकुर की यादें और समाज का उदय
प्रस्तावना: एक शाश्वत मुलाकात जो जीवन की चिरंतन प्रेरणा बन गई
इतिहास की मोटी और धूल-धूसरित किताबों के पन्नों को जब हम पलटते हैं, तो अक्सर हमारी आँखें बड़े-बड़े युद्धों, गगनचुंबी महलों, और राजमुकुट पहने राजा-महाराजाओं की गाथाओं में उलझकर रह जाती हैं। किंतु, सत्य तो यह है कि मानवता का असली और प्रामाणिक इतिहास उन भव्य महलों की चहारदीवारी में नहीं, बल्कि खेतों की पगडंडियों पर, तंग गलियों में और समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े आम आदमी के पसीने की बूंदों और उसके दिल से निकले जज्बात से लिखा जाता है। यह कहानी भी किसी साम्राज्य की विजय की नहीं, बल्कि एक दबे-कुचले समाज के आत्मसम्मान और चेतना के पुनर्जागरण की है।आदरणीय देवाशीष ठाकुर जी के जीवन का सफ़र एक शांत सरिता की भाँति बह रहा था, परंतु समय के चक्र में एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ आया, जिसने न केवल उनके जीवन की दिशा बदल दी, बल्कि उनके देखने का पूरा नजरिया ही समूल परिवर्तित कर दिया। वे उस भावुक क्षण को याद करते हुए अक्सर गहरे मौन में डूब जाते हैं और बड़ी कृतज्ञता से कहते हैं,
"समाज सेवा की एक मद्धम सी ललक तो मेरे मन के किसी कोने में बचपन से ही सुलग रही थी। मैं अपने लोगों का दर्द देखता था, तो दिल रोता था। परंतु उस सुलगती हुई आग को एक धधकती हुई मशाल में बदलने का काम, और भटके हुए कदमों को एक निश्चित दिशा देने का महान कार्य परम आदरणीय भाई राम लखन जी के अगाध स्नेह, उंगली पकड़कर राह दिखाने वाले मार्गदर्शन और उनके चमत्कारी नेतृत्व ने किया।"
यह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि एक सोए हुए समाज के संकल्प का जागृत पुरुषार्थ से मिलन था।
अंधेरे में उजाले की तलाश: लखीसराय से शुरू हुई अलख
वर्ष 1980 का वह दौर भारतीय सामाजिक और राजनीतिक पटल पर भारी उथल-पुथल का समय था। उस संक्रमण काल में नाई समाज अपनी बुनियादी पहचान, अपने वजूद और समाज में सम्मानजनक स्थान की तीव्र तलाश में छटपटा रहा था। देवाशीष जी अपने पिता तुल्य मार्गदर्शक आदरणीय राम प्रसाद शर्मा जी के साथ मिलकर लखीसराय की धरती पर समाज सेवा की अलख जगाने का महती प्रयास कर रहे थे। वे गाँव-गाँव जाते, लोगों को एकजुट करते और उनकी समस्याओं को सुनते थे। परंतु, हर प्रयास के बाद उन्हें भीतर ही भीतर एक गहरी शून्यता का अहसास होता था। उन्हें लग रहा था कि समाज का दर्द बिखरा हुआ है, आँसू अलग-अलग बह रहे हैं, और चीखें हवा में विलीन हो रही हैं।उन्हें एक ऐसे 'रहनुमा' की, एक ऐसे मसीहा की शिद्दत से तलाश थी जो इस बिखरे हुए सामूहिक दर्द को एक सुरीला और आक्रामक स्वर दे सके, जो समाज की रगों में बहने वाले ठंडे खून को स्वाभिमान के उबाल में बदल दे। वह मसीहा, वह मार्गदर्शक उन्हें भाई राम लखन के रूप में मिला। भाई राम लखन के व्यक्तित्व में एक अजब सा आकर्षण था—उनकी आँखों में समाज को बदलने का सपना था और उनकी आवाज़ में वो खनक थी जो सीधे दिल की गहराइयों में उतर जाती थी। उनके आगमन ने जैसे अंधेरी रात में एक चमकते हुए सूरज का अहसास करा दिया।
बड़हिया सम्मेलन (1983): एक ऐतिहासिक कीर्तिमान और चेतना का महाकुंभ
समय के कैलेंडर में कुछ तारीखें सामान्य होकर भी इतिहास के सीने पर हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो जाती हैं। ऐसी ही दो ऐतिहासिक तारीखें थीं—26 और 27 दिसंबर 1983। कड़ाके की ठंड थी, पौष का महीना था, और स्थान था बड़हिया का सुप्रसिद्ध जगदम्बी धर्मशाला। हवाओं में ठिठुरन थी, लेकिन वहाँ जुटने वाले लोगों के दिलों में एक अजीब सी तपन और बेचैनी थी। यह आयोजन मात्र कोई औपचारिक सामाजिक सम्मेलन या नेताओं के भाषणबाज़ी का अड्डा नहीं था, बल्कि सदियों से गहरी नींद में सोए हुए, अपने अधिकारों से वंचित एक विशाल समाज का सामूहिक शंखनाद था, एक सिंहनाद था।देवाशीष जी भावुक होकर याद करते हैं कि कैसे भाई राम लखन जी ने अपनी अद्वितीय सांगठनिक कुशलता, अद्भुत वाकपटुता और अथक परिश्रम से उस दौर में, जब संचार के साधन न के बराबर थे, थाना स्तर से लेकर जिला, राज्य और यहाँ तक कि देश की राजधानी दिल्ली के बड़े-बड़े शीर्ष नेताओं को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया। बड़हिया जैसे अपेक्षाकृत छोटे और ग्रामीण परिवेश वाले स्थान पर इतना बड़ा, भव्य और खुला अधिवेशन आयोजित करना उस ज़माने में किसी अकल्पनीय चमत्कार से कम नहीं था।
जब देवाशीष जी एक साधारण, निस्वार्थ स्वयंसेवक के रूप में वहाँ पहुँचे, तो वहाँ का नज़ारा देखकर वे स्तब्ध रह गए। चारों तरफ अनुशासित जनसैलाब, व्यवस्था की शुचिता और सबसे बढ़कर भाई राम लखन जी का ओजस्वी और चुंबकीय व्यक्तित्व। उनके चलने, बोलने और लोगों से मिलने के अंदाज़ ने देवाशीष जी के अंतर्मन को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। देवाशीष जी के शब्दों में, "भाई राम लखन जी द्वारा तैयार किया गया प्रस्ताव पत्र और मंच से दिया गया उनका वह ऐतिहासिक, ओजस्वी भाषण... उसने देश के हर कोने को, हर राज्य की राजधानी को हिलाकर रख दिया। वह कोई साधारण आवेदन या याचना पत्र नहीं था, बल्कि वह सदियों से सोए हुए समाज और बहरी हो चुकी सरकार, दोनों के ऊपर एक शक्तिशाली हथौड़े की तीखी चोट थी।"
उस भाषण के एक-एक शब्द ने देवाशीष जी की आँखों पर बंधी वह पारंपरिक पट्टी हमेशा के लिए खोल दी, जो उन्हें बचपन से यह मानने पर मजबूर करती थी कि नाई समाज का जन्म तो केवल दूसरों की सेवा करने, उनके सुख-दुख में खटने के लिए ही हुआ है। उस ऐतिहासिक दिन बड़हिया की धरती पर उन्हें यह गहरा अहसास हुआ कि समाज की निस्वार्थ सेवा करना यदि हमारा धर्म है, तो अपने सम्मान, स्वाभिमान और विधिक अधिकारों के लिए लड़ना हमारा परम कर्तव्य और अधिकार है।
'अखिल भारतीय नाई-ब्राह्मण महासभा' का स्वर्णिम काल
उस दौर में सामाजिक चेतना का यह रथ 'अखिल भारतीय नाई-ब्राह्मण महासभा' (जिसका ऐतिहासिक रजिस्ट्रेशन नंबर 6, दिनांक 23 अप्रैल 1942 था) के गौरवशाली बैनर तले आगे बढ़ रहा था। यह वही पूजनीय संगठन था जिसे परम आदरणीय पंडित रेवती शर्मा जी ने अपने खून-पसीने से सींचा था और एक नन्हे पौधे से विशाल वटवृक्ष बनाया था। बिहार की क्रांतिकारी धरती से लेकर उत्तर प्रदेश के मैदानों, बंगाल की बौद्धिक भूमि, उड़ीसा के जंगलों और देश के दिल दिल्ली तक इस संगठन की जड़ें गहरी फैल चुकी थीं और यह निरंतर सक्रिय था।बड़हिया सम्मेलन के उस पावन मंच से देश के कोने-कोने से आए बड़े-बड़े केंद्रीय राजनेताओं ने बड़ी-बड़ी बातें कहीं, सांत्वना के शब्द कहे, जिन्हें देवाशीष जी आज भी एक पवित्र 'प्रसाद' की तरह श्रद्धा से याद करते हैं। परंतु वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि असली वैचारिक क्रांति, असली सामाजिक भूचाल तो नेताओं के उन खोखले आश्वासनों से नहीं, बल्कि भाई राम लखन जी के उस क्रांतिकारी, धारदार 'मांग पत्र' से आया था, जिसने समाज के अंतिम व्यक्ति की सोई हुई संवेदनाओं और सोए हुए आक्रोश को जगाकर खड़ा कर दिया था। उस मांग पत्र ने प्रत्येक व्यक्ति को सोचने पर विवश कर दिया कि अब और चुप रहना आत्मघाती होगा।
समाज का मर्मांतक दर्द: सामाजिक दर्पण की कड़वी और नग्न सच्चाई
देवाशीष जी जब उस दौर की सामाजिक पीड़ा को याद करते हैं, तो उनकी आँखों के कोने भीग जाते हैं। वे उस दर्द को शब्दों में पिरोते हुए समाज के सामने एक कड़वा आईना रखते हैं। वे बताते हैं कि हमारे समाज को 'नाई-ब्राह्मण' या 'ठाकुर' कहकर कागजों पर, शास्त्रों में और लोक-व्यवहार में अलंकृत तो बहुत किया गया, लेकिन जब बात वास्तविक अधिकार की आई, सत्ता में हिस्सेदारी की आई, और सामाजिक सम्मान की आई, तो हमें हमेशा सबसे पीछे धकेल दिया गया। वे आज भी एक यक्ष प्रश्न उठाते हैं—"देश की आज़ादी के इतने दशकों के बाद भी, तमाम लोकतांत्रिक दावों के बाद भी, हमारे समाज के एक बड़े हिस्से की दशा बंधुआ मजदूरों से भी बदतर क्यों बनी हुई है?"यह कितनी बड़ी विडंबना है कि आज भी ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में वह दमनकारी और सामंती तस्वीर पूरी तरह बदली नहीं है। आए दिन अखबारों की सुर्खियों में या समाज के भीतर से हमारे सीधे-साधे लोगों पर अत्याचार, मार-पीट, बेगारी और जोर-जुल्म की दर्दनाक खबरें आती रहती हैं। जो समाज मानव जीवन के जन्म से लेकर विवाह, मुंडन और मृत्यु तक की हर छोटी-बड़ी रस्म और रिवाज में सबसे आगे खड़ा रहता है, जिसके बिना किसी का भी कोई भी मांगलिक या धार्मिक कार्य संपन्न नहीं हो सकता, उसी समाज के व्यक्ति को सार्वजनिक कुओं से पानी पीने के लिए तरसना पड़ता है, या सामंती रास्तों पर सिर उठाकर चलने पर प्रताड़ित किया जाता है।
देवाशीष जी के शब्दों में एक गहरी टीस है, एक सुलगता हुआ सवाल है: "यह कैसी अमानवीय और भारतीय संविधान के सिद्धांतों से परे की समानांतर व्यवस्था है कि सालों-साल, पीढ़ियों-पीढ़ियों तक अपनी सेवाएं देने के बाद भी हमें हमारी वाजिब मजदूरी तक नसीब नहीं होती? जब कोई प्राकृतिक आपदा आए, अकाल पड़े, तो सबसे पहली और सबसे क्रूर मार हमारे पेट पर पड़ती है। और जब किसी के घर में शादी-ब्याह का उत्सव हो, तो हम जेठ की झुलसा देने वाली दोपहरी से लेकर माघ की हड्डियों को कँपा देने वाली ठिठुरती ठंड तक उनके दरवाज़े पर हाज़िर रहते हैं, रात-रात भर जागते हैं। पर बदले में हमें क्या मिलता है? चंद सिक्के, बचे-खुचे अन्न के दाने या फिर उपेक्षा की एक ठंडी निगाह? यह अन्याय अब और स्वीकार्य नहीं हो सकता।"
अदृश्य कलाकार की मूक उपेक्षा: एक यक्ष प्रश्न
एक नाई को समाज केवल एक साधारण मजदूर समझने की भूल करता है, परंतु देवाशीष जी के नजरिए से देखें तो वह केवल बाल या दाढ़ी काटने वाला व्यक्ति नहीं है। वह तो ईश्वर द्वारा बनाए गए इस इंसानी ढांचे को अपनी उंगलियों के जादू से, अपनी कला से एक सुंदर, सुरुचिपूर्ण और आकर्षक शक्ल में बदलने वाला एक अद्भुत, जीवंत कलाकार है। वह सौंदर्य का शिल्पी है। लेकिन अफ़सोस, इस अद्वितीय कलाकार की अपनी खुद की जिंदगी कितनी बेरंग, कितनी अंधियारी और कितनी बदरंग है, इसका जीवंत और कारुणिक वर्णन देवाशीष जी के संस्मरणों में झलकता है।आज भी आधुनिक शहरों और कस्बों में इस समाज के हुनरमंदों को दुकानों के अभाव में सड़क के किनारे, उस स्थान पर बैठकर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है जहाँ शहर का कूड़ा फेंका जाता है, जहाँ खुली नालियां बदबू मारती हैं और बीमारियां पनपती हैं। सरकारों ने आज तक इन 'पारंपरिक पेशेवर हुनरमंदों' के लिए किसी पक्के शेड, किसी सम्मानजनक कियोस्क या बैठने के समुचित स्थान की व्यवस्था करने की ज़हमत नहीं उठाई। यदि यह कलाकार बीमार पड़ जाए, तो इसके परिवार के पास इलाज का कोई सहारा नहीं होता। और यदि काम के दौरान सड़क पर किसी दुर्घटना में इसकी आकस्मिक मृत्यु हो जाए, तो पीछे रोने वाले भूखे बच्चों के आंसू पोंछने वाला और उन्हें दो वक्त की रोटी देने वाला कोई नहीं होता।
केंद्र और राज्य सरकारों की उदासीन नीतियों पर गहरा और तीखा कटाक्ष करते हुए देवाशीष जी कहते हैं कि समाज के विभिन्न वर्गों और अल्पसंख्यकों की मदद के नाम पर करोड़ों-अरबों के ढोल पीटने वाली और वोट बैंक की राजनीति करने वाली सरकारों के पास इस 'अति-अल्पसंख्यक', अत्यंत पिछड़े और मूक नाई समाज के आर्थिक उत्थान के लिए कोई ठोस, दूरगामी और प्रभावी योजना आज तक नहीं है। जनगणना के कागजी आंकड़ों में शायद हमारी संख्या बल को कम करके आंका जाता हो, लेकिन हमारा पसीना, हमारा अटूट श्रम और हमारा सामाजिक योगदान इस महान देश के निर्माण की नींव में एक-एक ईंट बनकर समाया हुआ है। हमारी उपेक्षा करके कोई भी राष्ट्र उन्नति का दावा नहीं कर सकता।
एक पवित्र संकल्प जो आज भी धड़क रहा है
वर्ष 1983 के उस ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बड़हिया सम्मेलन ने देवाशीष ठाकुर जी के युवा और संवेदनशील मन को एक ऐसा जीवन-मकसद, एक ऐसा पवित्र संकल्प सौंप दिया, जिससे वे आज आधी सदी बीत जाने के बाद भी एक पल के लिए भी जुदा नहीं हुए। भाई राम लखन जी के पावन आशीर्वाद, उनके पिता तुल्य संरक्षण और उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए देवाशीष जी ने अपने जीवन को समाज के कल्याण के लिए होम कर दिया। उन्होंने समाज की सैकड़ों गरीब, बेसहारा बेटियों की शादियां करवाकर उनके घर बसाए, समाज के आपसी विवादों को सुलझाकर बिखरी हुई सामाजिक व्यवस्था को सुधारा, और जब कभी भी, जहाँ कहीं भी समाज के किसी भी गरीब भाई पर कोई विपत्ति आई या अन्याय हुआ, देवाशीष जी वहाँ एक मजबूत, अडिग चट्टान की तरह न्याय की ढाल बनकर खड़े रहे।वे आज अपने जीवन के इस पड़ाव पर भी अपनी इस अटूट सेवा भावना, अपनी इस ऊर्जा और अपने इस सेवा संकल्प का पूरा का पूरा श्रेय केवल और केवल अपने पूजनीय भाई राम लखन जी के चरणों में अर्पित करते हैं। देवाशीष जी का यह अत्यंत भावुक और जीवंत संस्मरण हमें, विशेषकर हमारी आने वाली युवा पीढ़ी को यह याद दिलाता है कि जब तक कोई समाज अपनी दयनीय दशा को बदलने के लिए और अपनी सही दिशा तय करने के लिए खुद एकजुट होकर अपनी बुलंद आवाज़ नहीं उठाएगा, तब तक सत्ता के आलीशान गलियारों और कुर्सियों पर बैठे बहरे लोग हमारी सिसकियों को नहीं सुनेंगे। 1983 में बड़हिया की पावन धरती से उठी वह क्रांतिकारी चिंगारी बुझी नहीं है, बल्कि वह आज भी 'Sen Saarthi' (सेन सारथी) जैसे आधुनिक, वैचारिक और सशक्त माध्यमों से समाज के लाखों-करोड़ों युवाओं के दिलों में मशाल बनकर जल रही है और उन्हें आत्मसम्मान से जीने के लिए निरंतर प्रेरित कर रही है।
श्रद्धावनत संस्मरणकर्ता:
देवाशीष ठाकुर
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राम लखन शर्मा: एक साधु व्यक्तित्व और नेतृत्व की विरासत (भाग 1)
राम लखन शर्मा: सूर्यगढ़ा का स्वर्णिम काल और त्याग की पराकाष्ठा (भाग 2)
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अस्वीकरण:
यह लेख पूरी तरह से संस्मरणकर्ता के व्यक्तिगत अनुभवों और स्मृतियों पर आधारित है। इसमें वर्णित ऐतिहासिक तिथियां और संदर्भ सामाजिक जागरूकता एवं संस्मरण संरक्षण के उद्देश्य से दिए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी भी जाति, समुदाय या भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है, और न ही इसे किसी कानूनी दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

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