स्मृति शेष: विरासत (भाग 2) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू

समाजसेवी शंभू ठाकुर और श्री रामलखन शर्मा के बीच सामाजिक एकता और सेवा का अटूट संबंध
सांकेतिक संपादन



प्रस्तावना: 

समाज के 'सविता रत्न' की कलम से...

किसी भी समाज का उत्थान केवल नारों से नहीं, बल्कि उन अनकहे संघर्षों और अटूट विश्वास से होता है, जो पर्दे के पीछे रहकर लड़े जाते हैं। प्रस्तुत संस्मरण 'सविता रत्न' सुरेन्द्र प्रसाद शंभू (शंभू ठाकुर) जी के उन अनुभवों की जीवंत झांकी है, जिन्होंने नाई समाज की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
यह मात्र एक कहानी नहीं है, बल्कि एक कर्मठ अध्यक्ष और एक दूरदर्शी मार्गदर्शक रामलखन शर्मा जी के बीच के उस आत्मीय संबंधों का दस्तावेज़ है, जहाँ शब्द शंभू जी के थे, लेकिन संकल्प रामलखन जी का। आखिर क्यों एक कड़क अनुशासनप्रिय नेता ने समाज के भीतर 'ज्योतिराव फुले' की खोज शुरू की? और कैसे सम्मान की एक चमक ने दो व्यक्तित्वों के सपनों को एक कर दिया?

आइए, शंभू ठाकुर जी की इस भावुक और प्रेरक यात्रा का हिस्सा बनें, जहाँ समाज को संवारने का जज्बा किसी जुनून से कम नहीं है।


पिछले भाग में आपने पढ़ा:

पेशे से शिक्षक और वर्तमान में 'बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट' के अध्यक्ष, सुरेंद्र प्रसाद शम्भू (शंभू ठाकुर) जी ने अपनी जड़ों से जुड़ाव की कहानी साझा की। साल 1984 की वह शाम, जब सूर्यगढ़ा बाजार की एक सभा में श्रद्धेय श्री रामलखन शर्मा जी के ओजस्वी विचारों ने शम्भू जी के जीवन की दिशा बदल दी। अपने मित्र हनुमान ठाकुर के साथ उस सभा में पहुँचे शम्भू जी ने पहली बार समाज के दर्द और उसे संवारने के संकल्प को महसूस किया।

अब आगे की कहानी...


समाज सेवा की मशाल: रामलखन जी और मेरा सफर

बाबा धर्मदास जी के प्राचीन और पवित्र मंदिर निर्माण का कार्य अपनी अत्यंत धीमी गति से आगे बढ़ रहा था। ईंटों और पत्थरों के जुड़ने की वह धीमी रफ्तार मानो हमारे सब्र की परीक्षा ले रही थी। निर्माण की इस कशमकश के बीच, एक दिन समाज के प्रबुद्ध जनों की बैठक हुई और वहाँ सर्वसम्मति से एक ऐसा निर्णय लिया गया जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी। मुझे 'बाबा धर्मदास जन सेवा ट्रस्ट' का अध्यक्ष चुन लिया गया। सच कहूँ तो, जब वह दायित्व मेरे नाम किया गया, तो मुझे कोई खुशी या अहंकार महसूस नहीं हुआ; बल्कि मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सीधे-सादे कंधों पर एक बहुत बड़ी, भारी और पवित्र जिम्मेदारी का बोझ रख दिया गया हो। पद तो केवल कागजों पर चमका करते हैं, लेकिन जनसेवा का जो काँटों भरा ताज मुझे पहनाया गया था, उसका अहसास मेरी रूह तक को था।
इस नए और चुनौतीपूर्ण सफर में ईश्वर ने मुझे अकेले नहीं छोड़ा। मेरे मार्गदर्शक और साथी भाई रामलखन जी का व्यक्तित्व बड़ा ही विलक्षण और अनूठा था। उनका जीवन पूरी तरह समाज को समर्पित था, और समाज सेवा के इस महायज्ञ में वे मुझे अपने साथ जोड़े बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाते थे। उन्हें जब भी समाज के उत्थान के सिलसिले में, लोगों को जगाने के लिए बाहर जाने का जरा सा भी अवसर मिलता, वे अपने इस छोटे भाई को अपने साथ ले लेना कभी नहीं भूलते थे। हमारा यह साथ केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विचारों का एक अटूट संगम बन चुका था।
चाहे बेगूसराय के धूल भरे मैदानों में आयोजित बड़े सम्मेलन हों, मुंबई की चमकती और भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच हुई सभाएँ हों, या कोलकाता की ऐतिहासिक गलियों में सजे मंच हों—हम दोनों ने हर जगह कदम से कदम मिलाकर सफर किया। मुंगेर प्रमंडल के अंतर्गत आने वाले विभिन्न जिलों के सुदूर गाँवों और कस्बों में जाकर हमने समाज के सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए मिलकर आवाज उठाई। बिहार की हृदयस्थली पटना में आयोजित हुईं न जाने कितनी ही सभाओं को हमने मंच पर खड़े होकर संबोधित किया। उन यात्राओं और सभाओं के दौरान अक्सर एक बेहद भावुक करने वाला दृश्य उभरता था; रामलखन जी कई बार अपनी गहरी बातों, अपनी दूरदर्शी सोच और अपने भीतर की तड़प को सीधे खुद न कहकर, मेरे जरिए जनता के सामने कहलवा देते थे। जब वे मंच पर मेरे पीछे खड़े होकर मंद-मंद मुस्कुराते थे, तो उनकी आँखों में मेरे प्रति जो अटूट, निश्छल और गहरा विश्वास झलकता था, वह मेरे भीतर एक नई ऊर्जा फूंक देता था। वही विश्वास मुझे बार-बार अपनी थकावट भूलकर, खुद को समाज के प्रति पूरी तरह समर्पित कर देने के लिए प्रेरित करता था।

अनुशासन और क्रोध का पवित्र संगम

रामलखन जी का स्वभाव गंगा की तरह शांत और सरल था, लेकिन समाज के दुश्मनों और कुरीतियों के लिए वे वज्र की तरह कठोर हो जाते थे। वे जितने कोमल दिल के थे, समाज विरोधी तत्वों के लिए उतने ही भयानक भी बन सकते थे। कई बार ऐसा हुआ कि स्वजातीय सभाओं में, जहाँ अपनों के कल्याण की बातें हो रही होती थीं, वहाँ जब हमारे अपने ही लोग समाज को पीछे धकेलने वाले कार्यों या अनुशासनहीनता में लिप्त पाए जाते, तो रामलखन जी का धैर्य जवाब दे जाता था। उस समय वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के समान क्रोधित हो उठते थे। उनकी आँखों में समाज को बिखरने से बचाने की तड़प साफ देखी जा सकती थी। वे किसी भी कीमत पर अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करते थे और समाज की भलाई के लिए भरी सभा में दोषियों को डांटने या दंड देने से भी कभी पीछे नहीं हटते थे।
उनकी इसी कड़क और अनुशासित छवि से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना आज भी मेरे मानस पटल पर पूरी तरह जीवंत है। यह बात साल 1998 की है, जब सूर्यगढ़ा के पावन बाबा विश्वकर्मा मंदिर के प्रांगण में एक विशाल सभा का आयोजन हुआ था। वहाँ अनुशासन तोड़ने वालों को जिस तरह उन्होंने फटकार लगाई और समाज की मर्यादा की रक्षा की, उसकी गूंज आज भी मेरे कानों में गूंजती है। वह गुस्सा स्वार्थ का नहीं, बल्कि समाज को सुधारने का एक पवित्र प्रयास था।

माली, नाई और समाज का दर्पण

रामलखन जी का जीवन को देखने का नजरिया बहुत दार्शनिक और गहरा था। वे अक्सर अपनी चर्चाओं में एक बेहद खूबसूरत बात कहा करते थे कि इस दुनिया में माली और नाई असल में एक ही सिक्के के दो खूबसूरत पहलू हैं। दोनों का कर्म एक जैसा है, बस क्षेत्र अलग हैं। एक कुशल माली जिस तरह बगीचे के बिखरे हुए काँटों को हटाता है, सूखी झाड़ियों को काटता है और पेड़-पौधों को सलीके से संवारकर पूरे उपवन को सुंदर और सुवासित बना देता है; ठीक वैसे ही, एक नाई मनुष्य की बाहरी कमियों को दूर करके, उसकी कुरूपता को एक सुंदर स्वरूप में ढाल देता है। वे इन दोनों पेशों में समाज को संवारने की अद्भुत कला देखते थे।
रामलखन जी हमेशा अपने नाई समाज के भीतर एक ऐसे 'दीपक' की तलाश में व्याकुल रहते थे, जो अज्ञानता और पिछड़ेपन के अंधेरे को चीर सके। वे चाहते थे कि हमारे बीच से कोई ऐसा व्यक्तित्व उठ खड़ा हो जो महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले की तरह क्रांति का बिगुल फूंक दे और पूरे समाज को एक नई, प्रबुद्ध दिशा में ले जा सके।
अंधेरे के उस दौर में प्रकाश की एक महीन किरण ढूंढते हुए, उन्होंने न जाने कितनी ही बार भरी सभाओं में और एकांत में मेरा (सुरेन्द्र प्र० शंभु) नाम लिया। वे जब भी मेरी तुलना फुले जी से करते, मेरा हृदय संकोच और आदर से भर उठता था। आज भी मैं पूरी विनम्रता और हाथ जोड़कर यही मानता हूँ कि मैं उस महान युगपुरुष महात्मा ज्योतिराव फुले जी के पैरों की धूल के योग्य भी नहीं हूँ, जिन्होंने अपना पूरा जीवन शोषितों और समाज के कल्याण के लिए होम कर दिया था। लेकिन रामलखन जी की उम्मीदें हार मानने वाली नहीं थीं। साल 2015 के बाबा धर्मदास पूजनोत्सव के पावन अवसर पर भी, जब चारों तरफ भक्ति का माहौल था, उन्होंने मंच से समाज को संबोधित करते हुए एक बार फिर फुले जी के महान कार्यों का जिक्र किया। उनकी भावुक नजरें हमेशा नाई समाज के भीतर छिपे हुए उसी नेतृत्व, उसी चिंगारी को खोजती रहीं जो एक दिन मशाल बनकर पूरे समाज का उद्धार और उत्थान कर सके।

एक मार्गदर्शक का अटूट विश्वास

लखीसराय जिला संयोजक के पद को सुशोभित करने वाले आदरणीय श्री रामलखन शर्मा जी के ओजस्वी भाषणों का एक-एक अंश आज भी एक अनमोल धरोहर की तरह मेरे हृदय के सबसे करीब सुरक्षित है। वह पल मेरे जीवन का सबसे भावुक क्षण बन गया जब उन्हें पहली बार यह शुभ समाचार मिला कि मुझे समाज की ओर से प्रतिष्ठित 'सविता रत्न सम्मान' से नवाजा गया है। यह खबर सुनते ही बुजुर्ग रामलखन जी की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उनकी आँखें डबडबा आईं और चेहरा गौरव से चमक उठा। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि जिस वैचारिक 'फुले' की तलाश में वे सालों से भटक रहे थे, जिसे वे बाहर की दुनिया में खोज रहे थे, वह तो उनके अपने पास, उनके साथ ही चल रहा था।
उस सम्मान के बाद उनके मन का असमंजस पूरी तरह खत्म हो गया। तब से उन्होंने समाज के नेतृत्व के लिए कहीं और देखने के बजाय, पूरी तरह मुझ पर ही अपना सारा स्नेह, अपनी उम्मीदें और एक सच्चे मार्गदर्शक का आशीर्वाद रूपी हाथ रख दिया। उन्होंने अपने मन में यह सुंदर सपना संजो लिया कि मेरे जरिए समाज की इस मशाल को हमेशा रोशन रखा जाएगा। उनका वह पवित्र सपना और निश्छल स्नेह आज भी मेरी आँखों में आँसू और मेरे कदमों में समाज सेवा की शक्ति बनकर जिंदा है।

संस्मरणकर्ता:

सुरेंद्र प्रसाद शंभू



Note:-

"यह लेख श्रृंखला का दूसरा भाग है।"
अगला भाग-यहाँ पढ़ें।
पिछले भाग-यहाँ पढ़ें।


लेखक की कलम से

यह संस्मरण समाज के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी और एक मार्गदर्शक के विश्वास की कहानी है। रामलखन जी जैसे व्यक्तित्व आज भी समाज को सही दिशा दिखाने के लिए अनिवार्य हैं।
आपको यह संस्मरण कैसा लगा? क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा 'रामलखन' है जिसने आप पर अटूट विश्वास जताया हो? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें! ✍️





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अस्वीकरण (Disclaimer):

इस लेख में व्यक्त किए गए विचार, संस्मरण और घटनाएँ पूरी तरह से लेखक (श्री सुरेंद्र प्रसाद शंभू) के व्यक्तिगत अनुभवों और यादों पर आधारित हैं। इसका मुख्य उद्देश्य समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले जी के विचारों को बढ़ावा देना, रामलखन जी के सामाजिक योगदान को याद करना और समाज में सकारात्मक चेतना जगाना है। इस लेख का उद्देश्य किसी भी जाति, समुदाय, संस्था या व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या आहत करना नहीं है। लेख में उल्लिखित ऐतिहासिक संदर्भ (जैसे वर्ष 1998 और 2015 की घटनाएँ) लेखक की स्मृति और निजी रिकॉर्ड के अनुसार साझा किए गए हैं।

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