तकदीर का थप्पड़ या समय का पाठ? (भाग 1)
'लेखक की बात':
यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है, जिसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि विषम परिस्थितियों में इंसान के हौसले और कर्म की शक्ति को दर्शाना है। जब इंसान के पास खाने को दाना न हो और चारों तरफ से केवल ताने मिलें, तब क्या किस्मत ही आखिरी रास्ता बचती है या फिर कर्म की एक छोटी सी चिनगारी पूरी तकदीर बदल सकती है? 12 साल के मासूम दीपक की यह दास्तान आपके दिल को छू लेगी। कहानी के अंतिम मोड़ तक बने रहिए, जहाँ एक अप्रत्याशित मुलाक़ात दीपक की पूरी ज़िंदगी का रुख मोड़ने वाली है...
मद्रास के पास बसे एक छोटे से गाँव की गलियों में दोपहर की धूप ऐसी बरस रही थी जैसे आसमान से आग के अंगारे गिर रहे हों। धूल से भरी संकरी सड़कों पर सन्नाटा पसरा था। मिट्टी और फूस की बनी एक छोटी सी झोपड़ी के भीतर, चूल्हे की ठंडी पड़ी राख हवा के हल्के झोंके से उड़ रही थी। यह राख इस बात की गवाही दे रही थी कि इस घर में पिछले दो दिनों से आग नहीं जली है।
बारह साल का दीपक अपनी माँ के पास बैठा था। उसका पेट भूख के मारे ऐंठ रहा था, लेकिन अपनी तकलीफ से ज्यादा उसे अपनी माँ के चेहरे की लाचारी दुखी कर रही थी।
"माँ, आखिर हमें कब तक ऐसे जीना पड़ेगा?" दीपक ने अपनी सूखी जुबान पर जीभ फेरते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में एक मासूम बच्चे का दर्द और गुस्सा दोनों घुले हुए थे।
माँ ने दीपक के उलझे हुए बालों पर कांपता हुआ हाथ रखा और एक गहरी सांस लेकर बोली, "बेटा, यह सब भगवान की देन है। इंसान केवल अपनी किस्मत को भोग सकता है, उसे बदल नहीं सकता। जब ऊपर वाले की मर्जी होगी, तब हमारे दिन भी बदलेंगे। लेकिन अभी रोने से काम नहीं चलेगा। जा, बगल वाली चाची के घर चले जा। उनसे कहना कि चाची, मम्मी ने एक सूप चावल और दो मुट्ठी दाल मांगी है। कहना कि काम मिलते ही दो दिन में वापस लौटा देंगे।"
दीपक का मन नहीं मान रहा था। खुदमुख्तारी और स्वाभिमान का एक छोटा सा अंकुर उसके बाल-मन में भी था, लेकिन भूख की तड़प सब पर भारी पड़ गई। वह उठा और भारी कदमों से पड़ोसी चाची के घर की तरफ चल दिया।
जब दीपक ने पड़ोसी के मुख्य द्वार पर दस्तक दी, तो अंदर से चाची बाहर निकलीं। दीपक ने बहुत ही हिचकिचाते हुए अपनी माँ का संदेश सुनाया।
दीपक की बात सुनते ही चाची का मुंह बन गया। उन्होंने अपने चेहरे पर चिढ़ लाते हुए कहा, "हूँ! बड़ा आया दो दिन में चावल वापस करने वाला! दो दिन से चूल्हा नहीं जला और बातें देखो बड़ी-बड़ी। जाओ यहाँ से, बड़ा आया मांगने वाला! दोबारा इस दरवाजे पर मत दिखाई देना।"
इतना कहकर चाची ने दीपक को हल्के हाथ से पीछे धकेला और दरवाजा जोर से पटक दिया। लकड़ी के उस पुराने दरवाजे के बजने की आवाज़ दीपक के कानों में नहीं, सीधे उसके दिल में जाकर लगी।
उदास मन और झुकी हुई नजरों के साथ दीपक वापस अपने घर की ओर लौट रहा था। तभी गली के मोड़ पर उसे उसका हमउम्र दोस्त मिला।
"अरे दीपक! चल भाई, मैदान में खेलने चलते हैं," दोस्त ने उत्साह से भरकर कहा। "आज दिनेश और श्याम भी आए हैं। हम चारों मिलकर बैडमिंटन खेलेंगे। बहुत मज़ा आएगा! चल न, एक तू हो जाएगा तो हमारी दो-दो की टीम बन जाएगी। बहुत मज़ा आएगा!"
दीपक अभी कुछ बोल पाता, उससे पहले ही पीछे से उसके दोस्त की माँ आ पहुँची। उन्होंने झटके से अपने बेटे की बांह पकड़ी और उसे पीछे खींचते हुए कड़क आवाज़ में बोलीं, "चल यहाँ से! कितनी बार कहा है कि इस अभागे के साथ मत रहा कर। दिन भर दूसरों के आगे हाथ फैलाता रहता है। कभी घर में आटा नहीं है, तो कभी चावल नहीं है। तुझे भी फुसला लेगा और तेरे ही घर पर डाका डालेगा। ऐसे लोगों का मुंह देखना भी पाप है। पता नहीं कहाँ से आ जाते हैं!"
वह औरत अपने बेटे को घसीटते हुए अपने घर ले गई। दीपक चुपचाप वहीं खड़ा रहा। उसकी आँखों से आँसू छलकने ही वाले थे कि उसने खुद को संभाला।
जब वह अपने घर के पास पहुँचा, तो झोपड़ी के भीतर से बिलखने की आवाज़ आ रही थी। उसका तीन-चार साल का छोटा भाई भूख के मारे तड़प रहा था। दीपक का कलेजा मुँह को आ गया। वह अंदर भागा। छोटा भाई ज़मीन पर पड़ा-पड़ा रो रहा था, रोते-रोते उसका गला बैठ चुका था। भूख की वजह से उसका शरीर तवे की तरह तप रहा था—उसे तेज बुखार चढ़ चुका था।
दीपक अपनी माँ के पास गया और फूट-फूटकर रोने लगा। उसकी हिचकियाँ बंद होने का नाम नहीं ले रही थीं।
माँ ने दीपक को गले से लगा लिया और खुद की आँखों के आँसू पोंछते हुए बोली, "चुप हो जा मेरे बच्चे। रोया नहीं करते। हम गरीब हैं और गरीबों को यह सब बर्दाश्त करना ही पड़ता है। गरीबों के नसीब में दाना कम और ताना ज्यादा ही लिखा होता है।"
उसी समय, बाहर से एक कांपती हुई आवाज़ आई, "कोई है माई? भूखे को एक रोटी दे दो..."
दीपक ने बाहर झाँककर देखा। करकती धूप में एक बूढ़ा फकीर खड़ा था। उसके कपड़े फटे हुए थे, काँख में एक पुराना झोला लटका था और हाथ में लाठी थी। बुढ़ापे के कारण उसका शरीर और आवाज़ दोनों कांप रहे थे।
दीपक की माँ बाहर आई और हाथ जोड़कर बोली, "बाबा, माफ करना। हमारे घर में दो दिन से चूल्हा नहीं जला है। हम खुद भूखे पेट हैं, आपको क्या खिलाएँ?"
12 साल के दीपक ने अपने बहते आँसू पोंछे। उसने मन ही मन सोचा कि भले ही हमारे पास खाना नहीं है, लेकिन प्यासे को पानी तो पिला ही सकते हैं। वह झट से अंदर गया, एक गिलास और एक बड़ा लोटा भरकर ठंडा पानी ले आया।
"बाबा, खाना तो नहीं है, लेकिन आप यह पानी पी लीजिए," दीपक ने आदर से गिलास आगे बढ़ाया।
फकीर ने तृप्त होकर एक गिलास, फिर दूसरा गिलास पानी पिया। दीपक ने देखा कि फकीर बाबा धूप में निढाल हो रहे हैं। उसने कहा, "बाबा, बाहर बहुत तेज धूप है। आप बीमार पड़ जाएँगे। हमारी झोपड़ी के बगल में पीपल का पेड़ है, वहाँ खाट बिछी है। जब तक धूप ढलती नहीं, आप वहीं आराम कर लीजिए।"
फकीर बाबा दीपक के इस व्यवहार और निस्वार्थ सेवा से बेहद प्रसन्न हुए। वे पीपल की ठंडी छाँव में खाट पर बैठे ही थे कि अंदर से छोटे बच्चे के रोने की करुण आवाज़ आई।
फकीर ने पूछा, "माई, यह बच्चा इतनी देर से क्यों रो रहा है? इसका गला भी फँसा हुआ लग रहा है।"
माँ ने सिसकते हुए कहा, "क्या बताऊँ बाबा, भूख के मारे तड़प रहा है। रोते-रोते तेज बुखार चढ़ गया है। दवा के लिए एक पैसा भी नहीं है हमारे पास।"
फकीर बाबा ने तुरंत अपने झोले में हाथ डाला और कुछ सूखी जड़ी-बूटियाँ निकालीं। उन्होंने माँ को देते हुए कहा, "माई, इसे सिलवट पर पीसकर बच्चे को चट दो। और यह एक बिस्किट का पैकेट है, इसे खिला देना। खाली पेट भी यह जड़ी-बूटी असर करेगी, बच्चा ठीक हो जाएगा।"
माँ ने वैसा ही किया। जड़ी-बूटी और बिस्किट खाते ही मासूम बच्चे को राहत मिली, उसका रोना बंद हुआ और वह खाट पर ही सो गया। फकीर बाबा भी थोड़ा विश्राम करने लगे।
शाम को जब धूप ढली, तो फकीर बाबा उठे। दीपक तुरंत लोटा भरकर पानी ले आया ताकि बाबा हाथ-मुंह धो सकें।
दीपक ने आदर से कहा, "बाबा, आप बहुत अच्छे हैं। आपके आते ही हमारे घर का दुख दूर हो गया। मेरा भाई मुस्कुराने लगा।"
फकीर ने दीपक के सिर पर हाथ रखकर कहा, "बेटा, अच्छे तो तुम हो। तुमने इस कड़कती धूप में मुझे पानी पिलाया, अपनी छाँव में जगह दी। तुम जैसे दिल वाले लोग ही आगे चलकर महान बनते हैं।"
दीपक का चेहरा उदास हो गया। उसने कहा, "नहीं बाबा, हम गरीब कभी महान नहीं बन सकते। हमारी किस्मत ही खराब है। भगवान ने गरीबों के नसीब में सिर्फ दर-दर की ठोकरें लिखी हैं।"
फकीर बाबा मुस्कुराए और बोले, "बेटा, भगवान पर दोष देना बंद करो। भगवान किसी की किस्मत खराब नहीं बनाते। इंसान खुद अपनी किस्मत बनाता है। एक बात बताओ, क्या तुम्हारे घर में रोटी अपने आप बन जाती है?"
दीपक ने झट से कहा, "नहीं बाबा! माँ को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। आटा गूथना पड़ता है, चूल्हा जलाना पड़ता है, तवा गर्म करके रोटी बेलनी और सेंकनी पड़ती है। तब जाकर रोटी बनती है।"
फकीर ने दीपक की आँखों में आँखें डालकर कहा, "बस बेटा! यही जीवन का सच है। जैसे बिना मेहनत के रोटी नहीं बनती, वैसे ही बिना कर्म के नसीब नहीं बनता। अगर तुम मेहनत करोगे, तो अपना नसीब खुद लिख लोगे।"
बाबा तो लाठी टेकते हुए चले गए, लेकिन उनकी यह बात 12 साल के दीपक के दिल में तीर की तरह गड़ गई।
अगले ही दिन से दीपक ने गाँव के उन लोगों पर नज़र रखनी शुरू की जो रोज़ सुबह टिफिन लेकर काम पर निकलते थे। तीसरे दिन, उसने देखा कि 40-45 साल का एक व्यक्ति रोज़ पैदल तीन-चार किलोमीटर दूर एक फैक्ट्री की तरफ जाता है। दीपक चुपके से उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
तेज धूप में 4 किलोमीटर पैदल चलने के बाद, दीपक एक बहुत बड़ी फैक्ट्री के लोहे के भारी गेट के सामने खड़ा था। उसके छोटे-छोटे पैर धूल से सने थे और साँस फूल रही थी।
गेट पर खड़े दरबान (गेटमैन) ने दीपक को देखा और पूछा, "अरे बच्चे! यहाँ क्या कर रहे हो? यह कोई खेलने की जगह नहीं है।"
दीपक ने हाथ जोड़कर तड़पते हुए कहा, "अंकल, मुझे काम चाहिए। मेरे घर में छोटा भाई भूखा है। मुझे कोई भी काम दे दो!"
गेटमैन का दिल पिघल गया। वह जानता था कि इतने छोटे बच्चे को काम पर रखना कानूनन और कंपनी के नियमों के खिलाफ है, लेकिन बच्चे की आँखों का दर्द देखकर वह मना नहीं कर पाया। वह अंदर सुपरवाइजर के केबिन में गया और सारी बात बताई।
सुपरवाइजर ने बिगड़ते हुए कहा, "पागल हो गए हो क्या? बाल-मजदूरी करवाओगे? जाओ उसे भगाओ यहाँ से!"
गेटमैन ने मिन्नत की, "सर, एक बार खुद जाकर उसे देख लीजिए। बहुत लाचार लग रहा है। आप कह देंगे तो वह चला जाएगा।"
सुपरवाइजर झल्लाते हुए उठ ही रहा था कि तभी कंपनी का एक पुराना मजदूर भागता हुआ आया और बोला, "सर! मालिक आपको तुरंत अंदर बुला रहे हैं, बहुत अर्जेंट काम है।"
सुपरवाइजर ने उस मजदूर से कहा, "सुनो, गेट पर एक छोटा बच्चा काम मांगने की जिद कर रहा है। तुम जाकर उसे समझाकर भगा दो, मैं मालिक से मिलकर आता हूँ।"
वह मजदूर तुरंत बाहर गेट की तरफ गया। जैसे ही उसने उस 12 साल के बच्चे का चेहरा देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
वह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि उसी के टोले का रहने वाला दीपक था, जिसकी जर्जर और बदतर हालत से वह मजदूर अच्छी तरह वाकिफ था...
प्रस्तुतीकरण:
सेन सारथी टीम (The Sen Saarthi Team)
इस शृंखला का अगला भाग यहाँ पढ़ें।
(क्या वह पड़ोसी मजदूर दीपक को डांटकर भगा देगा या उसकी मदद करेगा? क्या दीपक अपनी मेहनत से
गरीबी का कलंक धो पाएगा? जानिए अगले भाग में...)
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अस्वीकरण (Disclaimer):
काल्पनिक रचना: यह कहानी पूरी तरह से एक काल्पनिक (Fictional) रचना है। इस कहानी के सभी पात्र, स्थान, घटनाएँ, संस्थाएँ और संवाद लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य केवल पाठकों का मनोरंजन करना, जीवन के नैतिक मूल्यों (कर्म और समय के महत्व) पर प्रकाश डालना और सकारात्मक प्रेरणा देना है।
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