निराशा से गुरु-चरणों तक: एक शिव शिष्य की यात्रा
गंगा की शांत लहरों के किनारे, जब सुबह की पहली किरणें धरती को छूती हैं, तो एक असीम शांति का अनुभव होता है। ठीक वैसी ही शांति और स्पष्टता शिव शिष्य भाई राम लखन शर्मा जी के अंतर्मन में तब उमड़ी, जब उन्होंने अपनी डायरी के पन्नों पर जीवन का सबसे बड़ा सच लिखना शुरू किया। यह विचार केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि एक साधक के दिल की वह पुकार है जो निराशा के घने जंगलों से गुज़रकर गुरु के पावन चरणों तक पहुँचने का मार्ग दिखाती है। आइए, हम भी आत्मीयता के इस प्रवाह में बहते हुए इस आध्यात्मिक यात्रा को महसूस करें।
जब संकल्प के मार्ग पर निराशा की परछाई पड़ती है
मनुष्य का जीवन संकल्पों और उद्देश्यों की एक अविरल यात्रा है। हम सब अपने जीवन में किसी न किसी ऊँचे उद्देश्य को लेकर कर्म का पहला कदम बढ़ाते हैं। लेकिन, रास्ते हमेशा सीधे और सुगम नहीं होते। जब हमारे तमाम प्रयासों के बाद भी, किसी अनचाही परिस्थिति के कारण हमारा वह उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता, तो मन के किसी सूने कोने में 'निराशा' चुपके से आकर बैठ जाती है।
राम लखन शर्मा जी ने अपने अनुभवों को समेटते हुए लिखा कि यह निराशा केवल एक विचार नहीं रह जाती, बल्कि यह धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बनने लगती है। हमारे बात करने के तरीके में, हमारे रोज़मर्रा के काम-काज में यह इस तरह झलकने लगती है कि हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है। निराशा एक ऐसे घने कोहरे की तरह है, जो सामने खड़ी मंजिल को भी धुंधला कर देती है और हमारे मनोबल को भीतर से खोखला कर देती है। एक शिव शिष्य के रूप में जब हम अपने कर्तव्यों से पीछे हटने लगते हैं, तो हमें रुककर सोचना होगा कि आखिर हम पिछड़ क्यों रहे हैं?
धैर्य और संयम: हमारी कमजोरी नहीं, हमारे सच्चे सद्गुण
जब जीवन में सब कुछ हमारे मन के विपरीत हो रहा हो, तब अंतरात्मा से एक ही आवाज़ आती है—ठहर जाओ। यही ठहराव 'मंदन भाव' है। मन की इस चंचलता और उद्वेग को धीमा करना ही संयम की पहली सीढ़ी है। आज के इस भागदौड़ भरे संसार में, जहाँ हर किसी को तुरंत परिणाम चाहिए, वहाँ धैर्य रखना सबसे कठिन काम हो गया है।
अक्सर लोग सोचते हैं कि जो चुप है, जो परिस्थिति के सामने धैर्य रखकर सही समय का इंतज़ार कर रहा है, वह कमज़ोर है। लेकिन यह सांसारिक दृष्टिकोण कितना भ्रमित है! सच तो यह है कि धैर्य और संयम मनुष्य की कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे सदाचार के सबसे सुंदर प्रतीक हैं। जब हमारे सामने प्रतिकूल परिस्थितियाँ पहाड़ बनकर खड़ी हो जाएँ, तब यह धैर्य ही है जो हमें कोई गलत कदम उठाने से बचाता है। यदि हमारा आत्मबल, हमारा धैर्य और हमारा संयम अटूट है, तो संसार की कोई भी शक्ति हमें डिगा नहीं सकती; सफलता स्वयं चलकर हमारे निकट आएगी।
ऊर्जा का सृजन और गुरु के प्रति हमारी नासमझी
ईश्वर ने हर मनुष्य को ऊर्जा का एक अनमोल भंडार दिया है। प्रश्न यह है कि हम उस ऊर्जा का उपयोग कहाँ कर रहे हैं? जब हम निराश होते हैं, तो हमारी वह संचित ऊर्जा दुःख और विलाप में नष्ट होने लगती है। एक सच्चे साधक का कर्तव्य है कि वह अपनी उस ऊर्जा को समेटे और उसे सृजनात्मक कार्यों में लगाए। जब आपकी ऊर्जा से किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान आती है, जब परिवार और समाज का कल्याण होता है, तभी सही मायनों में शिव शिष्य होने का धर्म पूरा होता है।
परंतु, इंसानी स्वभाव भी कितना कोमल और नासमझ है। जब जीवन में छोटी सी भी भूल होती है या कोई संकट आता है, तो मनुष्य टूट जाता है। वह शिव चर्चा से, सत्संग से दूरी बना लेता है और जाने-अनजाने में अपने उस गुरु या ईश्वर को ही दोष देने लगता है जिसने उसे पाल-पोसकर इतना बड़ा किया। राम लखन जी इसे मनुष्य की सबसे बड़ी भूल मानते हैं। हम अक्सर ऐसी इच्छाएं और आशाएं पाल बैठते हैं जो हमारे सामर्थ्य से बाहर होती हैं, और जब वे पूरी नहीं होतीं, तो हम रोने लगते हैं। हमारी योजनाएं हमेशा हमारी शक्ति के अनुरूप होनी चाहिए, न कि ऐसी जो हमारे ही रास्तों का पत्थर बन जाएं।
निराशा को चुनौती समझकर शिरोधार्य करना
जीवन का एक अकाट्य सत्य यह भी है कि जब तक रात का घना अंधेरा नहीं होगा, तब तक सुबह के उजाले की कीमत समझ में नहीं आएगी। ठीक इसी तरह, जब तक जीवन में निराशा का सामना नहीं होगा, तब तक 'आशा' और 'सफलता' का असली महत्व कभी समझ में नहीं आ सकता। इसलिए, निराशा से डरकर भागना कैसा? इसे तो जीवन की प्रगति का एक हिस्सा मानकर, एक चुनौती की तरह स्वीकार करना चाहिए।
कभी-कभी हम अनजाने में कुछ कमियाँ छोड़ देते हैं, या कभी मानवीय स्वभाव के कारण हमसे भूल हो जाती है, जिससे असफलता हाथ लगती है। एक विवेकशील शिव शिष्य वही है जो किसी भी इंसान से बहुत अधिक उम्मीदें लगाने के बजाय, अपनी पूरी क्षमता से कर्म करता है। उसके बाद परिणाम चाहे सफलता मिले या असफलता, उसे गुरु का प्रसाद समझकर 'शिरोधार्य' कर लेता है। जब हम अपनी सोच में इस सकारात्मकता को स्थान देते हैं, तो दुःख का हर कतरा सुख में बदलने लगता है।
गीता का अमर संदेश और अहंकार का विसर्जन
अपनी भूल को भगवान या गुरु की भूल मान लेना हमारी सबसे बड़ी अज्ञानता है। इस संसार के थपेड़ों से डरकर अपना रास्ता मोड़ लेना भला कहाँ का न्याय है? जब भी मन व्याकुल हो, तो महाभारत के उस युद्धक्षेत्र को याद कीजिए जहाँ हताश अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने गीता का अमर संदेश दिया था।
भगवान ने कहा था:
"तुम क्यों रोते हो? तुम्हारा है क्या? तुमने क्या पैदा किया था जो खो गया? और तुम अपने साथ ऐसा क्या लाए थे जो नष्ट हो गया?"
इस एक वाक्य में संसार का पूरा सार छिपा है। हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाएँगे। जो कुछ भी आज हमारे पास है, वह सब उसी परमपिता परमेश्वर का दिया हुआ है। फिर इस संसार की वस्तुओं को खोने पर रोना कैसा?
यह संसार एक विशाल समुद्र की तरह है और हम इंसान उसकी लहरों के समान हैं। एक लहर समुद्र से उठती है और कुछ देर बाद उसी अगाध जल में विलीन हो जाती है। लेकिन इंसान इस छोटे से जीवन में 'अहंकार' से ग्रसित हो जाता है। वह भूल जाता है कि जब तक वह स्वयं को नहीं जानेगा, तब तक उस परमेश्वर की बनाई सृष्टि को कैसे जान पाएगा?
गुरु-चरणों का दास: परम आनंद की प्राप्ति
इस आध्यात्मिक मार्ग पर ज्ञानी होने के अहंकार से कहीं बेहतर है एक अबोध शिष्य बने रहना। जो शिष्य अपनी अज्ञानता को सहर्ष स्वीकार कर लेता है, गुरु की असीम दया सबसे पहले उसी पर बरसती है। जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, वैसे-वैसे एक सच्चे शिष्य के भीतर की जिज्ञासा और विनम्रता भी बढ़ती जाती है। जहाँ अहंकार का नामो निशान नहीं होता, वहीं गुरु की शक्तियां प्रवेश करती हैं। और एक दिन ऐसा आता है जब वह निष्काम शिष्य स्वयं गुरु के स्वरूप में पूजनीय हो जाता है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब निश्छल भक्ति हुई है, तब-तब भगवान को अपने भक्त के आगे झुकना पड़ा है। चाहे वह शिव के प्रति महाकवि विद्यापति का अनन्य प्रेम हो, श्री कृष्ण और सुदामा की निस्वार्थ मित्रता हो, या फिर दुर्योधन के छप्पन भोग छोड़कर विदुर जी के घर साग खाने वाले कृष्ण का प्रेम हो—ये सभी उदाहरण हमें यही सिखाते हैं कि गुरु और भगवान केवल भाव के भूखे हैं।
जीवन की असली पूँजी किसी बक्से या पेटी में बंद धन-दौलत नहीं है। हमारी असली पूँजी तो 'जीव रक्षा' और 'दया का भाव' है। इस भाव को दुनिया की नजरों से छिपाकर रखने के बजाय, अपने मन रूपी मंदिर की सबसे पवित्र कोठी में सजाकर रखना चाहिए। और अंत में, केवल एक ही इच्छा शेष रह जानी चाहिए—कि हम हमेशा शिवगुरु के चरणों के सेवक, उनके दास बने रहें। यही एक शिव शिष्य के जीवन की परम सार्थकता है और यही उसकी अंतिम कामना है।
विचारक:
शिव शिष्य रामलखन शर्मा
(समाजसेवी, जिला संयोजक, नाई संघ, लखीसराय, बिहार)
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