संदेश

परदेस का सफर: जब बीच रास्ते छूटा अपनों का हाथ

चित्र
लेखक की बात ​ यह कोई काल्पनिक कहानी या ड्रामा नहीं, बल्कि मेरे अपने जीवन का एक सच्चा संस्मरण है। जब घर पर कर्ज़ का भारी बोझ हो और सिर पर बहन की शादी की चिंता, तो पढ़ाई की मेज़ छोड़कर कंक्रीट उठाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बी.एससी. का एक छात्र, एक अनजान शहर (पंजाब) और अचानक बीच रास्ते में छूटा अपनों का हाथ—यह उस मुश्किल दौर का सच है जहाँ अकेलेपन ने मुझे जिम्मेदारियों से लड़ना सिखाया। ​यदि आप भी कभी जीवन की कठिन परिस्थितियों में अकेले पड़े हैं, तो यह सच्चा जीवन-अंश आपके दिल को ज़रूर छुएगा। बठिंडा जंक्शन का वो वीरान प्लेटफॉर्म और चारों तरफ गूँजती एक अनजान भाषा का शोर। हवा में कंक्रीट की धूल और गर्म राख की गंध तैर रही थी। 1000 किलोमीटर दूर, बिहार के अपने घर से मीलों दूर, पंजाब के इस तपते पावर प्लांट के मुहाने पर जब मेरे भारी जूतों ने पहला कदम रखा, तो पैर ज़मीन में धँस से गए। जेब में बी.एससी. प्रथम वर्ष का एडमिट कार्ड था और सिर पर एक ऐसा कर्ज़, जिसकी किश्तें चुकाने के लिए एक 18 साल के मासूम लड़के को किताबी दुनिया से खींचकर सीधे इस कंक्रीट के नरक में फेंक दिया गया था। लेकिन यह कहानी केवल...

किताबों से मजदूरी तक: घर बचाने की एक सच्ची कहानी

चित्र
लेखक की बात:  यह लेख समाज की वास्तविक परिस्थितियों और युवाओं के संघर्षों से प्रेरित एक काल्पनिक वृत्तांत है।   इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, स्थान या वास्तविक घटना से कोई संबंध नहीं है और न ही किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई उद्देश्य है। यह किसी एक व्यक्ति विशेष की कहानी न होकर, आर्थिक मजबूरियों के बीच सपनों से समझौता करते युवाओं के साझा सच को दर्शाती है। ​इसका उद्देश्य सामाजिक समझ विकसित करना और संघर्षरत युवाओं को प्रेरणा देना है, किसी पर विचार थोपना नहीं। पाठक अपनी परिस्थितियों और विवेक के आधार पर ही अपने जीवन के निर्णय लें। श्रेणी: जीवन-संघर्ष  पढ़ने का समय: 5-6 मिनट जीवन का सबसे बड़ा बदलाव अक्सर किसी ढोल-नगाड़े या पूर्व सूचना के साथ नहीं आता। वह बहुत चुपके से, अचानक और एक कड़वे मोड़ की तरह सामने आकर खड़ा हो जाता है। अक्सर लोग पूछते हैं कि किताबें हाथ से छूटकर फावड़ा और बोरी उठाने में कितना समय लगता है? मेरा जवाब होता है—"बस एक फैसले का समय।" लेकिन उस फैसले के पीछे सालों का वह मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह और घुटन छिपी होती है, जो किसी इंसान को अपनी काबिलियत औ...

जननायक कर्पूरी ठाकुर रत्न सम्मान: रामदास ठाकुर के संघर्ष की गाथा

चित्र
​प्रस्तावना: समाज सेवा और जन-चेतना का प्रतीक ​भारतीय समाज का इतिहास ऐसे अनगिनत संतों, विचारकों और समाजसेवियों के योगदान से समृद्ध रहा है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शोषित, पीड़ित और पिछड़े वर्गों के उत्थान में समर्पित कर दिया। ऐसे ही व्यक्तित्व किसी परिचय या औपचारिक प्रशंसा के मोहताज नहीं होते; उनका काम ही उनकी पहचान बन जाता है। ​बिहार की पावन धारा, विशेषकर बेगूसराय की माटी ने समय-समय पर ऐसे वीरों और समाज सुधारकों को जन्म दिया है जिन्होंने सामाजिक विषमता के खिलाफ आवाज़ उठाई। इसी श्रृंखला में श्री रामदास ठाकुर जी का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। ग्राम सीहमा (जिला बेगूसराय) के निवासी, स्व० घिनावन ठाकुर एवं स्व० धनेश्वरी देवी के पुत्र श्री रामदास ठाकुर जी का जीवन नाई समाज ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जन-सामान्य के अधिकार और स्वाभिमान की लड़ाई का जीवंत दस्तावेज़ है। ​हाल ही में समस्तीपुर जिले के नया टोला में आयोजित भव्य समारोह में उन्हें 'जननायक कर्पूरी ठाकुर रत्न सम्मान' से अलंकृत किया गया। यह विशेष लेख इस ऐतिहासिक अवसर पर श्री राम लखन शर्मा जी (अध्यक्ष, बाबा धर्मदास जन स...

त्याग, अधूरा ज्ञान और टूटते सपने: एक परिवार की कड़वी सच

चित्र
​ अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख के पात्र, स्थान और घटनाएँ समाज में घटने वाले विभिन्न वास्तविक अनुभवों और परिस्थितियों से प्रेरित एक पूर्ण काल्पनिक प्रस्तुति हैं। किसी भी  जीवित या मृत् व्यक्ति अथवा घटना से समानता महज़ एक संयोग है। इस कहानी का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि सही दिशा और व्यावहारिक सोच का संदेश देना है। हमारे समाज में अक्सर यह कहावत दोहराई जाती है कि "माता-पिता के फैसले कभी गलत नहीं होते।" लेकिन जब इसी अटूट विश्वास के पीछे अज्ञानता, झूठी शान की हवस और बिना सोचे-समझे उठाए गए कदमों का पर्दा पड़ जाए, तो एक हँसता-खेलता परिवार किस तरह तबाही के गहरे दलदल में धंसता चला जाता है—यह कहानी उसी कड़वी सच्चाई का एक जीता-जागता दस्तावेज़ है। ​अभावों की आग और नन्हे कंधों पर पहाड़ों का बोझ ​गाँव के एक सुदूर कोने में मिट्टी और ईंटों से खड़ा वह दो कमरों का छोटा सा मकान केवल एक ढाँचा नहीं था, बल्कि अभावों और लाचारियों का एक जीता-जागता पिंजरा था। घर की ज़मीन बस उतनी ही थी, जितने में वह मकान अपनी आखिरी साँसें गिन रहा था। भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के नाते रोशन...

सत्यं शिवं सुन्दरम्: भीतर छिपी चेतना की खोज

चित्र
प्रस्तावना: आदिम भय से सत्य की खोज तक यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक गहरी खामोशी में लिपटा हुआ था, जहाँ मनुष्य ने जब पहली बार अपनी आँखें खोलीं, तो उसके भीतर एक विस्मय था, एक असीम कौतूहल था। प्रकृति का वैभव उसके सामने बिखरा पड़ा था। विशाल नदियाँ, गरजते हुए बादल, धधकती अग्नि और नीले आकाश के उस पार चमकता हुआ सूर्य—इन सबने मानव मन को विस्मित भी किया और भयभीत भी। वैदिक काल के उस उषाकाल में, जब मनुष्य ने सभ्यता की दहलीज पर पहला कदम रखा था, तब आज के आधुनिक मंदिर अस्तित्व में नहीं आए थे। उस समय 'भगवान' जैसा कोई निश्चित शब्द भी मानव की जुबान पर नहीं चढ़ा था। हमारे पूर्वज सरल थे, उनका बोध सीधा और स्पष्ट था। वे किसी अदृश्य, काल्पनिक सत्ता के पीछे नहीं भागे, बल्कि उन्होंने केवल उन प्राकृतिक और भौतिक शक्तियों की उपासना शुरू की, जिनसे उनका खुद का अस्तित्व बना था। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश—ये पांच तत्व ही उनके रक्षक थे और इन्हीं में उनकी आस्था थी। विशेषकर, अंधकार को चीरने वाले प्रकाश के महापुंज, अग्नि के साक्षात प्रतीक 'सूर्य' की पूजा मुख्य तौर पर की जाती थी। परंतु, जैसे-जैसे समय का चक...

निराशा से गुरु-चरणों तक: एक शिव शिष्य की यात्रा

चित्र
 गंगा की शांत लहरों के किनारे, जब सुबह की पहली किरणें धरती को छूती हैं, तो एक असीम शांति का अनुभव होता है। ठीक वैसी ही शांति और स्पष्टता शिव शिष्य भाई राम लखन शर्मा जी के अंतर्मन में तब उमड़ी, जब उन्होंने अपनी डायरी के पन्नों पर जीवन का सबसे बड़ा सच लिखना शुरू किया। यह विचार केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि एक साधक के दिल की वह पुकार है जो निराशा के घने जंगलों से गुज़रकर गुरु के पावन चरणों तक पहुँचने का मार्ग दिखाती है। आइए, हम भी आत्मीयता के इस प्रवाह में बहते हुए इस आध्यात्मिक यात्रा को महसूस करें। जब संकल्प के मार्ग पर निराशा की परछाई पड़ती है मनुष्य का जीवन संकल्पों और उद्देश्यों की एक अविरल यात्रा है। हम सब अपने जीवन में किसी न किसी ऊँचे उद्देश्य को लेकर कर्म का पहला कदम बढ़ाते हैं। लेकिन, रास्ते हमेशा सीधे और सुगम नहीं होते। जब हमारे तमाम प्रयासों के बाद भी, किसी अनचाही परिस्थिति के कारण हमारा वह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता, तो मन के किसी सूने कोने में 'निराशा' चुपके से आकर बैठ जाती है। राम लखन शर्मा जी ने अपने अनुभवों को समेटते हुए लिखा कि यह निराशा केवल एक विचार नहीं रह जाती, ब...

शिवचर्चा और सच्ची श्रद्धा: शिव शिष्य के जीवन का सत्य

चित्र
ब्रह्मांड के कण-कण में रमे, देवाधिदेव महादेव की असीम अनुकंपा जब किसी जीव पर होती है, तो उसके भीतर एक ऐसी आध्यात्मिक जागृति का जन्म होता है जिसे शब्दों में समेटना समुद्र को गागर में भरने जैसा है। शिवचर्चा की पावन छांव में बैठकर, जब एक साधक अपने अंतर्मन को टटोलता है, तो उसे अहसास होता है कि गुरु और शिष्य के बीच का संबंध कोई लौकिक बंधन नहीं है। यह तो जन्म-जन्मांतर का वह आत्मिक सेतु है, जिस पर चलकर आत्मा सीधे परमात्मा से एकाकार हो जाती है। शिव शिष्य राम लखन शर्मा जी ने अपनी अंतर-अनुभूतियों को डायरी के पन्नों पर जिस आत्मीयता से उकेरा है, वह महज़ शब्द नहीं, बल्कि एक भक्त के हृदय की स्पंदन है, जो हर सनातन प्रेमी के मन को झंकृत कर देती है। आइए, राम लखन जी के उन्हीं दिव्य विचारों की गहराई में उतरकर सच्ची श्रद्धा और आत्मज्ञान के उस मर्म को समझें, जो हमारे जीवन को धन्य कर सकता है। श्रद्धा: हृदय का अनमोल स्पंदन, बुद्धि का खेल नहीं अक्सर लोग सोचते हैं कि श्रद्धा किसी तर्क या कसौटी पर कसी जा सकने वाली चीज़ है। परंतु सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। राम लखन जी कहते हैं कि श्रद्धा का सीधा संबंध हमारे हृदय क...