राम लखन शर्मा: सूर्यगढ़ा का स्वर्णिम काल और त्याग की पराकाष्ठा (भाग 2)
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| सांकेतिक संपादन |
प्रस्तावना: नेतृत्व की असली कसौटी – जब समाज बना परिवार से बड़ा
भाग 1 में हमने देखा कि कैसे राम लखन शर्मा जी ने विरासत में मिले जुझारूपन और विद्यार्थी जीवन के संघर्षों से अपने नेतृत्व की नींव रखी। लेकिन एक सच्चे नेता की पहचान केवल उसके उदय से नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए 'त्याग' और 'निर्णयों' से होती है।
सूर्यगढ़ा प्रखण्ड अध्यक्ष अजय ठाकुर के शब्दों में, "राम लखन जी का जीवन उस ध्रुव तारे की तरह है, जो तूफानों में फंसी नाव को सही दिशा दिखाता है।" भाग 2 में हम उनके जीवन के उस स्वर्णिम काल की चर्चा करेंगे जब उन्होंने सूर्यगढ़ा नाई समाज की किस्मत बदली और एक ऐसा कड़ा निर्णय लिया जिसने उन्हें 'नेताओं की भीड़' से अलग कर एक 'मनीषी' और 'साधु' की श्रेणी में खड़ा कर दिया। यह कहानी है एक ऐसे चयन की, जहाँ एक तरफ सगा भाई था और दूसरी तरफ पूरे समाज की लाज।
अंधकार से प्रकाश की ओर: सूर्यगढ़ा नाई सभा का पुनर्गठन (1984)
वर्ष 1984 सूर्यगढ़ा के नाई समुदाय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। अजय ठाकुर जी उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि उस समय समाज की स्थिति अज्ञात दिशा में भटकती हुई एक ऐसी नैया की तरह थी, जिसका कोई पतवार न हो। संगठन बिखरा हुआ था, और युवाओं में कोई स्पष्ट दिशा नहीं थी।
ठीक इसी नाज़ुक समय पर राम लखन शर्मा जी का आगमन हुआ। यद्यपि वे उस समय एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थे और उनका पेशा समाज सेवा से सीधा नहीं जुड़ा था, लेकिन उनके भीतर अपने स्वजातीय बंधुओं के लिए कुछ कर गुजरने की तड़प अगाध थी। उन्होंने चुनौतियों को स्वीकार किया और 1984 में सूर्यगढ़ा नाई सभा की डूबती नैया को थाम लिया।
22 वर्षों का बेमिसाल सफ़र: पद नहीं, प्रतिष्ठा का काल (1984-2006)
राम लखन जी का अध्यक्ष बनना केवल एक पद का सृजन नहीं था, बल्कि एक 'विशाल बरगद' की छाया की शुरुआत थी। उन्होंने लगातार 2006 तक (लगभग 22 वर्षों तक) अध्यक्ष पद की गरिमा को संभाला। यह कार्यकाल अजय ठाकुर जी के अनुसार 'बेमिसाल' था।
• सरदार की भूमिका: उनका प्रभाव केवल सूर्यगढ़ा की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। वे बड़हिया से लेकर दियारा क्षेत्र तक के 'सरदार' बनकर उभरे। दियारा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में भी उन्होंने समाज को संगठित किया। वरिष्ठ समाज सेवी लोटन ठाकुर (डीह पारी पण्डीया) और राम लगन ठाकुर (दौरा) जैसे लोग आज भी खुले भाव से उनके उस दौर के कार्यों का वर्णन करते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि उनका नेतृत्व सर्वस्वीकार्य था।
• अखंड सेवा: इन 22 वर्षों में उन्होंने कभी भी पद का अहंकार नहीं किया। वे हमेशा एक 'प्रहरी' की तरह समाज के हितों की रक्षा करते रहे।
त्याग की सर्वोच्च पराकाष्ठा: भाई बनाम समाज का नैतिक द्वंद्व
यह राम लखन शर्मा जी के जीवन का वह अध्याय है, जो उन्हें किंवदंती बनाता है। अजय ठाकुर जी के अभिनंदन पत्र का सबसे भावुक हिस्सा वह है जहाँ वे राम लखन जी के 'अपरिग्रह' और 'निष्काम कर्म' की तुलना करते हैं।
एक समय ऐसा आया जब नियति ने उनके सामने एक अत्यंत कठिन धर्मसंकट खड़ा कर दिया। एक तरफ उनके अपने सगे भाई से जुड़ी एक गंभीर घटना थी, जिसमें परिवार के सदस्य के नाते उनका खड़ा होना स्वाभाविक था। दूसरी तरफ, पूरे नाई समाज की प्रतिष्ठा और 'लाज' का सवाल था। एक सामान्य व्यक्ति निश्चित रूप से अपने खून के रिश्ते को चुनता।
लेकिन राम लखन शर्मा जी 'सामान्य' नहीं थे। उन्होंने एक महान चरित्र का परिचय देते हुए अपने व्यक्तिगत दुखों और पारिवारिक मोह को तिलांजलि दे दी। उन्होंने समाज की लाज को प्राथमिकता दी, न कि भाई के पक्ष को। अजय ठाकुर जी कहते हैं, "उन्होंने समाज को ही अपना स्थान दिया न कि भाई को।" यह निर्णय यह साबित करने के लिए पर्याप्त था कि उनके लिए 'वसुधैव कुटुम्बकम' केवल एक नारा नहीं, बल्कि उनके जीवन का मूलमंत्र था। यही वह क्षण था जब वे सही मायने में 'साधु' (जो माया-मोह से दूर हो) बन गए।
आस्था का प्रतीक: बाबा धर्मदास मंदिर का निर्माण
राम लखन जी का विज़न केवल सामाजिक संगठन तक सीमित नहीं था; वे समाज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों को भी मजबूत करना चाहते थे। सूर्यगढ़ा में बाबा धर्मदास जी के मंदिर का निर्माण उनके जीवन की एक और महत्वपूर्ण कड़ी है।
आज समाज जिस भव्य मंदिर को देखता है, और अजय ठाकुर सहित पूरा समाज जिस गौरव का अनुभव करता है, वह राम लखन जी की ही देन है। उन्होंने न केवल मंदिर निर्माण की परिकल्पना की, बल्कि उसे अमली जामा पहनाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। यह मंदिर आज नाई समाज की एकता और राम लखन जी की दूरदर्शिता के प्रतीक के रूप में खड़ा है।
अध्यक्ष पद से मुक्ति: एक प्रहरी का नया रूप
2006 में उन्होंने बिना किसी दबाव के, स्वेच्छा से अध्यक्ष पद छोड़ दिया। यह भी उनके 'त्याग' का एक बड़ा उदाहरण था। अक्सर लोग पद से चिपके रहते हैं, लेकिन उन्होंने नई पीढ़ी को मौका देने के लिए पद का त्याग किया। पद छोड़ने के बाद भी वे शांत नहीं बैठे। अजय ठाकुर बताते हैं कि वे आज भी लखीसराय जिला संयोजक के पद पर रहकर एक सजग 'प्रहरी' के रूप में समाज की सेवा कर रहे हैं।
1991 बेगूसराय सम्मेलन: जब पूरा बिहार उनके ओज से सराबोर हुआ
अजय ठाकुर जी उस ऐतिहासिक पल का भी जिक्र करते हैं जब 1991 में बेगूसराय में बिहार राज्य सम्मेलन आयोजित हुआ था। सूर्यगढ़ा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए जब राम लखन जी मंच पर आए, तो माहौल पूरी तरह बदल गया।
मंच पर कई दिग्गज और विद्वान वक्ता मौजूद थे, लेकिन राम लखन जी के तेजस्वी भाषण और सुयोग्य पात्र के सामने बहुत से लोग 'बौने' साबित हुए। उनकी वाणी में वह ओज, वह सच्चाई और वह जोश था कि पूरा जनसमुदाय 'वाह-वाह' कर उठा। उस भाषण ने न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा को सिद्ध किया, बल्कि पूरे बिहार के नाई समाज को एक नई रोशनी और सही दिशा-निर्देश प्रदान किया।
उपसंहार: 61 वर्षों का तपोमय जीवन और अजय ठाकुर का समर्पण
राम लखन शर्मा जी का 61वां वर्षगाँठ मनाना केवल एक जन्मदिन मनाना नहीं है, बल्कि एक 'विचारधारा' और एक 'तपस्या' का अभिनंदन करना है। वे एक ऐसे 'साधु सपूत' हैं जिनकी तुलना के लिए अजय ठाकुर जी के पास शब्द कम पड़ जाते हैं।
वर्तमान प्रखण्ड अध्यक्ष अजय ठाकुर जी अपनी श्रद्धा को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं:
"मैं भले ही आज अध्यक्ष हूँ पर इनके बिना सब सूना है। सचमुच नाई समाज के पथ-प्रदर्शक, नित निर्देशक और योग्य साधु हैं। उनके बिना कोई कार्य अधूरा है।"
"सूर्यगढ़ा नाई सभा ने उनके जीवन चरित्र पर जो मसौदा तैयार किया है, वह शत-प्रतिशत सत्य है। राम लखन शर्मा जी का जीवन यह सीख देता है कि संघर्ष से कभी डरना नहीं चाहिए, और समाज का हित हमेशा व्यक्तिगत हित से ऊपर होना चाहिए। 'Sen Saarthi' इस महान मनीषि को कोटि-कोटि नमन करता है।"
📖 इसे भी पढ़ें: अजय ठाकुर और राम लखन शर्मा - भाग 1
अस्वीकरण: यह लेख श्री अजय ठाकुर (प्रखण्ड अध्यक्ष, सूर्यगढ़ा) द्वारा प्रदान किए गए 'अभिनंदन पत्र' और उनके व्यक्तिगत संस्मरणों के आधार पर 'Sen Saarthi Team' द्वारा मौलिक रूप से लिखा गया है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेजीकरण है, न कि किसी राजनीतिक या कानूनी विवाद को जन्म देना।
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