स्मृति शेष: विरासत (भाग 2) | सुरेंद्र प्रसाद शंभू
सांकेतिक संपादन प्रस्तावना: समाज के 'सविता रत्न' की कलम से... किसी भी समाज का उत्थान केवल नारों से नहीं, बल्कि उन अनकहे संघर्षों और अटूट विश्वास से होता है, जो पर्दे के पीछे रहकर लड़े जाते हैं। प्रस्तुत संस्मरण 'सविता रत्न' सुरेन्द्र प्रसाद शंभू (शंभू ठाकुर) जी के उन अनुभवों की जीवंत झांकी है, जिन्होंने नाई समाज की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह मात्र एक कहानी नहीं है, बल्कि एक कर्मठ अध्यक्ष और एक दूरदर्शी मार्गदर्शक रामलखन शर्मा जी के बीच के उस आत्मीय संबंधों का दस्तावेज़ है, जहाँ शब्द शंभू जी के थे, लेकिन संकल्प रामलखन जी का। आखिर क्यों एक कड़क अनुशासनप्रिय नेता ने समाज के भीतर 'ज्योतिराव फुले' की खोज शुरू की? और कैसे सम्मान की एक चमक ने दो व्यक्तित्वों के सपनों को एक कर दिया? आइए, शंभू ठाकुर जी की इस भावुक और प्रेरक यात्रा का हिस्सा बनें, जहाँ समाज को संवारने का जज्बा किसी जुनून से कम नहीं है। पिछले भाग में आपने पढ़ा: पेशे से शिक्षक और वर्तमान में 'बाबा धर्मदास जनसेवा ट्रस्ट' के अध्यक्ष, सुरेंद्र प्रसाद शम्भू (शंभू ठाकुर) जी ने अपनी जड़ों ...