सामाजिक न्याय के अग्रदूत और बलराम पद

एक भावुक भारतीय किसान-लेखक की तस्वीर। वह अपने घर के आंगन में आराम से बैठा है, एक हाथ में पेन और दूसरे में डायरी थामे हुए। उसके चेहरे पर गहरे विचार और अनुभव झलक रहे हैं। उसके सामने खेत-खलिहान और ट्रैक्टर हैं, जो उसकी कड़ी मेहनत का प्रमाण हैं। दीवार पर हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों की तस्वीरें लगी हैं, जो उसे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं। यह तस्वीर ग्रामीण जीवन, संघर्ष और साहित्य के प्रति प्रेम की एक मार्मिक झलक पेश करती है।

हमारा रिश्ता सिर्फ एक घर की चौखट या सुख-दुख की सांझ तक सीमित नहीं रहा। जब दो इंसान एक-दूसरे पर अगाध भरोसा करते हैं, तो वे एक-दूसरे के विचारों को भी मांजते हैं। रामलखन अंकल के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह केवल मेरे पारिवारिक मार्गदर्शक नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना की जीती-जागती पाठशाला थे।

एक बार का वाकया है, मैंने समाज की दशा और दिशा को देखकर उनसे बहुत सहज भाव से कहा था, "रामलखन बाबू, आप अब सिर्फ अपनी जात की राजनीति छोड़कर पूरे 'जमात' (सर्वसमाज) की राजनीति करें, तो समाज के लिए कहीं ज्यादा अच्छा होगा।" मेरी इस बात पर उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के, दो टूक लफ्जों में जो जवाब दिया, उसने मुझे हिलाकर रख दिया। उन्होंने कहा, "जवाहर, पहले अपना घर सुधारे, फिर जमात की बात हो।"

उनका यह जवाब कोई नाराजगी नहीं था, बल्कि एक कड़वी सच्चाई थी। उस समय मुझे महसूस हुआ कि उन्होंने मुझे जबरन एक गहरी सामाजिक सोच के दायरे में धकेल दिया है। उनकी उस एक बात ने मेरी आँखें खोल दीं। तब से मैं भी अपने गाँव की आंतरिक स्थिति और अतीत का गहराई से मूल्यांकन करने लगा कि कैसे हम जमीनी स्तर पर बदलाव ला सकते हैं। राजनीति के मैदान में अंकल जी मेरे लिए पिता तुल्य तो थे ही, लेकिन उस दिन वह मेरे सच्चे गुरु के समान बनकर उभरे।

अंकल जी का एक बहुत ही स्पष्ट और दार्शनिक मानना था कि राजनीति और सामाजिक कार्य दो अलग-अलग पटरियाँ हैं, जो कभी एक नहीं हो सकतीं। वह कहते थे कि राजनीति कहीं न कहीं स्वार्थ के पहलुओं से घिरी होती है, जहाँ नफा-नुकसान देखा जाता है। इसके विपरीत, सामाजिक कार्य पूरी तरह से निःस्वार्थ भावना का द्योतक है। उनका एक जुमला मुझे आज भी याद है कि सामाजिक विकास के रास्ते में अक्सर राजनीतिक रोड़े अटकते हैं, इसलिए समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब काम करने वाला व्यक्ति खुद स्वार्थी न हो।

रामलखन अंकल की इसी निःस्वार्थ भावना की बानगी तब देखने को मिली, जब हमारे सामने नाई समाज के अधिकारों की रक्षा का सवाल आया। सिंधचक गाँव, जो कि एक पूर्णतः यादव बाहुल्य क्षेत्र है, वहाँ अकेले जाकर दिनभर सभा में मुस्तैद रहना और बिना किसी भय के अपने समाज के हक के लिए चट्टान की तरह डटे रहना—यह कोई साधारण बात नहीं थी। वह गाँव की किसी भी विकट परिस्थिति में, चाहे माहौल कितना भी तनावपूर्ण क्यों न हो, कभी अपना साहस और हिम्मत नहीं हारते थे। इसीलिए मेरे मन ने उन्हें हमेशा 'सामाजिक न्याय का अग्रदूत' माना।

उनकी सोच में एक और गहरा ठहराव था। मंदिर निर्माण को लेकर एक बार हमारे बीच लंबी बहस हुई। उनका नजरिया बहुत व्यावहारिक था। वह कहते थे, "मंदिर निर्माण केवल एक साया या ढांचा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा पवित्र केंद्र होना चाहिए जहाँ बैठकर हम अपनी सामाजिक समस्याओं को सुलझा सकें और स्वजातीय विकास की बातें कर सकें।" मैंने उनकी इस पवित्र भावना का दिल से कदर किया, अपनी अंतरात्मा की शांति के लिए चंदे में सहयोग दिया। अंकल जी की सबसे खूबसूरत बात यही थी कि जहाँ भी कोई सामाजिक कार्य होता या कहीं कोई भूल-चूक हो जाती, वह मुझे अपना छोटा भाई समझकर हक से सारी बातें करते थे। उनका मकसद नीचा दिखाना नहीं, बल्कि हमेशा सुधार की भावना से स्वस्थ बहस करना होता था।

वक्त गुजरता गया और उम्र का असर उनके शरीर पर दिखने लगा। एक दिन जब मैंने उन्हें धूप और धूल में भागदौड़ करते देखा, तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने बड़े लाड़ और चिंता से कहा, "अंकल जी, अब आप थक गए हैं। उम्र के लिहाज से आपको अब इतनी दौड़-धूप नहीं लगानी चाहिए। थोड़ा आराम करिए।"


एक बुजुर्ग भारतीय समाजसेवी व्यक्ति सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने लकड़ी के बेंच पर बैठे हैं, एक तालाब और हरे खेतों के पास। बेंच पर एक किताब और झोला रखा है। इमेज के शीर्ष पर हिंदी टेक्स्ट 'असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो' और कोने में वेबसाइट का नाम "Sen Saarthi" लिखा है।

मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक अदम्य मुस्कान तैर गई। पता नहीं स्वजातीय विकास और समाज को जगाने की कौन सी परिकल्पना उनके मस्तिष्क और चेतना पर इस कदर बैठ गई थी कि उन्होंने अपनी ढलती उम्र को चुनौती देते हुए मुझे यह प्रसिद्ध कविता सुना दी:

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो।

जो कमी रह गई, देखो और सुधार करो।

जब तक न सफल हो, नींद, चैन को त्यागो तुम।

संघर्षों का मैदान छोड़, मत भागो तुम।

कुछ किए बिना ही, जय जय कार नहीं होती।

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

जब उनके कांपते मगर दृढ़ होठों से यह कविता निकली, तो मुझे अहसास हुआ कि यह इंसान कभी थकने वाला नहीं है। इसी अडिग वैचारिक कसौटी ने उन्हें धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर के स्वजातीय नेताओं की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया। मुझे इस बात का गर्व है कि उन्होंने बिहार से बाहर कई राज्यों का दौरा किया और हर जगह से उन्हें जो मान-सम्मान और सम्मान पत्र मिले, मुझे उन्हें स्वयं अपनी आँखों से पढ़ने का सौभाग्य मिला।

उनकी यह सम्मान यात्रा देश के कोने-कोने तक फैली थी। सन् १९८८ और २०१५ में बंगाल के आसनसोल क्षेत्र के नियंता कल्याणी क्लब में, एवं अंडाल में दो बार 'स्वजातीय महासभा बंगाल (पाड़ा)' द्वारा उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया गया। ५ जनवरी २०१५ को महाराष्ट्र की धरती पर, मुंबई में 'राज्य स्तरीय नाई समाज' ने उनके योगदान को सराहा। इसके बाद २०१९ में बोकारो स्टील सिटी ने भी उन्हें मंच पर बुलाकर सम्मानित किया।

अपने गृह राज्य बिहार में तो उनकी सेवा की गूँज हर तरफ थी। बिहारशरीफ में उन्हें 'कर्पूरी ठाकुर रत्न' से नवाजा गया, तो राजधानी पटना में 'परम पूज्य भिखारी ठाकुर सम्मान' उनके नाम हुआ। हमारे अपने लखीसराय के जिला स्तरीय सम्मेलन में तो समाज ने उन्हें श्रद्धा से "गुरुजी पद" की उपाधि दे डाली। इससे पहले, १९९१ में अखिल भारतीय नाई महासभा के बेगूसराय सम्मेलन में उन्हें 'ज्योतिराव फूले सम्मान' से अंगीभूत किया गया था। सचमुच, नाई समाज के एक सच्चे सर्वेक्षक, पथ निर्देशक, पथ प्रदर्शक और कर्मठ सेवक के रूप में उन्हें इतनी ऊँचाइयों पर देख-जानकर मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है।

आज जब मैं इस पूरी यात्रा को देखता हूँ, तो मेरे पास ऐसे कोई शब्द नहीं बचते कि मैं उन्हें किस रूप में अपने गाँव चननियाँ में सम्मानित करूँ। एक यादव बाहुल्य गाँव में, जिस अपनत्व और सहजता के साथ वह घुलमिल कर रहते हैं, पूरे समाज की पीड़ा को बिना किसी भेदभाव के अपना दर्द समझते हैं, और बिना किसी से राग-द्वेष या लड़ाई-झगड़ा किए अपना जीवन खुशी-खुशी निर्वाह कर रहे हैं—यह अद्भुत है।

उनके इस निश्छल और विशाल भाव को देखकर मेरे मन में एक गहरी प्रेरणा जागी। हम यदुवंशियों की टोली की तरफ से, मैंने अपने अंतर्मन से उन्हें एक विशेष उपाधि दी है। जिस तरह द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी हमेशा न्याय के साथ खड़े रहते थे और सबको साथ लेकर चलते थे, उसी तरह हमारे रामलखन अंकल भी हैं। इसलिए मैं उन्हें अपने दिल से "बलराम पद" से सम्मानित करता हूँ, जो मेरे मन को पूरी तरह भा गया है।

मेरे गाँव में, मेरे पास रहकर उन्होंने जो मान-सम्मान कमाया और राष्ट्रीय स्तर पर नाई समाज का जो गौरव बढ़ाया, उसके लिए वह सच्चे अर्थों में साधुवाद के पात्र हैं। रामलखन अंकल के जीवन के सुखद, स्वस्थ और दीर्घायु भविष्य के लिए मैं ईश्वर के चरणों में सदा प्रार्थी हूँ।

लेखक, विचारक एवं विश्लेषक 

जवाहर प्र० यादव, चननियाँ (लखीसराय)।


पाठकों से आत्मीय अपील:

प्रिय पाठकों,

रामलखन शर्मा जी के इस प्रेरणादायी सामाजिक सफर और उन्हें दिए गए "बलराम पद" के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको भी लगता है कि समाज को आज ऐसे ही निश्छल नायकों की जरूरत है? नीचे Comment Box में अपनी अमूल्य राय जरूर साझा करें। इस पूरी कहानी को अपना प्रेम देने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद!



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