शिवचर्चा और सच्ची श्रद्धा: शिव शिष्य के जीवन का सत्य
ब्रह्मांड के कण-कण में रमे, देवाधिदेव महादेव की असीम अनुकंपा जब किसी जीव पर होती है, तो उसके भीतर एक ऐसी आध्यात्मिक जागृति का जन्म होता है जिसे शब्दों में समेटना समुद्र को गागर में भरने जैसा है। शिवचर्चा की पावन छांव में बैठकर, जब एक साधक अपने अंतर्मन को टटोलता है, तो उसे अहसास होता है कि गुरु और शिष्य के बीच का संबंध कोई लौकिक बंधन नहीं है। यह तो जन्म-जन्मांतर का वह आत्मिक सेतु है, जिस पर चलकर आत्मा सीधे परमात्मा से एकाकार हो जाती है। शिव शिष्य राम लखन शर्मा जी ने अपनी अंतर-अनुभूतियों को डायरी के पन्नों पर जिस आत्मीयता से उकेरा है, वह महज़ शब्द नहीं, बल्कि एक भक्त के हृदय की स्पंदन है, जो हर सनातन प्रेमी के मन को झंकृत कर देती है। आइए, राम लखन जी के उन्हीं दिव्य विचारों की गहराई में उतरकर सच्ची श्रद्धा और आत्मज्ञान के उस मर्म को समझें, जो हमारे जीवन को धन्य कर सकता है।
श्रद्धा: हृदय का अनमोल स्पंदन, बुद्धि का खेल नहीं
अक्सर लोग सोचते हैं कि श्रद्धा किसी तर्क या कसौटी पर कसी जा सकने वाली चीज़ है। परंतु सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। राम लखन जी कहते हैं कि श्रद्धा का सीधा संबंध हमारे हृदय की गहराइयों से होता है, हमारी खोखली बुद्धि से नहीं। बुद्धि तो सदा नफा-नुकसान तौलती है, वह संशय पैदा करती है, किंतु हृदय सिर्फ समर्पण जानता है। जब हम शिव को अपना गुरु स्वीकार करते हैं, तो हमारे भीतर जिस तत्व का प्राकट्य होता है, वह है—सच्चा आत्मविश्वास। यह आत्मविश्वास किसी अहंकार से नहीं जनमता, बल्कि इस परम विश्वास से जनमता है कि 'मेरा गुरु मेरे साथ है।'
बुद्धि में सदा सात्विक विचार रखना और हर परिस्थिति में गुरु के प्रति अडिग रहना ही वास्तविक श्रद्धा है। यह श्रद्धा मनुष्य को वह असीम आंतरिक शक्ति देती है, जिसके बल पर वह संसार के बड़े से बड़े तूफानों से भी मुस्कुराते हुए पार निकल जाता है। सच तो यह है कि जो कार्य श्रद्धा के बिना किया जाता है, उसका कोई अस्तित्व नहीं होता। वह न तो इस लोक में कोई फल देता है और न ही परलोक में उसकी कोई सार्थकता होती है। हमारे जीवन में यदि कोई एकमात्र परम प्रेरणादायक तत्व है, तो वह केवल और केवल हमारे गुरु महादेव हैं।
गीता का संदेश और आत्मज्ञान का दिव्य अनुदान
जब हम इतिहास और शास्त्रों के पन्नों को पलटते हैं, तो पाते हैं कि सनातन संस्कृति का मूल ही श्रद्धा पर टिका है। श्रीमद्भगवद्गीता में साक्षात योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को मन और विचारों के संतुलन का मार्ग दिखाया है। जब गीता के परम विद्वान श्री कृष्ण के उन गहन विचारों का अवलोकन करते हैं, तो वे एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं—सद्ज्ञान, सद्विचार और मन की परम शांति केवल और केवल सच्ची श्रद्धा के माध्यम से ही प्राप्त हो सकती है।
श्रद्धा का दीपक जब अंतर्मन में जलता है, तो वह सबसे पहले हमारी 'विवेक की आँखों' को खोलता है। विवेक यानी सही और गलत के बीच अंतर करने की वह दिव्य दृष्टि, जो हमें संसार के भ्रम जाल से मुक्त करती है। जैसे ही विवेक जाग्रत होता है, वैसे ही महादेव की कृपा से साधक को 'आत्मज्ञान का दिव्य अनुदान' प्राप्त हो जाता है। फिर मनुष्य स्वयं को शरीर मात्र नहीं समझता, बल्कि उस परम चेतना का अंश मानने लगता है।
ज्ञान और अज्ञान: श्रद्धा के दो पहलू
इस संसार में श्रद्धा के दो रूप देखने को मिलते हैं—एक जो ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है, और दूसरा जो अज्ञान के अंधेरे में धकेलता है। राम लखन जी बड़े ही सुंदर ढंग से समझाते हैं कि ज्ञान का अपना एक प्रकाश है, वह स्वतः सिद्ध है। परंतु जब गुरु कृपा से हमारे जीवन से अज्ञान का पर्दा हट जाता है, तो एक चमत्कार घटित होता है। उस स्थिति में मनुष्य के भीतर के सारे दोष, सारे विकार और सारी चिंताएं स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। फिर न तो कोई सांसारिक दुराचार बचता है और न ही किसी प्रकार का संताप या मानसिक कष्ट।
यहीं से एक आध्यात्मिक सत्य का जन्म होता है—जिस मनुष्य ने गुरु शरण में आकर सर्वप्रथम अपना आत्म-कल्याण कर लिया है, केवल वही ज्ञानी पुरुष संसार के दूसरे जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। जिसके पास स्वयं का दीपक बुझा हो, वह भला दूसरों का घर क्या रोशन करेगा? इसलिए, शिव की शरण में आकर पहले स्वयं को रूपांतरित करना होता है। जब श्रद्धा परिपक्व होती है, तो उसका प्रभाव और दिव्य प्रताप मनुष्य के सुविकसित व्यक्तित्व में साफ-साफ परिलक्षित होने लगता है। उसकी वाणी में मधुरता, आँखों में करुणा और व्यवहार में दिव्यता आ जाती है।
मनुष्य और पशु का अंतर: परमात्मा सत्ता का प्रत्यक्ष अनुदान
ईश्वर ने चौरासी लाख योनियों की रचना की, परंतु मनुष्य को एक विशेष गरिमा प्रदान की। राम लखन जी के शब्दों में कहें तो, श्रद्धा अपने आप में परमात्मा-सत्ता का वह प्रत्यक्ष अनुदान है, जो केवल मानव को प्राप्त हुआ है। एक पशु और मनुष्य के बीच का वास्तविक अंतर भोजन, निद्रा या भय से नहीं होता, बल्कि उनके बीच का अंतर श्रद्धा के धरातल पर ही प्रारंभ होता है। पशु केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित है, लेकिन मनुष्य अपनी श्रद्धा के बल पर अनंत परमात्मा को भी अपने हृदय में बांध सकता है।
जिस भाग्यशाली जीव ने इस जीवन में सच्ची श्रद्धा को अर्जित कर लिया, समझो उसने मानव जीवन के सर्वांगीण सफलता के परम लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। इसके विपरीत, जो व्यक्ति श्रद्धा से विहीन है, वह संसार की किसी भी साधना, किसी भी साध्य या किसी भी दैवीय नियम को महत्व नहीं देता। ऐसा अज्ञानी व्यक्ति भीतर से सदा खोखला रहता है। श्रद्धा के अभाव में वह वासनाओं और माया के थपेड़े खाता हुआ भटकता रहता है। उसके मन में केवल और केवल प्रत्यक्ष स्वार्थ ही दिखाई देता है। वह हर रिश्ते में, हर कर्म में सिर्फ अपना तात्कालिक लाभ ढूंढता है।
पथभ्रष्टता और भटकाव से मुक्ति का मार्ग
जब मनुष्य केवल स्वार्थ को ही अपना सर्वस्व मान लेता है, तो वह एक दिशाहीन पथिक की तरह हो जाता है। वह एक ऐसी विलासिता और अंधी लालसा की अंधी दौड़ में शामिल हो जाता है, जहाँ उसकी इंद्रियों पर उसका कोई अंकुश नहीं रहता। वह बार-बार गलतियाँ करता है, पाप कर्मों में लिप्त होता है, परंतु उसे कभी अपनी भूल पर पश्चाताप नहीं होता। वह सही और गलत का निर्णय करने की क्षमता पूरी तरह खो देता है।
परंतु, जैसे ही वह शिव को गुरु मानकर श्रद्धा के मार्ग पर कदम बढ़ाता है, उसका जीवन बदलने लगता है। श्रद्धा मनुष्य को संकीर्णता से उठाकर उस 'विराट' परमेश्वर के साथ जोड़ देती है। वह उसे ऊंचे आदर्शों और मानवीय गरिमा के साथ बांध देती है। श्रद्धा का नियम बहुत सीधा और स्पष्ट है—बिना अपनी दिशा बदले, गुरु के वचनों पर अडिग रहकर बस चलते रहो। यदि आपमें धैर्य है और गुरु पर पूर्ण विश्वास है, तो एक न एक दिन आप अपने उस 'निमित्त स्थान' यानी मोक्ष और परम शांति को अवश्य पा जाएंगे, जिसके लिए यह मानव देह मिली है।
श्रद्धा बनाम अंधश्रद्धा: मृत और जीवित जैसा अंतर
आध्यात्मिक मार्ग पर चलते समय एक बहुत बड़ी चेतावनी को समझना अत्यंत आवश्यक है, जिसकी ओर रामलखन जी ने हमारा ध्यान आकर्षित किया है। वह है—सच्ची श्रद्धा और अंधश्रद्धा के बीच का बारीक अंतर। अंधश्रद्धा वह कुआँ है जहाँ विवेक पूरी तरह मर जाता है। अंधश्रद्धा पर हमेशा अविवेक और अज्ञान की घनी छाया रहती है। वहाँ मनुष्य के पास उचित और अनुचित का विश्लेषण करने का न तो समय होता है और न ही समझ।
इतिहास गवाह है कि इसी अंधश्रद्धा के आधार पर समाज में अनेकानेक कुरीतियां, पाखंड और कुप्रथाएं पनपीं और परिपक्व हुईं, जिन्होंने मानवता को लहूलुहान किया। राम लखन जी बड़े ही कड़े और स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त सच्ची श्रद्धा और इस विवेकहीन अंधश्रद्धा में उतना ही अंतर है, जितना कि एक 'जीवित' और 'मृत' व्यक्ति में होता है। अंधश्रद्धा आत्मघाती है, जबकि सच्ची श्रद्धा जीवनदायिनी है।
स्वार्थ का त्याग और आत्मीयता का विस्तार
अपने भीतर की स्वार्थपरता को पूरी तरह से त्याग देना और संसार के हर जीव के प्रति आत्मीयता का भाव अपनाना ही श्रद्धा की सबसे सुंदर और सच्ची अभिव्यक्ति है। जब हम 'वसुधैव कुटुंबकम्' के भाव से भर जाते हैं, तो हमारे भीतर उस श्रेष्ठतम चेतना का संचार होता है जो साक्षात शिव रूप है। इसी चेतना से हमारे मन में नि:स्वार्थ भाव से जनकल्याण करने की भावना को बल मिलता है। फिर मनुष्य केवल अपने परिवार या अपने हित के लिए नहीं जीता, बल्कि वह समूचे संसार के कल्याण की प्रार्थना करने लगता है—सर्वे भवंतु सुखिनः।
श्रद्धा कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि यह एक विज्ञान है। श्रद्धा के हर पहलू को, उसके हर एक बिंदु को ठीक उसी तरह तपा कर देखा और परखा जा सकता है, जैसे सोने को आग में तपा कर उसकी शुद्धता जांची जाती है। युगों-युगों से विद्वानों और संतों का यह मत पूरी तरह साफ़ और स्पष्ट रहा है कि जब जीवन में 'शिवचर्चा' की पावन घड़ी आती है, तो वहाँ केवल और केवल आपकी शुद्ध श्रद्धा ही मायने रखती है। वही श्रद्धा उस परमात्मा को रिझा सकती है।
शिव शिष्य का परम सत्य
अंततः, श्रद्धा ही मानवों की वह 'चेतन जड़' है, जिसके बिना जीवन का यह कल्पवृक्ष पूरी तरह सूख जाएगा। इसी श्रद्धा के बल पर आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्यों को ईश्वर से अनमोल वरदान और सिद्धियां प्राप्त हुई हैं। आज एक शिव शिष्य के रूप में हमारा यह परम कर्तव्य है कि हम राम लखन जी के इन दिव्य और मर्मस्पर्शी विचारों को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि इन्हें अपने व्यावहारिक जीवन में उतारें।
हमें गुरु महादेव के दिखाए मार्ग का पूरी आत्मीयता से अनुकरण करना चाहिए और सत्य, प्रेम तथा करुणा के सही रास्ते को अपनाना चाहिए। यही हमारी अपने गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही हमारी वास्तविक श्रद्धा होगी। आइए, हम सब मिलकर अपने अंतस के शिव को पुकारें और कहें—"हे महादेव, आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर अपनी दया बनाए रखिएगा।"
अनुभवकर्ता एवं विचारक:
शिव शिष्य श्री रामलखन शर्मा
(समाजसेवी, जिला संयोजक, नाई संघ, लखीसराय, बिहार)
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