मुंगेरीलाल का महल और बीवी का बेलन: एक तीखा व्यंग्य
डिस्क्लेमर: यह कहानी समाज में पनपते उन गैर-जिम्मेदार रवैयों और घटनाओं से प्रेरित एक विशुद्ध साहित्यिक व्यंग्य है, जहाँ लोग विवाह जैसे पवित्र बंधन में बँधने के बावजूद पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ लेते हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष की भावना को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि हास्य-व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक व्यवहार पर एक कटाक्ष करना है। इसमें प्रयुक्त सभी पात्र, स्थान, संस्थाएं और घटनाएं पूर्णतः काल्पनिक हैं। इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं है। यदि कोई समानता पाई जाती है, तो उसे मात्र एक संयोग ही समझा जाए।
नवाबियत, शक्ल-सूरत और कॉन्फिडेंस की खान
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं—एक वो जो मेहनत करके नाम कमाते हैं, और दूसरे हमारे अमरचंद उर्फ 'मुंगेरीलाल'। मुंगेरीलाल की सबसे बड़ी खूबी उनकी शक्ल-सूरत थी। गोरा-चिट्टा रंग, मासूम चेहरा और लच्छेदार बातें। कोई पहली बार देख ले तो धोखा खा जाए कि बंदा सीधा स्वर्ग से उतरा है। लेकिन इस मासूम चेहरे के पीछे छुपा था 'ऑल इंडिया लपेटू संघ' का राष्ट्रीय अध्यक्ष!
मुंगेरीलाल की सबसे बड़ी कला थी उनका आत्मविश्वास। वे जब झूठ बोलते थे, तो सामने वाला अपनी आँखों और कानों पर शक करने लगता था। वे इतने यकीन से कह देते थे कि "अरे भाई! मैंने तो कल रात मंगल ग्रह पर चाय पी है," कि सुनने वाला एक पल को सोचने लगता कि कहीं मंगल ग्रह पर कोई टपरी खुली तो नहीं? हालांकि बाद में जब सच सामने आता, तो ठगे गए इंसान के पास सिर्फ हाथ मलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता था।
बात 90 के उस स्वर्णिम दशक की है जब मोबाइल फ़ोन नहीं थे और लोग दूसरों की बातों पर सीधे भरोसा कर लिया करते थे। मुंगेरीलाल की शादी घर-परिवार की मर्जी से बड़ी धूमधाम से हुई। शादी तो हो गई, पर नवाब साहब के पास फुटी कौड़ी कमाने का कोई जरिया नहीं था।
1500 रुपये की पहली डकैती और गायब होने की कला
शादी के कुछ ही समय बाद मुंगेरीलाल के दूर के रिश्तेवाले दादाजी ने सोचा कि पोता को सही रास्ते पर लाया जाए। दादाजी ने जान-पहचान के एक बड़े ठेकेदार से बात की और मुंगेरीलाल को काम पर लगवा दिया। लेकिन काम शुरू करने से पहले ही मुंगेरीलाल के भीतर का नवाब जाग उठा। उन्होंने अपने भोले-भाले दादाजी के कान भरे, "दादाजी! घर में राशन-पानी नहीं है, थोड़ा पॉकेट खर्च चाहिए, हाथ खाली है। ठेकेदार साहब से 1,500 रुपये एडवांस दिलवा दीजिए।"
90 के उस दौर में, जब दिहाड़ी मजदूर की पूरे दिन की कमाई बमुश्किल 35 से 40 रुपये होती थी, 1,500 रुपये की रकम किसी खजाने से कम नहीं थी। आज के हिसाब से समझ लीजिए कि किसी नए-नवेले कामगार ने पहले ही दिन 30,000 रुपये एडवांस मांग लिए हों!
दादाजी भी पोते के मासूम चेहरे के झांसे में आ गए। उन्होंने ठेकेदार से सिफारिश करके 1,500 रुपये दिलवा दिए। मुंगेरीलाल ने बड़ी विनम्रता से पैसे जेब में डाले। फिर क्या था? पूरे 10 दिन तक उन्होंने साइट पर आकर गारा-मिट्टी छूने का नाटक किया और 11वें दिन... हवा में उड़न छू! न ठेकेदार को खबर, न दादाजी को पता। मुंगेरीलाल पैसे समेटकर रातों-रात शहर से चंपत हो चुके थे। बेचारे दादाजी ठेकेदार के सामने ऐसे मुँह छिपाते फिरे मानो बैंक डकैती उन्होंने ही की हो।
बीवी को 'ताजमहाल' के सपने और चिट्ठियों की जलेबी
यहाँ से फरार होकर मुंगेरीलाल जी सीधे पहुँचे अपनी नई-नवेली बीवी के पास। बीवी बेचारी सीधी-सादी थी। मुंगेरीलाल ने उसकी आँखों में आँखें डालकर ऐसा रंग बाँधा कि शाहजहाँ भी कब्र में शरमा जाए!
"सुनो प्रिय! मैं परदेश जा रहा हूँ। वहाँ मैं इतना पैसा कमाऊँगा, इतना पैसा कमाऊँगा कि तुम्हारे लिए एक ऐसा आलीशान महल बनाऊँगा जिसकी दीवारें संगमरमर की होंगी। हम दोनों राजा-रानी की तरह रहेंगे!" बीवी ने अपने रूपवान पति की लच्छेदार बातों पर यकीन कर लिया और आँखों में सपनों का महल सजाकर विदा कर दिया।
परदेश गए एक महीना बीता, दो महीने बीते और बीतते बीतते साल बीता! मुंगेरीलाल का कोई अतापता नहीं। डाकिया कभी-कभार दो-तीन महीने में एक बार आता और एक चिट्ठी थमा जाता। उस चिट्ठी में भी वही हवा-हवाई बातें लिखी होती थीं—"जल्द ही बहुत सारा पैसा लेकर आ रहा हूँ, महल की नींव खोदी जा रही है।"
जब दो साल तक महल का एक गारा भी गाँव नहीं पहुँचा, तो बीवी के सब्र का बाँध टूट गया। गाँव में उसके सिवा कोई और संभालने वाला था नहीं। आखिरकार उसने अपने ससुरजी यानी मुंगेरीलाल के पिता जी से रो-रोकर कहा, "बाबुजी, अब बहुत हुआ। खतों के सहारे परिवार नहीं चलता। मुझे मेरे पति के पास ले चलो!"
पिताजी का 'मद्रास एक्सप्लोरर' और 8वीं मंजिल का सरप्राइज
पिताजी ने अपनी बहु को साथ लिया और दो दिन का लंबा रेल सफर करके तमिलनाडू के मद्रास शहर पहुँचे। मद्रास में पिताजी ने अपनी बहु को अपने भाई (यानि बहु की चचेरा ससुर) के घर सुरक्षित ठहराया और खुद 'मुंगेरीलाल खोज अभियान' पर निकल पड़े।
90 के दशक में बिना किसी पते और मोबाइल के किसी शहर में इंसान को ढूँढना समंदर में सुई ढूँढने जैसा था। पिताजी रोज सुबह निकलते—कभी नाली खोदने वाले मजदूरों से पूछते, कभी मिट्टी ढोने वाले ठेकेदारों से अमरचंद का हुलिया बताते, तो कभी बालू की गाड़ियों के चक्कर काटते। 4 से 5 दिन तक पिताजी की चप्पलें घिस गईं, पैर सूज गए, लेकिन मुंगेरीलाल का कोई सुराग नहीं मिला।
आखिरकार, एक दिन बस से लगभग 12 किलोमीटर दूर एक रेत के ठेकेदार ने सुराग दिया, "हाँ भाई! एक गोरा-चिट्टा, पतला सा लड़का यहाँ आता तो है। वो सामने जो गगनचुंबी इमारत बन रही है ना, शायद वहीं काम करता है।"
पिताजी हाँपते-काँपते उस निर्माणाधीन 8 मंजिला इमारत के पास पहुँचे। ऊपर गर्दन उठाकर देखा, तो 8वीं मंजिल पर एक पतला सा लड़का ईंट और गारा ढो रहा था। पिताजी की आँखों पर यकीन नहीं हुआ। ठेकेदार से कहकर उसे नीचे बुलवाया गया।
जैसे ही मुंगेरीलाल नीचे उतरे, पिता और मुंगेरीलाल की नज़रें मिलीं। पिता जी की आँखों से महीनों की थकान, गुस्सा और रुलाई एक साथ बह निकली। और मुंगेरीलाल का चेहरा? ऐसा बन गया जैसे किसी शातिर चोर को पुलिस ने रंगे हाथों मुर्गियों के दड़बे में पकड़ लिया हो!
पैरों पर गिरना और 'देशभक्ति' जैसा भाषण
पिता जी ने खुद को संभाला और डांटना शुरू किया, "तुझे थोड़ी भी शर्म आती है अमरचंद? घर-परिवार, बूढ़ी माँ, भाई और अपनी बीवी को लावारिस छोड़कर यहाँ छुपा बैठा है? घर में तू सबसे बड़ा है, जिम्मेदारी उठाने की जगह तू भगौड़ा बन गया! इसी दिन के लिए शादी किया था? और वो गाँव के ठेकेदार के ₹1,500 हड़पकर भाग आया था, उसका क्या?
पिता जी जैसे ही थप्पड़ उठाया, मुंगेरीलाल जी ने अपनी आखरी चाल चली। वे सीधे अपने पिता जी के पैरों में गिर पड़े और ज़ोर-ज़ोर से घड़ियाली आँसू बहाने लगे।
"पिता जी! मुझे माफ़ कर दीजिए! आप जैसा समझ रहे हैं वैसा नहीं है! मैं यहाँ अपने परिवार के लिए दिन-रात एक कर रहा हूँ। दिन तो दिन, मैं रातों को भी जागकर गारा ढोता हूँ। मैंने अपने परिवार के सपनों के लिए अपनी नींद और चैन त्याग दिया है!" मुंगेरीलाल ने इतना भावुक भाषण दिया मानो वे मद्रास की 8वीं मंजिल पर नहीं, बल्कि देश की सीमा पर जंग लड़ रहे हों।
पिताजी ने कड़क कर कहा, "रहने दे अपनी लच्छेदार बातें! तेरे इस ख्वाब को पूरा होने में ढाई साल लग गए? तूने घर में ढेला नहीं भेजा। अब मैं कुछ नहीं सुनूँगा।
लेकिन मुंगेरीलाल के रोने-धोने और कसमों के आगे पिता जी का दिल पिघल ही गया। अगले दिन पिताजी अपनी बहु को अमरचंद के पास ले आए और हिदायत देकर खुद गाँव लौट गए।
एस्बेस्टस का 'महल' और शराबी 'नौकर-चाकर'
अब मुंगेरीलाल और उनकी बीवी ठेकेदार द्वारा दिए गए एक छोटे से कमरे में रहने लगे, जिसकी छत टीन (एस्बेस्टस) की थी। दोपहर में जब टीन तपती, तो कमरे में भट्टी जैसी गर्मी होती।
बीवी ने कमरे में कदम रखते ही हिसाब माँगना शुरू कर दिया, "अच्छा! तो यही है तुम्हारा वो आलीशान महल? और कहाँ हैं वो नौकर-चाकर जिनका ज़िक्र तुम चिट्ठियों में करते थे?"
मुंगेरीलाल के पास हर बात का जवाब तैयार रहता था। उन्होंने छाती ठोककर कहा, "अरे भाग्यवान! धीरज रखो। ये तो अभी शुरुआत है!"
इसी बीच कमरे में मुंगेरीलाल के कुछ जोडीदार पधारे—जिनमें से कोई ताश का शौकीन था, तो कोई हर वक्त देसी शराब के नशे में धुत रहने वाला पेंटर। बीवी ने जब इन पियक्कड़ों को कमरे में मंडराते देखा, तो उसका पारा चढ़ गया।
मुंगेरीलाल ने तुरंत नया पाँसा फेंका। बीवी के कान में फुसफुसाकर बोले, "अरे! तुम इन पर गुस्सा मत करो। ये मेरे दोस्त थोड़े ही हैं! ये तो मेरे नौकर-चाकर हैं! मेरे आगे-पीछे घूमते हैं। मैं ही इन्हें थोड़ा बहुत खर्चा-पानी दे देता हूँ। अब बेचारे गरीब हैं, ताश-शराब पीना इनकी गंदी आदत है, मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं!"
बीवी का 'स्टिंग ऑपरेशन' और पोल-पट्टी का पर्दाफाश
बीवी भले ही सीधी थी, पर बेवकूफ़ नहीं थी। उसने अपने पति की चालाकी को ताड़ लिया और सच बाहर निकालने के लिए एक ज़बरदस्त 'स्टिंग ऑपरेशन' प्लान किया।
अगले दिन जब वे शराबी दोस्त कमरे पर आए, तो बीवी ने उन्हें नौकर समझकर डांटना और अपमानित करना शुरू कर दिया, "ए भागो यहाँ से! काम-काज नहीं है क्या? मेरे पति के टुकड़ों पर पलते हो और यहाँ आकर जमावड़ा लगाते हो? नौकर हो तो नौकर की तरह रहो!"
बस फिर क्या था! दोस्तों के आत्मसम्मान पर चोट लगी, तो उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
एक दोस्त चिल्लाया, "अबे ओ मुंगेरीलाल! तेरी बीवी हमें नौकर कह रही है? भूल गया परसों जब तूने दो बोतल देसी दारू पिए थे और नाश्ता मँगवाया था, उसके पैसे किसने दिए थे?"
दूसरा दोस्त आगे आया, "और वो जो 200 रुपये तूने मुझसे उधारी लिए थे राशन के लिए, वो कब लौटाएगा? हम तेरे नौकर हैं या तू हमारा कर्ज़दार है?"
तीसरे ने भी पूरा कच्चा-चिट्ठा खोल दिया, "बड़ा आया साहब बनने वाला! हमारी उधारी पर तो तेरी चाय-बीड़ी चलती है और बीवी के सामने हमें नौकर बताता है?"
दोस्तों ने बीवी के सामने मुंगेरीलाल के एक-एक झूठ की ऐसी धज्जियाँ उड़ाईं कि कमरे में सन्नाटा छा गया। पूरा हिसाब-किताब उगलने के बाद दोस्त थूककर चले गए।
क्लाइमैक्स: शेरनी बनी बीवी और बेलन का खौफ
दोस्तों के जाने के बाद मुंगेरीलाल का बचा-कुचा 'कॉन्फिडेंस' भी हवा हो गया। जो मुंगेरीलाल कुछ देर पहले नवाब बने घूम रहे थे, वे शर्म के मारे पानी-पानी होकर एक कोने में दुबक गए।
अब बीवी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। जो बीवी अब तक भीगी बिल्ली बनी सुनती थी, वह अचानक शेरनी बन चुकी थी। उसने झपटकर मुंगेरीलाल का कान पकड़ा और मरोड़ते हुए बोली,
"रहने को छत नहीं, खाने को रोटी नहीं, दूसरों की उधारी पर दारू-चाय चलती है और चला है मेरे लिए आलीशान महल बनाने!"
बीवी ने कान खींचते हुए उन्हें दरवाज़े के पास लाया और फिर रसोई से सीधा 'बेलन' उठा लिया।
बेलन हवा में लहराते हुए बीवी कड़की, "अब चुपचाप सीधे गाँव चलता है या यहीं तेरी पूरी नवाबियत झाड़ूँ? अगर सीधे गाँव नहीं चला, तो आज इसी बेलन से तेरी वो खैरियत लूँगी कि जीवन भर महल बनाना भूल जाएगा!"
आस-पास के टीन के कमरों में रहने वाले मजदूर बाहर निकल आए और ठहाके मारकर हँसने लगे। कोई कह रहा था—"बड़े मियाँ सो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभानअल्लाह!" तो कोई बोल रहा था—"ऊँचे-लंबे बोल बोलने वाले नवाब साहब आज बेलन के आगे बिल्ली बन गए!"
मुंगेरीलाल ने देखा कि सामने बीवी का बेलन है और पीछे हँसती हुई जनता। उन्होंने हाथ जोड़कर तुरंत गाँव लौटने में ही अपनी भलाई समझी। 'आलीशान महल' का सपना तो वहीं मद्रास की 8वीं मंजिल पर छूट गया, और हमारे मुंगेरीलाल जी कान पकड़कर गाँव की ट्रेन पकड़ने के लिए पैदल ही स्टेशन की तरफ दौड़ पड़े!
प्रस्तुतीकरण:
सेना सारथी टीम (The Sen Saarthi Team)
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अस्वीकरण (Disclaimer)
सामाजिक संदेश एवं उद्देश्य:
यह व्यंग्यात्मक रचना समाज में व्याप्त गैर-जिम्मेदाराना रवैये, खोखले दिखावे और पारिवारिक दायित्वों से विमुख होने की प्रवृत्ति पर एक कटाक्ष है। इसका मुख्य उद्देश्य हास्य एवं साहित्य के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करना और साथ ही यह सामाजिक संदेश देना है कि विवाह और परिवार के प्रति जिम्मेदारी ही किसी व्यक्ति के चरित्र का असली परिचय होती है।
इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या किसी की छवि को धूमिल करना नहीं है।
काल्पनिकता एवं चेतावनी:
यह एक विशुद्ध साहित्यिक, हास्यात्मक और काल्पनिक रचना है। इसमें प्रयुक्त सभी पात्र, नाम, स्थान, संवाद एवं घटनाएं लेखक की कल्पना की उपज हैं। इस कहानी का किसी भी जीवित, मृत व्यक्ति, वास्तविक घटना या किसी विशेष परिवार/समुदाय से कोई सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है। यदि किसी पाठक को इसमें किसी घटना या व्यक्ति विशेष की झलक प्रतीत होती है, तो उसे मात्र एक सुखद या दुखद संयोग ही माना जाए।
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