प्रेम की अनूठी गंगा: रामलखन अंकल और मैं

चननियाँ गाँव में, संस्मरणकर्ता जवाहर प्र० यादव और समाजसेवी रामलखन शर्मा के गहरे आत्मीय संबंधों को दर्शाता यह चित्र, जहाँ दोनों एक साथ नजर आ रहे हैं।


हमारा चननियाँ गाँव... जहाँ सुबह की धूप खेतों की हरियाली को चूमती है और शाम ढलते ही चौपालों पर अपनों के सुख-दुख की बातें शुरू हो जाती हैं। मैं जवाहर प्र० यादव, इसी मिट्टी का बेटा हूँ। स्वर्गीय गोपाल यादव जी का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते कंधों पर हमेशा एक जिम्मेदारी की भावना रही, लेकिन जीवन के सफर में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जो आपकी उंगली थामकर आपको सामाजिक और मानसिक रूप से बड़ा बना देते हैं। मेरे जीवन में यह स्थान आदरणीय रामलखन शर्मा जी का है, जिन्हें मैं और मेरा पूरा परिवार आदर से 'अंकल जी' कहता है।

बात १९७५ के उस दौर की है, जब देश का राजनीतिक माहौल बहुत गर्म था। दिल्ली से लेकर गाँव की गलियों तक 'आपातकाल' (इमरजेंसी) की गूँज थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी के आदेश पर देश के बड़े-बड़े विरोधी नेताओं को जेलों में ठूँसा जा रहा था। हवाओं में एक अजीब सा डर और उत्सुकता का मिला-जुला माहौल था। इसी ऐतिहासिक और उथल-पुथल भरे दौर में मेरी मुलाकात रामलखन शर्मा जी से हुई। पहली ही मुलाकात में उनके भीतर की सच्चाई और उनके चेहरे का निश्छल भाव मेरे दिल को छू गया। शुरुआत में तो वह एक सामान्य परिचय था, लेकिन समय बीतने के साथ मुझे समझ आया कि उनके भीतर का इंसान कितना गहरा है।

शुरुआती दौर में, यानी १९९० के दशक के आते-आते मुझे यह अहसास हुआ कि अंकल जी भी 'चलता-फिरता राजनीति' करते हैं। लेकिन उनकी राजनीति वो आज वाली स्वार्थी या जोड़-तोड़ वाली राजनीति नहीं थी। उनका रंग-ढंग बहुत सीमित और सीधा था। वह उस समय मात्र स्वजातीय मंच तक ही अपनी बात रखते थे। मैं उन्हें बहुत करीब से देख रहा था। एक साधारण परिवार में जन्म लेकर, जीवन यापन की रोजमर्रा की लड़ाइयों को लड़ते हुए भी उनके भीतर दूसरों के लिए जो तड़प थी, उसने मुझे उनका मुरीद बना दिया।

देखते ही देखते, वह कब हमारे चननियाँ गाँव की हवाओं में घुल गए और कब हमारे परिवार का एक अटूट हिस्सा बन गए, हमें पता ही नहीं चला। यों तो अंकल जी हमारे गाँव के कोई पुस्तैनी वासिंदे नहीं हैं। उनका मूल जुड़ाव बड़हिया क्षेत्र से था, जहाँ उनकी रिश्तेदारियाँ थीं। लेकिन १९७० का वो साल जब मैं खुद एक विद्यार्थी था और किताबों की दुनिया में अपना भविष्य ढूँढ रहा था, तब उन्होंने हमारे गाँव में जमीन खरीदी और अपना घर बनाया। मिट्टी का एक नया घर क्या बना, मानो हमारे बीच स्नेह का एक नया मंदिर खड़ा हो गया।

जब से वह हमारे संपर्क में आए, जाति-पाति की सारी दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं। हमारा गाँव यादव बाहुल्य है, लेकिन रामलखन अंकल के साथ हमारे रिश्ते में कभी 'जाति' शब्द बीच में आया ही नहीं। वहाँ तो बस प्रेम की एक ऐसी अविरल गंगा बह रही थी, जिसमें हम सब सराबोर थे। कभी-कभी जब मैं एकांत में बैठकर सोचता हूँ, तो मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे अंकल जी इस जन्म के साथी नहीं हैं। वह तो पूर्व जन्म के कोई ऐसे जीवन-साथी बनकर उभरे हैं, जिन्हें ईश्वर ने मेरे सुख-दुख की हर घड़ी में साथ निभाने के लिए ही भेजा था।

मेरे और उनके बीच एक ऐसा आत्मिक और पारिवारिक संबंध बन गया कि उनके जीवन की हर समस्या मेरी बन गई और मेरी हर उलझन उनका सिरदर्द। जब भी कभी गाँव में या परिवार में किसी सद्भाव की, आर्थिक मदद की या सामाजिक तालमेल की आवश्यकता महसूस हुई, रामलखन अंकल हमेशा आगे खड़े रहे। वह समस्याओं से भागने वाले इंसान नहीं थे, बल्कि समस्या की आँखों में आँखें डालकर उसका समाधान ढूँढने का प्रयास करने वाले जुझारू व्यक्तित्व के धनी थे।

मैं यहाँ अपनी प्रशंसा या अपनी बातें करने नहीं बैठा हूँ, क्योंकि अपनी बातें करना उतना शोभनीय भी नहीं लगता। चन्द शब्दों में अंकल रामलखन शर्मा जी के उस विराट जीवन पर प्रकाश डालना ही इस समय सबसे लाजिमी और उचित है, जिसने मुझ जैसे साधारण इंसान को गढ़ा है।

उनके प्रति मेरे मन में जो अगाध विश्वास था, उसकी सबसे बड़ी परीक्षा तब हुई जब मैंने एक बार बिना सोचे-समझे, समाज की और जनता की सेवा करने के लिए 'मुखिया पद' का प्रत्याशी बनने का फैसला कर लिया। राजनीति के दांव-पेंच से दूर, एक सीधे-सच्चे इंसान के लिए चुनाव लड़ना कोई आसान खेल नहीं था। कई लोग पीछे हट रहे थे, कई लोग नफा-नुकसान का आकलन कर रहे थे। लेकिन विश्वास पात्र के धनी रामलखन अंकल ने न तो कोई नफा-नुकसान देखा और न ही अपनी उम्र की परवाह की। वह बिना किसी सोच-विचार के, पूरी मजबूती के साथ मेरे साथ आ खड़े हुए।

चुनाव के उस भारी तनाव और भागदौड़ के बीच, जब हर पल समीकरण बदल रहे थे, अंकल जी साये की तरह मेरे साथ रहे। उन्होंने सिर्फ वोट नहीं मांगे, बल्कि अपनी साख और अपने चरित्र को मेरे पक्ष में दांव पर लगा दिया। चुनाव की उस लड़ाई के अंतिम क्षण तक, जब तक परिणाम नहीं आ गया, उन्होंने अपना साथ निभाया। वह केवल एक समर्थक बनकर नहीं खड़े थे, बल्कि एक पिता की तरह मेरी ढाल बनकर खड़े थे।

राजनीति की इस तपती धूप में, मेरे लिए अंकल जी केवल एक मार्गदर्शक या शुभचिंतक नहीं रहे। वह स्थान तो पिता का होता है, और सच कहूँ तो वह मेरे लिए पिता तुल्य हैं ही, लेकिन अपने कर्मों और अपनी सीख से वह मेरे गुरु के समान निकले। उन्होंने मुझे सिखाया कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा कैसे रखा जाता है।

जीवन के इस लंबे सफर में, दुःख-सुख और उतार-चढ़ाव की न जाने कितनी ही अनगिनत घटनाएँ आईं। कभी वक्त ने परीक्षा ली, तो कभी अपनों ने मुँह मोड़ा। लेकिन इन तमाम तूफानों के बीच अगर कोई एक इंसान चट्टान की तरह स्थिर रहा, तो वो रामलखन अंकल थे। उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया। और मुझसे भी जो बन पड़ा, मैंने पूरी श्रद्धा और सामर्थ्य के साथ उनका यथावत सहयोग करने का प्रयास किया। यह कोई लेन-देन का रिश्ता नहीं था, यह दो दिलों की साझी विरासत थी।

अगर मैं उनके साथ बिताए एक-एक दिन की दास्तान लिखने बैठूँ, तो कहानी बहुत लंबी बन जाएगी, शायद पन्ने कम पड़ जाएंगे। लेकिन उनसे मुझे जीवन की जो सबसे बड़ी सीख मिली, उसे मैंने अपने जीवन का 'प्रसाद' माना। उस सीख को अपने माथे से लगाया। और यही कारण है कि जिंदगी में जब कभी भी मुझे सामाजिक जीवन में आगे बढ़ने का मौका मिला, मैंने हमेशा अंकल जी के विचारों से कदम से कदम और कंधा से कंधा मिलाकर चलने का ही प्रयास किया।

चननियाँ की गलियों में आज भी जब मैं उनके घर की तरफ देखता हूँ, तो मुझे वही १९७५ का दौर याद आता है। एक ऐसा रिश्ता जो स्वार्थ की बुनियाद पर नहीं, बल्कि निश्छल प्रेम और गहरे भरोसे की नींव पर टिका हुआ है। यह हमारे पारिवारिक सफर की वो दास्तान है, जिसने मुझे समाज को एक नई नजर से देखना सिखाया। लेकिन अंकल जी का व्यक्तित्व सिर्फ मेरे परिवार तक सीमित नहीं रहने वाला था। उनके भीतर समाज के लिए एक ऐसी तड़प थी, जो जल्द ही उन्हें एक बहुत बड़े सामाजिक कैनवास पर ले जाने वाली थी, जहाँ उन्होंने मुझे 'जात की राजनीति' से ऊपर उठकर 'जमात की राजनीति' का ककहरा सिखाया...

लेखक: 

जवाहर प्र० यादव (ग्राम- चननियाँ, लखीसराय)



इस पारिवारिक और आत्मीय सफर के आगे, अंकल जी के सामाजिक न्याय के अग्रदूत बनने और राष्ट्रीय स्तर के सम्मानों की कहानी... पढ़िए अगले भाग में।


पाठकों से एक आत्मीय अपील

​प्रिय पाठकों,

रामलखन अंकल और मेरे परिवार के इस रिश्ते की कहानी आपको कैसी लगी? क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा इंसान है, जो जाति-पाति की दीवारों से ऊपर उठकर आपके परिवार का हिस्सा बन गया हो?

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​अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार और संस्मरण लेखक (जवाहर प्र० यादव) के निजी अनुभव और यादों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी जाति, समाज, समुदाय या राजनीतिक विचारधारा को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच के आत्मीय और सामाजिक संबंधों को उजागर करना है। इसमें शामिल ऐतिहासिक तिथियां और घटनाएं लेखक के व्यक्तिगत संज्ञान के अनुसार साझा की गई हैं।


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