राम लखन शर्मा: एक साधु व्यक्तित्व और नेतृत्व की विरासत (भाग 1)
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| प्रतीकात्मक चित्र |
प्रस्तावना: जब राहें धुंधली हों, तब मिलता है एक रहनुमा
समाज सेवा का मार्ग काँटों भरा होता है, और अक्सर इस सफर में व्यक्ति दिशाभ्रमित हो जाता है। ऐसे ही समय में समाज को एक ऐसी मशाल की जरूरत होती है जो न केवल रास्ता दिखाए, बल्कि खुद जलकर दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाए। सूर्यगढ़ा प्रखण्ड (लखीसराय) के नाई समाज के लिए श्री राम लखन शर्मा जी का व्यक्तित्व बिल्कुल वैसा ही है।
प्रखण्ड अध्यक्ष अजय ठाकुर (ग्राम जगदीशपुर) के शब्दों में, राम लखन जी केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक 'योग्य गुरु' और 'सच्चे रहनुमा' हैं, जिनके सानिध्य में समाज ने एक नया सवेरा (बिहान) देखा है।
एक साधु आवरण: लोभ-मोह से परे का व्यक्तित्व
अजय ठाकुर जी अपने संस्मरणों में राम लखन शर्मा जी की तुलना एक 'साधु' से करते हैं। यहाँ 'साधु' का अर्थ गेरुए वस्त्रों से नहीं, बल्कि उस आचरण से है जो छल-कपट, माया-मोह और लोभ-लालच से कोसों दूर हो।
राम लखन जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी जोशपूर्ण वाणी है। अजय ठाकुर जी बताते हैं कि उनकी पहली मुलाकात में ही उन्हें राम लखन जी की विचारधारा में सूर्य की किरणों जैसी चमक और स्पष्टता दिखाई दी। उनके भीतर समाज को लूटने वालों के खिलाफ एक गहरी टीस थी, जिसे उन्होंने इन पंक्तियों में पिरोया:
> "वो लूट रहे हैं गाँवों को, कैसे खामोश हो जाऊँ। वो लूट रहे हैं सपनों को, मैं चैन से कैसे सो जाऊँ।।"
>
यही वह ओज था जिसने अजय ठाकुर जैसे कई युवाओं को बिना किसी संशय के उनके पीछे चलने को प्रेरित किया।
विरासत में मिला जुझारूपन: लालजी शर्मा की अमिट छाप
राम लखन शर्मा जी का जन्म 19 जुलाई 1952 को मुंगेर जिले के किशनपुर (बड़हिया) गाँव के एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके व्यक्तित्व में जो साहस और निर्भीकता आज दिखती है, उसकी जड़ें उनके पिता स्व. लालजी शर्मा जी के संस्कारों में छिपी हैं।
स्व. लालजी शर्मा अपने समय के एक महान महारथी और समाज सेवक थे। वे नाई समाज के स्वजातीय सरदार (84 के मालिक) के रूप में आजीवन समाज की सेवा करते रहे। उनकी प्रतिष्ठा ऐसी थी कि किसी की हिम्मत उनके सामने गलत बात पर सिर उठाने की नहीं होती थी। राम लखन जी ने अपने पिता से ही वह 'जुझारूपन' और 'नेतृत्व क्षमता' विरासत में पाई, जिसे बाद में उन्होंने 'होनहार विरवान के होत चिकने पात' की कहावत को चरितार्थ करते हुए साबित किया।
संघर्ष की नींव: गंगा में विलीन हुई संपत्ति और डूबती नैया का सहारा
राम लखन जी का जीवन केवल सुखों की कहानी नहीं है। एक समय ऐसा आया जब गंगा की विनाशकारी लहरों ने उनके परिवार की पैतृक संपत्ति को अपने गर्भ में विलीन कर लिया। पारिवारिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।
संकट के उस दौर में बड़हिया निवासी बिरजू ठाकुर और उनकी धर्मपत्नी तारा देवी ने एक 'विश्वसनीय पतवार' बनकर उनकी जीवन की नैया को संभाला। इसी सहयोग और राम लखन जी के खुद के अटूट साहस ने उन्हें सामाजिक पहचान की नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
विद्यार्थी जीवन से ही नेतृत्व का आगाज़ (1971-1983)
राम लखन जी के भीतर नेतृत्व की भावना विद्यार्थी जीवन से ही कूट-कूट कर भरी थी।
1971: जब वे I.A. के छात्र थे, तभी उन्हें बड़हिया प्रखण्ड नाई सभा का सचिव चुना गया।
1983 तक: उन्होंने वासुदेव जी के साथ मिलकर लगातार समाज की सेवा की।
दिसंबर 1983 का सम्मेलन: 26-27 दिसंबर 1983 को आयोजित सम्मेलन में जुटी विशाल जनमेदिनी ने यह मुहर लगा दी कि राम लखन शर्मा जी केवल एक पद के भूखे नहीं, बल्कि समाज के दिलों पर राज करने वाले सच्चे सेवक हैं।
उपसंहार: नाविक की होशियारी से तय होती है मंजिल
अजय ठाकुर जी का मानना है कि यदि नाविक (लीडर) होशियार हो, तो नाव अपनी सही दिशा में चलकर निश्चित स्थान पर पहुँचती ही है। राम लखन जी के रूप में नाई समाज को एक ऐसा ही होशियार नाविक मिला है।
अगले भाग (भाग 2) में हम जानेंगे:
कैसे राम लखन जी ने सूर्यगढ़ा की 'डूबती नैया' को संभाला और क्यों उन्होंने अपने सगे भाई की घटना के बजाय समाज की लाज को प्राथमिकता दी।
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अस्वीकरण:
इस लेख में प्रस्तुत विचार और संस्मरण श्री अजय ठाकुर (प्रखण्ड अध्यक्ष, सूर्यगढ़ा नाई सभा) के व्यक्तिगत अनुभवों और उनके द्वारा प्रदान किए गए साक्ष्यों पर आधारित हैं। 'Sen Saarthi' का उद्देश्य इन प्रेरणादायक संस्मरणों को केवल ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेजीकरण के रूप में प्रस्तुत करना है। इसमें वर्णित घटनाएं और भावनाएं लेखक की अपनी श्रद्धा का प्रतीक हैं। यह लेख किसी भी राजनीतिक विवाद या कानूनी दावे को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है।

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