मन मंदिर की खोज: ईश्वर से कैसा हो हमारा संबंध?

पर्वतों के बीच एक योगी ध्यान में मग्न हैं, जिनके सामने एक मंदिर है। इमेज में वेबसाइट 'Sen Saarthi', लेखक 'रामलखन शर्मा' और शीर्षक 'मन मंदिर की खोज: ईश्वर से कैसा हो हमारा संबंध?' हिंदी में लिखा है।

इस संसार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य जीवन भर प्रेम की खोज में भटकता रहता है। वह सांसारिक रिश्तों में, भौतिक वस्तुओं में और बाहरी दुनिया के कोलाहल में उस परम आनंद को तलाशता है, जिसे केवल भीतर की शांत गुफा में ही पाया जा सकता है। एक सच्चे शिव शिष्य के अंतर्मन से निकले ये विचार किसी कागज़ के पन्नों पर बिखरी इबारत मात्र नहीं हैं, बल्कि यह एक आत्मा का अपनी परमात्मा से मिलन का जीवंत आख्यान है। जब कोई भक्त अपनी लौकिक यात्रा से थककर उस अलौकिक सत्ता की ओर कदम बढ़ाता है, तो उसके भीतर एक ही प्रश्न गूँजता है—आखिर इस चराचर जगत के स्वामी के साथ मेरा संबंध कैसा होना चाहिए?

समर्पण: एक बीज से विशाल वटवृक्ष बनने की यात्रा

समर्पण कोई विवशता नहीं है, न ही यह किसी के सामने घुटने टेकना है। समर्पण तो हृदय का वह अत्यंत कोमल और आवश्यक भाव है, जिसके बिना चेतना का विकास असंभव है। जब हम अपने आत्मीय जनों के प्रति समर्पित होते हैं, तभी हम उनके प्रिय बन पाते हैं। लेकिन जब यही समर्पण उस परमेश्वर के प्रति होता है, तो यह हमारे लौकिक और परलौकिक, दोनों जीवन की उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर देता है।

इसे समझने के लिए प्रकृति के इस अद्भुत रहस्य को देखना होगा। जब एक छोटा सा बीज मिट्टी की गोद में खुद को पूरी तरह सौंप देता है, तभी उसके भीतर एक जादुई रूपांतरण शुरू होता है। वह बीज मिट्टी में विलीन होता है—यही उसका समर्पण है। इसके बाद, प्रकृति की तमाम शक्तियां उसकी सेवा में लग जाती हैं। सूर्य की कोमल किरणें उसे अंधकार से बाहर निकलने की शक्ति प्रदान करती हैं, बहती हुई पवन उसे दुलारती है, और आकाश से बरसते मेघ अमृत जल से उसका अभिषेक करते हैं।

धीरे-धीरे वह नन्हा सा बीज एक विशाल, गगनचुंबी वृक्ष का रूप ले लेता है। वह वृक्ष न केवल अडिग खड़ा रहता है, बल्कि आने वाली सैकड़ों पीढ़ियों के लिए आश्रय, छाया और जीवन का जनक बन जाता है। एक भक्त का जीवन भी ठीक इसी प्रकार का होना चाहिए। जब हम अपने अहंकार को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तो ईश्वर स्वयं हमारे जीवन का पोषण करने लगते हैं। संबंधों की मधुरता और जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इस समर्पण भाव का होना अनिवार्य है।

शिशु-सुलभ विश्वास और गुरु-शिष्य परंपरा

अक्सर लोग भक्ति को एक बहुत ही कठिन, दुर्गम और नीरस रास्ता मान लेते हैं। वे सोचते हैं कि ईश्वर को पाने के लिए कठोर तपस्या, कठिन अनुष्ठान या संसार का त्याग करना आवश्यक है। परंतु एक सच्चे साधक का अनुभव कहता है कि प्रभु के साथ हमारा संबंध तो एक अबोध शिशु जैसा होना चाहिए। एक छोटा बच्चा जब अपनी माँ की गोद में होता है, तो उसे संसार के किसी भी भय का आभास नहीं होता। उसे पूर्ण विश्वास होता है कि उसकी माँ उसे कभी गिरने नहीं देगी।

ठीक ऐसा ही सहज और अडिग विश्वास हमें उस परम सत्ता पर रखना होगा। भक्ति की किसी जटिल और कठिन राह पर चलने के बजाय, यदि हम शिष्य और गुरु का रास्ता अपना लें, तो जीवन अत्यंत सुगम हो जाता है। गुरु और शिष्य, या भगवान और भक्त, वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही अधूरा है। यदि शिष्य नहीं होगा तो गुरु का ज्ञान किसे मिलेगा? और यदि गुरु नहीं होगा तो शिष्य को सन्मार्ग कौन दिखाएगा? एक को खोजे बिना दूसरे को पा लेना सर्वथा निरर्थक और असंभव है।

लोग अक्सर पत्थरों की दीवारों में, ऊंचे शिखरों वाले मंदिरों में ईश्वर को ढूंढते हैं। मंदिर निश्चित रूप से एक पवित्र और भावात्मक स्थल है, जो हमें भक्ति की प्रेरणा देता है। परंतु वास्तविक मंदिर तो हमारा 'मन' है। हमें अपने मन-मंदिर की उस गहरी भावना को पहचानना होगा, जहाँ स्वयं परमात्मा निवास करते हैं। जब हम अपने भीतर के इस मंदिर को साफ कर लेते हैं, तो ईश्वर से एक प्रत्यक्ष, व्यक्तिगत, मधुर और घनिष्ठ संबंध स्थापित हो जाता है।

वास्तविक स्वरूप की खोज और संतुलित जीवन

इस संसार के कोलाहल में हम यह पूरी तरह भूल चुके हैं कि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है। हम खुद को शरीर, पद, प्रतिष्ठा और सांसारिक बंधनों से तौलने लगते हैं। परंतु एक साधक का मन हमेशा अपनी आत्मा को सुसंस्कृत करने का प्रयास करता है। आत्मा को सुसंस्कृत करने का सीधा अर्थ है—अपने भीतर छिपे आसुरी या नकारात्मक प्रवृत्तियों का शमन करना और 'परम सत्य' को स्वीकार करना।

वह परम सत्य ईश्वर ही है। ईश्वर ही वह परम तत्व है जिस पर यह संपूर्ण दृश्य और अदृश्य सृष्टि टिकी हुई है। यदि हमें इस जीवन को सार्थक बनाना है, तो हमें केवल इतना करना होगा कि हम अपने दैनिक जीवन की प्रत्येक छोटी-बड़ी गतिविधि में ईश्वर को अधिकाधिक सम्मिलित करें। सुबह सोकर उठने से लेकर रात को सोने तक, हमारे हर कार्य में प्रभु का स्मरण होना चाहिए। यह केवल कुछ मिनटों की धूप-दीप या कर्मकांड से संभव नहीं है। इसके लिए जीवन की हर हलचल को, हर कर्म को गुरु और शिष्य के पवित्र भाव में ढालना होगा।

जब हम इस भाव में स्थिर हो जाते हैं, तो एक अद्भुत रहस्य प्रकट होता है। सांसारिक प्रेम में दूरियां होती हैं, अलगाव का भय होता है। परंतु जब भगवान अपने प्रेम स्वरूप भाव से भक्त पर करुणा करते हैं, तो वे हर क्षण, हर समय हमारे सबसे निकट आकर खड़े हो जाते हैं। गुरु और शिष्य का यह रिश्ता ऐसा है जो काल और स्थान की सभी सीमाओं को तोड़कर आत्माओं को एक-दूसरे के सम्मुख ला देता है।

अलौकिक प्रेम और आंतरिक आनंद का उदय

जब मनुष्य का संबंध उस परमेश्वर से गहराई से जुड़ जाता है, तो उसके भीतर एक ऐसी दिव्य आंतरिक शक्ति और अलौकिक आनंद का संचार होता है जिसकी तुलना संसार के किसी वैभव से नहीं की जा सकती। यह वह आनंद है जो मनुष्य को संसार के बड़े से बड़े दुखों, कष्टों और संतापों से ऊपर उठाने में पूरी तरह सक्षम है। ऐसी अवस्था में भक्त के मुख से अनायास ही यह अमृतवाणी फूट पड़ती है—"आप ही मेरे गुरु हैं, आप ही मेरी आंतरिक शक्ति हैं, और आपके चरण ही मेरे लिए सकल तीर्थ हैं।"

ज्ञान के अभाव में आज का इंसान इस संसार के मायाजाल के भंवर में दिन-प्रतिदिन और गहरा फंसता चला जा रहा है। वह जिसे सुख समझता है, वह केवल क्षणिक भ्रम है। इस सांसारिक या लौकिक प्रेम में हमेशा कोई न कोई शर्त छिपी होती है, जहाँ केवल लेने की होड़ मची है। इसके विपरीत, ईश्वर का अलौकिक प्रेम पूरी तरह से शर्त-रहित होता है।

ईश्वर के सानिध्य में रहने के लिए हमें भी उसी शर्त-रहित प्रेम की मनोवृत्ति को अपनाना होगा। जहाँ केवल देने का भाव हो, समर्पण का भाव हो। जब भक्त इस दिव्य भाव से भर जाता है, तो उसे एक ऐसी विशेष और अतींद्रिय अनुभूति प्राप्त होती है, जिसका आनंद केवल वही समझ सकता है जिसने इसे चखा हो। यह आनंद, यह शांति और यह परम तृप्ति किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि गुरुदेव के प्रति शिष्य भाव में छिपी अटूट और अडिग आस्था का ही साक्षात परिणाम है।

अपने मन को मंदिर बनाकर, उसमें श्रद्धा का दीप जलाकर, जब हम उस परम सत्ता को अपना सर्वस्व सौंप देते हैं, तब यह जीवन सचमुच सफल हो जाता है। यही एक सच्चे शिव शिष्य की पुकार है, यही मानवता के कल्याण का शाश्वत मार्ग है।

शिव शिष्य एवं विचारक:

रामलखन शर्मा

(समाजसेवी, जिला संयोजक, नाई संघ, लखीसराय, बिहार)


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प्रिय पाठकों, एक सच्चे शिष्य का जीवन समर्पण और विश्वास की अनवरत यात्रा है। राम लखन शर्मा जी के इन दिव्य और जीवंत विचारों ने आपके हृदय को किस प्रकार छुआ? ईश्वर और गुरु के साथ आपके संबंध का अनुभव कैसा रहा है? अपने अनमोल विचार, अनुभव या कोई भी जिज्ञासा नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ ज़रूर साझा करें। आपकी एक टिप्पणी इस आध्यात्मिक परिवार को और समृद्ध बनाएगी। हर-हर महादेव! 🙏


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