स्मृति शेष: क्रांति (भाग 3) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू

महात्मा ज्योतिराव फुले के प्रति श्री रामलखन शर्मा की काव्यात्मक श्रद्धांजलि और सामाजिक विचार
सांकेतिक संपादन



प्रस्तावना: 

जब शब्दों में उतरी सामाजिक क्रांति!

​क्या एक कविता किसी समाज की सोई हुई चेतना को जगा सकती है? क्या 19वीं सदी के एक महापुरुष के विचार आज के दौर की गुत्थियों को सुलझा सकते हैं?
​श्रृंखला के इस तीसरे भाग में, सुरेंद्र प्रसाद शम्भू हमें ले चलते हैं 2016 की उस ऐतिहासिक गांधी जयंती की सभा में, जहाँ लखीसराय का कोना-कोना रामलखन शर्मा जी की ओजस्वी वाणी से गूँज उठा था। यह लेख केवल एक महापुरुष का स्मरण नहीं है, बल्कि 'माली' और 'नाई' के उस अटूट रिश्ते की दास्तां है जो समाज को एक सुंदर 'मानव बगीचा' बनाने का सपना देखती है।
​इस भाग की जान है वह दुर्लभ कविता, जो महात्मा ज्योतिराव फुले के संघर्षों को सीधे आपके हृदय तक उतार देगी। आइए, जानते हैं कि क्यों आज के इस आधुनिक युग में भी हमें एक नए 'फुले' की तलाश है और क्यों रामलखन जी की वह पुकार आज भी प्रासंगिक है।

इतिहास, संवेदना और क्रांति का एक अद्भुत संगम—पढ़िए इस श्रृंखला की सबसे भावुक कड़ी।




• भाग 2 (Recap): 

में हमने देखा कि कैसे शम्भू जी को 'बाबा धर्मदास जन सेवा ट्रस्ट' की कमान मिली। रामलखन जी के साथ देशव्यापी दौरों और 1998 की अनुशासन प्रिय घटनाओं के बीच एक गहरा रिश्ता पनपा, जहाँ रामलखन जी ने शम्भू जी के भीतर एक भावी 'फुले' की छवि देखी।

अब आगे... (भाग 3)


सामाजिक चेतना का महाकुंभ: जब लखीसराय की धरती पर याद आए राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले

​कुछ तारीखें और कुछ सभाएँ महज़ कैलेंडर का पन्ना या लोगों का हुजूम नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की अंतरात्मा को झकझोरने वाला एक जीवंत दस्तावेज़ बन जाती हैं। आज से करीब एक दशक पहले, 2 अक्टूबर 2016 की उस सुहानी सुबह को याद कीजिए। पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के पावन अवसर पर सत्य और अहिंसा के मार्ग को याद कर रहा था। उसी पावन दिन, बिहार के लखीसराय में स्थित के.एस.एस. कॉलेज का विशाल प्रांगण एक ऐतिहासिक वैचारिक मंथन का गवाह बन रहा था।
​'लखीसराय जिला नाई समुदाय' और 'बाबा धर्मदास जन सेवा ट्रस्ट' के संयुक्त तत्त्वाधान में आयोजित उस विशाल सभा में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। दूर-दूर से आए लोगों की आँखों में अपने समाज को बेहतर बनाने की एक तड़प थी। हवाओं में एक अजीब सी गंभीरता थी और मंच से उठने वाली हर आवाज़ सीधे पंडाल में बैठे आखिरी व्यक्ति के दिल को छू रही थी।
​वक्ताओं की कसक: "हमें आज फिर एक ज्योतिराव फुले चाहिए!"
​जैसे-जैसे सभा आगे बढ़ी, समकालीन सामाजिक चुनौतियों पर विमर्श गहराता गया। मंच से जब मुख्य वक्ताओं ने बोलना शुरू किया, तो अचानक चर्चा की दिशा आधुनिक भारत में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत, महान क्रांतिकारी महात्मा ज्योतिराव फुले की तरफ मुड़ गई। वक्ताओं के कंठ में एक कसक थी, एक गहरी छटपटाहट थी। उन्होंने बेहद शिद्दत और भावुकता के साथ समाज के प्रबुद्ध वर्ग के सामने एक यक्ष प्रश्न और एक पुरज़ोर मांग रखी—
​"इस बिखराव और वैचारिक अंधकार के युग में, हमें आज अपने बीच फिर से एक ज्योतिराव फुले चाहिए!"
​यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि बदलते दौर में अपनी जड़ों को तलाशते और हकों के लिए संघर्ष करते एक समाज की अंतरात्मा की पुकार थी। 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे की पावन धरती पर जन्मे ज्योतिराव फुले ने समाज के जिस शोषित और वंचित तबके को अपने सीने से लगाया था, उसकी गूँज सदियों बाद भी लखीसराय की इस सभा में साफ महसूस की जा रही थी। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि फुले जी किसी एक जाति या विशेष 'माली समाज' के बंधनों में नहीं बंधे थे, बल्कि वे तो संपूर्ण मानव समाज के दुखों को दूर करने के लिए विधाता द्वारा भेजा गया एक 'दर्पण' थे—एक ऐसा आईना, जिसमें समाज अपनी कुरीतियों और अपनी कमियों को साफ-साफ देख सकता था।
​माली और नाई: एक ही सिक्के के दो पहलू
​उसी गरिमामयी सभा में अतीत के पन्नों को पलटते हुए पंडित रेवती शर्मा जी के उन ऐतिहासिक और मर्मस्पर्शी शब्दों को भी बड़े आदर के साथ याद किया गया, जो उन्होंने कभी एक नाई सभा के दौरान कहे थे। उनके उस विचार में सामाजिक समरसता और सह-अस्तित्व की एक ऐसी खुशबू थी, जो आज के दौर में भी प्रासंगिक है। पंडित जी ने कहा था:
​"नाई और माली समाज वास्तव में एक ही सिक्के के दो खूबसूरत पहलू हैं। दोनों का मूल काम संवारना और निखारना है। प्रकृति के स्तर पर देखें तो माली यदि कुदरत के बिखरे हुए बगीचे को अपने पसीने से सींचकर, काट-छाँटकर सुंदर और दर्शनीय बनाता है, तो दूसरी तरफ नाई समाज अपनी अद्वितीय कला और कौशल से 'मानव रूपी बगीचे' को निखारने का काम करता है। दोनों के बिना यह संसार अधूरा है।"
​इस विचार ने पंडाल में बैठे हर व्यक्ति के भीतर आत्मसम्मान और गौरव का एक नया संचार कर दिया।
​रामलखन जी की काव्यात्मक पुकार: आँखों की नमी और दिल की धड़कन
​सभा के इस वैचारिक और भावुक माहौल के बीच मंच पर आगमन हुआ श्री रामलखन जी का। रामलखन जी महज़ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि नाई समाज की दशा, दिशा और उसके भविष्य को लेकर दिन-रात चिंतित रहने वाले एक संवेदनशील मार्गदर्शक और कवि-हृदय व्यक्तित्व हैं। जब-जब वे समाज में फैली कुरीतियों, आपसी ईर्ष्या, अज्ञानता के अंधकार और पिछड़ेपन को देखते थे, तो उनके भीतर का कवि तड़प उठता था।
​उस दिन भी महात्मा फुले को नमन करते हुए उनके भीतर की वेदना शब्दों के सैलाब में बदल गई। उन्होंने हाथ में माइक थामा और अपनी लिखी एक मर्मस्पर्शी कविता का पाठ शुरू किया। उनकी बुलंद लेकिन भावुक आवाज़ ने मानो पूरे के.एस.एस. कॉलेज प्रांगण को मंत्रमुग्ध कर दिया। वह कविता आज भी जब सुनी या पढ़ी जाती है, तो उस ऐतिहासिक सभा के मनोभावों को पूरी तरह जीवंत कर देती है।
कविता: हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें प्रणाम
​— श्री रामलखन जी
"एक माली के घर जन्म लिया, पर किया अनोखा काम,
हे फुले ज्योतिबा! मेरा, शत-शत तुम्हें प्रणाम।
​था सभी जगह समाज में, शोषण और अन्याय,
छुटकारे का नहीं किसी को, सूझा कोई उपाय।
राह दिखाई आगे चलकर, निशि-वासर (दिन-रात) आठों याम,
हे फुले ज्योतिबा! मेरा, शत-शत तुम्हें प्रणाम।
​डग-डग पर दृष्टिगोचर था, घृणा-द्वेष का राज,
निर्बल पर बलवान झपटता, बगुले पर जैसे बाज।
छाया से भी छूत लगे था, अछूत था मानव चाम,
हे फुले ज्योतिबा! मेरा, शत-शत तुम्हें प्रणाम।
​विषमता की वह खाई, जैसे कोढ़ में हो खाज,
झकझोरने पर भी न जागे, ऐसा था यह समाज।
लगा तुम्हें कि बिन शिक्षा के, सफल न होगा काम,
हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत मेरा प्रणाम।
​कहाँ पढ़ें और कौन पढ़ाए? उठी समस्या भारी,
बुला-बुला के लगे पढ़ाने, तुम खुद ही नर-नारी।
प्रथम शिक्षिका भारत की, तब बना पत्नी का नाम,
हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत मेरा प्रणाम।
​नर-नारी समता का दर्शन, तुमने दिया अनोखा,
कहा कि मानव-मानव में भेद, है सबसे बड़ा धोखा।
जब एक ही रक्त और चाम है, फिर कैसा भेदभाव?
हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत मेरा प्रणाम।
​चमका सूर्य सच्चाई का, जब फटा झूठ का बादल,
मुँह मलिन हुए उनके, जिनके दामन में था काजल।
घर तेरा बन गया पीड़ित जनता का पावन धाम,
हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत मेरा प्रणाम।
​सुंदर कार्य तुम्हारा, आखिर दुनिया ने पहचाना,
मेहनत की महिमा का लोहा, दुश्मन ने भी माना।
सम्मानित किया श्रद्धा से, तुम्हें लोग खास और आम,
हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत मेरा प्रणाम।
​एक सदी के बाद तुम्हारी बात ले लोहिया-गांधी,
भारत भू पर पुनः चलाई आंदोलनों की आंधी।
तुमसे ही प्रेरित होकर, आंबेडकर ने किया सुंदर काम,
हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत मेरा प्रणाम।
​वर्तमान में जब तक धरती पर होगी जुल्म-मनमानी,
इसे मिटाने की प्रेरणा देगी, बस तेरी ही वाणी।
हे सामाजिक क्रांति के जनक! तेरी सेवा थी निष्काम,
हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत मेरा प्रणाम।"

कविता का अंतर्निहित भाव और समाज की तड़प

​रामलखन जी की कविता की एक-एक पंक्ति जब हवा में गूँज रही थी, तो वहाँ मौजूद कई बुजुर्गों की आँखें नम थीं और युवाओं की मुट्ठियाँ भिंच गई थीं। इस कविता का भाव यह साफ बयां करता है कि जिस दौर में इंसान की परछाई से भी नफरत की जाती थी, जब कमज़ोरों पर ताकतवर इस तरह टूटते थे जैसे मासूम पक्षी पर बाज़ झपटता है, उस भयानक अंधकार में ज्योतिराव फुले ने शिक्षा का दीया जलाया।
​जब समाज को जगाने की कोई राह न सूझी, तो फुले जी ने यह भांप लिया कि बिना शिक्षा के कोई भी समाज तरक्की नहीं कर सकता। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी माता सावित्रीबाई फुले को देश की पहली शिक्षिका बनाया और घर-घर जाकर दबे-कुचले लोगों को अक्षरों का ज्ञान दिया। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि जब सबका खून एक है, चमड़ी एक है, तो फिर यह ऊंच-नीच का भेद सिर्फ एक धोखा है। यही कारण था कि उनका घर अनाथों और सताए हुए लोगों के लिए एक पावन मंदिर बन गया था। आगे चलकर डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा गांधी और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों ने भी इसी वैचारिक आंधी को आगे बढ़ाया।
​निष्कर्ष: आज के दौर में प्रासंगिकता और सच्चे नेतृत्व की तलाश
​आज जब हम पीछे मुड़कर लखीसराय के उस समागम को देखते हैं, तो महसूस होता है कि वर्तमान समय का नाई समाज भी वैचारिक भटकाव के दौर से गुज़र रहा है। आज फिर समाज को एक ऐसे ही निस्वार्थ, त्यागी और निष्काम कर्मयोगी मार्गदर्शक की शिद्दत से तलाश है जो राजनीति या स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज का हाथ थाम सके।
​भूल-चूक होना, कमियाँ होना या अच्छा-बुरा सोचना तो इंसानी फितरत का हिस्सा है, लेकिन अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर, अपनी पूरी जवानी और अपना पूरा जीवन समाज के उत्थान के लिए हंसते-हंसते न्यौछावर कर देने का जज़्बा हर किसी के भीतर नहीं होता। यह जज़्बा विरले ही लोगों में होता है। शायद यही वजह है कि जब-जब समाज के भीतर अज्ञानता का, आपसी फूट का या अधिकारों के हनन का अंधकार गहराता है, हमें महात्मा ज्योतिराव फुले की याद बरबस ही सताने लगती है और हमारा दिल कह उठता है—"हे फुले ज्योतिबा! तुम्हें शत-शत प्रणाम।"
संस्मरण व शब्द-संयोजन: 
सुरेन्द्र प्रसाद शंभू




"यह लेख श्रृंखला का तीसरा भाग है।"

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🌟 लेख से जुड़ी कुछ अनमोल प्रेरणाएँ (आपके लिए)

इस लेख में हमने रामलखन जी की उस ओजस्वी कविता को पढ़ा जिसने समाज को एक 'मानव बगीचा' बनाने का संदेश दिया। यदि आप भी इस विचारधारा को अपने जीवन और घर का हिस्सा बनाना चाहते हैं, तो ये सुझाव आपके काम आएंगे:

  • सत्यशोधक समाज की मशाल: महात्मा फुले की जीवनी लेख में वर्णित उन संघर्षों को विस्तार से जानने के लिए, जहाँ ज्योतिबा फुले ने समाज के शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई, यह प्रामाणिक पुस्तक अवश्य पढ़ें। यह आपको उस 'क्रांति के सूर्य' के और करीब ले जाएगी।
  • आज ही पढ़ें: Jyotirao Phule Life and Mission (Hindi)


पाठकों से अपील:

क्या आपको भी लगता है कि आज के आधुनिक युग में भी हमें ज्योतिराव फुले जैसे विचारों की आवश्यकता है? रामलखन जी की यह कविता आपके दिल के किस कोने को छू गई? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें—आपका एक विचार समाज में बदलाव की नींव बन सकता है! 👇

 

© 2026 सेन सारथी (Sen Saarthi). सर्वाधिकार सुरक्षित।

इस लेख की मुख्य सामग्री और वैचारिक प्रस्तुति श्री सुरेन्द्र प्रसाद शंभू की है, तथा इसमें शामिल विशेष कविता श्री रामलखन जी की मौलिक रचना है। इस लेख या कविता के किसी भी हिस्से को डिजिटल, प्रिंट या किसी अन्य माध्यम में बिना पूर्व लिखित अनुमति के कॉपी-पेस्ट करना, पुनरुत्पादित (Reproduce) करना या व्यावसायिक रूप से उपयोग करना सख्त वर्जित है। उचित क्रेडिट और लिंक के साथ केवल साझा (Share) करने की अनुमति है।

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार और संस्मरण पूरी तरह से लेखक/संस्मरणकर्ता के निजी अनुभवों और 2 अक्टूबर 2016 को लखीसराय में आयोजित सामाजिक सभा के वास्तविक घटनाक्रम पर आधारित हैं। लेख में शामिल कविता श्री रामलखन जी की अपनी सामाजिक और काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। इस सामग्री का उद्देश्य किसी भी जाति, समुदाय, धर्म या भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि महात्मा ज्योतिराव फुले के विचारों और सामाजिक समरसता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाना है।

टिप्पणियाँ

  1. Mai sen Samaj me karyarat hone ke bavjud bhi itna nhi jan saka tha, apke lekh padhne ke bad dhire dhire apne samaj ke bare me jaan raha hun

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