बिहार दिवस पर अनमोल भाषण: एक छात्र की प्रेरक कहानी

बिहार दिवस के स्कूल समारोह में सफेद यूनिफॉर्म पहने एक छात्र बिना किसी कागज या कॉपी के, आत्मविश्वास से पोडियम पर खड़े होकर भाषण दे रहा है। पोडियम पर हिंदी में "बिहार दिवस समारोह" लिखा है और कमल के पत्ते बने हैं। सामने स्कूल के अन्य छात्र और शिक्षक बैठकर उसे सुन रहे हैं और तालियां बजा रहे हैं। पृष्ठभूमि में एक बड़ा बरगद का पेड़ और मैदान का दृश्य है।
प्रतीकात्मक चित्र


बचपन की यादें भी कमाल की होती हैं। धूल-मिट्टी से सने वो दिन और छोटी-छोटी चीजों में छुपी खुशियां, आज भी जब ज़हन में तैरती हैं, तो चेहरे पर एक अनजानी सी मुस्कान छोड़ जाती हैं। अनमोल के बचपन का वो दौर भी कुछ ऐसा ही था, जहाँ हर शाम एक नया खेल होता था और हर खेल का अपना एक अलग ही संसार था।

गाँव की उस मिट्टी में एक अजीब सा सुकून था। बरसात के दिनों में जब चारों तरफ हरियाली छा जाती, तो खेतों के किनारे एक पौधा उगता था, जिसे सब स्थानीय भाषा में 'पेक्चा' कहते थे। पेक्चा का पत्ता आकार में काफी बड़ा और बिल्कुल गोल होता था। बच्चों के लिए वह पत्ता किसी जादुई थाली से कम नहीं था। शाम ढलते ही बच्चों की टोली जुट जाती और शुरू होता था 'झूठा-मूठा' का काल्पनिक खाना बनाने का खेल।

कोई छोटी-छोटी सूखी लकड़ियां तोड़कर लाता और कहता, "लो, मैं जलावन लेकर आ गया।" कोई मिट्टी और पत्थरों को जोड़कर छोटा सा चूल्हा बनाता। फिर उस पेक्चा के बड़े और गोल पत्ते पर काल्पनिक पकवान परोसे जाते और सब मिलकर बड़ी मासूमियत से उसे एक-दूसरे में बांटते थे। उस पत्ते की एक और खासियत थी जो बच्चों को बहुत लुभाती थी—जब भी उस पर पानी की बूंदें पड़तीं, तो पत्ता गीला नहीं होता था। पानी की वो बूंदें गोल-गोल होकर उस हरे पत्ते पर सफेद मोती की तरह चमकने लगती थीं। उसी खेल के मैदान में कभी-कभी हवा में तैरती हुई 'गर्सिकिया' दिख जाती थी। लंबी, पतली और पारदर्शी सफेद पंखों वाली वो नन्ही सी कीट, जिसे देखते ही बच्चे उसके पीछे दौड़ पड़ते थे। वो गर्सिकिया और पेक्चा के पत्ते, अनमोल के बचपन की सबसे खूबसूरत जागीर थे।

जब अपनों के मज़ाक ने तोड़ा हौसला

पर बचपन सिर्फ खेलों तक सीमित नहीं रहता, उम्र बढ़ने के साथ स्कूल का दायरा बढ़ता है और साथ ही बढ़ती हैं मन की उलझनें। अनमोल पढ़ाई में बहुत तेज़ था। जब भी स्कूल में 15 अगस्त या 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम होते, तो उसका भी मन करता था कि वह मंच पर जाए, कुछ बोले या कुछ गाए। लेकिन उसके दोस्तों की टोली, जिसमें रोहन, सुरेश और सुरेश का बड़ा भाई संदीप शामिल थे, कभी इन सब चीजों में भाग नहीं लेते थे। इतना ही नहीं, जो बच्चे भाग लेते थे, ये लोग उनका मज़ाक उड़ाया करते थे।

जब अनमोल कक्षा 6 में था, तो उसने एक बार बहुत सोच-समझकर अपने डर पर काबू पाया और 15 अगस्त के कार्यक्रम में देशभक्ति गीत गाने का फैसला किया। उसने हिम्मत जुटाकर शिक्षक को अपना नाम दे दिया। स्कूल के नियम के मुताबिक, 15 अगस्त से 10 दिन पहले ही रिहर्सल शुरू हो गई थी, ताकि बच्चों की हिचकिचाहट दूर हो सके।

अनमोल बचपन में थोड़ा तोतलाता था। जब रिहर्सल के दौरान उसने सबके सामने गाना शुरू किया, तो सामने बैठे उसके अपने ही दोस्तों ने अजीब हरकतें शुरू कर दीं। खासकर रोहन, अनमोल का ध्यान भटकाने के लिए अपनी आँखें अजीब तरह से मटकाता, चेहरे पर कॉमेडी जैसे भाव बनाता और इशारे करता जैसे कह रहा हो— "वाह! तुम गीत गा रहे हो!" रोहन का वह अजीब चेहरा देखकर अनमोल के अंदर का आत्मविश्वास डगमगा जाता और वह और ज़्यादा तोतलाने लगता। बात यहीं खत्म नहीं हुई। स्कूल के बाद जब सब घर जाते, तो रोहन रास्ते में और गाँव के बाकी लोगों के सामने अनमोल की तोतली आवाज़ में उस गीत की नकल उतारकर सुनाता। जब अनमोल अपने ही दोस्त के मुंह से अपना यह मज़ाक सुनता, तो उसका दिल टूट जाता। उसका मनोबल इस कदर गिर गया कि 10 दिनों की रिहर्सल में से वह सिर्फ दो दिन ही हिम्मत कर पाया, तीसरे दिन से उसने सबके सामने गाना बंद कर दिया।

हालाँकि, उसने घर पर मेहनत करना बंद नहीं किया था। वह रोज़ बंद कमरे में उस देशभक्ति गीत को याद करता और गाता। उसे उम्मीद थी कि शायद 15 अगस्त के दिन वह गा पाएगा। लेकिन जब 15 अगस्त का वह आखिरी दिन आया, चारों तरफ लाउडस्पीकर गूंज रहे थे, तब मंच से शिक्षक ने कई बार 'अनमोल' का नाम पुकारा। पर अनमोल अपनी जगह से नहीं हिला। उसके मन में दो बातें चल रही थीं—एक तो उसे लगा कि दो दिन बाद रिहर्सल छोड़ देने की वजह से शायद उसका नाम कट गया होगा और यह नाम किसी और छात्र का होगा। और दूसरा, उसके अंदर वह गहरा मानसिक दबाव था कि अगर वह मंच पर गया और फिर से तोतला गया, तो रोहन और उसके दोस्त पूरी जिंदगी उसका मज़ाक उड़ाएंगे। उस दिन अनमोल मंच पर नहीं जा सका, उसका डर जीत गया और उसकी मेहनत धरी की धरी रह गई।

कक्षा 8 का वह कठोर निर्णय

इस घटना के बाद दो साल बीत गए। अब अनमोल कक्षा ८ में आ चुका था। समय बदला था और उसके साथ ही अनमोल के अंदर की तड़प भी बढ़ गई थी। उसे लग रहा था कि यह मिडिल स्कूल का आखिरी साल है, इसके बाद वह यहाँ से चला जाएगा। वह स्कूल में अपनी कोई ऐसी पहचान छोड़कर जाना चाहता था, जिसे सब याद रखें।

तभी स्कूल में 22 मार्च को 'बिहार दिवस' मनाने की घोषणा हुई। पूरे स्कूल में एक अलग ही उत्साह और होड़ का माहौल था। अनमोल ने इस बार एक बहुत ही कठोर निर्णय लिया—"चाहे जो हो जाए, इस बार मैं पीछे नहीं हटूंगा।" उसने शिक्षक के पास जाकर भाषण प्रतियोगिता में अपना नाम लिखवा दिया।

शिक्षक से भाषण लिखवाने के लिए बहुत से विद्यार्थियों की भीड़ लगी थी। अनमोल के कदम भी शिक्षक की तरफ बढ़े, पर अचानक वह रुक गया। उसने सोचा कि अगर शिक्षक इतने सारे बच्चों को भाषण लिखकर देंगे, तो सबका विषय और शब्द लगभग एक जैसे ही हो जाएंगे। उसे कुछ अलग करना था। इसलिए उसने किसी की मदद नहीं ली। वह घर गया, कई सारी किताबें इकट्ठा कीं और खुद शोध करना शुरू किया। उसने बिहार के भौगोलिक क्षेत्र, पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक फैले कुटीर उद्योगों के मुख्य बिंदुओं को चुन-चुनकर अपनी कॉपी में नोट किया। उसने एक ऐसा अनूठा भाषण तैयार किया जो किसी शिक्षक की डायरी से नहीं, बल्कि उसकी अपनी लगन से निकला था।

लेकिन चुनौती अभी बाकी थी। उसके दोस्तों को जैसे ही पता चला कि अनमोल भाषण दे रहा है, उनके ताने फिर शुरू हो गए— "देखो, बहुत बड़ा होनहार बच्चा बनने चला है!" अनमोल जानता था कि अगर इस बार उसने उनकी बातों पर ध्यान दिया, तो उसका हौसला फिर टूट जाएगा। इसलिए उसने एक बड़ा कदम उठाया। उसने अपने दोस्तों से बात करना धीरे-धीरे कम किया और 22 मार्च के आते-आते उनसे पूरी तरह बात करना बंद कर दिया। उसने अपनी पूरी ऊर्जा और ध्यान सिर्फ अपने भाषण पर केंद्रित कर दिया।

मंच की वो गूंज और पेड़ का सहारा

22 मार्च का वह दिन आ गया। मैदान में बहुत बड़ा स्टेज लगा था और लाउडस्पीकर बंधे थे। जब अनमोल का नाम पुकारा गया, तो उसके जीवन में यह पहली बार था कि वह मंच पर माइक के सामने खड़ा था।

शुरुआत के कुछ पल बहुत अच्छे रहे। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के बोलना शुरू किया। लेकिन तभी एक अजीब सी घटना हुई। लाउडस्पीकर के बड़े साउंड की वजह से अनमोल के कानों में उसकी अपनी ही आवाज़ गूंजने लगी। उस गूंज ने उसे असहज (Uncomfortable) कर दिया। उसे ऐसा भ्रम हुआ कि शायद लाउडस्पीकर की आवाज़ के ज़्यादा गुंजायमान होने की वजह से किसी को उसकी बात स्पष्ट सुनाई नहीं दी, और उसके मन में आया कि वह उस लाइन को दोबारा दोहराए। लेकिन तुरंत उसने अपने दिमाग को नियंत्रित किया, खुद को आदेश दिया— "यहाँ माइक लगा है, साउंड है, सबको सुनाई दे रहा है। अगर घबराहट में एक ही बात दो-तीन बार बोल दी, तो लोग मेरे विचारों को समझ नहीं पाएंगे और यह सब एक मज़ाक बनकर रह जाएगा।"

उसने अपनी आँखें सामने बैठे लोगों के चेहरों से हटा लीं। उसे याद था कि कैसे चेहरों को देखकर उसका कॉन्फिडेंस गिर जाता था। उसने मैदान के पार खड़े एक शांत वृक्ष पर अपना ध्यान टिका दिया। पेड़ तो स्थिर था, वह तो रोहन की तरह अजीब और कॉमेडी शक्लें बनाकर उसका हौसला नहीं तोड़ने वाला था। उस पेड़ को देखते हुए अनमोल बोलता गया। वह अपने याद किए हुए भाषण का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा ही बोल पाया था कि अचानक आगे की लाइनें उसके दिमाग से धुंधली होने लगीं। मंच पर ज़्यादा देर का ठहराव श्रोताओं को बोर कर सकता था, इस बात को भांपते हुए उसने बिना घबराए पूरे आत्मविश्वास के साथ आखिरी शब्दों को समेटा और ज़ोर से कहा— "जय हिंद, जय बिहार!"

भाषण खत्म होते ही जैसे ही वह पीछे मुड़ा, उसे छूटी हुई लाइनें याद आ गईं। मन ने कहा कि जाकर फिर से बोल दे, पर उसने खुद पर काबू पाया और सोचा कि "जय हिंद, जय बिहार" कहने के बाद अब कुछ और बोलना ठीक नहीं। वह गरिमा के साथ मंच से नीचे उतर आया।

एक जीत, जिसने बदल दी जिंदगी

जैसे ही अनमोल मंच से उतरा, पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। स्कूल के शिक्षक और प्रधानाध्यापक दंग थे कि जिस बच्चे को किसी ने कुछ लिखकर नहीं दिया, उसने बिहार के बारे में इतनी सटीक और अनोखी जानकारियां कैसे दे दीं। जब पुरस्कारों की घोषणा हुई, तो अनमोल को मंच पर बुलाकर एक 'कलम' (Pen) इनाम में दी गई। उस कलम को हाथ में लेकर अनमोल की आंखों में जो चमक थी, वह उसके दो साल के संघर्ष की जीत का इनाम थी। मिडिल स्कूल से विदा होने से पहले उसने अपनी एक अमिट पहचान बना ली थी।

इस पूरी घटना और दोस्तों से बात बंद करने का एक बहुत ही खूबसूरत 'साइड-इफेक्ट' भी हुआ। अनमोल का सबसे करीबी दोस्त सुरेश, जो अनमोल के बात न करने से थोड़ा आहत था, उसके मन में एक तड़प जागी। जब उन्होंने कक्षा 9 में प्रवेश किया, तो सुरेश ने अनमोल को यह दिखाने के लिए कि "मैं भी यह कर सकता हूँ", खुद आगे बढ़कर स्कूल की गतिविधियों और प्रार्थना सभा में भाग लेना शुरू कर दिया।

अनमोल को यह देखकर बहुत खुशी हुई कि उसके एक कदम ने उसके दोस्त के अंदर भी कुछ बेहतर करने की आग सुलगा दी थी। अब उन दोनों के बीच कोई मनमुटाव नहीं था, बल्कि पढ़ाई के क्षेत्र में एक बेहद स्वस्थ और खूबसूरत प्रतियोगिता (Healthy Competition) शुरू हो गई थी। अगर सुरेश को कुछ समझ नहीं आता, तो वह अनमोल के पास आता, और कभी अनमोल भी उससे सलाह लेता। इस स्पर्धा ने दोनों को पढ़ाई में अव्वल बना दिया।


"अनमोल की यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारे रास्ते में रोड़े अटकाने वाले बहुत मिलेंगे, कभी-कभी वो हमारे अपने भी हो सकते हैं। लेकिन अगर हम नकारात्मकता से दूरी बना लें, खुद पर भरोसा रखें और अपने लक्ष्य पर एक पेड़ की तरह अडिग होकर ध्यान लगाएं, तो मंच की हर गूंज हमारी सफलता की ताली में बदल जाती है।"


संस्मरणकर्ता:

उज्जवल प्रभाकर 




पाठकों से एक छोटी सी अपील:

दोस्तों,

अनमोल के बचपन की यह यादें और उसका यह संघर्ष आपको कैसा लगा? क्या आपके बचपन में भी ऐसी कोई याद या ऐसा कोई दोस्त था जिसने खेल-खेल में आपका हौसला बढ़ाया या कभी आपका मज़ाक उड़ाया? और आपने अपने जीवन के पहले स्टेज फियर (मंच के डर) पर कैसे काबू पाया था? अपनी अनमोल यादें और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ ज़रूर साझा करें। आपके हर एक कमेंट से हमें और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है। धन्यवाद!





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​अस्वीकरण: यह कहानी एक छात्र (अनमोल) के जीवन के वास्तविक अनुभवों, संघर्षों और उसकी यादों पर आधारित एक प्रेरणादायक प्रस्तुति है। इस कहानी का मुख्य उद्देश्य पाठकों को प्रेरित करना और सकारात्मक संदेश देना है। इसमें शामिल कुछ नाम (जैसे गर्सिकिया कीट और पेक्चा का पत्ता) स्थानीय या क्षेत्रीय बोलचाल की भाषा से लिए गए हैं, जिनका उद्देश्य किसी क्षेत्र, समुदाय या वैज्ञानिक तथ्यों को चुनौती देना नहीं है। यह कहानी किसी भी व्यक्ति, जीवित या मृत, अथवा किसी संस्था को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं लिखी गई है।

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