राम लखन शर्मा: एक साधु व्यक्तित्व और नेतृत्व की विरासत (भाग 1)

अजय ठाकुर अपने डेस्क पर बैठकर लिखते हुए मुस्कुराते हैं, उनके सामने एक संत की तस्वीर और हिंदी में पाठ है, जो 'राम लखन शर्मा: एक साधु व्यक्तित्व और नेतृत्व की विरासत' के संस्मरण पर केंद्रित है।


प्रस्तावना: समाज के अंधकार में जलती एक मशाल

​मानव समाज का इतिहास इस बात का गवाह है कि निस्वार्थ सेवा का मार्ग कभी भी मखमली नहीं होता। यह काँटों से भरा, ऊबड़-खाबड़ और इम्तिहानों की धूप से तपा हुआ एक ऐसा रास्ता है, जहाँ कदम-कदम पर व्यक्ति खुद को अकेला पाता है। अक्सर इस सफर में अच्छे-अच्छे लोग भी दिशाभ्रमित होकर अपनी राह बदल लेते हैं। लेकिन जब समाज घने अंधकार से घिर जाता है और आगे बढ़ने की राहें धुंधली पड़ने लगती हैं, तब कुदरत किसी न किसी को एक रहनुमा बनाकर धरती पर भेजती है। समाज को तब एक ऐसी जीवंत मशाल की जरूरत होती है, जो न केवल दूसरों को रास्ता दिखाए, बल्कि खुद के सुखों, आराम और निजी इच्छाओं को जलाकर दूसरों के जीवन में उम्मीद का उजाला फैला सके।

​बिहार के लखीसराय जिले के अंतर्गत आने वाले सूर्यगढ़ा प्रखण्ड के नाई समाज के लिए श्री राम लखन शर्मा जी का व्यक्तित्व बिल्कुल इसी जलती हुई मशाल की तरह है। वे कोई साधारण नेतृत्वकर्ता नहीं हैं, बल्कि एक संस्था हैं, एक विचार हैं। सूर्यगढ़ा प्रखण्ड के नाई समाज के अध्यक्ष अजय ठाकुर (ग्राम जगदीशपुर) जब भावुक होकर अपने संस्मरणों के पन्ने पलटते हैं, तो उनकी आँखों में राम लखन जी के प्रति अगाध श्रद्धा साफ दिखाई देती है। अजय ठाकुर जी के शब्दों में, "राम लखन जी हमारे लिए केवल एक राजनैतिक या सामाजिक नेता नहीं हैं। वे एक 'योग्य गुरु' और एक 'सच्चे रहनुमा' हैं, जिनके सानिध्य की छाँव में आकर हमारे पूरे समाज ने सदियों के पिछड़ेपन के बाद एक नया सवेरा, एक नया 'बिहान' देखा है।"

​एक साधु आवरण: लोभ, मोह और कपट से परे का तपस्वी व्यक्तित्व

​जब हम 'साधु' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मानस पटल पर गेरुए वस्त्र, जटाएँ और हाथ में कमंडल लिए किसी संन्यासी की तस्वीर उभरती है। लेकिन अजय ठाकुर जी अपने संस्मरणों में जब राम लखन शर्मा जी की तुलना एक साधु से करते हैं, तो उसका अर्थ वस्त्रों से नहीं, बल्कि उनके अंतर्मन के आचरण से होता है। साधु वेश से नहीं, अपनी वृत्तियों से होता है। राम लखन जी एक ऐसे गृहस्थ साधु हैं, जिनका जीवन छल-कपट, माया-मोह, और लोभ-लालच की आधुनिक बीमारियों से कोसों दूर, गंगा के जल जैसा पवित्र है।

​राम लखन जी के व्यक्तित्व की सबसे जादुई और सम्मोहक विशेषता उनकी ओजस्वी एवं जोश से भरी वाणी है। अजय ठाकुर जी अपनी पुरानी यादों के गलियारे में उतरते हुए बताते हैं कि जब उनकी पहली मुलाकात राम लखन जी से हुई थी, तो वे उनके चेहरे के तेज और विचारों की स्पष्टता को देखकर दंग रह गए थे। उनकी विचारधारा में सुबह के बाल-सूर्य की किरणों जैसी पवित्र चमक और पारदर्शिता थी। वे जब बोलते थे, तो उनके शब्द सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाते थे। राम लखन जी के भीतर अपने गरीब और सीधे-साधे समाज को लूटने वाले शोषकों के खिलाफ एक गहरी टीस, एक असहनीय दर्द और एक आक्रोश था। समाज के इसी दर्द को उन्होंने अपनी कविता की इन अमर पंक्तियों में पिरोया, जो आज भी युवाओं की रगों में लहू बनकर दौड़ती हैं:

"वो लूट रहे हैं गाँवों को, कैसे खामोश हो जाऊँ।

वो लूट रहे हैं सपनों को, मैं चैन से कैसे सो जाऊँ।।"

​यही वह आंतरिक ओज, यही वह नैतिक साहस था जिसने अजय ठाकुर जैसे सैकड़ों स्वाभिमानी युवाओं को बिना किसी संशय, बिना किसी लालच के उनके पीछे चलने और समाज सुधार के आंदोलन में कूदने के लिए प्रेरित किया।

​विरासत में मिला जुझारूपन: स्व. लालजी ठाकुर की अमिट और गौरवशाली छाप

​किसी भी मजबूत दरख्त की मजबूती उसकी जड़ों में छिपी होती है। राम लखन शर्मा जी के भीतर जो साहस, निर्भीकता और सिद्धांतों के लिए अड़ जाने का जज्बा आज दिखाई देता है, उसकी जड़ें उनके पारिवारिक संस्कारों में गहरी धँसी हुई हैं। उनका जन्म 19 जुलाई 1952 को मुंगेर जिले के अंतर्गत आने वाले किशनपुर (बड़हिया) गाँव के एक बेहद सम्मानित और संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता स्व. लालजी शर्मा जी अपने समय के एक महान महारथी, समाज सेवक और नाई समाज के एक कद्दावर स्तंभ थे।
​स्व. लालजी शर्मा जी की धाक और प्रतिष्ठा का आलम यह था कि वे नाई समाज के 'स्वजातीय सरदार' यानी '84 के मालिक' के रूप में जाने जाते थे। पूरे क्षेत्र में समाज का कोई भी विवाद हो, उनका फैसला पत्थर की लकीर माना जाता था। उनकी निष्पक्षता और न्यायप्रियता ऐसी थी कि बड़े से बड़े रसूखदार की भी हिम्मत उनके सामने किसी गलत बात पर सिर उठाने की नहीं होती थी। बचपन से ही अपने पिता के इस न्यायप्रिय और दबंग रूप को देखकर बड़े हुए राम लखन जी ने नेतृत्व के गुण अपनी माँ की लोरी और पिता के साए में सीखे। उन्होंने अपने पिता से ही वह जुझारूपन विरासत में पाया, जिसने आगे चलकर 'होनहार विरवान के होत चिकने पात' की पुरानी कहावत को पूरी तरह चरितार्थ किया। उन्होंने साबित कर दिया कि एक शेर का बेटा कभी विपरीत परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेकता।

​संघर्ष की भयंकर नींव: जब गंगा की लहरों ने छीना सब कुछ और मिला 'तारा' का सहारा

​राम लखन जी का जीवन केवल सुख, संपन्नता और तालियों की गड़गड़ाहट की कहानी नहीं है। नियति ने उनकी परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उनके जीवन का सबसे काला और दर्दनाक दौर तब आया, जब मां गंगा ने रौद्र रूप धारण किया। विनाशकारी बाढ़ की लहरों ने एक ही झटके में उनके परिवार की पूरी पैतृक संपत्ति, जमीन-जायदाद और खुशियों को अपने भीतर विलीन कर लिया। जो परिवार कल तक दूसरों की मदद करता था, वह पल भर में प्रकृति के इस क्रूर मजाक के कारण अत्यंत दयनीय और संकटपूर्ण स्थिति में आ गया। हर तरफ अंधेरा था और सहारा देने वाला कोई नहीं दिख रहा था।

​लेकिन कहते हैं कि जब भगवान सब कुछ छीन लेता है, तो वह इंसानी रूप में फरिश्ते भी भेजता है। संकट के उस भयंकर तूफान में, जब राम लखन जी के जीवन की नैया डूबने की कगार पर थी, तब बड़हिया निवासी श्री बिरजू ठाकुर और उनकी सहधर्मिणी श्रीमती तारा देवी उनके जीवन में एक 'विश्वसनीय पतवार' बनकर आए। इन दोनों सहृदय इंसानों ने न केवल राम लखन जी को सहारा दिया, बल्कि उनके भीतर छिपी प्रतिभा और सामाजिक सरोकार को मरने नहीं दिया। इस निस्वार्थ सहयोग, अपनत्व और खुद राम लखन जी के अटूट, कभी न टूटने वाले आत्मबल ने उन्हें उस गहरे दलदल से बाहर निकाला। संकट की इस आग में तपकर राम लखन जी कुंदन बन गए और उन्होंने सामाजिक पहचान की एक ऐसी नई ऊँचाई को छुआ, जहाँ तक पहुँचना हर किसी के बस की बात नहीं होती।

​विद्यार्थी जीवन से ही नेतृत्व का शंखनाद (1971-1983)

​नेतृत्व की भावना कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जा सके या उम्र के किसी पड़ाव पर अचानक ओढ़ लिया जाए। यह तो आत्मा का एक सहज गुण है, जो राम लखन जी के भीतर छात्र जीवन से ही कूट-कूट कर भरा था। बात साल 1971 की है, जब वे आई.ए. (12वीं कला संकाय) के एक युवा छात्र थे। जहाँ उस उम्र के बाकी युवा अपने करियर और निजी सुखों के ताने-बाने बुन रहे होते थे, वहीं राम लखन जी के दिल में अपने समाज की बदहाली को सुधारने का ख्वाब पल रहा था। उनकी इसी सक्रियता को देखते हुए उन्हें 'बड़हिया प्रखण्ड नाई सभा' का सचिव चुन लिया गया।

​यह उनके सफर की शुरुआत थी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 1971 से लेकर 1983 तक, पूरे बारह वर्षों तक उन्होंने समाज के एक अन्य कर्मठ साथी श्री वासुदेव जी के साथ मिलकर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। इन दोनों की जोड़ी ने गाँवों का दौरा किया, दबे-कुचले लोगों की आवाज बुलंद की और समाज को संगठित करने के लिए दिन-रात एक कर दिए। इस दौरान उन्हें कई तरह की धमकियों, सामाजिक विरोधों और आर्थिक तंगियों का सामना करना पड़ा, लेकिन समाज सेवा का जो व्रत उन्होंने लिया था, उससे वे एक इंच भी पीछे नहीं डिगे।

​इस लंबे और कठिन संघर्ष की परिणति दिसंबर 1983 के ऐतिहासिक सम्मेलन में देखने को मिली। 26-27 दिसंबर 1983 को आयोजित इस दो दिवसीय महासम्मेलन में उम्मीद से कहीं ज्यादा, सिरों का एक समंदर (विशाल जनमेदिनी) उमड़ पड़ा था। लोगों का वह हुजूम, वह जनसैलाब कोई भाड़े की भीड़ नहीं थी, बल्कि वह राम लखन जी के प्रति समाज का अटूट विश्वास था। उस सम्मेलन ने इस बात पर हमेशा-हमेशा के लिए मुहर लगा दी कि राम लखन शर्मा जी केवल किसी पद या कुर्सी के भूखे नेता नहीं हैं, बल्कि वे नाई समाज के करोड़ों दिलों पर राज करने वाले एक सच्चे, प्रामाणिक और निस्वार्थ सेवक हैं।

​कुशल नाविक की होशियारी से ही पार होती है नैया

​समय का समंदर हमेशा अशांत रहता है और समाज रूपी नाव को सुरक्षित किनारे तक ले जाने के लिए किसी आम इंसान की नहीं, बल्कि एक बेहद होशियार और तजुर्बेकार नाविक की जरूरत होती है। संस्मरणकर्ता अजय ठाकुर जी का यह दृढ़ विश्वास है कि यदि नाव का पतवार संभालने वाला नाविक (लीडर) समझदार, साहसी और ईमानदार हो, तो नाव चाहे कितने भी भयानक भंवर में फंसी हो, वह अपनी सही दिशा पकड़कर निश्चित रूप से अपनी मंजिल तक पहुँच ही जाती है।

​राम लखन शर्मा जी के रूप में आज सूर्यगढ़ा और पूरे क्षेत्र के नाई समाज को एक ऐसा ही दूरदर्शी, निष्पक्ष और होशियार नाविक मिला है। उनके जीवन का हर एक पन्ना संघर्ष, त्याग और मानवीय संवेदनाओं की खुशबू से महकता है। वे कल भी समाज के ढाल थे, आज भी मार्गदर्शक हैं, और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवित आदर्श बने रहेंगे।

​संस्मरणकर्ता:

अजय ठाकुर (प्रखण्ड अध्यक्ष, नाई समाज, सूर्यगढ़ा, ग्राम: जगदीशपुर)


अगले भाग (भाग 2) में हम जानेंगे: 

कैसे राम लखन जी ने सूर्यगढ़ा की 'डूबती नैया' को संभाला और क्यों उन्होंने अपने सगे भाई की घटना के बजाय समाज की लाज को प्राथमिकता दी।

भाग 2 यहां पढ़ें।


समाजसेवी देवाशीष ठाकुर जी की अनुभवी कहानी "पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।"



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इस लेख में प्रस्तुत विचार और संस्मरण श्री अजय ठाकुर (प्रखण्ड अध्यक्ष, सूर्यगढ़ा नाई सभा) के व्यक्तिगत अनुभवों और उनके द्वारा प्रदान किए गए साक्ष्यों पर आधारित हैं। 'Sen Saarthi' का उद्देश्य इन प्रेरणादायक संस्मरणों को केवल ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेजीकरण के रूप में प्रस्तुत करना है। इसमें वर्णित घटनाएं और भावनाएं लेखक की अपनी श्रद्धा का प्रतीक हैं। यह लेख किसी भी राजनीतिक विवाद या कानूनी दावे को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है।



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