आँसुओं में समाया साधुत्व: मोकामा की वो ऐतिहासिक और भावुक यात्रा

मोकामा सम्मेलन का दृश्य जहाँ रामलखन शर्मा जी का आध्यात्मिक व्यक्तित्व और 'साधु' स्वरूप दुनिया के सामने प्रकट हुआ।


​प्रस्तावना: यात्रा केवल भूगोल की नहीं, भावनाओं की भी

​पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे 1987 के उस दौर में, अली नगर सूर्यगढ़ा के मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक, कपिल देव शर्मा और सूर्यगढ़ प्रखंड नाई सभा के कर्मठ अध्यक्ष, भाई रामलखन जी के बीच एक निस्वार्थ और पारिवारिक संबंध बन गया था। चननियाँ गाँव का वो कच्चा घर और मुगशौड़ा जमालपुर में बाबा धर्मदास मंदिर के निर्माण में रामलखन जी का प्रेरक योगदान, उनके विराट व्यक्तित्व की महक फैला रहा था।

​लेकिन, जीवन की सबसे गहरी सीख अक्सर सबसे कठिन यात्राओं में मिलती है। यह भाग उस यात्रा का साक्षी है, जहाँ भूगोल की दूरियाँ कम पड़ गईं और दो दिलों के बीच का आध्यात्मिक संबंध हमेशा के लिए अमर हो गया। यह मोकामा के उस सम्मेलन की कहानी है, जहाँ रामलखन जी के भीतर छिपा एक 'साधु' दुनिया के सामने प्रकट हुआ।

​आमंत्रण और विवशता: स्नेह का मीठा दवाब

​साल 1987 का ही समय था। मोकामा प्रखण्ड नाई सभा का एक विशाल सम्मेलन औंटा ग्राम में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन की पूरी देख-रेख आदरणीय लक्ष्मी ठाकुर जी के कुशल हाथों में थी। सम्मेलन बड़ा था, और उद्देश्य था स्वजातीय भाईचारे को मजबूत करना।

​भाई रामलखन जी को इस सम्मेलन में न केवल निमंत्रण था, बल्कि वे इसके मुख्य स्तंभों में से एक थे। लेकिन, हमारे संबंधों की गहराई ऐसी थी कि उन्होंने अपने साथ-साथ मुझे भी इस आयोजन का हिस्सा बनाने का निश्चय कर लिया। उन्होंने प्रेम वश और शायद मुंगेर जिला पदाधिकारी (अधिकारी) के रूप में मेरी गरिमा को देखते हुए, अतिथि वक्ताओं की सूची में मेरा नाम शामिल कर दिया।

​जब उन्होंने मुझे यह बात बताई, तो मेरे सामने दोहरी चुनौती थी। एक तरफ स्कूल की जिम्मेदारियाँ और दूसरी तरफ इतनी दूर की यात्रा। मैंने अपनी असमर्थता जताई, लेकिन रामलखन जी उस समय एक भाई के अधिकार से बात कर रहे थे। उन्होंने जोर दिया, जिद्द की, और अंततः मुझे सम्मेलन में जाने के लिए 'बाध्य' कर दिया। उनके स्नेहपूर्ण दवाब के आगे मेरी हर दलील फीकी पड़ गई। यह एक ऐसा मीठा बंधन था, जिसे तोड़ना मेरे लिए संभव नहीं था।

​यात्रा का संघर्ष: बाधाओं की परीक्षा

​निर्धारित दिन, हम दोनों ने यात्रा शुरू की। चूँकि मैं स्कूल में कार्यरत था, इसलिए छुट्टी की व्यवस्था करनी पड़ी। उस दौर में यात्राएँ आज की तरह सुगम नहीं थीं। सड़कें संकरी थीं और साधन सीमित। हमारे निकलने के समय से ही बाधाएँ हमारा रास्ता रोकने लगीं।

​स्कूल से छुट्टी लेकर जब हम आगे बढ़े, तो रास्ते की परेशानियाँ बढ़ती ही गईं। और फिर, वो हुआ जिसकी हमें आशंका थी। 'रामपुर डुमरा' के पास हम एक भीषण रोड जाम में फंस गए। गाड़ियों की लंबी कतारें, धूल, गर्मी और बढ़ता समय—हर पल हमारी परीक्षा ले रहा था।

​समय तेजी से हाथ से फिसल रहा था। सम्मेलन शुरू होने का समय कब का बीत चुका था। हमारे चेहरों पर चिंता की लकीरें गहरी हो गईं। मुझे अपनी स्कूल की छुट्टी और इतनी मेहनत से की गई तैयारी बेकार जाती हुई लग रही थी। रामलखन जी भी खामोश थे, लेकिन उनकी खामोशी में एक अजीब सी तड़प थी। उन्हें अपने समाज के लोगों के बीच न पहुँच पाने का दुःख खाए जा रहा था।

​वो निर्णायक क्षण: वापसी का विचार और एक संकल्प

​काफी समय बीत गया। सूरज ढलने को था और जाम खुलने का कोई नाम नहीं ले रहा था। निराशा अपने चरम पर थी। अंततः, हमारे बीच 'आदान-प्रदान' (बातचीत) शुरू हुई।

​तर्क कह रहा था कि अब आगे बढ़ना बेकार है। जब तक हम पहुँचेंगे, सम्मेलन खत्म हो चुका होगा। वापसी ही एकमात्र विकल्प नजर आ रही थी। हमने भारी मन से विचार किया कि क्यों न यहीं से लौट चलें। 'लौट जाने का विचार उठा, अनायास ही'।

​लेकिन, तभी कुछ हुआ। मेरे भीतर से, आत्मा की गहराइयों से, एक आवाज उठी। मैंने रामलखन जी की ओर देखा, उनके चेहरे की हताशा को पढ़ा। और फिर, मैंने वो बात कही जिसने इस पूरी यात्रा का उद्देश्य ही बदल दिया।

​मेरे मन से अचानक यह बात उठी— "नहीं भाई रामलखन, मैं उस धरती को नमन कर लौटूंगा जिस धरती पर बैठ कर मेरे नाई-भाई दुःख-सुख सुनें और सुनायें होंगे।"

​यह केवल एक वाक्य नहीं था। यह मेरे भीतर का सम्मान था उस समाज के प्रति, उस संघर्ष के प्रति, और उस निस्वार्थ भाव के प्रति जिसके लिए रामलखन जी अपना जीवन दे रहे थे। मेरे लिए अब सम्मेलन में पहुँचना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि उस पवित्र स्थान को स्पर्श करना महत्वपूर्ण था जहाँ मेरे समाज के लोग जुटे थे।

​आँसुओं का सैलाब: साधुत्व का प्रकटीकरण

​मेरे ये शब्द, रामलखन जी के 'जेहन' (मन) में किसी तीर की तरह उतर गए। उन्होंने मुझे कुछ पल हैरानी से देखा। वो एक ऐसा क्षण था जहाँ शब्द छोटे पड़ गए थे।

​और फिर, वो दृष्य हुआ जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकता। रामलखन जी, वो निडर सामाजिक नेता, वो कर्मठ व्यक्तित्व, अचानक टूट गए। वे एक छोटे 'बच्चा' के तरह फफक-फफक कर रो पड़े।

​उनके वो आँसू साधारण नहीं थे। उन आँसुओं में दुःख नहीं, बल्कि एक असीम 'भाव' था—एक ऐसा भाव जिसे शब्दों में बांधना, जिसकी कल्पना करना या जिसके बारे में सोचना भी मानवीय सोच से परे है। वो आँसू उनके समाज के प्रति अटूट प्रेम, मेरे प्रति गहरी कृतज्ञता, और उस पल की आध्यात्मिक पवित्रता का संगम थे। उस दिन, मैंने जाना कि एक मजबूत शरीर के भीतर कितना कोमल और पवित्र हृदय धड़कता है। उस पल, रामलखन जी मुझे एक साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि एक 'साधु' के रूप में नजर आए, जो समाज के दुखों को अपने आँसुओं में धो रहा था।

​मोकामा का स्वागत: अंधकार में सूर्य की किरण

​काफी मशक्कत के बाद जाम खुला और हम आगे बढ़े। जब हम 'औंटा ग्राम' पहुँचे, तो काफी रात हो चुकी थी। सम्मेलन लगभग अपने अंतिम चरण में था। हमें लगा था कि सब लोग जा चुके होंगे।

​लेकिन, हमारी सोच गलत थी। जैसे ही हमारी गाड़ी रुकी, 'सम्मेलन की बाकी की हाल क्या कहूँ', दृष्य पूरी तरह बदल गया। दोनों आदमी बहुत लेट (देरी) से पहुँचे थे, इसके बावजूद लोगों का 'उत्साह और उमंग' देखने लायक था।

​जैसे ही लोगों ने रामलखन जी को देखा, पूरी सभा गद्गद हो गई। लोग अपनी सीटों से दौड़ पड़े। 'अगवानी' (स्वागत) के लिए ऐसी भीड़ उमड़ी कि लग रहा था कोई महान विजेता आया हो। उन्होंने हमें 'फूलों-माला से लाद दिया'। वो स्वागत ऐसा था कि 'लगा जैसे कि अंधेरी रात में सूर्य की किरण निकल गया हो'।

​देरी के बावजूद लोगों का वो निस्वार्थ प्रेम और रामलखन जी के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा ने सिद्ध कर दिया कि रामलखन जी ने समाज के दिलों में राज किया था। यह ख्याति, यह सम्मान, कोई पद या पैसा नहीं खरीद सकता था। यह केवल निस्वार्थ 'कर्मठता' और 'सच्चे इंसान' होने का फल था।

​उपसंहार: एक साधु का संस्मरण

​मोकामा की उस रात ने मेरे लिए रामलखन जी के व्यक्तित्व को एक नई परिभाषा दी। मैं उन्हें एक मित्र, एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में जानता था। लेकिन, रामपुर डुमरा के उस जाम में उनके वो आँसू और मोकामा में उनका वो भव्य स्वागत—इन सबने मिलकर मुझे एक गहरे निष्कर्ष पर पहुँचाया।

​मैंने भाई रामलखन जी को केवल एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि 'एक साधु' के रूप में पाया। एक ऐसा साधु जिसका मंदिर समाज था और जिसकी पूजा सेवा थी।

​आज, जब मैं इन पुरानी यादों को संजोता हूँ, तो मुझे गर्व होता है कि मुझे ऐसे विराट व्यक्तित्व का सानिध्य मिला। यह संस्मरण केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सीख है कि कैसे निस्वार्थ भाव से किया गया कर्म इंसान को 'साधुत्व' के करीब ले जाता है।

लेखक:

​कपिलदेव शर्मा 

(प्रधानाध्यापक, मुंगेर)

प्रस्तुति:

सेन सारथी टीम


"रामलखन जी के आँसुओं ने समाज के प्रति उनके गहरे समर्पण को दर्शाया। क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा क्षण आया है जब किसी के निस्वार्थ भाव ने आपको झकझोर दिया हो? अपने अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें और इस प्रेरक कहानी को औरों तक पहुँचाने में मदद करें।"



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यह संस्मरण श्री कपिल देव शर्मा (प्रधानाध्यापक, मुंगेर) की मूल स्मृतियों पर आधारित है।

​Disclaimer: अस्वीकरण: यह लेख 1987 की घटनाओं और लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों का संकलन है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। 

टिप्पणियाँ

  1. Sen Saarthi' website ko dil se dhanyavaad, jo hamare samaj ke nayako ko ham tak pahunchane ka sarahniya karya kar rahe hai. Isse hame 'samaajik karya' karne me prerna milta hai.

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